2 जून 2014

लग गया तो तीर नहीं तो तुक्का ?

लग गया तो तीर नहीं तो तुक्का ?

जगह जगह विभिन्न प्रकार के बाबाओं और ज्योतिषियों के बारे में सुनता आया , कभी कभी तो देवताओं /देवियों के आने के बारे में सुनता आया.जीवन में ऐसे स्थानो की परीक्षा किया और सत्य खोजने का प्रयास भी किया. अनेक मैंने सत्य पाया तो स्थानो पर फ्राड ! पाठको के सामान्य ज्ञान के लिए ऐसे अनेक स्थानो की परीक्षा परिणाम बतलाना चाहूँगा ताकि धोखा धडी से  सके.
१-देवी की परीक्षा -
तेली बाॅधा के आगे एक गांव के बारे में पता लगा की वहां  देवी आती है , यादव परिवार है। तो परीक्षा करने पहुँच गया। नियत समय पर एक महिला ने सजना शुरू किया और फिर गहने लाल साड़ी पहन कर जीभ निकाल कर काली माई आने का नाटक करने लगी। लोगों को गोलमाल बातें  बोल कर बरगलाने लगी।  मै निश्चित होकर सब देखते रहा। फिर धीरे से अपने पति को बोली -आज जो नया आदमी(यानी मैं ) आया है न , उसे बुलाओ। उसने मुझे इशारा किया तो मै  सामने गया।  फिर पूछा -भड़गाँव में जो बोली थी वो क्या था और क्यों  हुआ ? यह सुनकर  अकचका गयी , क्या बोली थी?मैंने कहा था ? मैंने कहा -हाँ। काली माई आकर  बोली थी , तिस पर उसने जवाब दिया -मैंने कहा था ?काली कई प्रकार की होती है ,काली महाकाली भद्रकाली आदि , मैंने जवाब दिया -मैंने सप्तशती पढ़ा है एक ही काली होती है , चाहे भड़गाँव हो या रायपुर। अब तो वह बगले झाकने लगी , मैंने जान लिया की यह फ्राड है , फिर भी अपमान न हो, लोगों की भावनाओं को ठेस न लगे, इसलिए बगैर दुतकारे चला आया।
२- बाबाजी की परीक्षा :-
दुर्ग के एक बाबाजी के  भक्त हैं, मराठी है,नाम नहीं दे रहा हूं , बहस से बचने। एक बार मित्र को लेकर  गया ,  एक  समस्या के बारे में पूछा -तो टालने लगे -अगले हप्ते आना। फिर मैंने अपने बारे में पूछा तो वही गोलमाल जवाब। एक बार मेरी बिटिया गयी तो उन्होंने बताया कि इंजिग के क्षेत्र में जाओगी,मेरी बिटिया ने  जवाब दिया -मै  तो कामर्स स्टूडेंट हूं फिर इंजिनियरिंग में कैसे जाऊगी ? वो वे बगले झाँकने लगे.इसी प्रकार  मौका लगने पर मैंने पूछा-मेरी नौकरी कब लगेगी-जवाब मिला -14 तारीख को पूर्णिमा है तब तक लग जावेगी। हाल में ही मैंने पुरानी नौकरी छोड़ी थी और बेरोजगार था, 14 मई 2014  के बाद 22/5 /2014 तक इंतज़ार किया । जो गलत निकला। बाबाजी के असंख्य भक्त है जिसमे  धर्म बहन भी है।  
(टीप- मेरी बिटिया पढ़ाई पूरी करने के बाद टीवी सीरियलों में असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में काम करने लगी है)

परिणाम बताते है -    "लग गया तो तीर नहीं तो तुक्का"।

ऐसा भी होता है -१ (धारावाहिक सत्य घटना )

ऐसा भी होता है !(१)- (धारावाहिक सत्य घटना )
मनुष्य भी बड़ा अद्भुत है ,जब तक जीवन स्वयं की मर्जी से  चल रहा है और हर ईच्छा पूरी हो रही है, तब तक वह बड़ी२   बाते करेगा . हिम्मत,दृढ़ विश्वास  और लगन की डींग  बघारता फिरेगा , लेकिन जैसे ही प्रतिकूल परिस्थितियाँ आयी  नहीं कि  वह हिम्मत हार जाता है। (वैसे मुसीबत में बजरंगबली भी दुम दबाकर भाग खड़े होते है , देवता भी कूच कर जाते हैं ). कुछ दिन पहले जिस व्यक्ति तो ज़िंदादिल कहते थे  मुरझाये फूल की तरह लगाने लगता है ,मानो उसके जीवन से खुशबू और सौन्दर्यबोध चला गया हो। पर  ऐसा क्या हो जाता है  क्या वह प्रतिकूल परिस्थितियों में भी  लक्ष्य को साधे रखना भूल जाता है ? हमारे सामने हेनरी फोर्ड जैसे कई उदाहरण है जिसने अपनी सूझ बूझ से फोर्ड कंपनी को दुनिया की एक नंबर कार निर्माण की कंपनी बना दिया. आप भी मुश्किल परिस्थितियों से निपट है-बस हिम्मत रखिये ( कभी किसी को मुसीबत से जूझते देख हंसी न उड़ाइए ,कहीं आपको भी वैसी परिस्थितियों का सामना न करना पड़े ).
                               जनवरी 1992 में मै अपनी रेडीमेड कपड़े  की दूकान के लिए रायपुर गया। एक ज्योतिषी ( भृगु ज्योतिष  )पास भी यूँ ही चला गया।यह ज्योतिषी असाधारण  किस्म का था। तंत्र सिद्धि भी प्राप्त था  पर  इसका आभास  नहीं था।  उसने कहा -"दो महीने के बाद तुम  दूकान में नहीं बैठ पाओगे , इधर उधर भटकोगे , न खाने का ठिकाना रहेगा न  पीने का"। मैंने सोचा बकवास ,इस साल मेरे पास  नकद पूंजी  भी है ,  धंधे में कुछ नाम भी कमा चुका , इस वर्ष पैसा अच्छा कमाऊँगा। परन्तु 3  मार्च 1992 को (लगभग दो महीने बाद) बड़े भाई की मृत्यु हो गयी ,भारी  मुसीबते आयी। उनके द्वारा  छोड़े गए ठेके पर सरकारी दायित्व आ रहा था। परिस्थितिवश छोटे भाई का भी सहयोग लिया ,उसका नया क्रशर (गिट्टी मशीन ) बेकार हो सकता  थी ,मैंने त्याग किया , सम्पूर्ण परिवार की भलाई के लिए ,चलती दूकान में ताला लगाकर दिन रात मेहनत की। ठीक उसी प्रकार -पहाड़ी क्षेत्र में भटका ,तख्तो पर सोया,इधर उधर भटका,न खाने का ठिकाना,न पीने का ठिकाना। बड़े भाई की मृत्यु पर शंकर भगवान को भी बुरा भला कहा कि 2 मार्च को शिव रात्रि थी ,मै आपके पास पहाड़ मेले में  आया था,तत्काल दूसरे दिन भाई की मृत्यु हो और दूकान बंद हो गयी ! (शिवरात्रि को ही 4 वर्ष पहले मेरी दुकान प्रारम्भ हुई थी , पर 4 वर्ष से लगातार घाटा ही झेलता रहा। ) तेरे पास आने का क्या फ़ायदा ? कभी शिव  मंदिर का सामना हो जाता तो यह कहता -देख  फूल चढ़ा रहा हूँ,अगरबत्ती भी ,पर मांगूगा कुछ नहीं क्योकि तुम हमेशा उलटा  हो। तुमसे मांगना भी खतरनाक है। गर्भवती पत्नी की भी देखभाल नहीं कर पाया और उसे छोडकर कार्य के सिलसिले में जंगल में पड़ा रहा. ईधर माँ-बाप और भाभी (विधवा ) तथा बहू (छोटे भाई की पत्नी )ने भी कोई देखभाल नहीं की।
       दो वर्ष बीत गए ,फ़रवरी 1994 में मै यूँ ही चारामा गया था , घूमते  घामते ,पता लगा रवेली वाले(गरियाबंद ) महाराज आये हुए है,उनके कुछ किस्से मैंने सुन रखे थे,अत: जिज्ञासा हुई एक बार  मिल लिया जाए. परन्तु  उस दिन न मिल  पाया। खैर दूसरे दिन मिल लूंगा  सोंचकर टाल दिया।  दूसरे दिन आया ,महाराज  मिला। महाराज  पूछा - समस्या है? मैंने कहा -समस्या ही समस्या है ,आर्थिक मानसिक शारीरिक सभी तो है घर पर, एक बार घर दिखा देना चाहता हूँ ,मैंने सुना है आप देखते हैं ,घर की दिशा वगैरह की कोई गड़बड़ी तो नहीं , बस शंका निवारण करना चाहता हूं। उन्होंने कहा-घर से कुछ लाये हो ,नींबू चावल वगैरह ?घर वालों ने कुछ भेजा है? मैंने कहा नहीं,अभी बाज़ार से नींबू ला देता हूँ। उन्होंने कहा वस्तु उसी क्षेत्र से आनी चाहिए। मेरे नींबू लेकर आने पर उन्होंने कहा-अभी नींबू फूंक कर देता हूँ ,घर जाकर पूजा स्थल पर रख देना मैंने स्वीकार कर लिया और दूसरे दिन आकर  घर चलने कहा जो उन्होंने स्वीकार कर लिया।
          सुनने में पहले कभी नहीं आया , कहीं कुछ रहस्यमय  नहीं?कई बार चर्चा होती है घर ठीक नहीं ,जैन मंदिर के ठीक सामने घर है ,जैन भगवान की दृष्टि घर पर पड़ती है,जो ठीक नहीं माना जाता ,इतने वर्षो से मेहनत कर रहे है,परन्तु सुख समृद्धि आती ही नहीं ,उल्टा घर में मन-मुटाव ,तंगी,कलह परेशानियां होती रहती है। जब पुराना घर था तो मामाजी के साथी ,गुरु,व महाप्रसाद श्री जगमोहन सिंह जी (ये भीऔघड़ सिद्ध थे )घर पर आये थे और उन्होंने कुलदेवी को रुष्ट बताया था ,नियमित दिया न जलाने की वजह से.(मामाजी सिद्ध औघड़ तांत्रिक थे) ,अत: किसी रहस्यमयी गड़बड़ी की आशंका  धर गयी। सोंचा विश्वास  करूँ या  करूँ परन्तु लापरवाही न करूँ , इस दिशा में भी छानबीन कर लूँ,शंका निवारणार्थ। (क्रमश:)