कुंए के मेंढक के अस्तित्व से किया इंकार !
आज कल जिसे देखो अपने को पढ़ा लिखा , आधुनिक बताते हुए अनेक विषयो को ढकोसला और अंधविश्वास बताता है . ऐसे दो मुंहे लोग भी दिखाई देते है जो वैसे तो आधुनिक और विज्ञान के ठेकेदार बनते है और चुपके चुपके नारियल अगरबत्ती लेकर कभी बाबाओ के पास, कभी मंदिर ,और कभी ज्योतिषियों के पास जाते दिखेंगे। जिन बातो पर ऐसे लोग पाखण्ड ,अंधविश्वास ,भ्रम विभ्रम होने की घोषणा करते है ,वे खुद भी कितने ज्ञानी है ,उनका मानसिक स्तर क्या है ? यह सोंचने वाली बात है। इनमे से कोई भी रिसर्चर नहीं। केवल फैशन और दिखावे के लिए बुद्धिमत्ता झाड़ रहे है।
आप ने कभी देखा नहीं ,कभी भुगता नहीं , इसका मतलब यह नहीं होता की इनका अस्तित्व नहीं। बिलासपुर (छ.ग. ) प्रकाशित प्रज्ञा तंत्र सन 2004 में "टोनही" सम्बन्धी सत्य घटना का प्रकाशन था , जिससे इन सबका अस्तित्व प्रमाणित होता है .दुनिया में हर चीज है, ये अलग बात है किसी को बार-बार देखना पडता है , किसी का पाला जीवन भर नहीं पडता ,किसी को इन चीजो का पता ही नहीं चलता। मूर्ख भारतीयों से बुद्धिमान विदेशी अच्छे ,जो परामनोविज्ञान के तहत इन पर गम्भीरता से रिसर्च कर रहे है , न कि बिना सोंचे समझे मूर्खो की तरह नकारते है। कानून बनाने वाले भी चुनाव के समय चुनाव जीतने तरह तरह के तांत्रिक अनुष्ठान करवाने लग जाते है .
विज्ञान के ठेकेदारो पर ज़रा खुद सोंचे -
आजकल जिसे देखो विज्ञान का ठेका ले लेता है। अब ज़रा विचार करे इन तर्कों पर। मान लीजिये एक एलोपैथी का डाक्टर है और वह ह्रदय रोग विशेषज्ञ रोग है। निश्चित रूप से हृदय रोग चिकित्सा में सम्पूर्ण ज्ञान रखना संभव नहीं, क्योकि जब उसने पढ़ाई की थी तब के कोर्स और अभी के नए कोर्स में काफी बदलाव आ गया होगा , नये नए ज्ञान और रिसर्च की बाते जुड़ती गयी होगी क्योकि वैज्ञानिक अनुसंधान कभी रुकता नहीं। इस हिसाब से तो इस चिकित्सा में अधिकतम 80 % ज्ञान ही होगा इस महाशय के पास , वह भी तब जब रिसर्च पेपर्स ,चिकित्सा विज्ञान के जर्नल्स नियमित रूप से पढ़ता रहे, एडवांस्ड प्रशिक्षण हेतु देश विदेश की यात्राये कर ट्रेनिंग लेता रहे।
अब चिकित्सा के भी अनेक क्षेत्र है एलोपैथी में। बाल रोग, स्त्रीरोग, नेत्र रोग ,मेडिसिन इत्यादि इस हिसाब से केवल एलोपैथी चिकित्सा विज्ञान का ही 10% ही ज्ञान उस चिकित्सक के पास हुआ ! अगर सम्पूर्ण चिकित्सा विज्ञान जिसमे आयुर्वेद ,यूनानी, होमियोपैथी, प्राकृतिक चिकित्सा बायोकेमिक, अादि भी शामिल कर लिया जाए तो सम्पूर्ण चकित्सा विज्ञान का मात्र 1% ही गया उस चिकित्सक के पास हुआ !
अब विज्ञान की सैकड़ो शाखाये तेजी से विकसित हो रही है, नयी शाखाये बनती जा रही है जैसे भौतिक विज्ञान में अंतरिक्ष विज्ञान , मनोविज्ञान(उपशाखा -परामनोविज्ञान ) , रसायन विज्ञान , बायोलॉजी, जूलॉजी (उपशाखा -सूक्ष्म जीव विज्ञान ) आदि आदि। ऐसे में जबकि चिकित्सा विज्ञान मूल विज्ञान की एक छोटी सी शाखा मात्र है. अब ज़रा उस चिकित्सक के ज्ञान का प्रतिशत तो निकालिये- 0. 001 % या शायद उससे भी कम !अब खुद सोंचिये इतना कम ज्ञान रखने वाला सम्पूर्ण विज्ञान का ठेका कैसे ले सकता है? उसे किसने दिया यह कहने को कि -" विज्ञान ये सब नहीं मानता "
सावधान :-
मै ये सब अंधविश्वास फैलाने के लिए कतई नहीं लिख रहा हूँ ,मेरा मकसद तो सिर्फ सच्चाई बताना है परन्तु लोग बेहद सावधान रहे , क्योकि धर्म , तंत्र और ज्योतिष के नाम पर दुनिया में पाखंडियो और ठगो की भरमार है। कही उनके चंगुल में फंसकर अपना सब कुछ न लुटा बैठे ! सच्चे लोग हजारो में एक होते है , वो भी किस्मत से मिलते है !
आज कल जिसे देखो अपने को पढ़ा लिखा , आधुनिक बताते हुए अनेक विषयो को ढकोसला और अंधविश्वास बताता है . ऐसे दो मुंहे लोग भी दिखाई देते है जो वैसे तो आधुनिक और विज्ञान के ठेकेदार बनते है और चुपके चुपके नारियल अगरबत्ती लेकर कभी बाबाओ के पास, कभी मंदिर ,और कभी ज्योतिषियों के पास जाते दिखेंगे। जिन बातो पर ऐसे लोग पाखण्ड ,अंधविश्वास ,भ्रम विभ्रम होने की घोषणा करते है ,वे खुद भी कितने ज्ञानी है ,उनका मानसिक स्तर क्या है ? यह सोंचने वाली बात है। इनमे से कोई भी रिसर्चर नहीं। केवल फैशन और दिखावे के लिए बुद्धिमत्ता झाड़ रहे है।
आप ने कभी देखा नहीं ,कभी भुगता नहीं , इसका मतलब यह नहीं होता की इनका अस्तित्व नहीं। बिलासपुर (छ.ग. ) प्रकाशित प्रज्ञा तंत्र सन 2004 में "टोनही" सम्बन्धी सत्य घटना का प्रकाशन था , जिससे इन सबका अस्तित्व प्रमाणित होता है .दुनिया में हर चीज है, ये अलग बात है किसी को बार-बार देखना पडता है , किसी का पाला जीवन भर नहीं पडता ,किसी को इन चीजो का पता ही नहीं चलता। मूर्ख भारतीयों से बुद्धिमान विदेशी अच्छे ,जो परामनोविज्ञान के तहत इन पर गम्भीरता से रिसर्च कर रहे है , न कि बिना सोंचे समझे मूर्खो की तरह नकारते है। कानून बनाने वाले भी चुनाव के समय चुनाव जीतने तरह तरह के तांत्रिक अनुष्ठान करवाने लग जाते है .
विज्ञान के ठेकेदारो पर ज़रा खुद सोंचे -
आजकल जिसे देखो विज्ञान का ठेका ले लेता है। अब ज़रा विचार करे इन तर्कों पर। मान लीजिये एक एलोपैथी का डाक्टर है और वह ह्रदय रोग विशेषज्ञ रोग है। निश्चित रूप से हृदय रोग चिकित्सा में सम्पूर्ण ज्ञान रखना संभव नहीं, क्योकि जब उसने पढ़ाई की थी तब के कोर्स और अभी के नए कोर्स में काफी बदलाव आ गया होगा , नये नए ज्ञान और रिसर्च की बाते जुड़ती गयी होगी क्योकि वैज्ञानिक अनुसंधान कभी रुकता नहीं। इस हिसाब से तो इस चिकित्सा में अधिकतम 80 % ज्ञान ही होगा इस महाशय के पास , वह भी तब जब रिसर्च पेपर्स ,चिकित्सा विज्ञान के जर्नल्स नियमित रूप से पढ़ता रहे, एडवांस्ड प्रशिक्षण हेतु देश विदेश की यात्राये कर ट्रेनिंग लेता रहे।
अब चिकित्सा के भी अनेक क्षेत्र है एलोपैथी में। बाल रोग, स्त्रीरोग, नेत्र रोग ,मेडिसिन इत्यादि इस हिसाब से केवल एलोपैथी चिकित्सा विज्ञान का ही 10% ही ज्ञान उस चिकित्सक के पास हुआ ! अगर सम्पूर्ण चिकित्सा विज्ञान जिसमे आयुर्वेद ,यूनानी, होमियोपैथी, प्राकृतिक चिकित्सा बायोकेमिक, अादि भी शामिल कर लिया जाए तो सम्पूर्ण चकित्सा विज्ञान का मात्र 1% ही गया उस चिकित्सक के पास हुआ !
अब विज्ञान की सैकड़ो शाखाये तेजी से विकसित हो रही है, नयी शाखाये बनती जा रही है जैसे भौतिक विज्ञान में अंतरिक्ष विज्ञान , मनोविज्ञान(उपशाखा -परामनोविज्ञान ) , रसायन विज्ञान , बायोलॉजी, जूलॉजी (उपशाखा -सूक्ष्म जीव विज्ञान ) आदि आदि। ऐसे में जबकि चिकित्सा विज्ञान मूल विज्ञान की एक छोटी सी शाखा मात्र है. अब ज़रा उस चिकित्सक के ज्ञान का प्रतिशत तो निकालिये- 0. 001 % या शायद उससे भी कम !अब खुद सोंचिये इतना कम ज्ञान रखने वाला सम्पूर्ण विज्ञान का ठेका कैसे ले सकता है? उसे किसने दिया यह कहने को कि -" विज्ञान ये सब नहीं मानता "
सावधान :-
मै ये सब अंधविश्वास फैलाने के लिए कतई नहीं लिख रहा हूँ ,मेरा मकसद तो सिर्फ सच्चाई बताना है परन्तु लोग बेहद सावधान रहे , क्योकि धर्म , तंत्र और ज्योतिष के नाम पर दुनिया में पाखंडियो और ठगो की भरमार है। कही उनके चंगुल में फंसकर अपना सब कुछ न लुटा बैठे ! सच्चे लोग हजारो में एक होते है , वो भी किस्मत से मिलते है !
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