17 मार्च 2014

मुर्दे की खटिया पर चैन की नींद ?

मुर्दे की खटिया पर चैन की नींद ?
बचपन में मेरे मित्र भी शरारती थे . अबकी बार मेरे मित्र श्री जितेन्द्र जैन (डोषी ) का एक संस्मरण  दे रहा हूँ। काफ़ी रुचिकर लगेगा।  ग्राम सरोना (कांकेर के पास ) रहते है।   बचपन में (करीब मिडिल स्कूल   पढने के
समय )  नाचा देखने पड़ोस के गांव  में भाग गए घर में बिना पूछे , बिना बताये, अपने कुछ साथियो के साथ ! (नाचा एक नाच का प्रोग्राम होता है जिसमे ग्रामीण गीतो में 'डांस' होता है , ग्रामीणो के मनोरंजन का एक साधन प्रचलित था ). रात्रि वापसी में काफ़ी देर हो चुकी थी . वे लोग वापस आने लगे , परन्तु घर आने के बाद खटखटाने से घर के लोग जागेंगे और डॉट  पड़ेगी , यही सोचकर वे लोग रात्रि  में ही कही सोने की सोंचने लगे। पर जगह कहा ! रास्ते में एक सूखी रेत  भरी नदी पड़ती थी , जब ये सभी साथी वहा पहुंचे तो नदी में एक अलाव जल रहा था , नदी किनारे झाड़िया दिख रही थी जो किसी का खेत लग रहा था।  सब लोगो ने अनुमान लगाया कि खेत का रखवाला (चौकीदार) कही गया है घूमने , पास ही एक खटिया (खाट) पड़ी हुई थी , अत: जलती अलाव से थोड़ी दूर ग्रामीण दोस्त सो गए और ये सेठ पुत्र होने के नाते उस खटिया पर सो गया। सबेरे उठने पर सब की घिघ्घी  बंध गयी , दर असल जिसे अलाव समझ रहे थे वो किसी मुर्दे का दाह संस्कार था , जिसे रखवाले की खटिया समझ रहे थे वो मुर्दे को लाये जाने वाला खाट था (गाँवों में खटिया /खाट  में लाने की परम्परा है ), जिसे खेत समझ रहे थे अँधेरे में वो तो शमशान  भूमि थी ! सबेरे उठते साथ सबके सब सर पर पैर रखकर भाग खड़े हुए घर की ओर। मित्र को तो कुछ नहीं हुआ पर ग्रामीण साथी में से कुछेक  दो तीन दिन बुखार से तपते रहे , ये उन गांव के लोगो का "डर"  का बुखार था।