18 अगस्त 2014

ऐसा भी होता है-8 (धारावाहिक सत्य घटना )

ऐसा भी होता है-8 (धारावाहिक सत्य घटना )-
कुछ दिनों बाद सर पुन : घर आये , मेरी पत्नी के घुटने को पुन  : देखा, पारद शिव लिंग का प्रयोग  स्पर्श कराते हुए किया , कुछ पैरो/घुटनों  में चूसने की प्रक्रिया की।  मुंह से पौधो की जड़ो जैसा कुछ निकाला  और कहा कि  घुटनो की बीमारी उन्होंने ठीक कर दिया।  विश्वास  नहीं हो रहा था मुझे ,मैंने पूछा - यह बात मै कैसे जानुगा? उन्होंने बताया की अमावस्या के आस पास ही ज्यादा दर्द उठता रहा होगा , देखना अब दर्द होगा ही नहीं !मैंने सर को बताया पुरानी बात,कि  कैसे 72 घंटे बाद,दुष्ट भाभी  बीमार पड़ी,फिर कैसे ठीक हो गयी? सर ने बताया , उसने रक्षा पाठ किया होगा, उसकी सहेली डायन-2  ने और गुरु (शीतला मंदिर के पुजारी ) ने "झाड़ा"  दिया होगा। या फिर शंकर भगवान को वचन बद्ध कर ठीक हुई होगी , और नारियल भिजवा दी , इसलिए बच गयी।
             [भगवान शंकर की यही एक खराबी है, दुष्ट लोगो को भी वरदान दे बैठते है और सीरियल को एकता कपूर की तरह लंबा खींचते है. कभी २ तो यह भगवान भरोसे के लायक भी नहीं लगते !]
सचमुच दुष्ट लोग बड़ी सख्त जान होते है ,ईश्वर भी उनके आगे नतमस्तक हो जाता है।  इसलिए इस्लाम में कहावत है- नंगे से खुदा डरे।
                     अमावस्या आयी, फिर पूर्णिमा, फिर अमावस्या।  पर पत्नी के घुटने का दर्द उड़न छू था।  घोर आश्चर्यजनक , परन्तु कई  महीनो मैंने ध्यान दिया , वाकई कभी नहीं हुआ।  जबकि घुटने का अजीब सा दर्द जो पिछले 4-5 वर्षो से पीछे पड़ा हुआ था।  काँकेर के दो-दो हड्डी रोग विशेषज्ञ देख चुके थे, दर्द का कारण समझ में नहीं आया था।  दवाईया अस्थायी रूप से ही लाभ कर रही थी , कभी 2 फेल भी हो जाती थी। एक्स रे इत्यादि से भी कुछ नहीं मिल रहा था ! दर्द का  कारण डाक्टरों को भी समझ में नहीं आ रहा था ,एक डाक्टर ने तो घुटने में वह इंजेक्शन देने का निर्णय भी ले लिया था जो बुढ़ापे में ही दिया जाता है। परन्तु एक अन्य डाक्टर की सलाह मैंने ली तो उसने रोक  दिया।  इस दर्द निवारण हेतु आयुर्वेद (वातरोग चिकित्सा ) एवं होमियोपैथी भी शतप्रतिशत असफल हुई थी कुछ आराम के बाद वही स्थिति फिर आ जाती थी।  हम लोग इलाज करवा2  कर थक चुके थे , समझ में नहीं आता था ! ऐसे में डायन भाभी की करतूत का रहस्योद्घाटन और उसका तंत्र मन्त्र द्वारा निराकरण भला क्यों नहीं अपना अस्तित्व प्रमाणित करता ? अनुभवजन्य सत्य का  उदघाटन था यह।  इसे मनोवैज्ञानिक असर भी नहीं कहा जा सकता, न ही किसी प्रकार का भ्रम विभ्रम।
                          कुछ दिनों बाद पुन : महसूस होने लगा की कार्य  पूर्ण नहीं हुआ है , अब भी कुछ गड़बड़ी है. शंका निवारण करने के लिए एक स्थानीय विचारक के पास गया( ये ब्राम्हण महाराज भी जोरदार सिद्धि प्राप्त थे,जो बाद में अनेक परीक्षाओ के बाद मैंने माना ) उसने अपनी हथेली पर सब कुछ देखने के बाद कुछ भी बताने से इंकार कर दिया।  परन्तु एक संकेत दे दिया की घर तो अभी तक ठीक नहीं हुआ है। मेरे परम मित्र सुब्रत दत्त राय को मेरी अनुपस्थिति में कई  बाते बताई जो मित्र ने मुझे बाद में बताया। बाते वही थी,जो पिछली बातो की पुष्टि थी। (परन्तु घर में क्या था ये पहली बार ठीक ठीक उसी से मालुम हुई। उसकी बातो में विश्वास पूरी तरह न करके मै कोंडागांव गया, जहा किसी के  शरीर पर काली माई आती थी, ऐसा सुना  था। उस दिन उस व्यक्ति ने कहा-परिस्थितिवश आज देवी का आवाहन नहीं करूंगा पर अनाज के दाने से विचार  कर उन्होंने बताया कि " डौंडीवाले  सर " के हाथो कार्य पूरा होने का  योग नहीं है।उन्हें समस्या की विस्तृत जानकारी नहीं है ,कार्य होने  योग भी नहीं, अत: पुराने रवेली वाले महाराज के पास जाओ। उन्हें समस्या की पूरी जानकारी भी है।  आदेश के अनुसार मुझे पुन : भाग दौड़ करनी थी।वहा  से आने के बाद , एक दो दिन बाद पुन:मन में आकस्मिक रूप से आत्महत्या विचार आने लगे , शरीर  और  मन भारी लगने   लगा।  एक बार पहले मन और शरीर पर  असर महसूस हो चुका था।  अत:पत्नी से पूछा ,तो  उसे भी वैसा ही लग रहा था।  अत: हम दोनों सावधान हो गए,दुष्टाके बंधन से  मुक्ति की बात समझ में आते ही तुरंत दूसरे दिन मै महाराज जी के गाँव की तरफ रवाना  हुआ ,दिन भर भूखा प्यासा रहते , रास्ते में विभिन्न बाधाये झेलते अंतत : रात्रि में उनके गाँव जा पहुंचा। इस बार  महाराज जी मिल गए। उस रात खा पीकर सो गया। . सबेरे उन्हें सारी बातें  बताई।काली माई ( कोंडागांव)से मिले निर्देश के बारे में बताया। उन्होंने आश्वासन दिया,कि मै  समय पर आ गया हूँ ।अब देखता हूँ ,कुछ फूंका उन्होंने, वापस लौटने का निर्देश दिया।  पुत्री का विवाह निपटाकर आने की बात कही।
(टीप-बुरे समय में कार्य पूरा करने दौड़ते समय  अनेक बाधाये आती है , जैसे रवेली गाँव जाते  समय मेरे साथ हुआ )   
                                                                                                                                                              
  मै वापस घर आ गया। घर आकर इंतज़ार करने लगा। एक एक दिन एक एक युग  के सामान लग रहा था।  संकट में समय एक एक पल  भारी लगता है। कैसी कैसी घटनाये घटती है जीवन में।मुझे याद आने लगा,बचपन में एक   ज्योतिषी(राधा कृष्ण श्रीमाली ने)बड़े भैया को बताया की तुम्हारा विवाह एक  चेचक दाग वाली लडकी से होगा, वो आकर तुम्हारा घर तहस नहस  देगी। वो चुड़ैल भाभी आ गयी, बड़े भाई की  मौत भी हो गयी और मै उससे महाभारत लड़ रहा हूँ। वो भयानक तंत्र मन्त्र की ज्ञाता , इधर मै अदना सा और अनजान।  लड़ाई में बाहरी व्यक्तियों का साथ और कुटुंब के स्वार्थी सदस्यों का विरोध। यह ही तो है मेरे जीवन का महाभारत युद्ध। तहस नहस तो वो कर ही रही थी।  एक ख़ास बात यह भी थी, वो चुड़ैल भाभी पूरे घर से लड़ जाती थी पहले, परन्तु न जाने क्यों मुझसे शुरू से ही डरती थी, कभी आमने  सामने  भिड़ने  का साहस नही किया औरो की तरह। कभी कभी कहती  थी- इस घर में पीलू जी (मेरे घर  का  नाम   ) ही अच्छे है , साफ़  सुथरे ,बाकी सब गलत लोग। पता नहीं ये युद्ध मुझे ही क्यों  लड़ना  पड़ रहा है।  शायद सिर्फ इसलिए बड़ा होने के कारण मुझपे भार था ?या  फिर पिछले जन्म का कोई कर्म फल ? या फिर ब्रम्हा जी की भैंस मैंने खोल कर चुरा लिया,जिसके कारण  ब्रम्ह देव ने मेरे भाग्य में   लिख मारा था बदलालेने  ! 

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