30 नवंबर 2015

धूर्तों पाखंडियो से कैसे बचे-("ऐसा भी होता है "के सन्दर्भ में)

("ऐसा भी होता है"- के सन्दर्भ में )
           मेरे लेखो के बाद कुछ लोगो ने मुझसे संपर्क करने की कोशिस भी की,कुछ तो सफल भी हुए,कुछ को कांटेक्ट नं नहीं मिल पाया। मैं खुद ही नहीं चाहता कि इतने बड़े देश के लाखो लोग मुझे फोन करके परेशान करे।मेरा सिर्फ इतना उद्देश्य है कि लोगो को सच्चाई से अवगत कराऊ,पर इस तरह की परेशानियों से निपटने का रास्ता स्वयं उन्हें ही खोजना पडेगा।

एक परेशानी हमेशा लोगो को रहती है खासकर मध्यम वर्ग के लोगो को,जो इस क्षेत्र में असली नकली की पहचान में सक्षम नहीं होते।
     ज्योतिष और मन्त्र-तंत्र जैसे क्षेत्र ठगी,पाखण्डियों का बहुत बड़ा व्यापार बना हुआ है।
         कोई नज़र उतारने का सामान बेचता है वो भी टीवी ,इंटरनेट के जरिये। जैसा कि हर धंधे में होता है वैसा ही इस क्षेत्र में होना कोई आश्चर्य की बात नहीं।इसलिए सावधानी जरुरी है।एक चीज और,कोई भी यंत्र केवल पूजा स्थल पर पड़ा रहे तो वो अपने आप काम नहीं करता।ये मेरा अपना अनुभव है।
        कुछ टिप्स दे रहा हूँ सावधानी के लिए ,बुद्धि आपको ही लगानी पड़ेगी।
1-ये सच है कि पहले लोग साधना करते थे और रोजी रोटी कमाना नहीं पड़ता था। ये लोग सेवा करते थे।राजाओं के जमाने में।उस काल में राजाओ द्वारा और खुद जनता द्वारा दक्षिणा आदि दे दिया जाता था कि उन्हें रोजी रोटी की चिंता ही नहीं करनी पड़ती थी। आज इस क्षेत्र में रहने वाले भूखो मरेंगे अत: रूचि रखने वाले,योग्यता रखने वाले मज़बूरी के चलते इस क्षेत्र से दूर ही रहना पसंद करेंगे।

2-साधक लोग गैर-सांसारिक और अंतर्मुखी होते है प्रायः,इसलिए लोगो से दूर रहना पसंद करते है। फिर ऐसे लोग विज्ञापन करना क्यों पसंद करेंगे ?
    अखबारो में विज्ञापन धन्धेबाजो और धूर्तो के ही आते है।इनसे दूर रहना ही अच्छा। कुछ ठग गिरोह भी देखे जाते है,जिनके चक्कर में फंस कर लाखो रु की ठगी का शिकार लोग हो जाते है।

3-जो व्यक्ति भूत प्रेत निवारण के लिए,टोना टोटका निवारण के लिए आपके सोना चाँदी या गहनों की मांग करे, वो आपसे ठगी ही कर रहे है।

4-ये ठीक है कि आज के जमाने में साधू संतो को भी धन की आवश्यकता होती है क्योकि दान दक्षिणा का ज़माना बीत चुका। दान भी जहाँ जाना चाहिए उसकी बजाय अनावश्यक स्थानों में जाता दिखता है। कुछ ही लोग ऐसे होते है जो निशुल्क सेवा करते है क्योकि उनके जीवन यापन का श्रोत कोई और होता है। पर दक्षिणा के नाम पर ठगने या सोना चांदी गहने की ठगी नहीं करते क्योकि ये पुण्यात्मा होते है।

5-असली साधक/सिद्धि प्राप्त व्यक्ति दिखावे से दूर रहता है। जो लोग ढेर सारा तिलक चन्दन,गले में नाना प्रकार की मालाये,हाथो में तरह2 की अंगूठियां , प्रायः अजीबो गरीब वस्त्र आदि धारण किये हुए होते है वे प्रायः ठग/धूर्त ही होते है।
    अनेक बार यह भी देखने मिला कि कईयो के कार्य अनेक वर्षो के बाद भी पूरे नहीं हो पाते। ऐसा क्यों?
दरअसल कर्ता तो दैवी शक्ति/उच्च शक्ति ही होती है। और उन्हें आपका कच्चा चिट्ठा भलीभांति मालुम रहता है। अहंकारी,पापी, दुष्टात्मा देखकर वे कार्य को टालते जाते है। साधक भी यह बात जान जाता है अत: टालने लगता है। अत: इन दुर्गुणो से दूर रहे,दैवी शक्ति प्रसन्नतापूर्वक सहायता को तत्पर रहेगी,थोड़ी सी पूजा से ही प्रसन्न हो कार्य संपन्न कर देती है
      कर्ता केवल देवी देवता होते है,न कि पुजारी/साधक। वह तो केवल माध्यम होता है। केवल दिया अगरबत्ती जला देता है,फूल इत्यादि अर्पित कर देता है। परिणाम तो उच्च शक्तिया देती है।अत:गारंटी के साथ कार्य सिद्ध करने का दावा करने वाले लोग ठग होते है।
        कभी वांछित दक्षिणा न मिलने की उम्मीद में भी साधक कार्य करने से इनकार कर देते है। दक्षिणा/फ़ीस उनका अधिकार होता है। अत: साधक(तांत्रिक/देवी सेवक) को उचित पारिश्रमिक देना ही चाहिए। तभी कार्य पूर्ण होते है।

19 नवंबर 2015

ऐसा भी होता है- (13)(धारावाहिक सत्य घटना)

            सारे उथल पुथल पार करने के बाद,जो मेरे जीवन में अविश्वनीय रूप से, अंधविश्वास जैसी घटनाओ के रूप में आया। जिसे मैं किसी साधारण मित्र,वैज्ञानिक सोंच रखने वाले मित्र से शेयर नहीं कर सकता था। अगर करता हूँ तो वो तो यही समझेगा कि मेरे दिमाग का स्क्रू ढीला हो गया है,इसे साइकियाट्रिस्ट की सख्त जरुरत है।
       या फिर सोंचा जायेगा कि ये घोर अंधविश्वासी है,या फिर दुष्टतावश कहानिया गढ़ रहा है।
       खैर मैंने बहुत ही गहरे मित्रो से ही इन घटनाओ पर चर्चा किया। जिसमे एक दो वो मित्र भी  है जो इन सब विषयों में रूचि रखते है,मुझसे भी ज्यादा गहरी समझ रखते है।
        पर मेरे मन में नयी उथल पुथल मचती रही आखिर ये सब मेरे साथ ही क्यों हुआ। ईश्वर से मेरी क्या दुश्मनी थी जो मुझे ये दिन देखने पड़े।या मैंने ब्रम्हा की कौन सी भैंस खोल दी थी जो मेरे भाग्य में ये सब लिख दिया। अब ये सब जानने की प्रबल जिज्ञासा मेरे मन में कई वर्ष बनी रही। मैं किसी सिद्धि प्राप्त व्यक्ति की तलाश में रहा,कोईं मिल ही नहीं रहा था। आजकल तपस्वी/साधना करने वाले लोग बहुत कम लोग होते है। अगर कोई इच्छुक भी हो तो उसे भूखों मरने की नौबत अवश्य आती है। यदि कोई कष्ट पाते हुए भी किसी प्रकार की सिद्धि प्राप्त कर भी ले तो अपने आपको छुपा कर ही रखेगा,आम लोगो के रवैये को देखते हुए इसी में अपनी भलाई समझेगा।
        कुछ वर्षो बाद मेरी धर्म पत्नी धुलिया महाराष्ट्र गयी तो वहां एक सिद्ध व्यक्ति(तांत्रिक) के पास पंहुचने का अवसर मिला। उसे सचमुच सिद्धि प्राप्त थी। बिना पूछे उसने मेरे घर परिवार और व्यवहार के बारे में बता दिया। मेरी पत्नी ने लौट कर सब बताया तो मैं आश्चर्य चकित हो गया। मेरी भी उसके पास जाने की इच्छा बलवती हो गयी।
        आखिर मैं भी वहां पहुँच गया। मेरी बारी आई तो काली माई उसके शरीर में आ गयी। मैं भूल न जाऊ इसलिए पाकेट डायरी में लिख कर ले गया था। पर वहां तो पूछने की नौबत ही नहीं आई। मेरे कुछ पूछने  के पहले ही देवी ने उसके मुख से कहा- तुम्हारे मन में ये प्रश्न है न जो कुछ घटनाये तुम्हारे साथ घटी,उसका कारण क्या है। मेरे हां कहने पर उन्होंने कहा-तुम्हारे कोई पूर्वज ब्याज का धंधा करते थे(गिरवी रख उधार देने का)। उसमे लोगो की मज़बूरी का फायदा उठाकर खूब लूटा खसोटा। मैंने ये कहा वो मेरे परदादा थे।उसने कहा वो जो कोई भी हो,मुझे कोई मतलब नहीं। उसी कर्म का भुगतान तुम कर रहे हो यानी उनके पाप को चुकता करने का।
और सारे प्रश्न जो मेरे मन में थे जवाब उसने दे दिया। और यह भी कहा पूर्वजो के कर्ज और पाप को संतानो या आने वाली पीढ़ी को चुकाना पड़ता है। ये सुन कर मेरा दिमाग ही घूम गया।
        अब नया प्रश्न उठ गया। आखिर मैं ही क्यों चुकता करूँ। परिवार में और भी लोग तो थे।उनपर क्यों नहीं बीती ! सोंचते 2 यह भी याद आया कि बचपन से तिजोरी के ऊपर लिखा हुआ नाम " सेठ करणीदान रावलमल बाफना" नाम में से "करणीदान" नाम से मुझे आकर्षण महसूस होता था। कही उन्ही का तो पुनर्जन्म तो नहीं हूँ मैं ,पुराने कर्मो को चुकता करने! बाद के बर्षो में मैं अपने दादा जी के परिवार में ,जहां से वे मेरे परदादा के यहाँ से गोद में आये थे(क्योकि मेरे परदादा की कोई संतान नहीं थी,अपने भाई के पुत्र को गोद में ले लिए थे),जा पंहुचा। वहां वृद्ध महिला से थोड़ी सी जानकारी मिली तो पाया परदादा करणीदान की रुचियाँ मुझसे बहुत कुछ मिलती है। और ये भी कि वे देवीभक्त भी थे! अब यह स्पष्ट हो गया कि मैं ही अपने परदादा सेठ करणीदान का पुनर्जन्म हूँ। इसीलिए देवीकृपा शुरू से मेरे साथ रही जबकि मैं युवावस्था में घोर नास्तिक था।पर मुझे मेरा पिछलाजन्म मुझे ज़रा भी याद नहीं आता। राजस्थान में पुराना अपने परदादा का खंडहरनुमा घर भी देखा,फिर भी कुछ नहीं याद आया।
     (समाप्त)

16 नवंबर 2015

ऐसा भी होता है-(12)-(धारावाहिक सत्य घटना)

कई महीने बीते,शायद साल भी बीता। छोटे भाई के मन में पूरी संपत्ति हड़पने की योजना चलने लगी। बंटवारे के लिए दौड़ भाग चलने लगी।
     इधर मृत डायन भाभी प्रेतनी के रूप में भटकने लगी थी।इसका मुझे ज़रा भी गुमान नहीं था। हालांकि वो आत्मा कांकेर स्थित निवास स्थान पर ही रहती थी।
बड़ी बहन इंदिरा जो वर्षो से पागल थी, ने घोर निराशा की वजह से चूहा मार दवा खाकर आत्महत्या कर ली। उसके दाह संस्कार आदि के लिए मैं कांकेर गया परिवार सहित। रात्रि में परछी में हम सोये। रात्रि में ही भाभी की आत्मा ने मेरी पत्नी के पैर खींचने का प्रयास किया। पत्नी को उसकी उपस्थिति का आभास भी हुआ। सबेरे उसने यह बात बताई तो मैंने गंभीरता से नहीं लिया ,सिर्फ वहम समझा। भला मरने के बाद भी कोई आ सकता है !
        वापसी पर वो दुष्ट आत्मा पत्नी के शरीर में प्रवेश कर साथ2 आ गयी। पर सब कुछ सामान्य होने से कोई आभास नहीं हुआ।
         इधर बाद में कई दिनों से पत्नी का चिड़चिड़ापन दिखने लगा था।जिसे मैंने तनाव और शायद कमजोरी के कारण समझा। कभी वह छोटी बिटिया को बहुत पीटती जबकि छोटी होने के कारण ज्यादा लाडली थी।
एक बार ठन्डे दिमाग से सोंचने पर मुझे कुछ शंका हुई।
रविवार के दिन अचानक मैंने उससे कहा चल घूमकर आते है।और स्कूटर में बिठाकर ले जाने लगा।उसने पूछा कहा ले जा रहे हो? मैंने कहा बस एक जगह से आते है। और सीधे एक (थान) देवस्थान ले गया।
       अनेक लोगो के बाद जब हमारा नं आया तो तुरंत पत्नी को क्रोध भरा आवेश आ गया। बाबाजी(थान के) से भी बहस करने लगी-तू मेरा क्या बिगाड़ लेगा? इसने मुझ(यानीे मैंने)बहुत तड़फा2 कर मारा है। मैं तो इसे((पत्नी को) लेकर ही जाउंगी, आदि। अब भेद खुल चुका था कि डायन की आत्मा का अटैक हो चुका है।
अब मुझे भी क्रोध आ गया-हरामजादी तेरे ज़िंदा रहते तो तेरे से डरा नहीं,तेरे मरने के बाद क्या डरूंगा ।
बाबा जी ने बंधन कर आवेश शांत किया। और मैं सावधान हो गया।वह डायन आत्मा भी सहम गयी कि उसका भेद खुल गया।
    इसी बीच मेरे ससुराल की कुलदेवी ने मेरी सास की दिवंगत आत्मा को निर्देशित किया कि जाओ अपनी बेटी(मेरी पत्नी ) के शरीर में रहकर उसकी रक्षा करो।
(ये रहस्य छोटे2 टुकड़ों में मेरे सामने खुले)।एक बार मेरी सास पत्नी के शरीर में आकर मेरी खिंचाई की तो पता चला। दरअसल मैंने भैरव बाबा से समस्त भूत प्रेत को बांधने की प्रार्थना की थी,चूँकि मेरी सास की आत्मा भी मेरे घर के लिए प्रेतनी ही थी,अत: वह भी बंधन में आ गयी और उन्हें तकलीफ होने लगी। ये बात स्वयं आत्मा ने ही मुझे कहा। मैंने तुरंत भैरव बाबा से प्रार्थना की ,कि पितरो और हमारी रक्षा करने आई आत्माओ को बंधन मुक्त करदे उन्हें तकलीफ मत हो। तुरंत 5 मिनट में सब शांत हो गया।
        कुछ दिनों बाद होली आ गयी। उस दिन पत्नी ने कहा आज मेरे जाने का दिन है। आखरी दिन है। रात्रि हुई घर की छत पर उल्लू भी आकर बैठ गया और आवाज करने लगा। मुझे भी शंका हो गयी अब।मैंने अपनी कुलदेवी के सामने जाकर गुस्सा हो बोला मैं तेरी पूजा करता रहता हूँ,यदि मेरी पत्नी को कुछ हुआ तो तेरी पूजा सदा के लिए बंद कर दूंगा,और तो और मेरी आने वाली पीढ़िया भी तेरी कभी पूजा नहीं करेगी।
रात्रि में सोने के बाद सपने में पत्नी को प्रेतनी भाभी दिखाई दी कि तुझे लेने आई हूँ। फिर एक थाली दिखाई दी जिसमे एक बिल्ली बैठी हुई थी।फिर एक चमकदार तलवार ऊपर से गिरती दिखाई दी उसके बाद बिल्ली उठकर चली गयी। रात्रि में ही पत्नी ने मुझे जगाने की कोशिस की पर मैं तो घनघोर नींद में था। सुबह होने पर रात्रि वाली बात बताई पर चमकदार तलवार जैसी चीज के बारे में समझ नहीं पा रही थी,तो मैंने माताजी की तस्वीर के पास ले जाकर दिखाया-ऐसी थी न? उसने तलवार का चित्र पहचान लिया। तब समझ में आया कि माताजी ने रक्षा की मेरी पुकार पर।
           इसी बीच कुछ समय बाद हमने किराए का घर बदल लिया। कुछ महीने बाद कभी डायन भाभी की प्रेतात्मा का आभास मेरी पत्नी और खुद मुझे भी हुआ। जब पत्नी से पूछने के बाद समझ में आ गया कि दुष्टा फिर से हमारे चक्कर लगा रही है तो मैंने भैरव प्रयोग किया। रात्रि में सपने में भैरव जी उस दुष्टात्मा को तालाब में डूबा2 कर मारते दिखाया। उसके बाद वो कभी नहीं आभास दी।
(आगे और है-ये सब क्यों हुआ)