24 अक्टूबर 2013

क्या इसे अंधविश्वास कहेंगे ? Whether These are SUPERSTITIONS ? (Hindi)

क्या इसे  अंधविश्वास कहेंगे ?

 जाके पैर  न फटे बिवाई वो क्या जाने पीर पराई !
जीवन में हर व्यक्ति का अनुभव अलग अलग होता है। कुछ सौभाग्यशाली होते है जिनका जीवन भर अजीबो गरीब घटनाओ से पाला नहीं पडता , कुछ एकाध बार झेलते है , कुछेक का सामना बार बार होता है।  पाठको का सही मार्गदर्शन करने , सच्चाई बताने के प्रयास में कुछ सच्ची घटनाये प्रस्तुत कर रहा हूं।  पाठक यदि मुझे सत्यवादी माने तो स्वयं सोंचे क्या ये मेरा  अंधविश्वास है ?

अंधविश्वास फैलाना मेरा मकसद नहीं , बल्कि सत्य बताना मेरा उद्देश्य है ताकि लोग धोखा न खाये।
प्रथम घटना  :-
मै  दुनिया को पाखंडी ठहरा सकता हू परन्तु अपने मामाजी को नहीं , श्री मांगीलाल जी कांकरिया मामाजी ने औघड़ सिद्धियां  प्राप्त किया था और हर अमावस्या की रात  शमशान भूमि जाकर अपनी ऊगली से रक्त निकाल कर दिया करते थे।  ऐसा बताया जाता था।  जीवन भर उन्होने  दूसरो की सेवा की , एक रुपया भी किसी से नहीं लिया करते थे। यदि कोई देना चाहे तो वे इंकार कर दिया करते थे , कहते थे लेने से, मेरी सिद्धिया चली जायेगी। दूर दूर से से बुलाने उन्हें लोग आया करते थे , जीवनं भर लोक सेवा के कारण उन्हें अपने धंधे में भी नुकसान उठाना पड़ा , गरीबी भी झेलनी पड़ी।  अब लोगो के मुख से प्रशंसा पाने वाला और एक भी  पैसा न लेने वाला ठग और पाखंडी कैसे हो सकता है ?  कुछ घटनाये  तो मेरे परिवार में भी घटी थी जो "प्रज्ञातंत्र" नामक पत्रिका के सन २००४ के अंको में छपी थी, इच्छुक पाठक स्वयं पढ़े। (मामाजी लगभग सन १९९२-९३  में दिवगंत हुए थे)

दूसरी  घटना -
सन 1995 -1997 में मई अभनपुर में रहा करता था , मेरे पड़ोस में एक एम. बी. बी. एस. डाक्टर रहते थे।  एक बार वह बीमार पड़  गया बिस्तर ही पकड़ लिया।  उसने अनेक दवाइयां  ली पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ , फिर दूसरे डाक्टरो की सलाह ली और अनेक दवाइयां प्रयोग की पर सब बेकार साबित हुआ।  ऐसा करते करते एक १०-१५ दिन  बीत  गया  . किसी ने उसे सलाह दी झाड़ फूंक भी करवा कर देख लो। मरता क्या न करता एक झाड़ फूंक करने वाले को बुलाया , एक वृद्ध व्यक्ति आया उसने डाक्टर को झाड़ा दिया , कुछ देर में ही डाक्टर अपने आप ठीक हो गया  (घटना सन 1995 -96 की है।

तीसरा प्रमाण :-
मेरी पत्नी  के दाहिने घुटने पर कुछ सालो से दर्द होता था , कभी कभी इतना बढ जाता था कि लंगड़ा कर चलने लगाती थी।  आखिर एक हड्डीरोग विशषज्ञ को दिखाया गया , जो एम. एस. सर्जरी थे व सरकारी अस्पताल में थे।  उन्होंने भलीभांति जांच की, एक्सरे वगैरह लिया परन्तु कोई खराबी नहीं निकली।  कुछ दवाइयां दी  जिनका असर जब तक रहता दर्द महसूस न होता , बाद में फिर वैसा का वैसा . दवाइयां बदल बदल कर तथा अनेक प्रकार से प्रयोग करने पर भी ठीक न हुआ। तो उसी शहर के एक दूसरे हड्डी रोग विशेषज्ञ को दिखाया गया पर कोई रोग निदान न हुआ। और अनेक प्रयोगवादी इलाजों के बाद हारकर बुढ़ापे में लगाने वाले एक इंजेक्शन लगाने का निर्णय किया।  परन्तु मेरे एक अन्य परिचित डाक्टर ने मुझे रोक दिया ऐसा करने से क्योकि बाद में इंजेक्शन नुकसानदेह साबित होता।  फिर फिजियोथेरेपी की राह पकड़ी , महीनो बाद उसमे भी राहत न मिली तो आयुर्वेद की शरण में जा पहुंचे। एक अच्छे आयुर्वेद डाक्टर ने वात  रोग चिकित्सा प्रारम्भ की , परन्तु वह भी असफल साबित हुई। तो अगला पड़ाव होमियोपैथी बन गया।  एक प्रकांड विद्वान चिकित्सक जो मेरे मित्र भी थे , उनके द्वारा हाथ आजमाया गया , पर ये प्रयास भी फेल  हो गया। ऐसा करते करते  रोग की पीड़ा झेलते झेलते करीब पांच साल बीत  गए। न राहत मिली न रोग का पता चला।  इसी बीच एक विचित्र बात हुई , पत्नी सहित मै  "डौंडी वाले सर " , जो शिक्षा विभाग में ए. डी.आई. साहब थे व तांत्रिक भी , उनके यहाँ संयोग से जा पहुंचे। किसी दूसरे काम से गए होंने  के बाद भी, अचानक घुटने के दर्द की चर्चा कर बैठे , "थान"  (देव स्थान ) में बैठने के बाद "सर" को घुटना दिखाया गया , इतने में पत्नी को विचित्र सा दौरा चढ़ा जैसे हिस्टीरिया आ गया हो या देवी चढ़ गयी हो . यह देख मै  भौचक्का  रह गया , ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था।  लेकिन "डौंडी वाले सर" मुस्कुराते रहे- जैसे डरने की कोई बात नहीं! फिर पूछने पर उन्होंने बताया - दर असल इसकी रिश्तेदार एक महिला (मेरी भाभी ) बहुत दुष्ट व शत्रु है , उसने कमर के नीचे विकलांग करने हेतु तंत्र प्रयोग किया था।  परन्तु इसके(पत्नी ) मायके की कुलदेवी ने आकर प्रयोग को रोक दिया और घुटने तक सीमित  कर दिया। इसकी माँ उस देवी की बड़ी भक्त थी और ये उसकी सबसे छोटी बेटी होने के कारण ज्यादा लाडली थी , अत: देवी की भी स्वाभाविक रूप से लाडली (प्यारी) बन गयी।अमावस्या के आस पास इसकी तकलीफ बहुत बढ़ जाती है बाकी दिन तकलीफ कम से कम होती जाती है। ये रहस्योद्घाटन सुन सभी अवाक रह गए। विश्वास  करना भी इतना आसान नहीं था  !  बाद में घुटने पर गीला आटा  लगा कर , तथा आटे  के भीतर से अजीबो गरीब काली रेशेदार वस्तुए निकालकर जलाई गयी और सर ने कहा निश्चिन्त रहो अब ये ठीक हो गयी।  दूसरे दिन वहा से लौटने पर पता चला जिस समय "बंधन" "निवारण" आदि प्रयोग डौंडी में किया जा रहा था , ठीक उसी समय उस शत्रु , दुष्ट महिला(भाभी को) को शरीर में काफ़ी पीड़ा व तकलीफ हुई जिसे सहन न कर पाने के कारण उसने रोना शुरू कर दिया - अपनी ननद से बाते करते हुए -कि कौन मेरे करम बाँध रहा है , मुझे भयानक पीड़ा हो रही है। इसके बाद की महीनो इंतज़ार करते रहे परन्तु घुटने का दर्द पूर्णत: गायब हो गया बगैर किसी प्रकार की दवाई लिए या इलाज के साधन उपयोग किये। इलाज के पहले वाकई अमावस्या के आस पास तकलीफ ज्यादा होती थी चलना फिरना भी दूभर हो जाता था।  (घटना सन १९९४ की है )
 डौंडी वाले सर के बारे में पढ़े , क्लिक कर।
चौथी  घटना :-
मेरी पत्नी  और मै बाद में नगर छोडकर दूसरे नगर जाकर रहने लगे , मेरी  नौकरी दूसरे शहर में लग गयी थी।  सोचा मुसीबत से छुटकारा मिला।  परन्तु  दूसरे शहर में जाते जाते हलका२   हल्का पेट में दर्द होने लगा था। नए शहर में जाकर कुछ दिन सब ठीक थक चला , बाद में पेट में जोरो से दर्द होने लगा , तब एक सर्जन को दिखाया गया।  भली भांति  जांचकर उसने एसिडिटी घोषित कर इलाज शुरू किया , परन्तु कोई राहत न मिली। एक रात इतना जोर से दर्द हुआ कि अस्प्ताल में भरती करना पड़ा रात भर , परन्तु डाक्टरो की समझ में नहीं आ रहा था कि इलाज किसका करे।  दूसरे दिन बेरियम एक्सरे कराया गया अल्सर की शंका में , पर कुछ न निकला। पुन: एसिडिटी मानकर 'एंटासिड' दिया गया और दर्द निवारक दवाइयां  भी। परन्तु सब बेकार साबित हुए। अब मै  आयुर्वेद की शरण में जा पहुंचे . परन्तु वैद्यराज की दवाइया भी बेकार साबित हुई। तब पुराने अनुभव के आधार पर किसी ग्रामीण बैगा गुनिया (तांत्रिक) की खोज हुई। एक निम्न  जाति सतनामी बैगा को घर पर बुलाया गया। और उसने कहा कि कुछ गड़बड़ है, फिर उसने दारु और मुर्गा की मांग की, प्रयोग के लिए।  पर  ये सब देना सम्भव न होने के कारण उसे पांच सौ रुपये दिए गए , ताकि वह ये सब ले सके। बाद में एक मुर्गा टोकनी दारु और कुछ पूजन सामग्री लेकर वह आया - मुर्गे को टोकनी से ढककर , कुछ बूंद शराब की जमींन  पर गिराया फिर सामान्य पूजा कर सारी  चीजे लेकर वह चला गया। अविश्वास के तराजू पर झूलते उस मुझे और मेरी पत्नी को  महान आश्चर्य  हुआ कि उसी दिन से साधारण सी दिखने वाली प्रक्रिया के बाद पेट दर्द नहीं हुआ जो ढेरो एलोपैथी , आयुर्वेदिक दवाइयो , इंजेक्शन  आदि के बाद भी ठीक नहीं हुआ था ( यह घटना सन १९९५ कीहै )
 यदि मेरे प्रस्तुत विवरण की शत प्रतिशत सत्यता पर आपको भरोसा होता हो तो बताये क्या ये तंत्र मन्त्र के अस्तित्व का अकाट्य प्रमाण  है ? निष्कर्ष  आपकी अपनी बुद्धि पर छोड़ा जाता है।

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