30 जुलाई 2016

फिर एक बार काल को जान लिया

भगवान् शंकर की ही कृपा रही होगी शायद जो मुझे विश्वास दिलाने और प्रकृति के रहस्य समझाने मुझे समय से पहले काल के आगमन का रहस्य समझाते आये। मेरे रिसर्च यात्रा में अनेक बार मैंने पहले से जाना और फिर घटते हुए भी देखा।आश्चर्य तो तब और हुआ जब टलते हुए भी देखा। यानी 2+2=4 तो देखा ही पर 2+2= 5 या 3 होते भी देखा अपवाद स्वरूप ।

इसीलिए मैं विज्ञापनों में लिखा करता था जब हस्तरेखा देखा करता था-"मैंने विधि के विधान को देखा है,उसे घटते हुए भी देखा उसे बदलते हुए भी देखा

एक और घटना-

तब मैं एक जैन परिवार में नौकरी करने लगा था। एक बार अपने मालिक के बाजू में खड़ा हो बात कर रहा था,उसकी हथेली खुली हुई थी,आदतवश मेरी नजर उस पर पड़ गयी। कुछ ही सालो बाद उसकी मृत्यु थी।
कुछ महीनो बाद मैंने उसके यहाँ नौकरी छोड़ दी,बड़ी मुश्किल से वेतन निकाल पाया।
3-4 वर्षो बाद अखबार में न्यूज आई,नागपुर से लौटते वक्त उसकी कार का एक्सिडेंट हो गया और स्पॉट में ही उसकी मृत्यु हो गयी!

ईश्वरीय लीला

ये कहानी दूसरे वाट्सएप ग्रुप से निकाल कर पोस्ट कर रहा हूँ,जो ईश्वरीय लीला/किस्मत की बात बताती है और प्रेरणादायक भी है-आर के बाफना
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🙏�🙏�🙏 �  *वह तेरे विश्वास को टूटने न देगा*  🙏�🙏�🙏�
एक प्रसिद्ध कैंसर स्पैश्लिस्ट था|
नाम था मार्क,
एक बार किसी सम्मेलन में
भाग लेने लिए किसी दूर के शहर जा रहे थे।
वहां उनको उनकी नई मैडिकल रिसर्च के महान कार्य  के लिए पुरुस्कृत किया जाना था।
वे बड़े उत्साहित थे,
व जल्दी से जल्दी वहां पहुंचना चाहते थे। उन्होंने इस शोध के लिए बहुत मेहनत की थी।

बड़ा उतावलापन था,
उनका उस पुरुस्कार को पाने के लिए।

जहाज उड़ने के लगभग दो घण्टे बाद उनके जहाज़ में तकनीकी खराबी आ गई,
जिसके कारण उनके हवाई जहाज को आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी।
डा. मार्क को लगा कि वे अपने सम्मेलन में सही समय पर नहीं पहुंच पाएंगे,

इसलिए उन्होंने स्थानीय कर्मचारियों से रास्ता पता किया और एक टैक्सी कर ली, सम्मेलन वाले शहर जाने के लिए।
उनको पता था की अगली प्लाईट 10 घण्टे बाद है।
टैक्सी तो मिली लेकिन ड्राइवर के बिना, इसलिए उन्होंने खुद ही टैक्सी चलाने का निर्णय लिया।

जैसे ही उन्होंने यात्रा शुरु की कुछ देर बाद बहुत तेज, आंधी-तूफान शुरु हो गया।
रास्ता लगभग दिखना बंद सा हो गया। इस आपा-धापी में वे गलत रास्ते की ओर मुड़ गए।
लगभग दो घंटे भटकने के बाद उनको समझ आ गया कि वे रास्ता भटक गए हैं। थक तो वे गए ही थे,
भूख भी उन्हें बहुत ज़ोर से लग गई थी। उस सुनसान सड़क पर भोजन की तलाश में वे गाड़ी इधर-उधर चलाने लगे।
कुछ दूरी पर उनको एक झोंपड़ी दिखी।

झोंपड़ी के बिल्कुल नजदीक उन्होंने अपनी गाड़ी रोकी।
परेशान से होकर गाड़ी से उतरे और उस छोटे से घर का दरवाज़ा खटखटाया।

एक स्त्री ने दरवाज़ा खोला।
डा. मार्क ने उन्हें अपनी स्थिति बताई और एक फोन करने की इजाजत मांगी। उस स्त्री ने बताया कि उसके यहां फोन नहीं है।
फिर भी उसने उनसे कहा कि आप अंदर आइए और चाय पीजिए।
मौसम थोड़ा ठीक हो जाने पर,
आगे चले जाना।

भूखे, भीगे और थके हुए डाक्टर ने तुरंत हामी भर दी।

उस औरत ने उन्हें बिठाया,
बड़े सम्मान के साथ चाय दी व कुछ खाने को दिया।
साथ ही उसने कहा, "आइए, खाने से पहले परमेश्वर से प्रार्थना करें
और उनका धन्यवाद कर दें।"

डाक्टर उस स्त्री की बात सुन कर मुस्कुरा दिेए और बोले,

"मैं इन बातों पर विश्वास नहीं करता।
मैं मेहनत पर विश्वास करता हूं।
आप अपनी प्रार्थना कर लें।"

टेबल से चाय की चुस्कियां लेते हुए डाक्टर उस स्त्री को देखने लगे जो अपने छोटे से बच्चे के साथ प्रार्थना कर रही थी।
उसने कई प्रकार की प्रार्थनाएं की। डाक्टर मार्क को लगा कि हो न हो,
इस स्त्री को कुछ समस्या है।

जैसे ही वह औरत
अपने प्रार्थना के स्थान से उठी,
तो डाक्टर ने पूछा,

"आपको परमेश्वर से क्या चाहिेए?
क्या आपको लगता है कि  परमेश्वर आपकी प्रार्थनाएं सुनेंगे?"

उस औरत ने धीमे से उदासी भरी मुस्कुराहट बिखेरते हुए कहा,

"ये मेरा लड़का है
और इसको कैंसर रोग है
जिसका इलाज डाक्टर मार्क नामक व्यक्ति के पास है
परंतु मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं
कि मैं उन तक,
उनके शहर जा सकूं
क्योंकि वे दूर किसी शहर में रहते हैं।

यह सच है की कि परमेश्वर ने अभी तक मेरी किसी प्रार्थना का जवाब नहीं दिया किंतु मुझे विश्वास है
कि परमेश्वर एक न एक दिन कोई रास्ता बना ही देंगे।
वे मेरा विश्वास टूटने नहीं देंगे।
वे अवश्य ही मेरे बच्चे का इलाज डा. मार्क से करवा कर इसे स्वस्थ कर देंगे।

डाक्टर मार्क तो सन्न रह गए।
वे कुछ पल बोल ही नहीं पाए।
आंखों में आंसू लिए धीरे से बोले,
"परमेश्वर बहुत महान हैं।"

(उन्हें सारा घटनाक्रम याद आने लगा। कैसे उन्हें सम्मेलन में जाना था।
कैसे उनके जहाज को इस अंजान शहर में आपातकालीन लैंडिंग करनी पड़ी।
कैसे टैक्सी के लिए ड्राइवर नहीं मिला और वे तूफान की वजह से रास्ता भटक गए और यहां आ गए।)

वे समझ गए कि यह सब इसलिए नहीं हुआ कि परमेश्वर को केवल इस औरत की प्रार्थना का उत्तर देना था

बल्कि परमेश्वर उन्हें भी एक मौका देना चाहते थे
कि वे भौतिक जीवन में
धन कमाने,
प्रतिष्ठा कमाने, इत्यादि
से ऊपर उठें और असहाय लोगों की सहायता करें।
    
वे समझ गए की परमेश्वर चाहते हैं
कि मैं उन लोगों का इलाज करूं जिनके पास धन तो नहीं है
किंतु जिन्हें परमेश्वर पर विश्वास है।
         
हर इंसान को ये ग़लतफहमी होती है
की जो हो रहा है,
उस पर उसका कण्ट्रोल है
और वह इन्सान ही
सब कुछ कर रहा है़

वचन कहता है:-
*"मांगो तो तुम्हें दिया जाएगा, ढूंढो तो तुम पाओगे, खटखटाओ तो तुम्हारे लिए खोला जाएगा ।"(मत्ती 7:7 )*
🙏🙏🙏

विरोधाभासी ज्योतिषीय योग !

💀ज्योतिष एक सिद्धांत मात्र ही है जो सिर्फ जीवन में पूर्व निर्धारित "योग" या "संभावना" को ही प्रकट करता है। पर ये कोई जरुरी नहीं कि वो संभावना/योग/घटना घट ही जाए। क्योकि मैंने अपनी परीक्षाओ में होने और न होने का प्रतिशत 50:50 ही पाया।
💀 ये घटना मेरी तो नहीं बल्कि एक मित्र हस्तरेखा विद्वान के द्वारा देखी गयी थी और मुझे उसने बताया चर्चा करते वक्त।
एक महिला उनके पास हाथ दिखाने आई तो उसने पाया कि उसके हाथ में विधवा योग था। उसने कुछ कहा नहीं बल्कि उसके पति को बुलवाया और उसका हाथ देखा।पति महोदय दीर्घजीवी थे हस्तरेखानुसार।

बड़ा गजब का संयोग था !!!!!
अगर पति महोदय जीवित रहते है तो पत्नी की हस्त रेखा गलत साबित होती है,और अगर पत्नी विधवा हो जाती है तो पति महोदय की हस्तरेखा गलत साबित होती है।
खैर उन्हें कुछ बताया नहीं गया पर उन्हें observation रखा गया। कुछ सालो बाद पति महोदय की मौत हो गयी और पत्नी का विधवा योग सही साबित हो गया। इतना प्रभाव होता है जीवन साथी का ।
-आर के बाफना

शास्त्र क्या है?

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शास्त्र क्या है?
शास्त्रो की रचना पुराने ऋषि मुनियो और विद्वानजनो ने आने वाली पीढ़ी तक ज्ञान स्थानान्तरित करने के लिए ही की है।
उन सभी पूर्वजो,विद्वतजनों,मुनियो को शत्2 प्रणाम जिन्होंने अथक मेहनत से खोजबीन कर संकलन किया और आने वाली पीढ़ी के लिए अमूल्य ज्ञान छोड़ गए। अगर स्वार्थी बन ये सब नहीं करते तो हमारी ,हमारी पहले की और आने वाली पीढियां बेशकीमती ज्ञान से वंचित रह जाती। इस योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। करोडो लोग धरती पर आये कमाए खाये, आने वाली अपनी पीढ़ी के लिए धन संपत्ति जोड़ कर भगवान को प्यारे हो गए। पर जिन्होंने नि:स्वार्थ ज्ञान का संकलन कर दिया उसकी तुलना में करोडो अरबो की धन संपत्ति भी तुच्छ है। कई पीढ़ियों का उद्धार कर दिया चाहे लोग किसी भी वंश से जुड़े हो।
✍ अब मान लीजिये इनकम टैक्स की किताब है और इसे मैं रेशमी कपड़ा बिछाकर और रेशमी कपड़े से ढककर फूल चढ़ाकर अगरबत्ती जलाकर पूजा करूँ तो उसमे संकलित ज्ञान तो मेरे दिमाग में घुसने से रहा।
इसके लिए तो मुझे उसका गहन अध्ययन करना होगा और प्रयोग भी करना होगा,अपनाना होगा।
करीब2 यही हरकते हम लोग धर्मग्रंथो सहित सभी विद्याओ के ज्ञान सम्बंधित शास्त्रो/ग्रंथो के साथ करते आ रहे है। जो हमारी ही नादानी के सिवा कुछ भी नहीं। और ग्रन्थ/शास्त्र रचना का उद्देश्य भी पूरा नहीं हो रहा।

✍ शास्त्र एक गुरु भी है बशर्ते उसे पढ़ा जाए,बुद्धिमतापूर्ण तरीके से उपयोग भी किया जाए। रही बात शास्त्रो से चिपके रहने की,तो ये कुपमंडूप्ता ही होगी।क्योकि शास्त्र एक नियमो/सिद्धान्तो का संकलन ही है। उसे गहराई तक समझने दिमाग की खिड़की खुली रखते हुए ही प्रयोग करे।क्योकि ज्ञान का क्षेत्र इतना विस्तृत है कि एक किताब में समाना असंभव ही है।
🔍दूसरी बात- विद्वानों ने खोजबीन से जो पाया उसका संकलन ही तो किया।
हो सकता है जिन सिद्धांतो को बताया उनके काल में अटलसत्य रहा हो।पर त्रेतायुग के सिद्धांत कलयुग में भी खरे उतरे क्या जरुरी है?
हर सिद्धांत के अपवाद भी होते है ये प्रकृति/भगवान की ही तो लीला है।
जब विज्ञान के सिद्धांतो के अपवाद हो सकते है तो ज्योतिष,अध्यात्म,तंत्र आदि जैसे अछूते कैसे रह सकते है?
इसलिए शास्त्रो को अध्ययन करो, मनन करो, चिंतन करो, आजमा कर देखो,अनुभव ही सत्य से साक्षात्कार करायेगा।
-आर के बाफना,रायपुर छ.ग.