18 अगस्त 2014

ऐसा भी होता है-8 (धारावाहिक सत्य घटना )

ऐसा भी होता है-8 (धारावाहिक सत्य घटना )-
कुछ दिनों बाद सर पुन : घर आये , मेरी पत्नी के घुटने को पुन  : देखा, पारद शिव लिंग का प्रयोग  स्पर्श कराते हुए किया , कुछ पैरो/घुटनों  में चूसने की प्रक्रिया की।  मुंह से पौधो की जड़ो जैसा कुछ निकाला  और कहा कि  घुटनो की बीमारी उन्होंने ठीक कर दिया।  विश्वास  नहीं हो रहा था मुझे ,मैंने पूछा - यह बात मै कैसे जानुगा? उन्होंने बताया की अमावस्या के आस पास ही ज्यादा दर्द उठता रहा होगा , देखना अब दर्द होगा ही नहीं !मैंने सर को बताया पुरानी बात,कि  कैसे 72 घंटे बाद,दुष्ट भाभी  बीमार पड़ी,फिर कैसे ठीक हो गयी? सर ने बताया , उसने रक्षा पाठ किया होगा, उसकी सहेली डायन-2  ने और गुरु (शीतला मंदिर के पुजारी ) ने "झाड़ा"  दिया होगा। या फिर शंकर भगवान को वचन बद्ध कर ठीक हुई होगी , और नारियल भिजवा दी , इसलिए बच गयी।
             [भगवान शंकर की यही एक खराबी है, दुष्ट लोगो को भी वरदान दे बैठते है और सीरियल को एकता कपूर की तरह लंबा खींचते है. कभी २ तो यह भगवान भरोसे के लायक भी नहीं लगते !]
सचमुच दुष्ट लोग बड़ी सख्त जान होते है ,ईश्वर भी उनके आगे नतमस्तक हो जाता है।  इसलिए इस्लाम में कहावत है- नंगे से खुदा डरे।
                     अमावस्या आयी, फिर पूर्णिमा, फिर अमावस्या।  पर पत्नी के घुटने का दर्द उड़न छू था।  घोर आश्चर्यजनक , परन्तु कई  महीनो मैंने ध्यान दिया , वाकई कभी नहीं हुआ।  जबकि घुटने का अजीब सा दर्द जो पिछले 4-5 वर्षो से पीछे पड़ा हुआ था।  काँकेर के दो-दो हड्डी रोग विशेषज्ञ देख चुके थे, दर्द का कारण समझ में नहीं आया था।  दवाईया अस्थायी रूप से ही लाभ कर रही थी , कभी 2 फेल भी हो जाती थी। एक्स रे इत्यादि से भी कुछ नहीं मिल रहा था ! दर्द का  कारण डाक्टरों को भी समझ में नहीं आ रहा था ,एक डाक्टर ने तो घुटने में वह इंजेक्शन देने का निर्णय भी ले लिया था जो बुढ़ापे में ही दिया जाता है। परन्तु एक अन्य डाक्टर की सलाह मैंने ली तो उसने रोक  दिया।  इस दर्द निवारण हेतु आयुर्वेद (वातरोग चिकित्सा ) एवं होमियोपैथी भी शतप्रतिशत असफल हुई थी कुछ आराम के बाद वही स्थिति फिर आ जाती थी।  हम लोग इलाज करवा2  कर थक चुके थे , समझ में नहीं आता था ! ऐसे में डायन भाभी की करतूत का रहस्योद्घाटन और उसका तंत्र मन्त्र द्वारा निराकरण भला क्यों नहीं अपना अस्तित्व प्रमाणित करता ? अनुभवजन्य सत्य का  उदघाटन था यह।  इसे मनोवैज्ञानिक असर भी नहीं कहा जा सकता, न ही किसी प्रकार का भ्रम विभ्रम।
                          कुछ दिनों बाद पुन : महसूस होने लगा की कार्य  पूर्ण नहीं हुआ है , अब भी कुछ गड़बड़ी है. शंका निवारण करने के लिए एक स्थानीय विचारक के पास गया( ये ब्राम्हण महाराज भी जोरदार सिद्धि प्राप्त थे,जो बाद में अनेक परीक्षाओ के बाद मैंने माना ) उसने अपनी हथेली पर सब कुछ देखने के बाद कुछ भी बताने से इंकार कर दिया।  परन्तु एक संकेत दे दिया की घर तो अभी तक ठीक नहीं हुआ है। मेरे परम मित्र सुब्रत दत्त राय को मेरी अनुपस्थिति में कई  बाते बताई जो मित्र ने मुझे बाद में बताया। बाते वही थी,जो पिछली बातो की पुष्टि थी। (परन्तु घर में क्या था ये पहली बार ठीक ठीक उसी से मालुम हुई। उसकी बातो में विश्वास पूरी तरह न करके मै कोंडागांव गया, जहा किसी के  शरीर पर काली माई आती थी, ऐसा सुना  था। उस दिन उस व्यक्ति ने कहा-परिस्थितिवश आज देवी का आवाहन नहीं करूंगा पर अनाज के दाने से विचार  कर उन्होंने बताया कि " डौंडीवाले  सर " के हाथो कार्य पूरा होने का  योग नहीं है।उन्हें समस्या की विस्तृत जानकारी नहीं है ,कार्य होने  योग भी नहीं, अत: पुराने रवेली वाले महाराज के पास जाओ। उन्हें समस्या की पूरी जानकारी भी है।  आदेश के अनुसार मुझे पुन : भाग दौड़ करनी थी।वहा  से आने के बाद , एक दो दिन बाद पुन:मन में आकस्मिक रूप से आत्महत्या विचार आने लगे , शरीर  और  मन भारी लगने   लगा।  एक बार पहले मन और शरीर पर  असर महसूस हो चुका था।  अत:पत्नी से पूछा ,तो  उसे भी वैसा ही लग रहा था।  अत: हम दोनों सावधान हो गए,दुष्टाके बंधन से  मुक्ति की बात समझ में आते ही तुरंत दूसरे दिन मै महाराज जी के गाँव की तरफ रवाना  हुआ ,दिन भर भूखा प्यासा रहते , रास्ते में विभिन्न बाधाये झेलते अंतत : रात्रि में उनके गाँव जा पहुंचा। इस बार  महाराज जी मिल गए। उस रात खा पीकर सो गया। . सबेरे उन्हें सारी बातें  बताई।काली माई ( कोंडागांव)से मिले निर्देश के बारे में बताया। उन्होंने आश्वासन दिया,कि मै  समय पर आ गया हूँ ।अब देखता हूँ ,कुछ फूंका उन्होंने, वापस लौटने का निर्देश दिया।  पुत्री का विवाह निपटाकर आने की बात कही।
(टीप-बुरे समय में कार्य पूरा करने दौड़ते समय  अनेक बाधाये आती है , जैसे रवेली गाँव जाते  समय मेरे साथ हुआ )   
                                                                                                                                                              
  मै वापस घर आ गया। घर आकर इंतज़ार करने लगा। एक एक दिन एक एक युग  के सामान लग रहा था।  संकट में समय एक एक पल  भारी लगता है। कैसी कैसी घटनाये घटती है जीवन में।मुझे याद आने लगा,बचपन में एक   ज्योतिषी(राधा कृष्ण श्रीमाली ने)बड़े भैया को बताया की तुम्हारा विवाह एक  चेचक दाग वाली लडकी से होगा, वो आकर तुम्हारा घर तहस नहस  देगी। वो चुड़ैल भाभी आ गयी, बड़े भाई की  मौत भी हो गयी और मै उससे महाभारत लड़ रहा हूँ। वो भयानक तंत्र मन्त्र की ज्ञाता , इधर मै अदना सा और अनजान।  लड़ाई में बाहरी व्यक्तियों का साथ और कुटुंब के स्वार्थी सदस्यों का विरोध। यह ही तो है मेरे जीवन का महाभारत युद्ध। तहस नहस तो वो कर ही रही थी।  एक ख़ास बात यह भी थी, वो चुड़ैल भाभी पूरे घर से लड़ जाती थी पहले, परन्तु न जाने क्यों मुझसे शुरू से ही डरती थी, कभी आमने  सामने  भिड़ने  का साहस नही किया औरो की तरह। कभी कभी कहती  थी- इस घर में पीलू जी (मेरे घर  का  नाम   ) ही अच्छे है , साफ़  सुथरे ,बाकी सब गलत लोग। पता नहीं ये युद्ध मुझे ही क्यों  लड़ना  पड़ रहा है।  शायद सिर्फ इसलिए बड़ा होने के कारण मुझपे भार था ?या  फिर पिछले जन्म का कोई कर्म फल ? या फिर ब्रम्हा जी की भैंस मैंने खोल कर चुरा लिया,जिसके कारण  ब्रम्ह देव ने मेरे भाग्य में   लिख मारा था बदलालेने  ! 

16 अगस्त 2014

कुंए के मेंढक के अस्तित्व से किया इंकार !

कुंए के मेंढक  के अस्तित्व से किया इंकार !
आज कल जिसे देखो अपने को पढ़ा लिखा , आधुनिक  बताते हुए अनेक विषयो को ढकोसला और अंधविश्वास बताता है . ऐसे दो मुंहे  लोग भी दिखाई देते है जो वैसे तो आधुनिक और विज्ञान के ठेकेदार बनते है   और चुपके चुपके नारियल अगरबत्ती लेकर कभी बाबाओ के पास, कभी मंदिर ,और कभी ज्योतिषियों के पास जाते दिखेंगे। जिन बातो पर ऐसे लोग पाखण्ड ,अंधविश्वास ,भ्रम विभ्रम होने की घोषणा करते है ,वे खुद भी कितने ज्ञानी है ,उनका मानसिक स्तर क्या है ? यह सोंचने वाली बात है। इनमे से कोई भी रिसर्चर नहीं। केवल फैशन और दिखावे के लिए बुद्धिमत्ता झाड़  रहे है।
                      आप ने कभी देखा नहीं ,कभी भुगता नहीं , इसका मतलब यह नहीं होता की इनका अस्तित्व नहीं। बिलासपुर (छ.ग. )  प्रकाशित प्रज्ञा तंत्र  सन  2004  में "टोनही" सम्बन्धी सत्य घटना का प्रकाशन  था , जिससे इन सबका अस्तित्व प्रमाणित होता है .दुनिया  में हर चीज है, ये अलग बात है किसी को बार-बार देखना पडता है , किसी का पाला जीवन भर नहीं पडता ,किसी को इन चीजो का पता ही नहीं चलता।  मूर्ख भारतीयों से बुद्धिमान विदेशी अच्छे ,जो परामनोविज्ञान के तहत इन पर गम्भीरता से रिसर्च कर  रहे है , न कि  बिना सोंचे समझे मूर्खो की तरह नकारते है। कानून बनाने वाले भी चुनाव के समय चुनाव जीतने तरह तरह के तांत्रिक अनुष्ठान करवाने लग जाते है .
विज्ञान के ठेकेदारो पर ज़रा खुद सोंचे -
आजकल जिसे देखो विज्ञान का ठेका ले लेता है।  अब ज़रा विचार करे इन तर्कों पर।  मान लीजिये एक एलोपैथी का डाक्टर है और वह ह्रदय रोग विशेषज्ञ  रोग है। निश्चित रूप से हृदय रोग चिकित्सा में सम्पूर्ण ज्ञान रखना संभव नहीं, क्योकि जब उसने पढ़ाई की थी तब के कोर्स और अभी के नए कोर्स में काफी बदलाव आ गया होगा , नये नए ज्ञान और रिसर्च की बाते  जुड़ती गयी होगी क्योकि वैज्ञानिक अनुसंधान कभी रुकता नहीं।  इस हिसाब  से तो इस चिकित्सा में अधिकतम 80 % ज्ञान ही होगा इस महाशय के पास , वह भी तब जब रिसर्च पेपर्स ,चिकित्सा विज्ञान के जर्नल्स नियमित  रूप से पढ़ता रहे, एडवांस्ड  प्रशिक्षण हेतु देश   विदेश की यात्राये कर ट्रेनिंग लेता रहे।
                            अब चिकित्सा के भी अनेक क्षेत्र है  एलोपैथी में। बाल रोग, स्त्रीरोग, नेत्र रोग ,मेडिसिन  इत्यादि इस हिसाब से केवल एलोपैथी चिकित्सा विज्ञान का ही 10% ही ज्ञान उस चिकित्सक के पास हुआ ! अगर सम्पूर्ण चिकित्सा विज्ञान जिसमे आयुर्वेद ,यूनानी, होमियोपैथी, प्राकृतिक चिकित्सा बायोकेमिक, अादि भी शामिल कर लिया जाए तो सम्पूर्ण चकित्सा विज्ञान  का मात्र 1%  ही गया उस चिकित्सक के पास हुआ !
                                    अब विज्ञान  की सैकड़ो शाखाये तेजी से विकसित हो रही है, नयी शाखाये बनती जा रही है जैसे भौतिक विज्ञान में अंतरिक्ष विज्ञान , मनोविज्ञान(उपशाखा -परामनोविज्ञान ) , रसायन विज्ञान , बायोलॉजी, जूलॉजी (उपशाखा -सूक्ष्म जीव विज्ञान ) आदि आदि।  ऐसे में जबकि चिकित्सा विज्ञान मूल विज्ञान की एक छोटी सी शाखा मात्र है. अब ज़रा उस चिकित्सक के ज्ञान का प्रतिशत तो निकालिये- 0. 001 % या शायद  उससे भी कम !अब खुद  सोंचिये इतना कम ज्ञान  रखने वाला सम्पूर्ण विज्ञान का ठेका  कैसे ले सकता है? उसे किसने दिया यह कहने को कि -" विज्ञान ये सब नहीं मानता "
सावधान :-
मै  ये सब अंधविश्वास फैलाने के लिए कतई नहीं लिख रहा हूँ ,मेरा मकसद तो सिर्फ सच्चाई बताना है परन्तु लोग बेहद सावधान रहे , क्योकि धर्म , तंत्र और ज्योतिष के नाम पर दुनिया में पाखंडियो और ठगो की भरमार है। कही उनके चंगुल में फंसकर अपना सब कुछ न लुटा बैठे ! सच्चे लोग हजारो में एक होते है , वो भी किस्मत से मिलते है !






4 अगस्त 2014

ऐसा भी होता है -7 (धारावाहिक सत्य घटना )

ऐसा भी होता है -7  (धारावाहिक सत्य घटना )
वह क्या था?-
सबेरे सात बज चुके थे , सर ने  उलटा लोटा जीजाजी को पकड़ने कहा, बोतल पर कपड़ा ढककर नींबू हाथ में लिए कुछ बुदबुदाते हुए लोटा उठाने को कहा। इसके बाद बोतल में ढक्कन लगाए दिए। हम तीनो ध्यान से  देख  रहे थे. फिर बोतल में ढक्कन लगा दिए। इसके बाद बोतल  लेकर धूप की तेज रोशनी में जाकर उलट पलट कर  देखने लगे। एक मिनट बाद मैंने भी देखा- कुछ अजीब सी चीज दिखाई देने लगी।  एक चिड़िया (गौरय्या )  बच्चे  जैसा ,मानो अंडा फूटने के बाद निकला हो . परन्तु ये गौरय्या का बच्चा नहीं था जिससे मै बचपन से परिचित हूँ। इसकी चोंच ,डैना वगैरह नहीं था ,पेट वाले हिस्से में नीली नस भी उभरी हुई थी ,सिंदूर भी लगा था ,ऊपर और नीचे दो हाथ और दो पैर , मनुष्यो की भाँति मोड़कर परन्तु उंगलियाँ तीन, बदक के बच्चो जैसा ,ऊपर के दोनों हाथो से अपना मुंह ढके हुए। सबेरे सूर्य की रोशनी में सर के अलावा हम तीनो ने   स्पष्ट रूप देखा, परखा  परन्तु यह चीज तो हम लोगो के लिए भी  अनजानी थी।  सर ने बताया उसकी(डायन की ) पाली हुई चीज कृत्रिम  शरीर सहित कैद हुआ है।
                    एक बाल्टी में बोतल एवं अन्य सामग्री लेकर हम रवाना हो गए। सर जीजाजी के घर जाकर मंजन वगैरह दैनिक क्रियाएँ किये और मै व जीजाजी दूध नदी में गड्ढा खोदकर समस्त चीजे गड़ा  दिये फिर जीजाजी के घर आ गए। दोपहर को सर जीजाजी के घर में  पूजा के लिए  बैठे ,  उनके सामने मेरी पत्नी को पुन:  हिस्टीरिया जैसा दौरा पड़ा , सर ने तुरंत उठकर उसके सर के कुछ बाल तोड़े तो वह शांत हो गयी .सर ने सिर्फ  इतना बताया -ये हिस्टीरिया नहीं था परन्तु क्या था, ये  नहीं बताया , चुप रहे। जिज्ञासु रहना मेरा शुरू  स्वभाव था।
                     मैंने सर से पूछा कि  कार्य संपन्न हुआ कि नहीं , इसका पता कैसे  चलेगा ,प्रमाण क्या होगा ? तो उन्होंने बताया -किये गए दुष्कर्म कर्ता  के पास लौटते है और वह प्रभावित होता है। बहत्तर घंटे (72 ) में तुम्हारी भाभी बीमार पड़ जायेगी , ये प्रमाण है। शायद फिर कभी न उठ पाये ! सर वापस डौंडी  लौट गए। तीसरे दिन सबेरे 72 पूरे  हुए,हमलोग इंतज़ार कर रहे थे उत्सुकतापूर्वक।  तब मैंने देखा -डायन भाभी जो रोज सुबह समय पर उठ जाती थी ,उस दिन 10-11 बजे तक उठ नहीं पायी। मैंने दूर से  कमरे में झाँका तो पाया डायन भाभी जमीन  चटाई बिछाकर सोयी थी और अभी भी वही पड़ी थी। मैंने अपनी पत्नी को व जीजाजी को बात बताई, इधर डायन भाभी बाद में  किसी तरह से उठ गयी तुरंत अपनी ख़ास सहेली (रेखा पंसारी ) जिसे डायन  न. 2  सांकेतिक नाम दिया था , के यहाँ गयी . दोपहर को वापस आयी तो  पूरी तरह ठीक ठाक हो चुकी थी। दूसरे दिन मैंने देखा की सहेली (डायन न. २) व भाभी की  बड़ी बेटी पम्मी गढ़िया पहाड़ चढ़ाई  कर रहे थे। शायद शंकर भगवान को नारियल चढ़ाने। भाभी पूरी  तरह चंगी हो गयी थी।  फिर भी मैंने सोंचा -चलो कम से कम घर की अशुभता तो दूर हुई।  परन्तु मेरा सोंचना गलत  था।  कुछ दिन बाद फिर से कुछ असामान्य सा लगने लगा।
(क्रमश:)




27 जुलाई 2014

ऐसा भी होता है -6 (धारावाहिक सत्य घटना )

 ऐसा भी होता है -6 (धारावाहिक सत्य घटना ) :-
आपद  परखिये चारि ,धीरज धरम मित्र और नारि -तुलसी दास
दुष्ट भाभी  की स्वीकारोत्ति :-
                     डौंडी  वाले सर कहते थे मेरा  शिष्य जो इन विद्याओं को सीख चुका  है , मेरे साथ रहेगा तभी तुम्हारा घर ठीक करने जा सकूंगा , अन्यथा मेरी ही जान को  खतरा है ! ऐसा ही रवेली वाले महाराज जी कहते थे- जो ठीक करने जाएगा , उसी की जान  को खतरा है,ऐसा ही एक तांत्रिक मांत्रिक साथ में चाहिए, रक्षा के लिए अन्यथा काम मुश्किल और खतरनाक है ! मुझे याद आया की मेरे मामाजी स्व.  माँगीलाल जी कांकरिया ने भी कुछ ऐसा ही कहा था -मुझ मे अब इतनी शक्ति नहीं कि  इसे ठीक कर सकूँ, बुढ़ापा आ गया ।  ऐसा आखिर क्या था मेरे घर में, जो दैवी शक्ति संपन्न को भी डरा  रही थी ? खैर इस बात से मै बिलकुल अनजान था। सन 1994 , मई जून का  महीना ,डौंडी  वाले सर को लेकर मै कांकेर अपने घर आ गया, परन्तु बिना सहायक के। गोबर ,नींबू ,बोतल, थाली लोटा वगैरह पूजा सामग्री इकट्ठा किया। भोजनोपरांत मै सहयोगी के रूप में मुंहबोले जीजाजी को बुलाने गया, तब मेरी अनुपस्थिति में सर छत पर कुर्सी में ठंडी हवा में आराम कर रहे थे भोजनोपरांत।उस समय उन्हें अकेले देखकर डायन भाभी ने सर से कहा- मुझे बचा लो , किसी तरह का 'प्रयोग'मत करो, वरना मै तुम्हे भी देख लूंगी।( यह बात सर ने मुझसे छुपा लिया,परन्तु मुंहबोले जीजाजी को बताने के कारण दूसरे दिन मुझे पता चल गया)। रात्रि में सर ने पूजा किया , गोबर का घोल बनाया , थाली में भरा ,बीच में एक दिया जलाया , उसके ऊपर काफी देर तक एक उलटा लोटा हाथ में लेकर   बुदबुदाते रहे, फिर दिए को उलटे लोटे से ढक दिया।  अब यह लोटा गोबर पानी खींचेगा।  सामान्य सी बात थी, एक विज्ञान का छात्र होने  मै समझ सकता था -लोटे की हवा गर्म हुई  बाहर निकली अंदर गर्म हवा का घनत्व कम हो गया , ढकने के बाद आक्सीजन की समाप्ति से दिया बुझेगा, हवा ठंडी होगी, अंदर का दबाव कम होगा,इससे गोबर का घोल लोटे के अंदर खिंचेगा। ( ये भौतिक शास्त्र पढ़ा हुआ कोई भी व्यक्ति आसानी से समझता है .उसे बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता)।  इसी  बीच मै सर से पहले की तरह जिज्ञासा पर जिज्ञासा रखता जा रहा था, जैसे क्या सचमुच तंत्र मन्त्र होता है ?क्या सचमुच  भूत प्रेत होते है ? क्या वाकई इनका अस्तित्व होता है ? सर मेरी जिज्ञासा भलीभांति  समझते थे , स्वयं शिक्षा विभाग के अधिकारी जो थे। दूसरा होता तो शायद मेरे प्रश्नो से बौखला जाता , शायद सोंचता कि मेरी जांच कर रहा है . पर सर ने एक सच्चे गुरु की भांति शांत , धीर गम्भीर होकर मेरी जिज्ञासा शांत की,एक एक प्रश्न का उत्तर दिया। आजकल पढ़े लिखे लोग इसे अंधविश्वास मानते है ,परन्तु तंत्र मन्त्र जादू टोना , भूत प्रेत इत्यादि वास्तव में होते है , इनका अस्तित्व है। विद्या बुरी चीज नहीं, परन्तु प्रयोग करने वाला अच्छा बुरा होता है।  पहले मै भी (यानी स्वयं सर ) ये सब नहीं मानता था परन्तु घर में भुगतने के कारण और प्रमाण मिलाने के कारण मानना पड़ा।  (सर स्वयं भी कटु घटनाओ से होकर गुजरेथे  ! ) उस समय मै (यानी सर ) भी सच्चे जानकार व्यक्ति की तलाश में भटका।
                         रात्रि में ये सब क्रियाएँ करते करते काफी देर हो गयी, जीजाजी अपने घर चले गए,  शेष कार्य सबेरे करेंगे ऐसा सर के कहने के बाद हम दोनों छत पर जाकर सो गए। गर्मी के दिन थे , सर मुझसे कुछ दूर किनारे पर सोये थे।  सबेरे मेरी आँख जल्दी खुल गयी।  आँख खोले मै लेटा  था कि  डायन भाभी चुपचाप सीढ़ी चढकर उपर आने लगी।  इतने सबेरे उसे ऊपर आते देख कर मुझे आश्चर्य हुआ। मुझे जागते हुए  उस दुष्टा ने
ने देखा तो तुरंत उलटे पाँव सीढ़ी से ही नीचे उत्तर गयी वापस। सर छत के किनारे सोये थे , शायद वह जल्दी में उन्हें देख नहीं पायी।  कुछ समय बाद मै उठा ,और दंतमंजन लेने और मुंह धोने के लिए पानी लेने नीचे उतरा और आँगन के मध्य स्थित कुंए के पास गया।  पानी लेने के बर्तन में मेरी नजर पड़ी , किनारे में थोड़ा गोबर लगा देखकर मै उसे धोने लगा।  इधर मेरी पत्नी भी जल्दी उठ गयी और चाय बनाने हेतु किचन में गयी।  घर पर मेरे नामुराद कुटुंब के लोग सोये हुए थे। भाभी ने मुझे अकेला देख मुझे सुनाते हुए कहने लगी -कल जो आदमी (यानी डौंडी वाले सर ) आया था न ,भाग गया लगता है , देख कर ही डर गया होगा . मैंने सुना अनसुना कर दिया, सिर भी नहीं उठाया।  डायन ने सोंचा इसका ध्यान कही और है,सुन नहीं पाया या आवाज धीमी हो गयी होगी. उसने थोड़ी जोर से कहा - ठीक वही लाइन , वही शब्द।  मैंने दुबारा अनसुना कर दिया। इस पर भाभी ने सोंचा इसका दिमाग अक्सर अनुपस्थित(Absent Mind)  रहता है अत: और जोर से बोला जाए अत: तीसरी बार एकदम ऊँची आवाज में कहा - पम्मी (मेरी भतीजी का नाम, जो उस समय सोयी हुई थी ) कल जो आदमी आया  था न, वो भाग गया लगता है ,देखकर ही डर गया होगा . अबकी बार मैंने सर उठाकर डायन को देखा , अपने कमरे के दरवाजे पर ही खड़ी थी मुझे देखकर हँसते हुए , उसे मैंने देखा तो जोर जोर से हा-हा-हा कर अट्टहासपूर्ण हंसने लगी।  ये तो डायन भाभी की आत्मस्वीकृति थी,यानी अपनी दुष्टता व् करतूतो की स्वीकृति ! अब तक मिले प्रमाणों के आधार पर 90 प्रतिशत विश्वावास और 10 प्रतिशत बाकी था।  परन्तु इस डायन की स्वीकारोक्ति के बाद रहा सहा अविश्वास भी समाप्त हो गया।  मन  क्रोध भी आ रहा था , यदि मै शेर चीता होता तो चीर-फाड़ कर खा जाता ! परन्तु इन विद्याओ का जवाब भी ऐसे ही देना चाहिए। अन्यथा कानून के ठेकेदारो  और समाज के कथित ठेकेदारो का हस्तक्षेप झेलना पडता !
                          मै पानी और मंजन लेकर चुपचाप वहां से हट गया और पत्नी को यह बात तुरंत बता दी। वह भी चकित रह गयी , सावधान रहने की हिदायत देकर, नजर रखने को कह मै पुन : छत पर गया और सर को सारी  बाते बताई . सर बोले अब ज्यादा  देर तक यहां रहना ठीक नहीं।  इन सामग्रियों की देख रेख मै करता हूँ तुम जीजाजी को बुला लाओ ,कार्य पूरा कर जल्दी से निकलना ठीक रहेगा।मंजन और चाय वगैरह बाद में करेंगे   मेरे व जीजाजी के आने के बाद पत्नी भी ऊपर छत पर आ गयी (क्रमश:)

26 जुलाई 2014

केलपूज्य माता का चमत्कार

केलपूज्य माता का चमत्कार (सच्ची घटना ) :-
                                          जलगांव(महाराष्ट्र) के लालवानी जी की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं रहती थी ,पेचिश/डायरिया की  शिकायत वर्षो से चलती आ रही थी , बार बार शौच जाना उनकी मजबूरी थी,वर्षो से यह सिलसिला चल रहा था बहुतेरा इलाज करा चुके थे , पर सब असफल साबित हुआ।  डाक्टर  बदले, पैथी बदली , पर सब बेकार साबित हुआ। 
          एक दिन भटकते भटकते चालीसगाँव के प्रसिद्ध बाबा रामदेव के थान(देव स्थान ) में यूँ ही चले गए , वहां अचानक बाबा के अंग में उनकी कुलदेवी केलपूज्य माता आ गयी और कहने लगी- तुम्हे जो भी कष्ट हो रहा है उसका कारण मै  (यानी देवी) ही हूँ। तुम मेरे मूल स्थान का उद्धार करो , मेरे बारे में अपने गोत्र वालो को बताओ तो सब कष्ट दूर हो जाएंगे। 
              ललवानी जी ने पूछा -मै ही क्यों देवी? और भी तो लालवानी गोत्र के लोग है उन्हें क्यों नहीं कहती ? देवी ने जवाब दिया - तुम पिछले जन्म में मेरे ही पुजारी थे ,मेरे मूल स्थान /मंदिर का उद्धार तुम्हारे हाथों से ही होना है। इसलिए तुम्हे परेशान कर रही थी ताकि  तुम थक हार कर किसी थान  में जाओ  और मैं  तुम्हारा कार्य बता सकूँ। लालवानी जी  ने कहा -ठीक है पर ये मेरा अतिसार/पेचिश रोग दूर करो तो मुझे विश्वास  हो जाए, फिर मैं करूंगा। देवी ने वर्षो से चले आ रहे रोग को तुरंत ठीक कर दिया। 
                अब लालवानी जी ने एक और संशय रखा-हे देवी मेरे पास पैसा धन संपत्ति नहीं है तो तुम्हारा  मंदिर वगैरह कैसे बन पायेगा? जवाब दिया-तुम सिर्फ कार्य करने की ठानकर आगे बढ़ो, बाकी सब व्यवस्था मै करुँगी। देवी ने अपने मूल स्थान के गाँव का नाम भी बता दिया। यह भी बता दिया कि  वह (यानी देवी स्वयं )केले के पेड़ से अवतरित हुई है, आदि । 

                अब लालवानी जी गाँव खोजने में लग गए। खोजते-खोजते देवी के स्थान( गाँव) पहुँच भी गए , लोगो से पता किया तो एक भी मंदिर उस गाँव में नहीं था। काफी पूछताछ  करने पर पता चला कि  गाँव में एक स्थान है जहां लोग कभी-कभी एक लोटा पानी डालकर अगरबत्ती जला देते है.लालवानी जी उस स्थान पंहुचे तो उन्हें असीम शान्ति महसूस हुई जैसे माँ  की गोद  में किसी बालक को महसूस होता है।  वे समझ गए यही केलपूज्य माता का स्थान है फिर उन्होंने उस स्थान की  साफ़ सफाई की, वहां पूजित पत्थर को धोया ,साफ़ सुथरा किया , धूप दीप आदि जलाया , फिर कुछ गाँव वालो को इकट्ठा कर उनसे अनुरोध किया कि इस स्थान पर रोज धूप दीप जलाते रहे। कुछ दिन रुक कर एक चबूतरा भी बनवा दिया और उस देवी /अनगढ़ पत्त्थर को चबूतरे पर  रखवा दिया। इधर जैसे-जैसे लालवानी जी कार्य करते जा रहे थे मंदिर के जीर्णोद्धार का , उनका काम धंधा भी जोर पकड़ता जा  रहा था ,धन संपत्ति का जोरदार आगमन होना शुरू हो गया था। अपनी गरीबी और  खस्ताहालत  से तेजी से उभरने लगे. फिर मंदिर पूरी तरह से बनवाकर एक देवी की मूर्ति भी बनवाई ,और  प्राण प्रतिष्ठा भी करवा दी।  प्रतिष्ठा के समय , उनके मन में जप कराने  की इच्छा हुई तो योग्य ब्राम्हण ढूंढने गाँव में घूमने लगे , न मिलने पर वापस मंदिर आये तो देवी पूजारी के अंग में आकर लालवानीजी  पर भड़क गयी -कहाँ गया था तू ?लालवानी जी ने जवाब दिया -तेरे ही काम से निकला था , किसी योग्य ब्राम्हण को ढूंढने , ताकि तेरा जप करवा सकूँ। देवी ने दिया -क्या जरुरत इसकी ? तुझे मेरा नाम मालूम है और माला फिराना आता है , बस मेरे नाम को ही जपता चला जा माला लेकर। इतना ही काफी है इधर उधर मत जा , बस मेरे पास ही रह ,  इतना कहकर देवी शांत हो गयी। बार बार लालवानी जी अपनी कुलदेवी के पास मिलने  आते रहे , इधर करोड़पति भी बन गए देवी कृपा से।  उन्होंने ने एक पुस्तिका भी छपवाई और अपने गोत्र वालो को  वितरण भी किया . (जैसा कि जलगांव वाले लालवानी जी ने बताया )
[" मेरी उत्पत्ति केले के पेड़ से हुई है अत: जिनकी (लालवानी गोत्र वालो की ) मै कुलदेवी हूँ उन्हें केला खाना और दूसरो को केला खिलाना तथा केले की खेती करना वर्जित है , जो इसका पालन नहीं करेगा उनकी संताने विकृत मस्तिष्क /पागल और विकलांग हो जाएंगे " देवी ने लालवानी जी को बताया ]

22 जुलाई 2014

कर्नल ,चमत्कारी साधू और तालाब

कर्नल ,चमत्कारी साधू और तालाब -
                          ऐसा नहीं है की विचित्र घटनाये कसी एक के ही जीवन में होती है, अनेको के साथ होती है।  परन्तु शर्म, झिझक, लोग क्या कहेंगे या सोचेंगे जैसी बातो के कारण दूसरो को  बताना पसंद नहीं करते   या  किसे बताये , कैसे बताये ,या फिर लिखे तो अखबारों और पत्रिकाओ के  मूर्धन्य या "मूर्खधन्य " संपादक इसे छापना ही पसंद नहीं  करेंगे, अंधविश्वास या बकवास मानकर।
                           रायपुर (छ.ग. ) में एक रिटायर्ड कर्नल  साहब से मेरी जान  पहचान हुई  ।  उन्होंने अपने ड्यूटी के दौरान एक विचित्र घटना बताई। बार्डर पर उनकी ड्यूटी लगी थी .एक बार गश्त के लिए जा रहे थे गाडी के  रेडियेटर में पानी खत्म जाने  के कारण इंजन गर्म हो गया, तब अपने अटेंडेंट को गाडी में ही बैठ रखवाली करने को कह खुद केन लेकर पानी की तलाश में निकल पड़े।  कई किलोमीटर चलने के बाद भी कही पानी का श्रोत नहीं मिला।  पूरा बंजर इलाका था। इतने में सामने से एक साधू आता दिखाई दिया उन्होंने साधू से  पूछा -बाबाजी इधर कही पानी मिल सकता है क्या ? साधू ने जवाब दिया -क्यों नहीं बेटा , थोड़ा आगे जाने पर बांयी ओर एक तालाब मिलेगा ,पानी ही पानी ,जितना चाहे  ले लेना। वाकई कुछ दूर चलने पर एक साफ़ सुथरा तालाब मिल गया। कर्नल  साहब ने पहले तो अपनी प्यास बुझाई , पैदल चलने के कारण और गर्मी के कारण जोर से प्यास  के कारण  खुद का बुरा हाल था।  पानी काफी मीठा और साफ था। फिर वाटर केन भरकर वापस पीछे लौट चले। गाडी में रेडियेटर में पानी डालने के बाद और साथी की प्यास बुझाने की बाद भी केन में काफी पानी बचा था। जीप/गाड़ी  स्टार्ट कर आगे चल पड़े। परन्तु कई  किलोमीटर जाने  के बाद भी वह तालाब नहीं दिखा जो पहले सड़क क किनारे ही दिखा था , और वह साधू भी नहीं दिखा।दृष्टि भ्रम की गुंजाइश भी नहीं थी क्योकि केन में बचा पानी साबूत के तौर  पर  मौजूद था।
                                   [ तो क्या उस महात्मा ने कर्नल  साहब की जोरो की प्यास बुझाने और गाडी के लिए पानी देने के लिए ही अपनी शक्ति से एक तालाब की रचना , उस पथरीली बंजर और सुनसान जगह में थोड़े समय के लिए कर दी थी ,जो बाद में अदृश्य हो गयी ?] (समाप्त )

ऐसा भी होता है-4 (धारावाहिक सत्य घटना )

ऐसा भी होता है-4 (धारावाहिक सत्य घटना )-
दुःख क्याहै? सब कुछ तुम्हारे हाथ में है- शेक्सपियर 
आपद काल परखिये चारि ,धीरज धरम मित्र अरु नारी -तुलसीदास 
                            उम्मीद थी की दुष्ट डायन भाभी की पराजय के बाद सब ठीक हो जाएगा। मेरी पत्नी पूर्ण रूप से मेरा साथ दे रही थी, परन्तु पता नहीं इतनी छोटी-छोटी बातो पर आपस में खटपट शुरू हो जाती  थी (आगे जाकर पता चला की तंत्र में विद्वेषण प्रयोग होता  है, वह डायन इसमे सिद्ध हस्त थी )
                                 इसी बीच ग्रामीण क्षेत्रो में कुछ बैगा गुनिया लोगो के बीच घूमा, विचार करने की अनेक पद्धतियाँ देखी ।  'कुछ तीर कुछ तुक्का'  छाप परिणाम देखे।  नई  जानकारियां भी मिली . मेरे  दादी के कर्मो  के  कुफल के बारे में जानकारी मिली।  दादा-दादी ने किसी "सिद्धो" नामक ग्रामीण देवता या देवी जो दरअसल खतरनाक किस्म का प्रेत होता है उसे पाला था।  घरबंधन  खुलने के बाद वह भी घर पर आने लगा था।  खेती में हमेशा घाटा होता था ,ये उसी सिद्धो की करामात थी ऐसा पता लगा।  इस सिद्धो के आने की पुष्टि (क्रास चेक  के रूप  में ) रवेली वाले महाराज ने भी की थी।
                        एक तरफ दुष्ट भाभी भयंकर तांत्रिक थी। दूसरी तरफ मै इन बातो से पूर्णत: अपरिचित एवं अविश्वासी ,तीसरी मुसीबत आर्थिक तंगी, दाने दाने को मोहताज और चौथी तरफ पत्नी को छोडकर घर सभी सदस्यों का (माँ  बाप सहित ) विरोध। परछाई  भी साथ छोड़ चुकी थी। और 'मुसीबत अकेले नहीं आती , चारो तरफ से एक साथ आती है' ,जैसे जुमले सच होते दिखाई दे रहे थे। ऐसे में एक मेरा मित्र सुब्रत दत्त राय जो उम्र में मेरे से छोटा था , ने साथ दिया (सच्चा मित्र लाखो करोडो के धन से भी कीमती होता है, पर बाद में भगवान ने उसे भी मुझसे छीन लिया, उसकी मृत्यु हो गयी कुछ सालो बाद ) सुब्रत मुझे अनेक स्थानो पर , गाँवों में अपनी मोटर सायकिल पर बिठाकर खुद के खर्चे  पर ले जाता था। जब रक्त सम्बन्धी मुंह मोड़ ले , परछाई भी साथ छोड़ दे तब सच्चा मित्र  , पत्नी रिश्तेदार आदि की परीक्षा  होती है। सुब्रत शत-प्रतिशत खरा उतरा। मुझे ढाढस बंधाता , उस 'रहस्यमय क्षेत्र/विद्या ' की जानकारी देता , ताकि मैं सुरक्षित रह सकूँ। इधर-उधर ले जाता , जब में बुद्धि  काम नहीं करती  तो उसके सुझाव,उसकी बाते काफी लाभदायक रहती।  मेरे जीवन के सर्वाधिक बुरे दौर में सुब्रत जो अब "स्वर्गीय" हो चुका है एक अमिट  छाप और यादें  छोड़ गया। मेरे घर के समस्त रक्त सम्बन्धियों जो वास्तव में मेरे शत्रु रूप में थे उनकी नजर में सुब्रत भी एक शत्रु बन गया ये बात हम दोनों भली भांति समझते थे।
                                  नवरात्रि आयी , रवेली वाले महाराज जी नहीं आये(रवेली वाले महाराज परम आलसी और लापरवाह थे ), आखिर नवरात्रि के दूसरे तीसरे दिन परेशान होकर ए. डी  आई  साहब यानी डौंडी  वाले सर के पास गया। दिनभर घटनाओ/इंतज़ार  के बाद शाम 4 बजे वहां से निकले। रात्रि  बारह बजे सर ने मेरे घर में प्रवेश किया। घर के आँगन में घूमने के बाद मेरे कमरे में बैठे. फिर मुझसे एक नींबू   मांगकर उस पर सिंदूर लगाकर मुझे थमाया ,दो अगरबत्ती जलाकर मुझे देकर पुन : आँगन की और गए।  वापस आकर कमरे में बैठे , मेरे हाथ से नींबू लेकर चाकू से मेरे सामने काटा तो उसमे से एक मनुष्य का दाढ़ का दांत प्लेट पर आकर गिरा।  उन्होंने कहा कि  प्रेत की कोई चीज  आनी  चाहिए ,  आ गयी प्रमाण के तौर पर।  मैंने देखा दांत नीम्बू के रस से गीला था ,पान का दाग भी लगा था। डौंडी वाले सर पढ़े लिखे  कारण मेरी जिज्ञासा भली भांति समझते थे ,साथ में मेरे मुंह बोले जीजाजी भी थे. सर ने कहा -अगली बार आऊंगा तो ठीक कर दूंगा। इससे पहले डौंडी  वाले सर के घर बैठा था तो विचार समय मेरे द्वारा लाये गए नींबू से हड्डी जैसा कोई छोटी सी वस्तु या तिनका निकला  था . नींबू काटते वक्त मेरा ध्यान था ,कोई हाथ की सफाई भी नहीं। यह नींबू से दांत  निकलने की दूसरी घटना मेरे सामने घटी। सर इसके बाद मुंहबोले जीजाजी के यहां सोने चले गए .उन्होंने रात्रि में मेरी अनुपस्थिति में जीजाजी को बताया -इसको (यानी मुझे) कैसे बताऊ ,इसकी भाभी जो बगल के कमरे में रहती है , वह बेहद दुष्ट है ,उसने  खतरनाक तंत्र मन्त्र सीखकर शमशान की गन्दी चीज (शायद प्रेत,पिशाच वगैरह ) घर पर बसा लिया है ,घर बुरी तरह अभिशप्त है।  वह चीज काफी पुराना हो गया है और रच- बस गया है। जो भी उसे निकालने जायेगा ,उसके ही प्राण जाने  की संभावना भी है . उसने(प्रेत ने ) बंधन का समय समाप्त  होने के बाद "भक लेना"(भक्ष्य लेना या प्राण लेना ) शुरू कर दिया है। इसके बड़े भाई की मृत्यु भी इसी कारण  हुई है . तीसरा वर्ष चल रहा है , इसके बड़े भाई के स्वर्गवास के बाद इस वर्ष इसका नंबर (यानी मेरा ) है. इसके बाद पूरे कुटुंब का  नाश हो जाएगा। इस पर मुंह बोले जीजाजी ने जवाब दिया-सर इसे बहुत कुछ मालूम है, परन्तु विश्वास नहीं हो रहा है, इसलिए छानबीन कर रहा है। रायपुर में भृगु ज्योतिष (पंडित आर इन शर्मा ,जिला पाली राजस्थान )ने साफ़ बता दिया था ।
                        दूसरे दिन सबेरे जीजाजी ने सर की बताई 'सारी  बाते' मुझे बताई ,जब मैंने जाना की सब बाते तो वही है जो औरो ने बताई ,परन्तु इस वर्ष मेरा नंबर है यह जानकर मै  सकते में आ गया। मुझे याद आया की महाराज जी ने कहा था-"सबसे ज्यादा तुम्ही प्रभावित हो " . इसी तरह भृगु ज्योतिष ने तीन बार कहा था जोर देकर, इस तंत्र विद्या की काट जल्द से जल्द करवाओ . कुटुम्ब नाश की बात भी दो-तीन जगह से सांकेतिक व स्पष्ट रूप से ज्ञात हो गयी थी ।  मुझे सन 1971 -72 वाली बात भी याद आई जब बड़े भैया को राजस्थानी प्रसिद्द ज्योतिषी ने कहा था - तुम्हारी शादी एक चेचक दागवाली लडकी से  होगी जो तुम्हारा घर तहस नहस कर देगी। मैंने नियति को साफ़2 जान लिया ,पहचान लिया।  मैंने सीधे सीधे हार मानने की बजाय लड़ने की ठान ली।  आमने सामने लड़ना ठीक नहीं ,कानूनी और अविश्वास, अंधविश्वास जैसे की पचड़े सामने थे।  मैंने विधि के इस विधान से टकराने का फैसला कर लिया। आखिरकार स्वयं की रक्षा करना मेरा कर्त्तव्य था और अधिकार भी। (कदाचित मेरे जीवन का सबसे गलत निर्णय था जो मैंने पूरे कुटुम्ब  की रक्षा की भी ठान ली। विधि के विधान से लड़ने कीबात भी ठान ली, जिसका दुष्प्रभाव यह हुआ की आगे  चलकर कपट ,दुष्टता,घोर अपमान, सब तरह से पीड़ा ,उपेक्षा, बदनामी , दरिद्रता, और न जाने क्या क्या न झेलना पड़ा,अपने छोटे परिवार सहित! मैंने उन सिद्ध लोगो के सलाह की  उपेक्षा भी  की थी जिन्होंने कहा था-अपने और अपने परिवार अर्थात पत्नी और बच्चो की रक्षा भर करो, बाकी को यानी छोटे भाई व उसका परिवार , माँ इत्यादि को भी ध्यान मत दो ,  ये सब तुम्हारे काम नहीं आएंगे , बल्कि  तुम्हारे  साथ दुष्टता ही करेंगे , सब स्वार्थी है।  पर मुझ पर तो कर्तव्य पालन,बड़प्पन , मोह माया आदि का बहुत सवार था।  यही आदर्श मेरे जीवन का जहर साबित  हुआ। एक ने तो स्पष्ट रूप से कहा था कि तुम कीचड़ में कमल पुष्प की भाँति  हो. ) 
(क्रमशः )




ऐसा भी होता है -5 (धारावाहिक सत्य घटना )

ऐसा भी होता है -5 (धारावाहिक सत्य घटना ):-
"वन में ,युद्ध में ,शत्रु के सामने,जल में, अग्नि में,पर्वत शिखर पर,सोये हुए स्थिति में, तथा असावधान और विषम स्थिति में मनुष्य के पूर्व जन्म के पुण्य ही भाग्य के रूप में उसकी रक्षा करते है -भर्तृहरि नीति शतक (116 )
                   मेरे जीवन  सबसे बुरा समय प्रारम्भ हो चुका था, जिसमे कई कड़वे जहर के घूंट पीने थे, जगह जगह पीड़ा पहुंचनी थी, तकलीफो का ढेर मुझे परिवार सहित झेलना था। अकेले  संकट आये तो ठीक परन्तु पत्नी बच्चो पर कष्ट आये तो अपना असहायपन किसी भी  पुरुष को तोड़ कर रखा देता है।
                दूसरे दिन सर तो चले गए , लेकिन जाने के बाद घर हल्का फुल्का लगाने लगा,शरीर भी , सिर भी, जो हमेशा भारी और सुस्ती से भरा लगता था, वो हल्का फुल्का लगने लगा। पहले तो मैंने इसे मनोवैज्ञानिक प्रभाव माना, पर दूसरे दिन भी जब ऐसा ही लगा, तब क्रास चेकिंग के लिए पत्नी के अनुभव के बारे में उससे बातचीत की। उसे भी घर का हल्कापन व शरीर का हल्कापन लग रहा था। चिड़चिड़ापन व छोटी छोटी बातो पर झगड़ा भी दो दिनों से नहीं हो रहा था। कभी कभी अकारण आत्महत्या के विचार भी आते थे वे भी बंद थे दोनों के मन में। (पाठको को बता देना चाहिए कि तंत्र प्रयोग से भी अकारण आत्महत्या के विचार आते है , कभी2 लोग आत्महत्या भी कर लेते है,अकाल मौतो के कारण भी यही होते है कई  केसेस में ) तब समझ में आया की पहले हम दोनों प्रभावित थे। प्रभावित होने पर कैसा लगता है,छुटकारा मिलने पर क्या परिवर्तन महसूस होता है , ये हमारे जीवन का पहला अनुभव था। पहले किसी2 के मुंह से सुना था ,अब तो स्वयं महसूस कर देखा है।
                       अगले  दिन पता चला महाराज आये हुए है, तो उनके पास गया. उन्हें 'सर' के बारे में बताया. उन्होंने कहा ठीक है ,  पहले उन्हे देख लो , उनसे कार्य सिद्ध न हो तो फिर मै तो हूँ ही।
                  कई  दिनो तक सब  ठीक ठाक रहा , फिर वापस बेचैनी,भारीपन, अनमनापन लगाने लगा। पुराने अनुभव से सबक सीख हम लोग सर के यहाँ गए और देवी के थान (थान =पूजा स्थल ) में बैठे। बातचीत करते हुए बातो बातो में मैंने सर को पत्नी के घुटने के दर्द के बारे में बताया।  इतने में पत्नी को हिस्टीरिया जैसा दौरा पड़ा।  इधर इस दौरे से मै भौंचक्का हो गया उधर सर मुस्कुराने लगे। पत्नी ने पहले आँखे तरेरी फिर बोली- माता मैंने कुछ नहीं किया, मैंने तो रक्षा की,मै तो तेरी ही बेटी हूँ , कोई नुकसान थोड़ी पहुंचाती हूँ। इधर सर देवी के चित्र की तरफ मुस्कुराते हुए  देखते रहे। फिर मुझे आश्चर्यचकित देखकर बात  स्पष्ट किया जिससे मै और भी भौंचक्का रह गया।  आर ने कहा ये हिस्टीरिया नहीं, दरअसल इसके मायके की कुलदेवी (यानी माँजी सा) आयी थी।  फिर उन्होंने और रहस्य उजागर किया ,तुम्हारी दुष्ट भाभी ने इसके कमर के नीचे का सम्पूर्ण भाग लकवाग्रस्त करने हेतु "प्रयोग" (अभिचार कर्म या टोना जादू )किया था ,पर इसके मायके की कुलदेवी (माजी सा)ने इसकी रक्षा की और तंत्र प्रयोग का असर रोक कर घुटने तक सीमित कर दिया। अगली बार जब मै घर आऊंगा तब इसे ठीक कर दूंगा, अभी बंधन कर देता हूँ।  सर ने एक और रहस्योदघाटन  किया-इसकी एक और ख़ास सहेली(डायन-2 ) जो इन सब कर्मो में इसकी साथिन है , ने भी अपने देवर के लडके पर ऐसा प्रयोग किया है जिससे वह बालक लकवाग्रस्त हो गया है जिसके इलाज में लाखो बर्बाद होगये उसके पिता के (जो सब इंजिनियर थे ) । इस सफल प्रयोग को इस पर भी आजमाया गया है। (बाद में  पता करने पर मैंने ये सब सच पाया , सचमुच उस डायन नंबर 2 की देवर का लड़का पोलियोग्रस्त जैसा था, बाद में की सालो बाद पता चला उसकी मृत्यु भी हो गयी,इसी बीच   यह भी पता  चला कि  देवर को धमतरी में किसी ने उसकी भाभी (डायन नं -2 ) की करतूतो के बारे में बता दिया था। )
                                        दूसरे दिन घर लौटा तो घर पर मंझली बहन आयी हुई थी।  उससे बात करने लगा तो बातो में उसने बताया की कल भाभी(यानी डायन नं -1, मेरी भाभी ) के  पास बैठकर बातचीत कर रही थी तो अचानक भाभी ऐंठते हुए रोने लगी और कहने लगी थी -कौन मेरे करम बाँध रहा है , मुझे बहुत तकलीफ हो रही है। यह सुनकर मै तो चौंक गया और बहन से पूछा-कितने समय की बात है ?बहन ने बताया करीब दो बजे ! यह तो वही समय था जब हम लोग सर के पास थान में बैठे थे और सर मेरी पत्नी के  घुटने पर मन्त्र फूंककर बंधन कर रह थे। इसके बाद मैंने खोजबीन किया तो पाया वाकई दुष्ट भाभी की सहेली के देवर के लडके को लकवा हुआ है और उसके इलाज में बच्चे के पिता ने लाखो खर्च कर दिए है।  ऐसा सुनकर तो मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही। इधर एक और घटना हुई -मेरे मुंहबोले जीजाजी के होटल में, मै कभी कभार मिलने जाकर बैठता था , वहां एक बार दो अनजान व्यक्ति आये और नाश्ता करते हुए आप में खुसुर पुसुर करने लगे फिर जीजाजी से कहा -सुनो महाराज , आपके यहां बाफना जी के लडके जो आते है न ?जीजाजी अनजान बन कहने लगे- कौन भाई , मै किसी को नहीं जानता , कोई मेरे यहाँ नहीं आता।  उन अजनबी व्यक्तियों ने कहा-महाराज जो बाफना यहाँ के पुत्र आते है , उन्हें बोल देना, उनके यहां घर पर जो देवी घुसी हुई है वो घर की सुख समृद्धि के लिये  है, उसे निष्काषित  करने का प्रयास न अकरे, नहीं तो परिणाम भुगतेगा , वो उस घर के हित  के लिए है। जीजाजी ने मिलने पर  यह बात बताई तो हम दोनों ही आश्चर्य चिकित हुए। वे अनजान व्यक्ति पहले और बाद में कभी दिखाई नहीं दिए।
                                     (ग्रामीण क्षेत्रो में जो बहुत प्रेत पाला जाता है उसे भी ग्रामीणजन देव या देवी कहते है, ये छत्तीसगढ़ विशेषकर बस्तर की परम्परा है )
मेरी आत्म  स्वीकृति एवं प्रायश्चित :-
ईश्वर परम दयालु ,कृपालु , करुणा का  सागर , सहनशील है(इन सब का मतलब अब समझ में आया). मैंने करीब दो वर्ष तक शंकर भगवान को उलाहना दी , लेकिन भोलेनाथ ने रुष्ट होने की बजाय मेरी नादानी समझते थे, परत दर परत रहस्यों को खोलना शुरू किया। क्रशर में काम करते वक्त, वक्त की मार से पार्टनरशिप की बजाय "छोटे भाई  की नौकरी " जैसी स्थिति में आ गया था। उस वक्त रक्त सम्बन्धी एक गन्दी गाली लगने लगी, सब कुछ जानते समझते हुए भी अनजान रहना मजबूरी थी, "कुटुंब" के लिए . उस समय गाँव के कमरे में मैंने अपने प्रिय भगवान कृष्ण(विष्णु) की गीता ज्ञान देते हुए विराट स्वरुपवाली तस्वीर लगाकर रखा था , उस पर रोज अगरबत्ती।  दिमाग खराब होने पर भगवान को उलटा टांग देता और बोलता सीधा- सीधा सब कुछ कर लिया भगवान, परन्तु  सुनते ही नहीं।  कलयुग में सबकुछ उलटा होता है , तुम दुष्टो के साथ ही रहते हो ,अत : अब तुम्हारे साथ उल्टा ही करूंगा। भगवान विष्णु की तस्वीर उलटा लटकाकर बाए हाथ से अगरबत्ती जलाता और उलटी दिशा में (एंटी क्लॉक वाइज ) अगरबत्ती घुमाता। परन्तु "हरि और हर" शायद सुनते ही नहीं थे। सुनते भी थे तो कभी नाराज नहीं हुए।  अनजाने में किया गया दुर्व्यवहार ,क्षोभवश दी गयी गालियाँ भगवान भी प्रेमपूर्वक ग्रहण करता है और रास्ता दिखाता है। यही हो रहा था और परदे के पीछे छुपे रहस्य उघड़ते  जा रहे थे, जैसे ईश्वर कह रहा हो -देख सच में किसके द्वारा क्या किया जा रहा है , और तू  दे रहा था ! 
( आगे जारी है )

7 जुलाई 2014

ऐसा भी होता है-3 (धारावाहिक सत्य घटना )

ऐसा भी  होता है-३ (धारावाहिक सत्य घटना ) 
[मूर्ख  सत्य का एक अंग देखता है और विद्वान सत्य के सौ अंगो को देखता है -थेर गाथा ]
                              माँ से मैंने बात की तो पता चला कि नया घर बनने के बाद एक बार मामाजी घर आये थे तो उन्होंने कहा था-मेरा गाड़ा हुआ  बंधन तुमने खोल दिया है , बहुत बेवकूफी की , अब ये घर बुरी तरह बिगड़ गया। बुढ़ापा आ गया है मेरे में इतनी शक्ति  नहीं कि  संभाल सकूँ। तुम लोग इस घर को छोड़ दो बहुत बिगड़ गया है। नहीं मानोगे तो एकाध की जान जायेगी।  यही बात उन्होंने बड़े भाई से भी कहा,परन्तु  दो ढाई लाख खर्च करके नया घर बना था , कैसे बेचने या  छोड़ने की बात सोंचते अत : ध्यान नहीं दिया गया। एक बार मुस्लिम फ़क़ीर से भी किसी कारणवश माँ की मुलाक़ात हुई ,शायद मिर्गी के मामले पर उसने विचार किया था, उसने हमारी भाभी से बात करने की इच्छा जाहिर की थी। इस हेतु घर पर आने या उसे (भाभी को) भेजने की बात भी कही थी , पर किसी मुस्लिम के सामने घर की बहु बेटी कैसे भेजे , अत: यह बात भी टाल दी गयी। एक बार गुजरात में जीजाजी ने बड़े भाई को एक संत को दिखाया,उन्होंने तांत्रिक प्रयोग के असर की बात कही (इस समय बड़े भाई साहब को हृदय रोग हो चुका था ) उस संत ने एक लाल डोरा पहनने को दिया था परन्तु भाभी ने भैया के गले में बांधने नहीं दिया, ऐसा मुझे माँ  ने बताया था ।
                                   जब मुझे प्रथम पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तो मेरी पत्नी को माँ ने भाभी  से दूर रखने की हिदायत दी थी कि वो (भाभी ) दुष्ट औरत है , कहाँ-कहाँ जाती  है , शायद तंत्र मन्त्र सीख रही है।  एक बार मेरी बहन और मेरी पत्नी आपस में बाते कर रहे थे तब अचानक मेरी पत्नी पर देवी आई और चिल्लाकर बोली -मेरे रहते ये सब तंत्र मन्त्र इस घर पर नहीं चलेगा।  उसका चिल्लाना सुन भाभी तुरंत दौड़ते आई, "किसने किया है ,किसने किया है" बोलते हुए। (इसका रहस्य मुझे बाद में समझ में आया ) परन्तु बीच में मैंने मूर्खतावश कहा- ये शायद हिस्टीरिया है जाने दो भाभी। परन्तु मेरे ऐसा कहने पर देवी मुझ पर बिगड़ गयी,परन्तु मै विज्ञान का छात्र ,मनोविज्ञान पढ़ा हुआ ,भला ये कैसे परवाह करता?मै उस समय तक  प्रेत, देवी, देवता ये सब  नहीं मानता था ,और मै असामान्य मनोविज्ञान , परामनोविज्ञान के ज्ञान के घमंड से भरा हुआ था। ये छिटपुट घटनाये शायद मुझे व मेरे घर के सदस्यों को सावधान करने हुई थी ,परन्तु हम लोगो ने लापरवाहीवश ध्यान नहीं दिया। देवी आयी थी या नहीं, सच क्या था राम जाने (हालांकि देवी आने की पुष्टि बाद में हुई एवं मै चकित रह गया जानकर।  एक थान (देवस्थान) में बताया गया की देवी तुम्हे  सावधान करने भी आई थी परन्तु तुमने उसे ही उलटा सुल्टा कह दिया ) इन सबको याद करने के बाद मै जान  गया की "दाल में कुछ काला है। एक बहुत पुरानी बात और याद आयी -मै शायद 8 वी -9 वी पढ़ता था,सं 1971 -72 की बात थी , तब विख्यात ज्योतिषी राधाकृष्ण श्रीमाली रायपुर आकर होटल में ठहरे थे , मेरे बड़े भाई साहब उनके पास गये  थे (तब भैया अविवाहित थे),तो उन्होंने कुंडली देखकर कहा था -तुम्हारी शादी एक चेचक दाग वाली लड़की से होगी जो तुम्हारा पूरा घर तहस नहस कर देगी। 
                      नियत समय आया ,महाराज जी( रवेली -छुरा वाले ) नहीं आये।  26 से 28 फ़रवरी बीत  गयी. पता लगाया तो पता चला उनकी बातो  का ठिकाना नहीं , दो दिन के लिए बोलकर जाते है तो 15 दिन लटक जाते है। समय के पाबन्द नहीं , बेहद लापरवाह किस्म के व्यक्ति है ,ऐसा सबने बताया। उनका टेम्परेरी बंधन भी शायद खुल गया था , बेहद परेशानी सी महसूस हो रही थी। इधर दुष्ट भाभी को पता चल चुका था कि मै काफ़ी कुछ जान गया हूँ उसकी करतूत के बारे में। मै महाराज जी की तलाश में निकला , पर घर पर वे नहीं मिले,रायपुर गए है ऐसा पता चला रायपुर जाकर खोजा तो मिले, परन्तु आये नहीं, केवल आश्वासन दिया। समय बढ़ाकर, नवरात्रि में ठीक करने की बात कही।  पर उनका न  आना था , वे नहीं आये।  इस बीच भृगु ज्योतिषी से मिल कर आने के बाद मेंरे एक वकील मित्र (मुकेश श्रीवास्तव ) से डौंडी (दुर्ग जिले ) के साहब के बारे में पता चला.शिक्षा विभाग में ए. डी. आई. साहब थे,महाराज जी के  न आने  से निराश मै इनके पास गया इनकी विधि एकदम अलग थी . थान में बैठने के बाद मेरे हाथ  से निम्बू  लिया और दीपक की लौ पर तपाने लगे, क़ुछ सेकेण्ड बाद अचानक नींबू फट गया ,ऐसा कभी होता नहीं था. इस अचानक घटना से वे भी चौक पड़े , फिर काली माई की मूर्ति की और ध्यान से देखने लगे और बताया देवी माता मना कर रही है कि  यहां से बैठे-बैठे कुछ भी मत बताओ . इसके घर जाकर देखो और वहीँ कार्य भी कर दो . फिर डौंडी वाले सर (श्री मनसा राम जी शर्मा  को मै डौंडी वाले सर कहने लगा था बाद में  ) ने फटे नींबू के भीतर देखा तो  अंदर से एकदम काला हो गया था यह देखकर उन्होंने कहा अभी सिर्फ इतना मालूम पड़ता है की तुम्हारा घर बुरी तरह अभिशप्त हो गया है, क्यों और कैसे हुआ यह वही जाकर पता चलेगा . चूँकि मै तो केवल छानबीन (क्रास चेक)  करने आया था ,ले जाने की तैयारी से नहीं अत :भविष्य में आने की बात कहकर वापस आ गया अब तीन जगह से "दाल में काला "होने की बात स्पष्ट हो रही थी अत: सावधानी रखना आवश्यक हो गया था . विश्वास न होने पर भी लापरवाही करना ठीक नहीं था .
      (मेरा घर जैन मंदिर के ठीक सामने था ,मंदिर में ठहरने की व्यवस्था न होने के कारण सभी जैन पंथ के साधू साध्वियां मेरे घर के सामने वाले हिस्से में ठहरा करते थे . कहा जाता है की साधू संत तपस्वी के ठहरने से घर पवित्र हो जाता है . परन्तु यहां वह बात दिखाई नहीं देती . दूसरे दैवी आपदा निवारण का दायित्व धर्म गुरु का होता है,परन्तु वह भी नहीं हुआ )
              मार्च 1994 में मेरे छोटे भाई से खटपट हो गया, उसके मन में कपट आ गया , अब तो संभल गए है , क्रशर व्यवसाय से मुझे अलग कर दिया जबकि पहले पार्टनरशिप में  बात हुई थी . दो वर्ष की तपस्या निरर्थक हुई क्योकि बड़े भाई की मृत्यु के बाद चलती दूकान को ताला लगाया था सिर्फ घर को संभालने,बड़ा होने की नैतिक जिम्मेदारी का  बोझ था .अलग करते वक्त कुछ नहीं दिया, जबकि दो वर्ष मैंने घोर आर्थिक तंगी में  काटे थे . माँ बाप भी चुप रहे , क्योकि कमाऊ पूत ही प्यारा होता है . बल्कि आगे जाकर माँ बाप भाई बहू  अन्य रिश्तेदार बहनो सहित मेरे घोर विरोधी भी बन गए . यहां मेरी मुसीबते और बढ़ गयी . अब मुझे आगे की लड़ाई अकेले ही  लड़ना था . (क्रमश:…… )

5 जुलाई 2014

ऐसा भी होता है -२ धारावाहिक सत्य घटना

ऐसा भी होता है (२) धारावाहिक सत्य घटना
 घर  बारे में शंका क्यों हुई ,  पीछे  किस्सा है है - मृत भाई  बड़ी लडकी को भी (बड़ी भतीजी ) एक बार मिर्गी  दौरा पड़ गया , उस दिन सब लोग  डाक्टर चक्कर में दौड़ थे,मै सोंच विचार में डूबा बैठा था -दादा जी को बुढ़ापे में फिट्स (मिर्गी का दौरा ) आया, बुढ़ापे का रोग समझा गया, उनके जाने के बाद मेरी छोटी बहन को मिर्गी का दौरा आया,युवा अवस्था में दमित भावना के कारण रोग की उत्पत्ति समझी गयी। मंझली भतीजी को अब मिरगी आने लगी जो रोग हो गया ,3-4 वर्ष हो गए परन्तु इसकी मिर्गी ठीक नहीं हो पायी , दवाइयाँ दुगनी मात्रा में देना पड़ रहा है,अब तो बड़ी भतीजी को भी मिर्गी आने लगी ! एक ठीक होता है तो दूसरा शिकार हो जाता है ! ऐसा तो मिर्गी परम्परा देखने में नहीं आता !
                                दूसरे दिन मै महाराज को कांकेर लिवा लाया ,घर गए,पूजन स्थान में रखवाया निम्बू मंगवाया , एक फूल लिया, कुछ बुदबुदाते हुए नीम्बू पर फूंका ,फिर कान लगाकर सुनने जैसा करने लगे. कुछ क्षण उपरांत उन्होंने कहा -मुझे घर का एक एक हिस्सा दिखाओ, कुछ भी छूटना नहीं चाहिए . मै  घर का एक एक हिस्सा दिखाने लगा. घर के बाकी सदस्य सामने पड़े तो उन्होंने ध्यान न दिया , परन्तु मृत भाई के कमरे में पहुंचा तो उन्होंने भाभी (मृत भाई की विधवा)और उसकी सहेली को ध्यान से देखा। उस समय उसकी एक मात्र सहेली भी उसके साथ खड़ी थी। दीवार पर दिवंगत भाई की तस्वीर लगी थी ,उसे देखकर उन्होंने पूछा -इसी भाई की मृत्यु हुई थी न?  मेरे  हाँ कहने पर तस्वीर से नीम्बू स्पर्श कर कान के पास ले गए।  इसके बाद आगे बढ़ने मुझे कहा और शेष घर जल्दी जल्दी घूमने लगे। घूमना पूरा करने के बाद वापस सामने के कमरे में हम लोग आकर बैठे।
उन्होंने मुझे एक दिया,बत्ती,सात प्रकार के फूल चांवल वगैरह मंगाया।  एक पाटा बिछाकर कुछ करने लगें, मै  और माँ उत्सुकता से देखने लगे.फिर  एक कागज़ पर पेन से घर के सभी सदस्यों के नाम व घर के सभी हिस्से का नाम लिखने कहा।  दिया, अगरबत्ती, फूल से पूजा करने के बाद उन्होंने कहा -अभी मै कुछ नहीं बताऊंगा,पर इतना बता देता हूँ की पहले यह घर "बंधा" था , बांधने वाला असाधारण था , आज के जमाने में ऐसा व्यक्ति मिलना मुश्किल है. नया घर बनाते समय वो बंधन की वस्तु निकालकर फेंक दी गयी जिससे घर असुरक्षित हो गया और घर बिगड़ गया। घर के सभी लोग प्रभावित हो गये. कुलदेवी की भी नियमित पूजा अराधना नहीं होती. उनका स्थान भी नियत नहीं। मैंने महाराज से कहा -सुनने में सब बाते  अजीब लगती  है, परन्तु मै प्रभावित नहीं होऊंगा , इस पर उन्होंने जवाब दिया -सबसे ज्यादा असर तो तुम्ही पर है। बात उनकी रहस्यमयी , परन्तु सही थी।
                उन्हें चारामा पंहुचाकर मै वापस आ गया।  और ठन्डे दिमाग से विचार करने लगा। एक अनजान व्यक्ति पहली बार मेरे घर में आया ,कुछ भी मेरे या मेरे परिवार के बारे में नहीं जानता , कुछ भी उसे बताया नहीं गया , न ही पूछा गया, फिर भी 10 -12 वर्ष पुरानी बाते ठीक-ठीक बता गया। जो विस्मृत हो चुकी थी। पुराना घर मेरे मामाजी ने बांधा था ,वे असाधारण सिद्ध (औघड़ विद्या के ) माने जाते थे , उनके काफी किस्से मैंने सुने थे। 10-12 वर्ष  पहले  घर बना तो न तो कुलदेवी का स्थान नियत हुआ, न उनकी स्थापना हुई.(पहले मेरे घर में कुलदेवी का थान /स्थान था ) इतना ही नहीं मेरे छोटे भाई ने बेवकूफी की , मामाजी की जमीन में गड़ाई हुई सामग्री को फालतू चीज और अंधविश्वास है कह कर फेंक दिया।  मै उन दिनों बाहर रहता था . मुझे पता चला तो अच्छा नहीं लगा जिसके बारे में ज्ञान नहीं उसे छेड़ना भी ठीक नहीं।
                 महाराज जी की बाते रहस्यमय व आश्चर्यजनक थी,मै और जानने को उत्सुक था। दूसरे दिन मै पुन:  उनके पास गया और जानने की कोशिश की। उन्होंने बताया -पहले यह घर बंधा हुआ था।  अब घर बिगड़ा हुआ है बुरी तरह से। तुम्हारे बड़े भाई की अकाल मौत भी इसी वजह से हुई और तुम्हारा मामला मैं अपने हाथ में लेना नहीं चाहता। मेरे काफी अनुरोध पर उन्होंने हाथ में लेना स्वीकार किया और कहा की इस महीने के 24   से 28  तारीख के बीच आऊंगा और ठीक कर दूंगा। उन्होंने यह भी बताया कि मामला इतना खतरनाक है की जो इसे ठीक करने जायेगा ,अपने प्राणो से हाथ धो सकता है।
              इस मुलाक़ात के बाद अपने ट्रैक्टर का पम्प ठीक  कराने मै रायपुर गया। रायपुर में वही दो वर्ष पहले वाले भृगु ज्योतिष आये हुए थे, मेरे पास खाली समय था , इच्छा हुई क्यों न उनसे मिला जाये। भृगु ज्योतिष को भला क्या याद रहने वाला है की दो वर्ष पहले मै  उनके पास आया था और उन्होंने मुझे क्या बताया था ,सोंचा उनका पिछला लिखा कागज़ अभी नहीं दिखाऊंगा और कुंडली वगैरह भी नहीं दिखाऊंगा , पहले यूँ ही बताने दूंगा। ज्योतिषी ने मेरा नाम पूछा -क्या नाम है? रेणिक  बाफना। कहा से आये हो ? कांकेर से। कागज़ लेकर कुंडली जैसा चौकड़ी बनाया (शायद प्रश्न कुंडली थी ). फिर काली माई की तस्वीर की तरफ देखने लगे। तस्वीर की तरफ धूप दीप जल रहा था।फिर उन्होंने  कहना शुरू किया -तुम्हारी एक रिश्तेदार महिला है , बहुत निकट की है,तुम उसे अच्छे से जानते भी हो ,गोरा रंग ,माध्यम कद काठी , चहरे में चेचक के दाग है  उसने भयंकर तांत्रिक प्रयोग किया है जो उलटा भी हुआ है। इसी से तुम लोग परेशान हो , वह खुद भी भुगत रही है।  दो वर्ष पूर्व  तुम्हारे यहां किसी की मृत्यु हुई थी क्या ? मैंने कहा हाँ। उसने पूछा -अभी कितने भाई हो ? मैंने कहा दो, पहले तीन थे ,दो वर्ष  पहले बड़े भाई का ही  स्वर्गवास हुआ था। उसने कहा बड़े  की मृत्यु इसी तांत्रिक प्रयोग के उलटा हो जाने से हुआ था !प्रयोग करने वाली तुम्हारी बहुत निकट की रिश्तेदार है , तुम्हारे बाजू में ही रहती है ,नाम भी बता सकता हूँ , पर नाम बताना ठीक नहीं रहता ,इसलिए नहीं बता रहा हूँ। इसे जल्दी से जल्दी कटवाओ किसी भी हालत में। चाहे मेरे से , या किसी और से , पर जल्दी कटवाओ देर मत करना !मैंने ज्योतिषी को अपनी और पत्नी की कुंडली निकाल दिखाई तो देखकर उसने कहा -इसमें कोई दोष नहीं , तब दो वर्ष पुराने उसी ज्योतिषी के लिखे कागज़ भी दिखाए , उनकी पुरानी भविष्यवाणी भी बतायी की उनकी  बाते अक्षरश : सत्य हुयी।उसने जवाब दिया -गलत बातें  तो मै बताता ही नहीं। दो वर्ष पहले उन्होंने कहा था कि तुम दो माह बाद आने दूकान में बैठ नहीं पाओगे,जगह  जगह मारे मारे फिरोगे, न खाने का ठिकाना रहेगा, न पीने का. ये बाते मैंने बकवास मानकर दक्षिणा देकर चल दिया था। परन्तु बाद में ऐसा ही हुआ था सौ प्रतिशत। ( ज्योतिषी दर असल देवी सिद्धि प्राप्त था, ये ज्योतिष से भी ऊँची विद्या होती है )यहाँ भी बाते सोलह आने सच लग रही थी ,सभी लक्षण मेरी भाभी से मिल रहे थे ,शत प्रतिशत ! जो उसी घर में रह रही थी , बगल के कमरे में। मैंने उनसे कहा आपकी बाते और लक्षण मेरी भाभी से पूरी तरह से मिलते है,उसने जवाब दिया -इससे मुझे कोई मतलब नहीं ,नहीं तो झगड़ा हुआ तो जिम्मेदार मुझे माना जाएगा। ज्योतिषी से 10 -15 मिनट चर्चा करने के बाद मै वापस आ गया।
                          घर आकर मै गहरी सोंच में डूब गया। पिछली सारी  बाते याद करने लगा। पुरानी बिखरी कड़िया मेरे दिमाग में क्रम से जुड़ने लगी , प्रमाण देती गयी ,सच्चाई नग्न होती गयी ! पत्नी में मुझे लगातार विचारमग्न रहते देखा तो बहुत पूछने पर आखिर सच्चाई उसे बताना ही पड़ा कि  महाराज जी ने क्या बताया और भृगु ज्योतिष ने क्या बताया। बाते विचित्र है पर न तो निगलते बनाता है न उगलते ! तब पत्नी ने भी कई  बाते जो उसने मुझसे छिपाकर रखी थी, बतायी जो मेरी भी जानकारी में नहीं थी। मुझे यह भी याद आया की भाभी को की बार रात्रि में 9 -10 बजे शीतला मंदिर में आते जाते देखा था ,रात्रि में उधर कोई नहीं जाते क्योकि वह क्षेत्र सुनसान था , नगर का किनारा भी था , शराबी जुआरियो का भी जमघट लगता था। आवारा लोग भी उधर थे एकांत की वजह स,इस तरफ. भाभी को उसकी एकमात्र सहेली जो राजापारा में ही (हमारे मोहल्ले ) रहती थी
उसके साथ अन्नपूर्णा पारा की तरफ भी घूमते रात्रि में मैंने स्वयं देखा था जबकि उस तरफ रात्रि में उस मोहल्ले के लोग भी नहीं घूमते थे।  उस क्षेत्र में थोड़ी दूर पर देसी दारू भट्टी है ,मुस्लिम कब्रिस्तान भी और शमशान घाट भी है और नदी भीं मुझे यह भी याद आया कि भाभी रात्रि एक बजे तक भी घर आती थी कई  बार ,घर में कोई कुछ भी नहीं बोलता था क्योकि बड़ा भाई कमाऊ था। दुधारू गाय की लात भी भली लगती है। एकाध बार माँ ने टोका तो बड़े भाई ने ही माँ को ही कुछ  न कहने की हिदायत दी और  मै  "मुझे क्या करना है की तर्ज पर" अपने काम से काम रखता आया। क्योकि मेरे विवाह के पहले से ही घर पर मेरा दबदबा समाप्त हो चुका था। पिताजी तामसिक गुणों के थे ,जुआ शराब गांजा आदि की लत थी। बड़े भाई ठेकेदार थे ,उनमे भी पिताजी के कुछ गुण थे। मै कठोर प्रकृति का और इन चीजो से घृणा करने वाला था , अत : उम्र में छोटा होने के बाद भी बड़े मेरे सामने बौनापन महसूस करते थे। बड़प्पन भी मै कायम रखता था ताकि मेरे से छोटे  मै आदर्श बनू ,  बड़े तो गए काम से पर छोटो की नींव तो ठीक रहे। (क्रमश :)

2 जून 2014

लग गया तो तीर नहीं तो तुक्का ?

लग गया तो तीर नहीं तो तुक्का ?

जगह जगह विभिन्न प्रकार के बाबाओं और ज्योतिषियों के बारे में सुनता आया , कभी कभी तो देवताओं /देवियों के आने के बारे में सुनता आया.जीवन में ऐसे स्थानो की परीक्षा किया और सत्य खोजने का प्रयास भी किया. अनेक मैंने सत्य पाया तो स्थानो पर फ्राड ! पाठको के सामान्य ज्ञान के लिए ऐसे अनेक स्थानो की परीक्षा परिणाम बतलाना चाहूँगा ताकि धोखा धडी से  सके.
१-देवी की परीक्षा -
तेली बाॅधा के आगे एक गांव के बारे में पता लगा की वहां  देवी आती है , यादव परिवार है। तो परीक्षा करने पहुँच गया। नियत समय पर एक महिला ने सजना शुरू किया और फिर गहने लाल साड़ी पहन कर जीभ निकाल कर काली माई आने का नाटक करने लगी। लोगों को गोलमाल बातें  बोल कर बरगलाने लगी।  मै निश्चित होकर सब देखते रहा। फिर धीरे से अपने पति को बोली -आज जो नया आदमी(यानी मैं ) आया है न , उसे बुलाओ। उसने मुझे इशारा किया तो मै  सामने गया।  फिर पूछा -भड़गाँव में जो बोली थी वो क्या था और क्यों  हुआ ? यह सुनकर  अकचका गयी , क्या बोली थी?मैंने कहा था ? मैंने कहा -हाँ। काली माई आकर  बोली थी , तिस पर उसने जवाब दिया -मैंने कहा था ?काली कई प्रकार की होती है ,काली महाकाली भद्रकाली आदि , मैंने जवाब दिया -मैंने सप्तशती पढ़ा है एक ही काली होती है , चाहे भड़गाँव हो या रायपुर। अब तो वह बगले झाकने लगी , मैंने जान लिया की यह फ्राड है , फिर भी अपमान न हो, लोगों की भावनाओं को ठेस न लगे, इसलिए बगैर दुतकारे चला आया।
२- बाबाजी की परीक्षा :-
दुर्ग के एक बाबाजी के  भक्त हैं, मराठी है,नाम नहीं दे रहा हूं , बहस से बचने। एक बार मित्र को लेकर  गया ,  एक  समस्या के बारे में पूछा -तो टालने लगे -अगले हप्ते आना। फिर मैंने अपने बारे में पूछा तो वही गोलमाल जवाब। एक बार मेरी बिटिया गयी तो उन्होंने बताया कि इंजिग के क्षेत्र में जाओगी,मेरी बिटिया ने  जवाब दिया -मै  तो कामर्स स्टूडेंट हूं फिर इंजिनियरिंग में कैसे जाऊगी ? वो वे बगले झाँकने लगे.इसी प्रकार  मौका लगने पर मैंने पूछा-मेरी नौकरी कब लगेगी-जवाब मिला -14 तारीख को पूर्णिमा है तब तक लग जावेगी। हाल में ही मैंने पुरानी नौकरी छोड़ी थी और बेरोजगार था, 14 मई 2014  के बाद 22/5 /2014 तक इंतज़ार किया । जो गलत निकला। बाबाजी के असंख्य भक्त है जिसमे  धर्म बहन भी है।  
(टीप- मेरी बिटिया पढ़ाई पूरी करने के बाद टीवी सीरियलों में असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में काम करने लगी है)

परिणाम बताते है -    "लग गया तो तीर नहीं तो तुक्का"।

ऐसा भी होता है -१ (धारावाहिक सत्य घटना )

ऐसा भी होता है !(१)- (धारावाहिक सत्य घटना )
मनुष्य भी बड़ा अद्भुत है ,जब तक जीवन स्वयं की मर्जी से  चल रहा है और हर ईच्छा पूरी हो रही है, तब तक वह बड़ी२   बाते करेगा . हिम्मत,दृढ़ विश्वास  और लगन की डींग  बघारता फिरेगा , लेकिन जैसे ही प्रतिकूल परिस्थितियाँ आयी  नहीं कि  वह हिम्मत हार जाता है। (वैसे मुसीबत में बजरंगबली भी दुम दबाकर भाग खड़े होते है , देवता भी कूच कर जाते हैं ). कुछ दिन पहले जिस व्यक्ति तो ज़िंदादिल कहते थे  मुरझाये फूल की तरह लगाने लगता है ,मानो उसके जीवन से खुशबू और सौन्दर्यबोध चला गया हो। पर  ऐसा क्या हो जाता है  क्या वह प्रतिकूल परिस्थितियों में भी  लक्ष्य को साधे रखना भूल जाता है ? हमारे सामने हेनरी फोर्ड जैसे कई उदाहरण है जिसने अपनी सूझ बूझ से फोर्ड कंपनी को दुनिया की एक नंबर कार निर्माण की कंपनी बना दिया. आप भी मुश्किल परिस्थितियों से निपट है-बस हिम्मत रखिये ( कभी किसी को मुसीबत से जूझते देख हंसी न उड़ाइए ,कहीं आपको भी वैसी परिस्थितियों का सामना न करना पड़े ).
                               जनवरी 1992 में मै अपनी रेडीमेड कपड़े  की दूकान के लिए रायपुर गया। एक ज्योतिषी ( भृगु ज्योतिष  )पास भी यूँ ही चला गया।यह ज्योतिषी असाधारण  किस्म का था। तंत्र सिद्धि भी प्राप्त था  पर  इसका आभास  नहीं था।  उसने कहा -"दो महीने के बाद तुम  दूकान में नहीं बैठ पाओगे , इधर उधर भटकोगे , न खाने का ठिकाना रहेगा न  पीने का"। मैंने सोचा बकवास ,इस साल मेरे पास  नकद पूंजी  भी है ,  धंधे में कुछ नाम भी कमा चुका , इस वर्ष पैसा अच्छा कमाऊँगा। परन्तु 3  मार्च 1992 को (लगभग दो महीने बाद) बड़े भाई की मृत्यु हो गयी ,भारी  मुसीबते आयी। उनके द्वारा  छोड़े गए ठेके पर सरकारी दायित्व आ रहा था। परिस्थितिवश छोटे भाई का भी सहयोग लिया ,उसका नया क्रशर (गिट्टी मशीन ) बेकार हो सकता  थी ,मैंने त्याग किया , सम्पूर्ण परिवार की भलाई के लिए ,चलती दूकान में ताला लगाकर दिन रात मेहनत की। ठीक उसी प्रकार -पहाड़ी क्षेत्र में भटका ,तख्तो पर सोया,इधर उधर भटका,न खाने का ठिकाना,न पीने का ठिकाना। बड़े भाई की मृत्यु पर शंकर भगवान को भी बुरा भला कहा कि 2 मार्च को शिव रात्रि थी ,मै आपके पास पहाड़ मेले में  आया था,तत्काल दूसरे दिन भाई की मृत्यु हो और दूकान बंद हो गयी ! (शिवरात्रि को ही 4 वर्ष पहले मेरी दुकान प्रारम्भ हुई थी , पर 4 वर्ष से लगातार घाटा ही झेलता रहा। ) तेरे पास आने का क्या फ़ायदा ? कभी शिव  मंदिर का सामना हो जाता तो यह कहता -देख  फूल चढ़ा रहा हूँ,अगरबत्ती भी ,पर मांगूगा कुछ नहीं क्योकि तुम हमेशा उलटा  हो। तुमसे मांगना भी खतरनाक है। गर्भवती पत्नी की भी देखभाल नहीं कर पाया और उसे छोडकर कार्य के सिलसिले में जंगल में पड़ा रहा. ईधर माँ-बाप और भाभी (विधवा ) तथा बहू (छोटे भाई की पत्नी )ने भी कोई देखभाल नहीं की।
       दो वर्ष बीत गए ,फ़रवरी 1994 में मै यूँ ही चारामा गया था , घूमते  घामते ,पता लगा रवेली वाले(गरियाबंद ) महाराज आये हुए है,उनके कुछ किस्से मैंने सुन रखे थे,अत: जिज्ञासा हुई एक बार  मिल लिया जाए. परन्तु  उस दिन न मिल  पाया। खैर दूसरे दिन मिल लूंगा  सोंचकर टाल दिया।  दूसरे दिन आया ,महाराज  मिला। महाराज  पूछा - समस्या है? मैंने कहा -समस्या ही समस्या है ,आर्थिक मानसिक शारीरिक सभी तो है घर पर, एक बार घर दिखा देना चाहता हूँ ,मैंने सुना है आप देखते हैं ,घर की दिशा वगैरह की कोई गड़बड़ी तो नहीं , बस शंका निवारण करना चाहता हूं। उन्होंने कहा-घर से कुछ लाये हो ,नींबू चावल वगैरह ?घर वालों ने कुछ भेजा है? मैंने कहा नहीं,अभी बाज़ार से नींबू ला देता हूँ। उन्होंने कहा वस्तु उसी क्षेत्र से आनी चाहिए। मेरे नींबू लेकर आने पर उन्होंने कहा-अभी नींबू फूंक कर देता हूँ ,घर जाकर पूजा स्थल पर रख देना मैंने स्वीकार कर लिया और दूसरे दिन आकर  घर चलने कहा जो उन्होंने स्वीकार कर लिया।
          सुनने में पहले कभी नहीं आया , कहीं कुछ रहस्यमय  नहीं?कई बार चर्चा होती है घर ठीक नहीं ,जैन मंदिर के ठीक सामने घर है ,जैन भगवान की दृष्टि घर पर पड़ती है,जो ठीक नहीं माना जाता ,इतने वर्षो से मेहनत कर रहे है,परन्तु सुख समृद्धि आती ही नहीं ,उल्टा घर में मन-मुटाव ,तंगी,कलह परेशानियां होती रहती है। जब पुराना घर था तो मामाजी के साथी ,गुरु,व महाप्रसाद श्री जगमोहन सिंह जी (ये भीऔघड़ सिद्ध थे )घर पर आये थे और उन्होंने कुलदेवी को रुष्ट बताया था ,नियमित दिया न जलाने की वजह से.(मामाजी सिद्ध औघड़ तांत्रिक थे) ,अत: किसी रहस्यमयी गड़बड़ी की आशंका  धर गयी। सोंचा विश्वास  करूँ या  करूँ परन्तु लापरवाही न करूँ , इस दिशा में भी छानबीन कर लूँ,शंका निवारणार्थ। (क्रमश:)

13 मई 2014

मैं ज्योतिष पर क्यों विश्वास करने लगा

 मैं ज्योतिष पर क्यों विश्वास करने लगा 
मेरे एक मामाजी थे जो प्रसिद्द वकील होने के साथसाथ हस्तरेखा विशषज्ञ भी थे . उन दिनों मेरी उम्र २४-२५ वर्ष रही होगी।  तब तक ज्योतिष विद्या में मुझे विश्वास पक्का  नहीं था .
                          [ पर एक घटना हो चुकी थी , एक होमियोपैथी के डाक्टर ने मेरी कुंडली देखकर बता दिया था कि तुम ज्यादा नहीं पढ़ पाओगे , सिर्फ ग्रेजुएशन तक ही पढ़ पाओगे।  मैंने उसे चुनौती के रूप में लिया और ग्रेजुएशन के बाद आगे सी. ए. करने चला गया।  जो पांच साल पापड़  बेलने के बाद भी वाकई नहीं कर पाया। ]
                             मैंने मामाजी को अपना हाथ दिखाया तो उन्होंने कहा कि २८ वे वर्ष में तुम्हारा  खुद का कार्य शुरू होगा।  वाकई मेरा खुद का कार्य २८ वे वर्ष में ही शुरू हुआ , उसके पहले मैं आत्मनिर्भर नही हो पाया, मैंने पूछा  कि हस्तरेखा तो अंधविश्वास है , बकवास है कइयो का अनुभव है कि गलत होता है वगैरह । तो उन्होंने कहा , एकदम सत्य होती है , मैंने तर्क किया कि मैंने कुछ किताबे देखी  थी, कभी लोगो को पढते , तो उन्होंने जवाब दिया तुमने अब तक बाजारू किताबे ही देखी है जो पैसा कमाने के लिए लिखी गयी होती है , असली किताबे इतनी सस्ती थोड़ी मिलती है ! अब भविष्यवाणी सत्य होते देखकर मेरी उत्सुकता और बढ गयी , मैं फिर गया , पूछने पर उन्होंने आगे की बात बतायी।  इसके बाद चूँकि सत्यता का प्रमाण मुझे मिल गया तो मैंने लेखक आदि का नाम पूछ कर अपने गृह नगर लौटा , और संयोग से श्री नवाब अली  , जो मेरे मोहल्ले में ही रहते थे, के पास मिल गयी। किसी को किताब नहीं देने की आदत के बाद भी उदारता पूर्वक उन्होंने मुझे पढने दी , मार्गदर्शन भी किया समय समय पर और इस तरह मुझे ये विद्या प्राप्त हो गयी।

7 मई 2014

मैंने फिर किसी का काल देखा……।


✍मैंने फिर किसी का काल देखा । 

सन 2011 की बात है , मेरे पास एक फोन आया , हैलो मै ,शीतल जैन  बोल रहा हूँ , मैआपसे मिलना है , मैंने पहले तो मना कर दिया , फिर उससे कुछ पूछा तो उसने एक व्यक्ति से कोई रिश्ता नहीं बताया।  फिर भी मेरे मना करने पर उसने अपने "हैंडीकेप्ट" होने की बात कही तो मुझे दया आ गयी।  मैंने उसे आने की आज्ञा दे दी।  एक पैर से पोलिओग्रस्त विशेष स्कूटर पर बैठ कर  आया। मैंने फिर उससे उसकी रिश्तेदारी की पूछ ताछ की फिर  संतुष्ट होकर उसकी समस्या सुनी। उसकी हस्तरेखा देखी , आवश्यक सुझाव दिया। उसने एक बार घर भी चलने का अनुरोध किया जो मैंने उस  समय ठुकरा दिया। चलते चलते एक बार उसके दूकान भी गया , उसी दौरान  उसने फिर घर चलने का अनुरोध किया , जो मैंने स्वीकार कर लिया। घर जाकर मेरी नजर उसकी भाभी पर पड़ी , जो मुझे देखकर कुछ विचित्र सा मुंह बनाने लगी , साफ़2 मुझे आभास हो गया कि वो प्रेतबाधाग्रस्त थी।(वह उस समय भोजन कर रही थी)।  फिर बैठक में बैठने के बाद शीतल ने मुझे बताया कि उसकी भाभी की तबियत खराब रहती है , काफी इलाज करवा चुके है , एक मुस्लिम ने बताया उसे "बाहर की हवा " लगी हुई है , उससे शांति प्रयोग करवाने के बाद अब ठीक है काफी।  मैंने जवाब दिया कि अभी ठीक नहीं हुई है , प्रभावित है, फिर उसके भाभी को बुलवाकर उसका हाथ देखकर मैंने वापस भेज दिया।  बाद में शीतल को बताया कि अपनी भाभी का विशेष ख्याल रखे , इसी  साल खतरा है, पता नहीं कब क्या हो जाये !  वापस आते आते फिर मैंने दोहराया कि उसकी भाभी को इसी साल खतरा है  जान का। घर आना एक प्रयोग बताऊंगा उसे उनके हाथ से करवा लेना। 

(इसी बीच उसने बताया जिस दिन मैं उसके घर गया था,उसी रात उसकी मम्मी को स्वप्न आया कि बाफना जी घर पर आ गए है,चिंता की कोई बात नहीं,अब सब ठीक हो जाएगा, उसकी मम्मी को मेरा चेहरा भी दिखा था !)


घर आने पर मैंने राजिम कुलेश्वर महादेव के मंदिर जाकर एक प्रयोग करने कहा।  अगले दिन वो और उसके साले साहब आये, भाभी के पैदल नहीं चल पाने की बात कहते हुए उनके बदले खुद पूजा करने की बात कहने लगे ।  वे लोग गए और पुजारी के साथ मिलकर छोटी सी पूजा कर लिए।  परन्तु विधि को यह मंजूर नहीं हुआ।  अगले हप्ते ही उसकी भाभी फिर से बुरी तरह बीमार हो गयी और अस्पताल में भरती होना पड़ा।  अब मेरे आफिस में (नौकरी स्थल ) बैठे हुए ही दिन भर में उसका ५-७ बार फ़ोन आ गया  कि ऐसा-ऐसा हो गया।  मैंने कहा अब एक काम ही कर सकते है , होमियोपैथी के डा रमानी से संपर्क , पर दुर्भाग्य डा साहब बाहर थे , मिल न सके। अब मैंने कुछ दवाइया बतायी जो अंगरेजी दवाई के साथ देने का सुझाव दिया , पर इसके पहले वो लाता और देता , उसकी भाभी आई- सी- यू  में भरती कर दी गयी। दवा दे पाना मुश्किल।  शाम होते होते विशेष आई सी यू  में ले जाया गया।  और फिर 4 बजे शाम को मृत्यु की खबर ही आ पायी। बाद में शीतल काफ़ी रोया और गम्भीर रूप से विश्वास हुआ कि मैंने सच  ही कहा था . देखा जाए तो मैंने उसकी भाभी का काल देख लिया था और उसे स्पष्ट रूप से बता भी दिया था ताकि सावधानी रखी जा सके , वक्त रहते बचाव किया जा सके , पर ऐसा हो न सका !

   इसके बाद मैंने पहले ही उसका हाथ देख रखा था जिसके अनुसार अगला नंबर शीतल जैन का ही था। और उसे बता भी रखा था। वह घबराया और मेरे पास फिर आया,मैंने उसे सात्वना दी कि अगर तुम उस दिन भाभी के हाथो ही राजिम ले जाकर पूजा करवा देते तो शायद बच जाती। अब तुम्हें बचाने की कोशिस करूँगा पर तुम कार की व्यवस्था करो और कुछ पूजा में काम आने की सामग्री लिखवा दी क्योकि ऐसे प्रयोग घर में करना ठीक नहीं होते। नियत दिन वो आया और हम दोनो ड्राइवर सहित गए,जंगल में स्थित एक देव स्थान पर पूजा कर प्रयोग किया। इसके बाद वो व्यवसायिक कार्य से दिल्ली और उज्जैन भी गया तो उसके साथ चमत्कारिक रूप से अनजान लोग सहायता करने लगे, ये सभी विवरण मुझे लौट कर बताया भी। पर उसका घर शुद्ध नहीं हुआ था क्योकि मैंने जो कुछ किया था उसकी रक्षा के लिए था, अब घर अभी भी भारी2 लगता है ये सुनकर अपने गुरु के पास उसे ले गया,फिर उनसे घर शुद्ध हुआ। 

सब कार्य पूर्ण होने के बाद मैंने उसे मेरी लिखी "जैन गोत्रो की कुलदेवी " नामक पुस्तक की 10 कॉपी दी और कहा कि इसे अपने परिचितो रिश्तेदारो को बेचना ताकि कष्ट में कोई हो तो उसे रास्ता मिल जाए। पर मुश्किल से 2-3कॉपी बेचा फिर टालने लगा ,ये देख मैंने बची सारी कॉपी मांगा ली। अब काम निकलने के बाद उसने आम भारतीयो की तरह ही मुंह फेर लिया,कोई फोन नहीं आता या खुद कभी मिलने आता। 
# क्या उसे बचाकर मैंने गलती की?#
-आर के बाफना,रायपुर

17 मार्च 2014

मुर्दे की खटिया पर चैन की नींद ?

मुर्दे की खटिया पर चैन की नींद ?
बचपन में मेरे मित्र भी शरारती थे . अबकी बार मेरे मित्र श्री जितेन्द्र जैन (डोषी ) का एक संस्मरण  दे रहा हूँ। काफ़ी रुचिकर लगेगा।  ग्राम सरोना (कांकेर के पास ) रहते है।   बचपन में (करीब मिडिल स्कूल   पढने के
समय )  नाचा देखने पड़ोस के गांव  में भाग गए घर में बिना पूछे , बिना बताये, अपने कुछ साथियो के साथ ! (नाचा एक नाच का प्रोग्राम होता है जिसमे ग्रामीण गीतो में 'डांस' होता है , ग्रामीणो के मनोरंजन का एक साधन प्रचलित था ). रात्रि वापसी में काफ़ी देर हो चुकी थी . वे लोग वापस आने लगे , परन्तु घर आने के बाद खटखटाने से घर के लोग जागेंगे और डॉट  पड़ेगी , यही सोचकर वे लोग रात्रि  में ही कही सोने की सोंचने लगे। पर जगह कहा ! रास्ते में एक सूखी रेत  भरी नदी पड़ती थी , जब ये सभी साथी वहा पहुंचे तो नदी में एक अलाव जल रहा था , नदी किनारे झाड़िया दिख रही थी जो किसी का खेत लग रहा था।  सब लोगो ने अनुमान लगाया कि खेत का रखवाला (चौकीदार) कही गया है घूमने , पास ही एक खटिया (खाट) पड़ी हुई थी , अत: जलती अलाव से थोड़ी दूर ग्रामीण दोस्त सो गए और ये सेठ पुत्र होने के नाते उस खटिया पर सो गया। सबेरे उठने पर सब की घिघ्घी  बंध गयी , दर असल जिसे अलाव समझ रहे थे वो किसी मुर्दे का दाह संस्कार था , जिसे रखवाले की खटिया समझ रहे थे वो मुर्दे को लाये जाने वाला खाट था (गाँवों में खटिया /खाट  में लाने की परम्परा है ), जिसे खेत समझ रहे थे अँधेरे में वो तो शमशान  भूमि थी ! सबेरे उठते साथ सबके सब सर पर पैर रखकर भाग खड़े हुए घर की ओर। मित्र को तो कुछ नहीं हुआ पर ग्रामीण साथी में से कुछेक  दो तीन दिन बुखार से तपते रहे , ये उन गांव के लोगो का "डर"  का बुखार था।