ऐसा भी होता है -१० (धारावाहित सत्य घटना )-
कर्म प्रधान विश्वकरी राखा ,जो जस करहि तास फल चाखा -तुलसी दास
नवरात्रि के दौरान महाराज बताते थे कि मेरी भाभी इधर उधर प्राण बचाने बहुत दौड़ लगा रही है, परन्तु उसे निराशा हाथ लग रही है। शीतला मंदिर के पुजारी , जो उसका तान्त्रिक गुरु भी था, वहां भी गयी , परन्तु बैरंग लौट आयी। कल हमें भी शीतला मंदिर जाना है। अभी वो बैगा गुनिया (छत्तीसगढ़ के ग्रामीण तांत्रिक ) के यहां चक्कर काट रही है। मुझे याद आया की डौंडी वाले सर भी आये थे तो एक बार शीतला मंदिर जाना पडेगा बोले थे, देवी का आदेश है। हम दोनों वहां गए थे तो देवी माँ से प्रार्थना करते समय करीब 100 -150 ग्राम चावल जो देवी के माथे पर लगा था , सामने रखे परात/थाली में एक साथ गिरा था। यह देख छोटा पुजारी तुरंत बड़े पुजारी के पास भागा था , फिर वापस लौटकर बोला -आपको तो देवी का आशीर्वाद ही मिल गया।
(बड़ा पुजारी ही तो दुष्ट डायन भाभी का तांत्रिक गुरु था ,यह बात मुझे बहुत बाद में पता चला,जिसे डौंडी वाले सर ने और महाराज जी, दोनों ने छुपा लिया था जानबूझकर )
| डायन प्रभा भाभी |
छटवे या सातवे दिन महाराज जी ने अचानक रात्रि को मुझसे कहा देवी कहती है की वह (डायन ) बहुत पापिन और दुष्ट आत्मा है , देवी का आदेश है उसे उड़ा दो,ताकि नवरात्रि के बाद शीघ्र ही उसकी मृत्यु हो जाए ,तुम क्या कहते हो? तो मैंने कहा कि- महाराज जी यदि दुष्ट भाभी पट से मर गयी तो दुनिया को उसके कुकर्मो का कैसे पता चलेगा?लोग तो उसके विधवा होने पर ही सहानुभूति प्रकट कर रहे है। फिर मै भी कैसे जानूंगा की किये हुए कुकर्मो की सजा मिलती है ,अगले जन्म में या मृत्यु के बाद मिलती भी है तो मै कौन सा वहा देख पाउँगा या जान पाउँगा ? फिर उसके तीन बच्चियां भी है , मेरे बड़े भाई की निशानी , उनका एक तरफा बोझ मुझ पर भी आ जायेगा . बाप तो रहा नहीं , माँ भी मर गयी तो अनाथ कहलाएगी , मै चाहता हूँ कि दुष्टा की मृत्यु न हो बस उसकी विद्या ही सम्पूर्ण नष्ट हो जाए तो वह किसी को भी नुकसान न पहुंचा पायेगी भविष्य में।
( दुनिया भावनाओ से नहीं चलती ,भगवान ने मुझे बाद में सबक सिखाया ,मेरे मन में मोह माया बचा था , इस दया भाव का खामियाजा मुझे बाद में भुगतना पड़ा। मेरे इस जिद के बाद महाराज जी ने देवी से प्रार्थना की और मर्डर कैन्सिल हो गया। एक भय भी था मेरे मन में ,यदि दुष्टा की मृत्यु नवरात्रि के बाद तुरंत हो गयी तो सारे नासमझ लोग मुझे व महाराज जी को दोष देंगे ,बदनामी करेंगे , ईश्वरीय न्याय को ये नालायक क्या समझेंगे। )
अष्टमी के रोज हवन हुआ ,रात्रि में महाराज जी ने कहा- मांग लो देवी से क्या माँगना चाहते हो ! इस पर मैंने देवी से प्रार्थना की- हे माता मै चाहता हूँ कि दुष्टा पट से न मरे ,बल्कि सड़ सड़ के मरे. घुल घुल के मरे ,तड़फ तड़फ कर मरे , मेरा ये घोर श्राप उसे लगे. मै भी देखू कि दुष्टता का फल वास्तव में मिलता है भी या नहीं। कांकेर के लोग , खासकर मेरे समाज के लोग देखे की कर्मो का फल कैसे मिलता है। मुझे भी पाप-पुण्य के सिद्धांत पर विश्वास हो जाए . फिर मेरी पत्नी आई, वह भी माता से बुदबुदा कर मांगी। मैंने क्या माँगा ,और पत्नी ने क्या माँगा ,किसी को पता नहीं। मेरी मांग पत्नी को भी पता नहीं। पर महाराज जी जान गए। इधर पत्नी से जब मैंने पूछा तुमने क्या माँगा , फिर मैंने बताया उसे कि मैंने क्या माँगा। हम दोनों ने एक ही बात कही थी लगभग। आधे घंटे बाद हमने देखा की भाभी तुरंत बीमार पड़ गयी , हम लोग यह देखकर प्रसन्न हुए , उसके कमरे की तरफ ताक झाँक भी करने लगे। हमको खुसुर पुसुर देख महाराज जी ने ही पूछा की क्या बात है। हमने टालने की कोशिस की , पर महाराज जी जान गए। उन्होंने देवी की तस्वीर की तरफ देखकर कुछ कहा, कुछ ही मिनटों में दुष्टा वापस ठीक हो गयी यह देख मैंने महाराज जी से पूछा आपने क्या किया या कहा , तो उन्होंने टाल दिया। (कई दिनों बाद महाराज जी ने बताया देवी से कहा कि उनके जाने के बाद ही कुछ करना , उन्हें (महाराज जी ) के सुरक्षित जाने के बाद ही, कोई बखेडा खड़ा होने देना, और देवी जी मान गयी )
नवरात्री बीत गयी पर उस दुष्टा को कुछ न हुआ,यह देखकर उसका साहस बढ़ गया। [दुष्टा को समय देना मुझे बेहद मँहगा पड़ा]।
इसी बीच नगर पालिका का चुनावी समय आया। हमारे मोहल्ले की सीट महिलावर्ग के लिए आरक्षित हो गयी। मेरी पत्नी को टिकट देने राजनीतिक पार्टियों में सुगबुहाहट होने लगी, इसी डायन भाभी बीच में कूद पड़ी ,मैंने महाराज जी से पूछा तो वे बोले शायद देवी तुम्हे यश देना चाहती हो इसलिए ये सब चक्कर चल रहा है। मैंने उन पर अंधविश्वास करके रूचि लेना शुरू किया। दिसंबर में चुनाव हुए ,इसी बीच प्रचार के दौरान काफी कड़वे घूँट पड़े ,हमारे एक मुंह बोले काकाजी, जो किसी के घर में आग लगी हो तो घी डालने वाला काम करते थे , कथित काकाजी की करतूत खुलकर सामने आयी , दुष्ट भाभी ,घर के सब लोग मेरी पत्नी के विरुद्ध विष वमन और विरोध में प्रचार करने लगे। हार तो होनी थी सो हुई। इस हार से ज्यादा अपमान और पीड़ा से हम आहत हो गए .एक दो महीने 'अच्छे दिन आएंगे' की आस में और कटे , मकर संक्रांति के बाद अच्छे दिन आएंगे ऐसा बताया गया। परन्तु ऐसा हुआ नहीं। मुझे संक्रान्ति के पहले संदेह होने लगा, मैंने जाँच करवाई तो पाया की दुष्टा की पूरी "सेना" का नाश हो चुका था, परन्तु "सेनापति" यानी कमांडर अभी वही था, उसका निष्कासन नहीं हुआ था। मैंने फिर दौड़ लगाई और एक दूसरे महाराज के पास पहुंचा , इनका नाम भीखम महाराज था ,इस महाराज ने एक जड़ी की आवश्यकता बताई , मैंने कहा जड़ी कैसे प्राप्त की जाए मै तो जानता नहीं , परन्तु उन्हें आवश्यक रुपये दे दिए ताकि वे मंगवा सके। इस भीखम महाराज ने कमांडर यानी सेनापति बारे में जो कुछ बताया वह सही था। जड़ी के साथ महाराज ने घर आकर कुछ प्रयोग किया,उस समय दुष्टा व अन्य घर पर नहीं थे। वह चला गया, बंधन भी वह कर गया, घर हल्का लगने लगा। उसके जाने के थोड़ी देर में डायन भाभी घर पर आ गयी। थोड़ी देर में उसे सब आभास हो गया ,मै आँगन में खड़ा था अकेला , सोंच विचार में डूबा। घर पर अन्य लोग नहीं थे , एकांत देख डायन अपने दरवाजे पर खड़ी होकर बोली-पिल्लू जी (मेरा घर का नाम) बहुत नीच है , एक बार पीछे पड़ जाते है तो बस पीछा नहीं छोड़ते, चैन से जीने भी नहीं देते। उसकी बात सुन मै आश्चर्य चकित रह गया, कि ये ऐसा खाम:खाह क्यों कह रही है। फिर समझ में आया, नए महाराज का कार्य असरदायक होगा, इसे पता चल गया कि मैंने क्या करवाया। दूसरे दिन मै भीखम महाराज से मिला तो वह बोलने की बजाय मुंह चुराने लगे , इससे मुझे पता चल गया की उसका प्रयोग शायद बाद में असफल हो गया।
अब मैंने अपने एक गहरे मित्र अजय मिश्र से पत्र व्यवहार किया ,उसे अपने संघर्ष के बारे में बताया। उसने मुझे घर छोड़ने की सलाह दी, नौकरी करने भी कहा ,मेरी पत्नी की भी यही जिद थी। और अजय ने मुझे रायपुर बुलाकर एक रक्षाकारी मन्त्र दिया। ये मन्त्र आत्मरक्षा व शत्रु दंड देने के भी काम आता था। अजय स्वयँ एक साधक है। अगले दस दिनों मैंने जीवन में प्रथम बार मन्त्र साधना की, पहली मन्त्र साधना थी। भाभी को मेरी साधना का शायद पता चल गया था, पर विघ्न नहीं डाल सकी। (पर बाद में मुझसे डरने लगी ,सामने खड़ी भी नहीं होती थी ,शायद वह इस मन्त्र का प्रभाव था ) इधर अघोरी बाबा का दिया रुद्राक्ष भी मेरे गले में था। मकर संक्रांति तक मैंने जप कर मन्त्र को सिद्ध किया। मुझसे 'मन्त्र' सिद्ध हुआ था, ये बहुत अरसे बाद मुझे समझ में आया। परन्तु फिर भी मैंने मकर संक्रांति तक इंतज़ार करने की ठानी। इस बीच महाराज जी के पास भी कई चक्कर लग गए। पर बात गोलमाल सी रही। कोई स्पष्ट जवाब नहीं। बस 'होगा -होगा' का आश्वासन। इधर सब उल्टा सुल्टा हो रहा था।
अंतत: घोर निराशा से भरकर कांकेर ही छोड़ने का निर्णय हमने लिया। पत्नी के कहने पर मार्च 1995 में नौकरी की तलाश में रायपुर आया, मेरे परम मित्र श्री अजय मिश्रा ने रहने व ठहरने की व्यवस्था की,एक -दो दिन में नौकरी मिल गयी। मै वापस कांकेर चला गया। 1995 अप्रैल में मैंने अभनपुर आकर नौकरी ज्वाइन कर ली . मई '95 में बच्चो की परीक्षा के बाद पत्नी व बच्चो को भी अभनपुर ले आया।
परन्तु लाने के पहले, जब मई तक इन्हे घर पर ही छोड़ आया था तब उस डायन भाभी ने पेट में दर्द करने का प्रयोग पत्नी पर कर दिया था। अभनपुर लाया तब भी कभी-कभी पेट में भीषण दर्द हो जाया करता था। दर्द से तड़फ़ने लगती। सदा की भांति , औरो की तरह मैंने डाक्टरों को दिखाया , दवाइयाँ असफल हुई। एलोपैथी ,आयुर्वेदिक सभी असफलता बार बार। अल्सर की आशंका से बेरियम एक्सरे कराया , परन्तु कुछ भी न मिला। डाक्टर कभी एसिडिटी बताते,कभी अल्सर की शंका करते। परन्तु बेरियम एक्सरे के बाद वे भी चुप हो गए। आखिर पुराने अनुभव से एक झाड़फूँक करने वाले बैगा की तलाश की। उसने तंत्र प्रयोग की पुष्टि की , फिर उतारने हेतु प्रयोग किया। मैंने कई दिनो तक निरिक्षण किया, परन्तु दर्द नहीं हुआ , तब दुष्ट भाभी की करतूत समझ में आयी।
| डौंडी सर-श्री मंशाराम जी शर्मा |
| रवेली वाले महाराज-बृजमोहन प्रसाद जी दुबे |
| कपटी भाई अभय बाफना ,कांकेर |
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