30 नवंबर 2015

धूर्तों पाखंडियो से कैसे बचे-("ऐसा भी होता है "के सन्दर्भ में)

("ऐसा भी होता है"- के सन्दर्भ में )
           मेरे लेखो के बाद कुछ लोगो ने मुझसे संपर्क करने की कोशिस भी की,कुछ तो सफल भी हुए,कुछ को कांटेक्ट नं नहीं मिल पाया। मैं खुद ही नहीं चाहता कि इतने बड़े देश के लाखो लोग मुझे फोन करके परेशान करे।मेरा सिर्फ इतना उद्देश्य है कि लोगो को सच्चाई से अवगत कराऊ,पर इस तरह की परेशानियों से निपटने का रास्ता स्वयं उन्हें ही खोजना पडेगा।

एक परेशानी हमेशा लोगो को रहती है खासकर मध्यम वर्ग के लोगो को,जो इस क्षेत्र में असली नकली की पहचान में सक्षम नहीं होते।
     ज्योतिष और मन्त्र-तंत्र जैसे क्षेत्र ठगी,पाखण्डियों का बहुत बड़ा व्यापार बना हुआ है।
         कोई नज़र उतारने का सामान बेचता है वो भी टीवी ,इंटरनेट के जरिये। जैसा कि हर धंधे में होता है वैसा ही इस क्षेत्र में होना कोई आश्चर्य की बात नहीं।इसलिए सावधानी जरुरी है।एक चीज और,कोई भी यंत्र केवल पूजा स्थल पर पड़ा रहे तो वो अपने आप काम नहीं करता।ये मेरा अपना अनुभव है।
        कुछ टिप्स दे रहा हूँ सावधानी के लिए ,बुद्धि आपको ही लगानी पड़ेगी।
1-ये सच है कि पहले लोग साधना करते थे और रोजी रोटी कमाना नहीं पड़ता था। ये लोग सेवा करते थे।राजाओं के जमाने में।उस काल में राजाओ द्वारा और खुद जनता द्वारा दक्षिणा आदि दे दिया जाता था कि उन्हें रोजी रोटी की चिंता ही नहीं करनी पड़ती थी। आज इस क्षेत्र में रहने वाले भूखो मरेंगे अत: रूचि रखने वाले,योग्यता रखने वाले मज़बूरी के चलते इस क्षेत्र से दूर ही रहना पसंद करेंगे।

2-साधक लोग गैर-सांसारिक और अंतर्मुखी होते है प्रायः,इसलिए लोगो से दूर रहना पसंद करते है। फिर ऐसे लोग विज्ञापन करना क्यों पसंद करेंगे ?
    अखबारो में विज्ञापन धन्धेबाजो और धूर्तो के ही आते है।इनसे दूर रहना ही अच्छा। कुछ ठग गिरोह भी देखे जाते है,जिनके चक्कर में फंस कर लाखो रु की ठगी का शिकार लोग हो जाते है।

3-जो व्यक्ति भूत प्रेत निवारण के लिए,टोना टोटका निवारण के लिए आपके सोना चाँदी या गहनों की मांग करे, वो आपसे ठगी ही कर रहे है।

4-ये ठीक है कि आज के जमाने में साधू संतो को भी धन की आवश्यकता होती है क्योकि दान दक्षिणा का ज़माना बीत चुका। दान भी जहाँ जाना चाहिए उसकी बजाय अनावश्यक स्थानों में जाता दिखता है। कुछ ही लोग ऐसे होते है जो निशुल्क सेवा करते है क्योकि उनके जीवन यापन का श्रोत कोई और होता है। पर दक्षिणा के नाम पर ठगने या सोना चांदी गहने की ठगी नहीं करते क्योकि ये पुण्यात्मा होते है।

5-असली साधक/सिद्धि प्राप्त व्यक्ति दिखावे से दूर रहता है। जो लोग ढेर सारा तिलक चन्दन,गले में नाना प्रकार की मालाये,हाथो में तरह2 की अंगूठियां , प्रायः अजीबो गरीब वस्त्र आदि धारण किये हुए होते है वे प्रायः ठग/धूर्त ही होते है।
    अनेक बार यह भी देखने मिला कि कईयो के कार्य अनेक वर्षो के बाद भी पूरे नहीं हो पाते। ऐसा क्यों?
दरअसल कर्ता तो दैवी शक्ति/उच्च शक्ति ही होती है। और उन्हें आपका कच्चा चिट्ठा भलीभांति मालुम रहता है। अहंकारी,पापी, दुष्टात्मा देखकर वे कार्य को टालते जाते है। साधक भी यह बात जान जाता है अत: टालने लगता है। अत: इन दुर्गुणो से दूर रहे,दैवी शक्ति प्रसन्नतापूर्वक सहायता को तत्पर रहेगी,थोड़ी सी पूजा से ही प्रसन्न हो कार्य संपन्न कर देती है
      कर्ता केवल देवी देवता होते है,न कि पुजारी/साधक। वह तो केवल माध्यम होता है। केवल दिया अगरबत्ती जला देता है,फूल इत्यादि अर्पित कर देता है। परिणाम तो उच्च शक्तिया देती है।अत:गारंटी के साथ कार्य सिद्ध करने का दावा करने वाले लोग ठग होते है।
        कभी वांछित दक्षिणा न मिलने की उम्मीद में भी साधक कार्य करने से इनकार कर देते है। दक्षिणा/फ़ीस उनका अधिकार होता है। अत: साधक(तांत्रिक/देवी सेवक) को उचित पारिश्रमिक देना ही चाहिए। तभी कार्य पूर्ण होते है।

19 नवंबर 2015

ऐसा भी होता है- (13)(धारावाहिक सत्य घटना)

            सारे उथल पुथल पार करने के बाद,जो मेरे जीवन में अविश्वनीय रूप से, अंधविश्वास जैसी घटनाओ के रूप में आया। जिसे मैं किसी साधारण मित्र,वैज्ञानिक सोंच रखने वाले मित्र से शेयर नहीं कर सकता था। अगर करता हूँ तो वो तो यही समझेगा कि मेरे दिमाग का स्क्रू ढीला हो गया है,इसे साइकियाट्रिस्ट की सख्त जरुरत है।
       या फिर सोंचा जायेगा कि ये घोर अंधविश्वासी है,या फिर दुष्टतावश कहानिया गढ़ रहा है।
       खैर मैंने बहुत ही गहरे मित्रो से ही इन घटनाओ पर चर्चा किया। जिसमे एक दो वो मित्र भी  है जो इन सब विषयों में रूचि रखते है,मुझसे भी ज्यादा गहरी समझ रखते है।
        पर मेरे मन में नयी उथल पुथल मचती रही आखिर ये सब मेरे साथ ही क्यों हुआ। ईश्वर से मेरी क्या दुश्मनी थी जो मुझे ये दिन देखने पड़े।या मैंने ब्रम्हा की कौन सी भैंस खोल दी थी जो मेरे भाग्य में ये सब लिख दिया। अब ये सब जानने की प्रबल जिज्ञासा मेरे मन में कई वर्ष बनी रही। मैं किसी सिद्धि प्राप्त व्यक्ति की तलाश में रहा,कोईं मिल ही नहीं रहा था। आजकल तपस्वी/साधना करने वाले लोग बहुत कम लोग होते है। अगर कोई इच्छुक भी हो तो उसे भूखों मरने की नौबत अवश्य आती है। यदि कोई कष्ट पाते हुए भी किसी प्रकार की सिद्धि प्राप्त कर भी ले तो अपने आपको छुपा कर ही रखेगा,आम लोगो के रवैये को देखते हुए इसी में अपनी भलाई समझेगा।
        कुछ वर्षो बाद मेरी धर्म पत्नी धुलिया महाराष्ट्र गयी तो वहां एक सिद्ध व्यक्ति(तांत्रिक) के पास पंहुचने का अवसर मिला। उसे सचमुच सिद्धि प्राप्त थी। बिना पूछे उसने मेरे घर परिवार और व्यवहार के बारे में बता दिया। मेरी पत्नी ने लौट कर सब बताया तो मैं आश्चर्य चकित हो गया। मेरी भी उसके पास जाने की इच्छा बलवती हो गयी।
        आखिर मैं भी वहां पहुँच गया। मेरी बारी आई तो काली माई उसके शरीर में आ गयी। मैं भूल न जाऊ इसलिए पाकेट डायरी में लिख कर ले गया था। पर वहां तो पूछने की नौबत ही नहीं आई। मेरे कुछ पूछने  के पहले ही देवी ने उसके मुख से कहा- तुम्हारे मन में ये प्रश्न है न जो कुछ घटनाये तुम्हारे साथ घटी,उसका कारण क्या है। मेरे हां कहने पर उन्होंने कहा-तुम्हारे कोई पूर्वज ब्याज का धंधा करते थे(गिरवी रख उधार देने का)। उसमे लोगो की मज़बूरी का फायदा उठाकर खूब लूटा खसोटा। मैंने ये कहा वो मेरे परदादा थे।उसने कहा वो जो कोई भी हो,मुझे कोई मतलब नहीं। उसी कर्म का भुगतान तुम कर रहे हो यानी उनके पाप को चुकता करने का।
और सारे प्रश्न जो मेरे मन में थे जवाब उसने दे दिया। और यह भी कहा पूर्वजो के कर्ज और पाप को संतानो या आने वाली पीढ़ी को चुकाना पड़ता है। ये सुन कर मेरा दिमाग ही घूम गया।
        अब नया प्रश्न उठ गया। आखिर मैं ही क्यों चुकता करूँ। परिवार में और भी लोग तो थे।उनपर क्यों नहीं बीती ! सोंचते 2 यह भी याद आया कि बचपन से तिजोरी के ऊपर लिखा हुआ नाम " सेठ करणीदान रावलमल बाफना" नाम में से "करणीदान" नाम से मुझे आकर्षण महसूस होता था। कही उन्ही का तो पुनर्जन्म तो नहीं हूँ मैं ,पुराने कर्मो को चुकता करने! बाद के बर्षो में मैं अपने दादा जी के परिवार में ,जहां से वे मेरे परदादा के यहाँ से गोद में आये थे(क्योकि मेरे परदादा की कोई संतान नहीं थी,अपने भाई के पुत्र को गोद में ले लिए थे),जा पंहुचा। वहां वृद्ध महिला से थोड़ी सी जानकारी मिली तो पाया परदादा करणीदान की रुचियाँ मुझसे बहुत कुछ मिलती है। और ये भी कि वे देवीभक्त भी थे! अब यह स्पष्ट हो गया कि मैं ही अपने परदादा सेठ करणीदान का पुनर्जन्म हूँ। इसीलिए देवीकृपा शुरू से मेरे साथ रही जबकि मैं युवावस्था में घोर नास्तिक था।पर मुझे मेरा पिछलाजन्म मुझे ज़रा भी याद नहीं आता। राजस्थान में पुराना अपने परदादा का खंडहरनुमा घर भी देखा,फिर भी कुछ नहीं याद आया।
     (समाप्त)

16 नवंबर 2015

ऐसा भी होता है-(12)-(धारावाहिक सत्य घटना)

कई महीने बीते,शायद साल भी बीता। छोटे भाई के मन में पूरी संपत्ति हड़पने की योजना चलने लगी। बंटवारे के लिए दौड़ भाग चलने लगी।
     इधर मृत डायन भाभी प्रेतनी के रूप में भटकने लगी थी।इसका मुझे ज़रा भी गुमान नहीं था। हालांकि वो आत्मा कांकेर स्थित निवास स्थान पर ही रहती थी।
बड़ी बहन इंदिरा जो वर्षो से पागल थी, ने घोर निराशा की वजह से चूहा मार दवा खाकर आत्महत्या कर ली। उसके दाह संस्कार आदि के लिए मैं कांकेर गया परिवार सहित। रात्रि में परछी में हम सोये। रात्रि में ही भाभी की आत्मा ने मेरी पत्नी के पैर खींचने का प्रयास किया। पत्नी को उसकी उपस्थिति का आभास भी हुआ। सबेरे उसने यह बात बताई तो मैंने गंभीरता से नहीं लिया ,सिर्फ वहम समझा। भला मरने के बाद भी कोई आ सकता है !
        वापसी पर वो दुष्ट आत्मा पत्नी के शरीर में प्रवेश कर साथ2 आ गयी। पर सब कुछ सामान्य होने से कोई आभास नहीं हुआ।
         इधर बाद में कई दिनों से पत्नी का चिड़चिड़ापन दिखने लगा था।जिसे मैंने तनाव और शायद कमजोरी के कारण समझा। कभी वह छोटी बिटिया को बहुत पीटती जबकि छोटी होने के कारण ज्यादा लाडली थी।
एक बार ठन्डे दिमाग से सोंचने पर मुझे कुछ शंका हुई।
रविवार के दिन अचानक मैंने उससे कहा चल घूमकर आते है।और स्कूटर में बिठाकर ले जाने लगा।उसने पूछा कहा ले जा रहे हो? मैंने कहा बस एक जगह से आते है। और सीधे एक (थान) देवस्थान ले गया।
       अनेक लोगो के बाद जब हमारा नं आया तो तुरंत पत्नी को क्रोध भरा आवेश आ गया। बाबाजी(थान के) से भी बहस करने लगी-तू मेरा क्या बिगाड़ लेगा? इसने मुझ(यानीे मैंने)बहुत तड़फा2 कर मारा है। मैं तो इसे((पत्नी को) लेकर ही जाउंगी, आदि। अब भेद खुल चुका था कि डायन की आत्मा का अटैक हो चुका है।
अब मुझे भी क्रोध आ गया-हरामजादी तेरे ज़िंदा रहते तो तेरे से डरा नहीं,तेरे मरने के बाद क्या डरूंगा ।
बाबा जी ने बंधन कर आवेश शांत किया। और मैं सावधान हो गया।वह डायन आत्मा भी सहम गयी कि उसका भेद खुल गया।
    इसी बीच मेरे ससुराल की कुलदेवी ने मेरी सास की दिवंगत आत्मा को निर्देशित किया कि जाओ अपनी बेटी(मेरी पत्नी ) के शरीर में रहकर उसकी रक्षा करो।
(ये रहस्य छोटे2 टुकड़ों में मेरे सामने खुले)।एक बार मेरी सास पत्नी के शरीर में आकर मेरी खिंचाई की तो पता चला। दरअसल मैंने भैरव बाबा से समस्त भूत प्रेत को बांधने की प्रार्थना की थी,चूँकि मेरी सास की आत्मा भी मेरे घर के लिए प्रेतनी ही थी,अत: वह भी बंधन में आ गयी और उन्हें तकलीफ होने लगी। ये बात स्वयं आत्मा ने ही मुझे कहा। मैंने तुरंत भैरव बाबा से प्रार्थना की ,कि पितरो और हमारी रक्षा करने आई आत्माओ को बंधन मुक्त करदे उन्हें तकलीफ मत हो। तुरंत 5 मिनट में सब शांत हो गया।
        कुछ दिनों बाद होली आ गयी। उस दिन पत्नी ने कहा आज मेरे जाने का दिन है। आखरी दिन है। रात्रि हुई घर की छत पर उल्लू भी आकर बैठ गया और आवाज करने लगा। मुझे भी शंका हो गयी अब।मैंने अपनी कुलदेवी के सामने जाकर गुस्सा हो बोला मैं तेरी पूजा करता रहता हूँ,यदि मेरी पत्नी को कुछ हुआ तो तेरी पूजा सदा के लिए बंद कर दूंगा,और तो और मेरी आने वाली पीढ़िया भी तेरी कभी पूजा नहीं करेगी।
रात्रि में सोने के बाद सपने में पत्नी को प्रेतनी भाभी दिखाई दी कि तुझे लेने आई हूँ। फिर एक थाली दिखाई दी जिसमे एक बिल्ली बैठी हुई थी।फिर एक चमकदार तलवार ऊपर से गिरती दिखाई दी उसके बाद बिल्ली उठकर चली गयी। रात्रि में ही पत्नी ने मुझे जगाने की कोशिस की पर मैं तो घनघोर नींद में था। सुबह होने पर रात्रि वाली बात बताई पर चमकदार तलवार जैसी चीज के बारे में समझ नहीं पा रही थी,तो मैंने माताजी की तस्वीर के पास ले जाकर दिखाया-ऐसी थी न? उसने तलवार का चित्र पहचान लिया। तब समझ में आया कि माताजी ने रक्षा की मेरी पुकार पर।
           इसी बीच कुछ समय बाद हमने किराए का घर बदल लिया। कुछ महीने बाद कभी डायन भाभी की प्रेतात्मा का आभास मेरी पत्नी और खुद मुझे भी हुआ। जब पत्नी से पूछने के बाद समझ में आ गया कि दुष्टा फिर से हमारे चक्कर लगा रही है तो मैंने भैरव प्रयोग किया। रात्रि में सपने में भैरव जी उस दुष्टात्मा को तालाब में डूबा2 कर मारते दिखाया। उसके बाद वो कभी नहीं आभास दी।
(आगे और है-ये सब क्यों हुआ)

10 सितंबर 2015

और इस तरह मिला सिरदर्द से छुटकारा !

और इस तरह मिला सिरदर्द से छुटकारा  !
घटना  अगस्त 2015  की है। यानी नवीनतम  ईश्वर  नई 2  दिखाता है।
मेरे एक मित्र की पत्नी को हमेशा सिरदर्द  रहता था . ऐसा की महीनो से  या शायद वर्षो से था. एलोपैथी इलाज करा कराकर थक चुके थे पर कोई राहत नहीं। एक बार दर्द  पीड़ित थी उसी समय मै संपर्क में आया।  मैंने होमिओपैथी देने की सोंची।  सबसे पहले "बादल छाने से आँखों में धुंधलापन छाना " लक्षण देखकर नेट्रम सल्फ दिया।  दूसरे दिन थोड़ा ज्यादा दर्द हुआ।   सोंचा प्रूविंग हो गयी इसलिए सहन करने का सुझाव दिया। 
                          आगे उन्होंने 'एम्स' के एक होमिओ-डाक्टर से सलाह ली।  उसने नक्स वोमिका दिया क्योकि साथ में कब्ज भी था।  इसके बाद तो तेज बुखार ही छा गया। अब घबरा कर मित्र ने एक नर्सिंग होम में  भर्ती कर दिया।  (नक्स वोमिका से कई बार नकली बुखार , यदि बुखार दबा हुआ हो, तो आता है ) सारी  जांच  बाद , स्कैन  वगैरह करने के बाद निकला 'कुछ नहीं'  और शायद ह्रदय की कमजोरी बताकर, कुछ दवाइया देकर विदा किया अस्पताल से। इससे 17000/- रु  का चूना  लग गया। 
                                अब मैंने पुन: बेलाडोना, ब्रायोनिया और जेल्सीमियम दवाइयाँ लक्षण  दिया , पर सब बेकार सिद्ध हुई। फिर दूसरे दिन दर्द देखकर तत्काल राहत हेतु बंगला पान की पत्ती  पर पिपरमेंट सत  वाला अनुभूत प्रयोग किया पर सिर्फ सामने के माथे का दर्द ही ठीक हुआ। 
                          दूसरे दिन  फिर से  सारे  लक्षण लेते हुए बेक्सन कंपनी की  एक पेटेंट दवा लिखा जो माइग्रेन में भी काम करती है।  और दिन में चार बार अधिक बार लेने का निर्देश दिया।  2 सितम्बर 2015  को उसने चार  बार लिया पर ज़रा भी असर नहीं दिखा।  अब मै भी सोंच में पड़  गया और किसी अच्छे होम्यो डाक्टर को दिखाने कहा , एक डाक्टर का नाम भी सुझाया।
                               इसी दिन शाम को एक बैगा/झाड़फूंक करने वाला आया।  संयोग से उसने दिखाया।  उसने  आश्वस्त किया।  फिर एक बोतल शराब, दो निम्बू और अगरबत्ती मंगवा कर।  फिर अपने साथ  लाये एक पाइप में शराब भरकर मरीज से  लगाकर खींचने का उपक्रम किया।  तीन कंकड़  निकालकर दिखाया। फिर पूछा अब कैसा लग रहा है ? तो मरीज ने (भाभी जी) ने बताया की सिरदर्द उत्तर गया।  अगले 48  घंटे मैंने  जायजा लिया तो पाया मरीज एकदम ठीक हो चुका है जहा एलोपैथी , होमिओपैथी दवाइया फेल हो रही थी। वहाँ  एक तंत्र प्रयोग ने मरीज को एकदम से राहत दे दी।
                                            मै यह भी जानता हूँ की कुछ शिक्षित लोग कहेंगे कि  यहां मनोवैज्ञानिक प्रभाव से  सर दर्द ठीक हुआ ,कुछ  सोचेंगे की अंतत: होमिओपैथी ने कमाल दिखाया और सिरदर्द ठीक  होगा , पर निश्चित मानिए, कि  न तो मनोवैज्ञानिक प्रभाव हुआ था, न वो किसी हिस्टीरिया की मरीज थी, न  होमिओपैथी की दवाइयों का असर था। क्योकि मै मरीज को जानने लगा था, होमिओपैथी खुद मैंने दिया  था।  किसी समय मै खुद माइग्रेन (एक प्रकार के सिरदर्द की बीमारी)से दस साल भुगता था। और होमिओपैथी से  स्थायी रूप से छुटकारा पाया था ,अत: असर कैसे होता है मै भलीभांति जानता  था। मुझे बार फिर तंत्र /मन्त्र प्रभाव का प्रमाण मिला।
                  मित्र ने जब पूछा कि  हुआ क्या था तो बैगा ने हंसकर जवाब दिया -आम खाने पर ध्यान दो, गुठली गिनने से क्या लाभ ?
                             वास्तव में बैगा लोग बताते नहीं, नहीं तो झगड़ा हो जाता है रिश्तेदारो परिचितों से , क्रोध में, या फिर पुलिस केस बन जाता है।  इसलिए  परहेज करते है।  
क्या हुआ होगा - किसी ने ईर्ष्यावश 'किसी को' बीमार करने कंकड़ अभिमंत्रित कर छोड़ा  होगा ,उसी की  मरीज तंत्र प्रभाव से   पीड़ित हुई। ऐसा प्रयोग (शत्रु पीड़क प्रयोग ) तंत्र शास्त्र में मुझे पढने में आया था।   ऐसे मामलों में अक्सर  कोई दवा काम नहीं करती है और जांच में भी कुछ नहीं निकलता है।  परन्तु मेरा मित्र अगस्त के ही  करीब 19000 /- के खर्चे में उत्तर गया , दौड़भाग , परेशानी अलग।
( शत्रुपीड़क प्रयोग एक पाप कर्म होता है , सिर्फ ईर्ष्यावश प्रोयोग करने से आगे जाकर भयंकर परिणाम भुगतने पड़ते है ,जबकि आत्मरक्षा हेतु प्रयोग में पाप नहीं परन्तु  आपका पक्ष धर्म का हो )


24 फ़रवरी 2015

ऐसा भी होता है-(११)-(धारावाहिक सत्य घटना)


ऐसा भी होता है-(११)-(धारावाहिक सत्य घटना)-
खुदा कसम पैसा खुदा तो नहीं पर खुदा से काम भी नही" 

                                        अभनपुर आने के बाद उस दुष्टा को आराम हुआ कि  उसका शत्रु (यानी मै) उसके आस पास नहीं, उसका बंटाधार करने। कपटी भाई को भी चैन मिला , अब सम्पूर्ण धन संपत्ति पर उसका एकाधिकार होगा। जमा जमाया व्यवसाय "वेटिंग पीरियड" काटने के बाद उसे मिल गया।  "बिल्लियों की लड़ाई में बन्दर का भाग्य खुला"  वाला किस्सा हो रहा था. उसने तो रंच मात्र भी कष्ट नहीं उठाया इस तांत्रिक संघर्ष में बल्कि कभी दर्शक की भाँति  देखा, कभी विरोधी बना।  पैसा ही खुदा है, पैसा ही माँ है, बाप  है,भाई है, बहन है।  ये सब मुझे अब समझ में आ रहा था,सगे  भाई बहन का  व्यवहार देखकर . धन के सामने सारे रिश्तेनाते नत-मस्तक होते है।

                           मेरे कांकेर से हटने के बाद वहाँ  शान्ति छा गयी।  परन्तु ये तो तूफ़ान के आने के पहले की शान्ति थी।  मुझे परिवार सहित इसलिए माता जी ने हटाया ताकि जब ये लोग चक्की पीसे तो  उसका बुरा असर मुझ पर ना पड़े।

                       अभनपुर में रहते हुए मैंने पूजा पाठ  इत्यादि करना  प्रारम्भ किया।  मन्त्र आदि का अध्ययन किया।  मित्रो गुरुओ से मार्गदर्शन प्राप्त किया।  कई  विद्वानो के संपर्क में भी आया।  आत्मरक्षा विषयक विद्याओ का ज्ञान  हुआ।  इधर दुष्टा भाभी की दाल नहीं गल रही थी . परन्तु मेरे मन में भी असंतोष हमेशा बना रहा। क्योकि माता परा-शक्ति ने उसके किये का दंड अभी तक नहीं दिया।  इसी बीच महाराज जी से मुलाक़ात की कई बार हुई महाराज जी ने आश्वस्त किया-काम चल रहा है ,देवी ऐसा कहती है. इसी अवधि में  जी ने शिवरात्रि में मेरी जप माला  शोधन किया, जप माला अब मन्त्र साधना  उपयुक्त हो गयी। इसी बीच महाराज जी ने एक बार कहा-देवी कह रही है की इसी माह तुम्हे पता चलेगा कि  उसे क्या दंड मिल रहा है। सचमुच उसी महीने पता चला की दुष्ट भाभी को गर्भाशय का कैंसर हो गया।  वह इलाज के लिए नागपुर व बम्बई दौड़ लगाना शुरू भी कर दी।  चूँकि कैंसर प्रारम्भिक अवस्था में  था इसलिए इसके ठीक होने की संभावना  थे। मैंने इधर महाराज जी से  संपर्क किया तो कहा - देवी ने आशवस्त किया है की यही सजा है, कितना भी इलाज करा ले,वह ठीक हो ही नहीं  सकती .

   समय बीतता गया ,उस दुष्टा ने जितना मुझे परेशान किया था, दौड़ाया था , देवी ब्याज सहित उसे दंड दे रही थी , दौड़ा  रही थी ज़ितना मै तडफा , वह उसे तड़फ़ा  रही थी।  जितना दरिद्रता व धन नाश  मेरा की थी,देवी उसका ब्याज सहित नुकसान कर रही थी। कभी गोंदिया, कभी नागपुर , कभी बम्बई दौड़ भाग करती , धन की बरबादी अलग।  कभी जाने के लिए कोई साथ मिल जाता, कभी नौकरानी को लेकर अकेले यात्रा।  सारी खबरे

 मिलती रहती। कैंसर आखरी स्टेज में पहुंच गया।  परन्तु बड़ी  जीवट दुष्टा थी वह ,इलाज रेडियम थेरेपी के फेल होने के बाद पूरा गर्भाशय कैंसर  चपेट में आने के बाद और डाक्टरों द्वारा सर्जरी की सीमा के बाहर घोषित करने के बाद भी ,  मुझे "उड़ाने " के लिए विभिन्न तांत्रिको के पास घूमती रहती। कुछ धनलोभी टुच्चे तांत्रिक प्रयोग करते भी थे परन्तु असफल हो जाते, तो कुछ "विचार" कर देखते और लाखो रूपए देने पर भी प्रयोग करने से इंकार।   मुझे पता चला कपटी दुष्टात्मा सगा भाई भी ऐसे हरामी तांत्रिको की खोज में उसकी सहायता करता ,ताकि उसका  धन हड़पने का स्वार्थ पूरा हो सके. .

                        मैंने डायन के मृत्यु के पूर्व सच उगलवाने हेतु देवी कंकालीन माता से प्रार्थना भी की थी ताकि सब सच वह  बोल  जाए।  एक प्रयोग भी करवाया अभनपुर से परन्तु किसी 'तेलगू तांत्रिक' के बीच में आ  जाने से असफल हुआ. जब यह अभनपुर के तांत्रिक बैगा ने बताई तो विश्वास  नहीं हुआ। उधर वह मुझ पर "तांत्रिक वार" करने की कोशिस करती रहती पर सफल नहीं होती। अब क्रोध आकर मैंने स्वयं अपनी जप माला उठाई और नौसिखिया प्रयोग कर बैठा।  तीन दिन के मन्त्र  प्रयोग के बाद दिन दुष्ट कपटी भाई दौड़ता दौड़ता आया, कि  संपत्ति का हिस्सा बांटा करना है, भाभी मरणासन्न  है ,डाक्टरों ने कहा है कुछ घंटो में प्राण निकल सकते है , अधिकतम 24 घंटे जीवित रह पायेगी।

                                          (बाद में मुझे पता चला की मेरी विद्या सफल होने पर उसी तेलगू तांत्रिक पास इस  प्रयोग को असफल कराने  गए थे, परन्तु   उसने साफ़ मना कर दिया और कहा की यह प्रयोग उसने खुद किया है, देवी देवता उसी के साथ  है,मै बीच में आऊंगा तो मै  भी मारा जाऊंगा , दोषी तो तुम्ही लोग हो इत्यादि।  महाराज जी ने जब यह बात बताई तो अभनपुर वाले बैगा की बात की सच्चाई पता चली  )

                                अब एक अन्य महाराज (भीखम महाराज ) पास जांच के लिए पहुंचा तो पता चला दुष्ट डायन का प्राणांत अभी नहीं होगा।   मैंने कहा -असंभव, ड़ाक्टर ने हद से हद 24 घंटे दिया है। कैसे बच सकती है? परन्तु सचमुच मेकाहारा अस्पताल रायपुर से  एक सप्ताह खून चढ़ाने बाद पुन: डायन  घर आ गयी।  और लगभग छह माह जीवित रही।

                              दरअसल देवी उसे कुछ  माह और जीवित रखना   चाहती थी। मैंने जो मांग की थी वह अभी बाकी था ।  अगले छह माह डायन भाभी खाट(बिस्तर ) पर से उठ नहीं  पायी .उसका इधर उधर तांत्रिको के पास ,बैगाओं के पास भागना दौड़ना बंद  हो गया। परन्तु  दर्द से तड़फ़ना जारी रहा।  अस्पताल जाना भी बंद हो गया।

                          सारी रात, सारा दिन दर्द से तड़फती रहती। उसकी दुर्दशा पर बहुत से लोगो को दया आती , पेट भर सहानुभूति प्रकट करते समाज के लोग, जाति  के लोग. नाते रिश्तेदार वगैरह आते , शायद मुझे  कोसते भी थे, गालिया भी देते रहे होंगे।  उसकी दुर्दशा जो देवी ने की सारे  वे लोग देख रहे थे, पर समझ नहीं रहे थे थे, सिवा मेरे। (क्योकि इन छह महीनों में मै कांकेर नहीं गया और क्योकि खेल मुझे और उस डायन को पता था ). परन्तु उसके कर्म किसी को दिखाई नहीं  दिए (समाज  अंधा भी होता है ). अब मेरे श्राप (या मांग ) का बाकी हिस्सा पूरे होने को  थे। उसका कैंसर सारे शरीर में फ़ैल गया , पूरा शरीर ही  सड़ने लगा , यहां तक कि बदबू देने लगा, सड़े मांस जैसा ।  24  घंटे, हप्तों ,महीनो सो न पाना हमेशा तड़फते हुए कराहना ,करवटें बदलते रहना यही हो रहा था।  जो भी उससे मिलने आता  या देखने आता , मारे दुर्गन्ध के नाक में रुमाल रख लेते। ज्यादा देर उसके पास में न रहते।  मैंने माँगा था - तड़फ तड़फ कर मरे, घुल घुल कर मरे ,सड़ सड कर मरे।  माँ दुर्गा उसे शब्दश: पूरा कर रही थी। पापी जब अपने पाप  भुगतने लगता है तो अच्छे अच्छों की हिम्मत जवाब दे जाती है। इस तड़फन से वह अपने सारे कर्म मेरे कुटुंब के सामने बकने लगी।  सारे कर्म पर्दाफ़ाश होने के बाद भी मेरे कुटुंब के कपटी सदस्यों की आँखे नहीं खुली , न हि  पश्चाताप का भाव आया। न कलयुगी माँ का दिमाग आया, न कलयुगी स्वार्थी कपटी भाई  का दिमाग सही हुआ। उसकी पत्नी भी ओछे दिमाग की थी, उसका दिमाग सही नहीं हुआ। सारी वास्तविकता उलटे गोपनीय रखने लगे। समाज के लोग भी पूर्व में काफी पीड़ा पहुंचा चुके थे,मुझे सारी  बाते विभिन्न श्रोतो  से मालूम थी। पूरा  'हॉरर टीवी शो' मेरे जीवन में घटित  था।

                   मैंने अभनपुर छोड़ दिया क्योकि मेरी कंपनी छपारिया  के मंदी के चलते बंद हो गयी और नौकरी के लिए विशाखापटनम कुछ माह रहा। फिर होशंगाबाद जिले के  टिमरनी ग्राम में रहा. जबकि मेरी पत्नी और बच्चे विशाखापटनम से दक्षिण भारत घूमने चले गए -चेन्नई।

                 (बाद में समझ आया की देवी ने  सुरक्षा के लिए विस्थापित किया था ताकि तांत्रिक प्रयोग से मै परिवार सहित बचा रह सकू , मरते वक्त उसने  शरीर अर्पित कर  परिवार का नाश करने का प्रयोग किया था , ये बात देवी ने खुद  ही आकर बताया बहुत बाद में। आश्चर्य तो यह भी हुआ की देवी ने समुद्र, शिप इत्यादि का आभास भी कराया था मुझे व मेरी पत्नी  को भी , यानी  पूर्वाभास था विशाखापटनम जाने का ,जो हम अज्ञानी होने के कारण समझ नहीं पाये )

               टिमरनी में में रहते हुए ही नवरात्रि का समय आया।  इसी नवरात्रि में देवी के पास मैंने  पुन : याचना की-हे माता, दुष्ट प्रभा डायन के प्राणो  अंत कर दे, जब तक वह जीवित रहेगी मेरा कार्य पूरा नहीं हो पायेगा , नवरात्रि पवित्र है, उसमे मत मारना , नवरात्रि के बाद 15 दिन में उठा लेना। माँ ने स्वीकार कर लिया. शायद और नवरात्रि के 21 वें  दिन उसे यमलोग भेज दी। मुझे टिमरनी (होशंगाबाद) में  रहते ही यह सूचना मिली य़ह दिन 28  अप्रैल 1997 य़ानी कांकेर में मेरे घर पर किये गए नवरात्री  के 2 वर्ष उपरांत।

                      परन्तु मेरे इस महाभारत में मजे लेने वाले अभी तक खीर  खा रहे है। उन्हें उनके कपट की सजा इस इंटरनेटी लेख के लिखते तक नहीं मिली है।  जन्म दात्री माँ कुछ  ही महीनों पूर्व मृत्य को प्राप्त हुई , और मेरे, उसके सामने ही उसके व्यवहार से क्रोधित होकर, किये गए प्रण के अनुसार मैंने न कोई शोक  मनाया , न ही कांकेर गया उसके दाह संस्कार में, और न कंधा दिया शव यात्रा में , न किसी कर्मकांड मे भाग लिया।  मुझे तो मेरी जगत जननी माँ मिल चुकी थी फिर साँसारिक माँ न भी मिले तो क्या परवाह। दरअसल विधि के विधान का-"बोया सो काटेगा" की परीक्षा भी मै करना चाहता था , अत : मैंने देवी से प्रार्थना  थी की मुझे दिखाए ताकि ईश्वरीय न्याय पर मुझे विश्वास हो सके , ये सिर्फ कहावत है डराने के लिए, या फिर सच्चाई ! और मैंने देख लिया कर्म फल घटित होते हुए . दुष्टा घर पर बोल कर गयी थी कि  उसकी मृत्यु के बाद कोई कर्मकांड न किया जाए , ऐसा सुनने में आया।

                दुष्टा की आत्मा को मुक्ति नहीं मिली, प्रेतनी के  रूप में भटक रही है , दो बार अटैक भी  चुकी , परन्तु मेरे रक्षा -प्रयोग, माताजी और माजी सा तथा आदरणीय सासु माँ (मेरी दिवगंत सास की आत्मा) की कृपा से रक्षा हुई।

                       मेरी आत्मा कथा पाठको की आँख खोलने के लिए तथा सत्य से परिचय कराने  प्रकाशित किया. इस  पूरे घटनाक्रम में मै नास्तिक से आस्तिक बना, एक अनजान अविश्वनीय क्षेत्र का ज्ञानी बना।  विधि के विधान एवं  ज्ञान बढ़ा।  परन्तु घोर संताप , संघर्ष व हर तरह की तकलीफ मुझे झेलना पड़ा। कभी किसी व्यक्ति को ऐसे बुरे दिन देखने में आये तो उसकी सहायता भले ही न कर पाये परन्तु उपहास न करे ,कपटी अभय की तरह और समाज के और  तरह। बगैर असलियत जाने उसे बुरा भला न कहे ,   पाठको से यही  प्रार्थना है
(आपको ऐसा करने का अधिकार भी नहीं) होसकता है इससे उसकी मानसिक पीड़ा बढ़ जाए  और फिर आपकी बोई फसल आपको भी कभी काटना पड़े इस तरह  -रेणिक बाफना

 (और है - आखिर ये घटना  मेंरे जीवन में ही क्यों घटी !)

4 जनवरी 2015

ऐसा भी होता है -9 (धारावाहिक सत्य घटना )

ऐसा भी होता है -9 (धारावाहिक सत्य  घटना )

होइहे वही जो राम रची राखा  -तुलसीदास
महाराज जी पड़ोस के शहर चारामा में आये, इस बीच घर का वातावरण एक तरफा हो चुका था। भाभी का कुचक्र घर पर जोरो से चल रहा था। सब जैसे उसके वश में थे,उसक इशारो पर नाचते थे। मेरी   इच्छा थी कि  किसी भी तरह महाराज जी का आना निर्विघ्न हो सके।  डायन कई  बार किसी न किसी  बहाने घर में मेरा झगड़ा करा चुकी थी।  गँजेड़ी बाप  नशे में अपने को तीसमारखां समझने लगता था।  भाभी के उकसाने पर कभी भी अपनी गर्मी दिखाने लगता-घर से निकाल दूंगा,जूता  मार के वगैरह और गालियां भी बकने लगता। माँ घटिया किसम का व्यवहार करने लगी थी , पहले से भी बदतर। छोटा भाई दुष्ट और स्वार्थी तो था ही, मोहल्ले वालों को इकट्ठा कर घर से बाहर निकालने की बात भी भाभी से करता। अभय बाफना (छोटा 
भाई ) कपट दुष्टता , लालच में अंधा हो चुका था। उसकी पत्नी अपने को घर की वास्तविक मालकिन समझती और हमें जैसे किरायेदार और घर का बोझ। मेरे मन से अब सबका मोह समाप्त हो चुका था।
                                         जिस दिन  महाराज जी को कांकेर घर लाया संयोग  से सारी सामग्री आसानी से मिल गयी।  बंगला पान की जुड़वा पत्ती  जो दुर्लभ होती है , वह भी मिल गयी।  महाराज जी  के अनुसार योग   अच्छा था। जब वे  घर पर गए तो सिर्फ पिताजी ही दिखे, डायन घर पर नहीं थी।  परन्तु बाद में वह आ गयी और मेरे बंद कमरे के इधर उधर , आस  पास  घूमती रही कमरे से बाहर निकले तो सिर्फ माँ भर सामने आई. वो भी शायद महाराज जी को पहचान नहीं पायी होगी , क्योकि  महाराज जी पहली बार घर पर आये थे तो माँ ही मिली थी . पर इतने अंतराल के बाद याद आना मुश्किल था। कमरे में पूजा करते वक्त महाराज जी ने बताया की डौंडी  वाले सर ने जो "असली चीज" थी, उसे तो निकाला नहीं बल्कि जो शांत था उसे कैद करके निकाला है। सब चीजे  अस्त व्यस्त हो है और बन्धन  भी कर दिया  है , निकालने में मुश्किल होगा। उन्होंने यह भी कहा मै तुम्हारे व तुम्हारे परिवार की सुरक्षा भर करूंगा ,बाकी की जिम्मेदारी नहीं लेता। चूकि बाकी विघ्नकर्ता थे , व्यवहार भी बहुत खराब कर रहे थे , अतः अब उनका मोह न था (यानी माँ बाप भाई और बहू और उनके बच्चो का भी !). इसलिए मैंने मान  लिया। महाराज जी ने चार नग ताबीज  भी लाने का निर्देश दिया। महाराज जी चारामा चले गए। दूसरे दिन मैं  वहां गया ,महाराज जी ने दुर्गा जी के चित्र के सामने दिया जलाया , दिशा देवी की तरफ रखे, और कमरे से बाहर निकल गए।  बाद में जाकर देखा तो दिये  की दिशा घूम गयी थी, यानी कांकेर शहर की ओर। महाराज  देखा तो कहा यह अपने आप हुआ है ,बहुत काम समय में ही घूम गया, देवी कार्य शुरू कर दी ,देवी एक एक सांस खींच  रही है , जब पूरा खींच लेगी तब वापस दिया सीधा हो जाएगा। दो-तीन माह यह अब चलता रहा, लाल कमल से भी देवी की पूजा किये , सावन का महीना लगने वाला था। मैंने महाराज जी को अपनी रोजी रोटी  की समस्या भी बताई। मार्च 1994 से कमाई पूरी बंद थी।  रास्ता सूझ नहीं रहा था।   दूकान देखा और बताया -यहाँ आरिष्ट है, आरिष्ट निवारण करना पडेगा।
 ( हालांकि उनका आरिष्ट निवारण का प्रयोग सफल नहीं हुआ और ऐसा मेरा मानना है क्योकि अनुकूल परिणाम दूर दूर तक दिखाई नहीं दिया ).
 महाराज जी ने आश्वस्त किया कि  अब कोई खतरा नहीं है तुम लोगो को, बस ताबीज अपने 2 गले से  चारों कभी मत उतारना। हम चारो ने (मै स्वयं ,पत्नी और दोनों बच्चे ) ताबीज पहन लिया महाराज जी वापस गाँव चले गए।  सावन सोमवार समाप्ति के बाद जी से पुन: मुलाक़ात किया। उन्होंने निरिक्षण किया- सब ठीक ठाक चल रहा था। "विचारकर " उन्होंने बताया , नवरात्रि करने का आदेश देवी दे  रही है। मैंने कहा महाराज जी , न जाने इसमे कितना पैसा लगेगा , मेरे  पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं है , भारी गरीबी चल रही है। उन्होंने जवाब दिया- तुम्हे कुछ नहीं करना होगा , बस व्यवस्था करनी होगी, पैसो की चिंता मत करो, देवी स्वयं इसकी व्यवस्था करेगी। परन्तु भगवान पर भरोसा औरो की तरह मुझे भी कम होता है . अत : मेरी चिंता दूर नहीं हुई। पितृपक्ष में मै पुन: मिलने गया और तैयारी सम्बन्धी बातचीत की, सामग्री आदि विवरण लेकर लौटा। इसी समय मेरी बंद पड़ी दूकान का फर्नीचर ,कपड़े का स्टॉक आदि , मेरे गहरे मित्र (जितेंद्र डोसी ) के पास बिक गया, इस तरह संयोग से धनं की भी व्यवस्था भी हो गयी। इधर दुष्ट भाभी को मेरा अगला कदम समझ में नहीं आ रहा था , ये भी शायद भगवती की कृपा थी। नवरात्रि के दो पहले मैंने अपने कमरे की पुताई का बहाना कर सारा सामान कमरे के बाहर परछी में निकाल दिया और श्रमिक लाने हेतु घूमने का बहाना करने लगा। नवरात्रि   के एक दिन पहले महाराज जी चारामा ग्राम में आ गए। मै उनसे मिला, सारी  सामग्री खरीद कर तैयार था। नवरात्रि के दिन महाराज जी को लेने गया, मुहूर्त था,उन्हें लेकर आया।
डायन से भिड़न्त :-
जैसे ही महाराज जी  आये और मेरे कमरे  घुस गए, दुष्ट भाभी को पता चल गया। तुरंत वह आकर पिताजी ,माँ , व  कपटी भाई अभय बाफना को उकसाने लगी - उसे अंदर कैसे घुसने दिया ? ये तन्त्र  मन्त्र इत्यादि उलटा सीधा हमारे घर  में कर रहे हैं ,तुम लोग चुपचाप  तमाशा देख रहे हो?पिताजी को ताव आ गया,वे गालिया बकने लगे,माँ भी दहाड़ने लगी ,छोटा भाई अभय कहने लगा-चिंता मत करो भाभी ,कल सबेरे मोहल्ले वालो को इकट्ठा कर इन सबको धक्के मार कर बाहर करेंगे। अब तो मैंने भी उग्र रूप धारण कर लिया . और कमरे के दरवाजे पर खड़ा हो गया। जिसने भी अपनी माँ का दूध पिया हो  मुझसे टकराये, यहीं लाश न बिछा दिया तो मेरा भी नाम नहीं। घर तुम्हारे बाप का नहीं। मेरे दादा का है, मेरा भी हिस्सा है, कमरे में कुछ भी करने से कोई माई का लाल मुझे नहीं रोक सकता। कोई बाहरी व्यक्ति हस्तक्षेप करने आया तो उसके भी दिन पूरे हुए होंगे  तभी आएगा। मेरे गुर्राने से सब मेरे दरवाजे से 15 फीट दूर ही रहे, कोई आगे आने का साहस नहीं कर पाया। सब मेरी आदत जानते थे - या तो मुझे गुस्सा  नहीं आता ,  तो क्रोध में मै अंधा हो जाता हूँ, फिर कुछ भी ख्याल नहीं रहता।  मैंने भी ठान लिया, कोई भी आगे बढ़ा और मुझे नवरात्रि करने रोकना चाहां तो  किसी भी कीमत पर नहीं रोकने दूंगा ,चाहे किसी भी सीमा तक मुझे जाना पड़े। जब डायन भाभी ने देखा की कोई आगे बढ़ने साहस नहीं कर रहा है ,सब गीदड़ भभकी भर दे रहे है तो उसका उकसाना बेकार जा रहा है। आखिर वो बोली -आप लोग कोई नहीं रोकते तो मै आती हूँ जूता लेकर और मारकर बाहर करती हूँ। मै भी तुरंत तैयार हो गया ,बोला- तू जूता लेकर आ ,मै तेरे को पहले तेरे ही जूते से मारूँगा ,फिर यहीं मर्डर ही कर दूँगा। वह  कमरे में तो गयी परन्तु वापस लौटकर नहीं आई,मै खड़ा इंतज़ार करता रहा। इधर सभी गीदड़गण  अपने अपने कमरो में घुस गए। मै कमरे के बाहर क्रोध से भरा खड़ा रहा। थोड़ी देर में सब शांत हो गया तो मैंने महाराज जी से फिर निवेदन किया,उधर महाराज जी ने पूछा -सब शांत हो गया, तो अब दीप जलाये? मैंने कहा-हाँ। दोनों बच्चो,पत्नी, और मै स्वयं कमरे में घुसकर दरवाजा बंद कर सामग्री आदि व्यवस्थित किये, देवी के चित्र की पूजा कर अखंड ज्योति प्रज्वलित किये।  माता जी विराजमान  थी , अब  डर नहीं था। मुझे याद आ रहा था कि  पितृ पक्ष में या उसके पूर्व महाराज जी ने पांच मंगलवार हनुमान जी के मंदिर में जाने  का निर्देश दिया था ,पीपल के पत्ते पर लाल चन्दन से राम नाम लिखकर चढ़ाने का  निर्देश दिया था ,तो घर के कलंकित ,हरामी सदस्य मेरी हंसी उड़ाते थे , यानी खुद  करे  तो भगवान की भक्ति ,दूसरे  करे तो ढकोसला ,खुद करे तो पुण्य कार्य ,दूसरा करे तो पापी  और दुष्टात्मा ! 

                            नवरात्रि के दौरान  मै चुपचाप अपने कार्य में लगा रहता था। नवरात्रि में मैंने महाराज जी के साथ स्वयं भी उपवास किया, जीवन में पहली बार नवरात्रि के नौ दिनो तक फलाहार।  दुष्ट भाभी के कारनामो से परिचित, मै महाराज जी को शौच इत्यादि सामने के गढ़िया पहाड़ की तराई में ले जाता, स्वयं भी वहीं शौच करता , स्नान भी घर के पीछे दूध नदी में करता , महाराज जी के साथ। पूरे सात दिन तक यही क्रम चला ,घर पर बड़ी बहन भी आयी हुई थी , पिछले दस--बारह सालो से पागलपन के रोग से पीड़ित थी।  विशेषज्ञो के पास दवाइयाँ व शॉक  थेरेपी से दो तीन बार गुजर चुकी थी ,परन्तु ठीक नहीं हुई।  एक बार पूर्व में कहा था कि  यह भी ठीक हो जायेगी।  परन्तु उस गंदे माहौल में उसकी चिकित्सा हेतु प्रयोग करने की ईच्छा ही नहीं हुई। आखिर जिम्मेदारी उसके पति (सूरजमल नाहर , कवर्धा निवासी ) की भी बनती थी। जो उसे मायके पंहुचाकर खुद को झंझट से मुक्त कर लिया था। और घर में मै अपने पर एक  और मुसीबत लेने की हालत में नहीं था। दिन ब दिन शांत वातावरण होता जा रहा था ।   घर के बाकी गीदड़गण मेरी गतिविधियाँ चुपचाप देखते रहते क़िसी में कुछ भी पूछने की हिम्मत भी  नहीं होती थी।
बड़ी बहन-इंदिरा जिसकी तंत्र प्रयोग से मृत्यु हुई -चूहा मार दवाई से आत्महत्या !

 (बड़ी बहन को भी तंत्र प्रयोग कर पागल , उसी डायन ( प्रभा )भाभी  ने किया था, ऐसा बाद में पता चला था , जो बेचारी करीब 15 वर्ष तक पागल रही, और लाइलाज सिद्ध हुई , एवं अंत में चूहे मारने की दवा खाकर आत्महत्या कर ली )