ऐसा भी होता है -9 (धारावाहिक सत्य घटना )
होइहे वही जो राम रची राखा -तुलसीदास
महाराज जी पड़ोस के शहर चारामा में आये, इस बीच घर का वातावरण एक तरफा हो चुका था। भाभी का कुचक्र घर पर जोरो से चल रहा था। सब जैसे उसके वश में थे,उसक इशारो पर नाचते थे। मेरी इच्छा थी कि किसी भी तरह महाराज जी का आना निर्विघ्न हो सके। डायन कई बार किसी न किसी बहाने घर में मेरा झगड़ा करा चुकी थी।
गँजेड़ी बाप नशे में अपने को तीसमारखां समझने लगता था। भाभी के उकसाने पर कभी भी अपनी गर्मी दिखाने लगता-
घर से निकाल दूंगा,जूता मार के वगैरह और गालियां भी बकने लगता।
माँ घटिया किसम का व्यवहार करने लगी थी , पहले से भी बदतर।
छोटा भाई दुष्ट और स्वार्थी तो था ही, मोहल्ले वालों को इकट्ठा कर घर से बाहर निकालने की बात भी भाभी से करता।
अभय बाफना (छोटा
भाई ) कपट दुष्टता , लालच में अंधा हो चुका था। उसकी पत्नी अपने को घर की वास्तविक मालकिन समझती और हमें जैसे किरायेदार और घर का बोझ। मेरे मन से अब सबका मोह समाप्त हो चुका था।
जिस दिन महाराज जी को कांकेर घर लाया संयोग से सारी सामग्री आसानी से मिल गयी। बंगला पान की जुड़वा पत्ती जो दुर्लभ होती है , वह भी मिल गयी। महाराज जी के अनुसार योग अच्छा था। जब वे घर पर गए तो सिर्फ पिताजी ही दिखे, डायन घर पर नहीं थी। परन्तु बाद में वह आ गयी और मेरे बंद कमरे के इधर उधर , आस पास घूमती रही कमरे से बाहर निकले तो सिर्फ माँ भर सामने आई. वो भी शायद महाराज जी को पहचान नहीं पायी होगी , क्योकि महाराज जी पहली बार घर पर आये थे तो माँ ही मिली थी . पर इतने अंतराल के बाद याद आना मुश्किल था। कमरे में पूजा करते वक्त महाराज जी ने बताया की डौंडी वाले सर ने जो
"असली चीज" थी, उसे तो निकाला नहीं बल्कि जो शांत था उसे कैद करके निकाला है। सब चीजे अस्त व्यस्त हो है और बन्धन भी कर दिया है , निकालने में मुश्किल होगा। उन्होंने यह भी कहा मै तुम्हारे व तुम्हारे परिवार की सुरक्षा भर करूंगा ,बाकी की जिम्मेदारी नहीं लेता। चूकि बाकी विघ्नकर्ता थे , व्यवहार भी बहुत खराब कर रहे थे , अतः अब उनका मोह न था (यानी माँ बाप भाई और बहू और उनके बच्चो का भी !). इसलिए मैंने मान लिया। महाराज जी ने चार नग ताबीज भी लाने का निर्देश दिया। महाराज जी चारामा चले गए। दूसरे दिन मैं वहां गया ,महाराज जी ने दुर्गा जी के चित्र के सामने दिया जलाया , दिशा देवी की तरफ रखे, और कमरे से बाहर निकल गए। बाद में जाकर देखा तो दिये की दिशा घूम गयी थी, यानी कांकेर शहर की ओर। महाराज देखा तो कहा यह अपने आप हुआ है ,बहुत काम समय में ही घूम गया, देवी कार्य शुरू कर दी ,देवी एक एक सांस खींच रही है , जब पूरा खींच लेगी तब वापस दिया सीधा हो जाएगा। दो-तीन माह यह अब चलता रहा, लाल कमल से भी देवी की पूजा किये , सावन का महीना लगने वाला था। मैंने महाराज जी को अपनी रोजी रोटी की समस्या भी बताई। मार्च 1994 से कमाई पूरी बंद थी। रास्ता सूझ नहीं रहा था। दूकान देखा और बताया -यहाँ आरिष्ट है, आरिष्ट निवारण करना पडेगा।
( हालांकि उनका आरिष्ट निवारण का प्रयोग सफल नहीं हुआ और ऐसा मेरा मानना है क्योकि अनुकूल परिणाम दूर दूर तक दिखाई नहीं दिया ).
महाराज जी ने आश्वस्त किया कि अब कोई खतरा नहीं है तुम लोगो को, बस ताबीज अपने 2 गले से चारों कभी मत उतारना। हम चारो ने (मै स्वयं ,पत्नी और दोनों बच्चे ) ताबीज पहन लिया महाराज जी वापस गाँव चले गए। सावन सोमवार समाप्ति के बाद जी से पुन: मुलाक़ात किया। उन्होंने निरिक्षण किया- सब ठीक ठाक चल रहा था। "विचारकर " उन्होंने बताया , नवरात्रि करने का आदेश देवी दे रही है। मैंने कहा महाराज जी , न जाने इसमे कितना पैसा लगेगा , मेरे पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं है , भारी गरीबी चल रही है। उन्होंने जवाब दिया- तुम्हे कुछ नहीं करना होगा , बस व्यवस्था करनी होगी, पैसो की चिंता मत करो, देवी स्वयं इसकी व्यवस्था करेगी।
परन्तु भगवान पर भरोसा औरो की तरह मुझे भी कम होता है . अत : मेरी चिंता दूर नहीं हुई। पितृपक्ष में मै पुन: मिलने गया और तैयारी सम्बन्धी बातचीत की, सामग्री आदि विवरण लेकर लौटा। इसी समय मेरी बंद पड़ी दूकान का फर्नीचर ,कपड़े का स्टॉक आदि , मेरे गहरे मित्र (जितेंद्र डोसी ) के पास बिक गया, इस तरह संयोग से धनं की भी व्यवस्था भी हो गयी। इधर दुष्ट भाभी को मेरा अगला कदम समझ में नहीं आ रहा था , ये भी शायद भगवती की कृपा थी। नवरात्रि के दो पहले मैंने अपने कमरे की पुताई का बहाना कर सारा सामान कमरे के बाहर परछी में निकाल दिया और श्रमिक लाने हेतु घूमने का बहाना करने लगा। नवरात्रि के एक दिन पहले महाराज जी चारामा ग्राम में आ गए। मै उनसे मिला, सारी सामग्री खरीद कर तैयार था। नवरात्रि के दिन महाराज जी को लेने गया, मुहूर्त था,उन्हें लेकर आया।
डायन से भिड़न्त :-
जैसे ही महाराज जी आये और मेरे कमरे घुस गए, दुष्ट भाभी को पता चल गया। तुरंत वह आकर पिताजी ,माँ , व कपटी भाई अभय बाफना को उकसाने लगी - उसे अंदर कैसे घुसने दिया ?
ये तन्त्र मन्त्र इत्यादि उलटा सीधा हमारे घर में कर रहे हैं ,तुम लोग चुपचाप तमाशा देख रहे हो?पिताजी को ताव आ गया,वे गालिया बकने लगे,माँ भी दहाड़ने लगी ,छोटा भाई अभय कहने लगा-चिंता मत करो भाभी ,कल सबेरे मोहल्ले वालो को इकट्ठा कर इन सबको धक्के मार कर बाहर करेंगे। अब तो मैंने भी उग्र रूप धारण कर लिया . और कमरे के दरवाजे पर खड़ा हो गया। जिसने भी अपनी माँ का दूध पिया हो मुझसे टकराये, यहीं लाश न बिछा दिया तो मेरा भी नाम नहीं। घर तुम्हारे बाप का नहीं। मेरे दादा का है, मेरा भी हिस्सा है, कमरे में कुछ भी करने से कोई माई का लाल मुझे नहीं रोक सकता। कोई बाहरी व्यक्ति हस्तक्षेप करने आया तो उसके भी दिन पूरे हुए होंगे तभी आएगा। मेरे गुर्राने से सब मेरे दरवाजे से 15 फीट दूर ही रहे, कोई आगे आने का साहस नहीं कर पाया। सब मेरी आदत जानते थे -
या तो मुझे गुस्सा नहीं आता , तो क्रोध में मै अंधा हो जाता हूँ, फिर कुछ भी ख्याल नहीं रहता। मैंने भी ठान लिया, कोई भी आगे बढ़ा और मुझे नवरात्रि करने रोकना चाहां तो किसी भी कीमत पर नहीं रोकने दूंगा ,चाहे
किसी भी सीमा तक मुझे जाना पड़े। जब डायन भाभी ने देखा की कोई आगे बढ़ने साहस नहीं कर रहा है ,सब गीदड़ भभकी भर दे रहे है तो
उसका उकसाना बेकार जा रहा है। आखिर वो बोली -आप लोग कोई नहीं रोकते तो मै आती हूँ जूता लेकर और मारकर बाहर करती हूँ। मै भी तुरंत तैयार हो गया ,बोला- तू जूता लेकर आ ,मै तेरे को पहले तेरे ही जूते से मारूँगा ,फिर यहीं मर्डर ही कर दूँगा। वह कमरे में तो गयी परन्तु वापस लौटकर नहीं आई,मै खड़ा इंतज़ार करता रहा। इधर
सभी गीदड़गण अपने अपने कमरो में घुस गए। मै कमरे के बाहर क्रोध से भरा खड़ा रहा। थोड़ी देर में सब शांत हो गया तो मैंने महाराज जी से फिर निवेदन किया,उधर महाराज जी ने पूछा -सब शांत हो गया, तो अब दीप जलाये? मैंने कहा-हाँ। दोनों बच्चो,पत्नी, और मै स्वयं कमरे में घुसकर दरवाजा बंद कर सामग्री आदि व्यवस्थित किये, देवी के चित्र की पूजा कर अखंड ज्योति प्रज्वलित किये। माता जी विराजमान थी , अब डर नहीं था। मुझे याद आ रहा था कि पितृ पक्ष में या उसके पूर्व महाराज जी ने पांच मंगलवार हनुमान जी के मंदिर में जाने का निर्देश दिया था ,पीपल के पत्ते पर लाल चन्दन से राम नाम लिखकर चढ़ाने का निर्देश दिया था ,तो घर के कलंकित ,हरामी सदस्य मेरी हंसी उड़ाते थे , यानी खुद करे तो भगवान की भक्ति ,दूसरे करे तो ढकोसला ,खुद करे तो पुण्य कार्य ,दूसरा करे तो पापी और दुष्टात्मा !
नवरात्रि के दौरान मै चुपचाप अपने कार्य में लगा रहता था। नवरात्रि में मैंने महाराज जी के साथ स्वयं भी उपवास किया, जीवन में पहली बार नवरात्रि के नौ दिनो तक फलाहार। दुष्ट भाभी के कारनामो से परिचित, मै महाराज जी को शौच इत्यादि सामने के गढ़िया पहाड़ की तराई में ले जाता, स्वयं भी वहीं शौच करता , स्नान भी घर के पीछे दूध नदी में करता , महाराज जी के साथ। पूरे सात दिन तक यही क्रम चला ,घर पर बड़ी बहन भी आयी हुई थी ,
पिछले दस--बारह सालो से पागलपन के रोग से पीड़ित थी। विशेषज्ञो के पास दवाइयाँ व शॉक थेरेपी से दो तीन बार गुजर चुकी थी ,परन्तु ठीक नहीं हुई। एक बार पूर्व में कहा था कि यह भी ठीक हो जायेगी। परन्तु उस गंदे माहौल में उसकी चिकित्सा हेतु प्रयोग करने की ईच्छा ही नहीं हुई। आखिर जिम्मेदारी उसके पति (सूरजमल नाहर , कवर्धा निवासी ) की भी बनती थी। जो उसे मायके पंहुचाकर खुद को झंझट से मुक्त कर लिया था। और घर में मै अपने पर एक और मुसीबत लेने की हालत में नहीं था। दिन ब दिन शांत वातावरण होता जा रहा था । घर के
बाकी गीदड़गण मेरी गतिविधियाँ चुपचाप देखते रहते क़िसी में कुछ भी पूछने की हिम्मत भी नहीं होती थी।
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| बड़ी बहन-इंदिरा जिसकी तंत्र प्रयोग से मृत्यु हुई -चूहा मार दवाई से आत्महत्या ! |
(बड़ी बहन को भी तंत्र प्रयोग कर पागल , उसी डायन ( प्रभा )भाभी ने किया था, ऐसा बाद में पता चला था , जो बेचारी करीब 15 वर्ष तक पागल रही, और लाइलाज सिद्ध हुई , एवं अंत में चूहे मारने की दवा खाकर आत्महत्या कर ली )