15 अप्रैल 2022

चटिया मटिया(बाल प्रेत)होते ही है

छत्तीसगढ़ में बाल प्रेतों को पालने की बाते बचपन से सुनता आ रहा हूं पर देखने कभी नही मिला।बचपन में एक जैन परिवार के यहां जाता करता था तो उनके घर के अंदर की बाड़ी या बड़ा आंगन में एक कोने पर जाने से मना किया जाता था कि उधर मत जाना उधर देवता रहता है।दरअसल मटिया/चटिया पाला हुआ था।
छत्तीसगढ़ में ग्रामीण भूत प्रेत पाल लेते है  और उसे देवता कहकर पुकारते है। इन बाल प्रेतों से धान आदि चोरी करवाने का काम अक्सर करवाया करते है।इसीलिए किसान लोग धान या काटी गई फसल के ढेर के चारो तरफ गोबर घोल कर छिड़कते है ताकि कोई चटिया मटिया चुरा न सके।
मेरे गांव के खेत के खलिहान में भी गोबर पानी छिड़कते देखा करता था और दादाजी से पूछता था तो बताते थे कि इससे कोई देवता धान नही चुरा पाएगा।
चटिया मटिया कांवर लेकर जाया करते है और छोटे से कांवर में सैकड़ों किलो अनाज धान आदि उठाकर ले आते है
पास के एक छोटे शहर  चारामा में एक मेडिकल स्टोर वाला परेशान था कि उसकी अलमारी में बंद संभाल कर रखे हुए पैसे नोट वगैरह भी गायब हो जाते थे।जमा धन नकदी के गायब होने से चिंता में रहता था।क्योंकि न अलमारी खुली न चाबी किसी और को दिया न तोड़ा गया फिर भी गायब।
फिर रवेली वाले महाराज ने घर बंधन किया तब जाकर ये सिलसिला रुका।पता चला us mohalle के एक घर में मटिया नमक बाल प्रेत पाला हुआ है वही रात को आकर पैसे चुरा ले जाता है।मुझे पता चला तो मैं सीधे मेडिकल स्टोर वाले से पूछा तो उसने भी सत्य होने की बात स्वीकारी।
खैर एक सोने चांदी का धंधा करने वाले व्यापारी के यहां डौंडी वाले सर और मैं गए थे हमारे ही मोहल्ले में तो जांच करने के बाद डौंडी वाले सर बताए की इसके यहां चटिया/मटिया यानी बाल प्रेत आता है पीछे वाले घर में पाला गया है वही आकर इसे कंगाल कर रहा है।मैं जानता था कि इस व्यापारी की माली हालत आजकल बहुत खराब चल रही है।पीछे वाले घर को भी जानता था क्योंकि पीछे वाला घर मेरे ही एक गुरुजी का था जिन्होंने पहली क्लास का ट्यूशन पढ़ाया था मुझे।और गुरुजी का पुत्र मेरा मित्र भी था ।उनके यहां मैं खेलने भी जाया करता था।उनकी बाड़ी में एक स्थान छोटा सा कोने में बना था जिधर जाने को हमे मना किया जाता था कि उधर देवता रहता है मत जाना। मै उत्सुकता से us स्थान को दूर से देखता था। खैर डौंडी वाले सर ने अपना प्रयोग किया और आटे में उसे कैद किया।काले रंग के ब्रश के रेशों का गुच्छा जैसा।फिर उसे जलाकर नष्ट किया और बाल्टी में लेजाकर निर्देशा नुसार पास की नदी में गड्ढा खोदकर गड़ा दिया।
दूसरे दिन गुरु माता यानी मेरे मित्र की माता मोहल्ले में कहीं दूर जाने निकली फिर वापस आते हुए मेरे ही घर पहुंच गई और मिलने का बहाना कर बैठ गई।मेरी मां ने आने का कारण पूछा तो उसने जवाब दिया कि मन्नी (मेरी बड़ी बहन का घर का नाम)आई है या नहीं यह जानने आई हूं ताकि मिल सकूं।वह बार बार मुझे देखती थी।शायद उसे पता चल गया था कि दौंडी वाले सर को us व्यापारी के यहां मैं ही लेकर गया था और मटिया को मैं ही गड़ा कर आया था जलाने के बाद।उसके फिजूल का  बहाना बनाकर मेरे घर आने का प्रयोजन मैं समझ चुका था।यही प्रमाण भी था की कुछ न कुछ प्रभाव पड़ा है इस गुरु माता पर।इसीलिए मुझे बार२ देखती थी

27 अगस्त 2021

उसका अभिशप्त घर ठीक हो गया

 काल शुरू होने के पहले 2019 में मुझे बार 2  प्रेरणा होती थी कि कोंडागांव जाकर अपने पुराने परिचितों से मुलाकात करूँ। छुट्टी लेने की जरूरत भी नही, घूमना हो जाएगा।सो रविवार को सबेरे2 तैयार होकर बस द्वारा रवाना हो गया।वहां अपने कई पुराने परिचितों से मिला फिर आपने प्रिय मित्र से मिला।मैं सोंच रहा था अब तक उसका व्यवसाय बहुत बढ़ गया होगा पर उसकी दुकान की जगह आलू प्याज की दुकान दिखी मैं चौंक गया।फिर पास ही उसके घर गया वह आंगन में ही खड़ा था मुझे देखते ही पहचान भी गया।गले मिलने के बाद वह रुवांसा होकर बोला मैं अकेला रह गया हूँ मेरा साथ मत छोड़ना।उसके पिताजी और बड़े भाई परलोक सिधार चुके थे ।उसकी भी शादी हो चुकी थी और बच्चे भी बड़े हो चुके थे काम धंधे में लगे हुए थे। गरीबी का कष्ट जारी था। दुकान बिक गया था परिस्थितिवश। उसका पतन हो चुका था बहुत कष्ट में चल रहा था।उसकी मम्मी जिंदा थी पर मेरा मित्र  उससे लड़ता रहता था और अपनी मम्मी को(चाची जी को) रुलाता रहता था।(मित्र खुद भी भूत ग्रस्त था)
 वहां  बैठे आभास हुआ कि इसके पतन का कारण घर का अभिशप्त होना है। मैने कहा तेरी उन्नति हो गयी होगी सोंच कर आया पर तेरा तो बुरी तरह पतन हो गया है शायद तेरा घर अशुभ हो गया है। कोई पूजा पाठ वगैरह करवाये कर।उसकी धर्म पत्नी ने ने कहा  यहां के ब्राम्हणो को कुछ नही आता आप ही कुछ  कर दो या करवा दो। उसी समय प्रेरणावश मैं कह बैठा ठीक है अगले रविवार को मैं आता हूँ और कुछ करता हूँ। उनकी कुलदेवी की जानकारी ली फोटो वगैरह भी देखी।
अगले रविवार कुछ पूजन सामग्री  लेकर फिर कोंडागांव चला गया।चाची से पूछ ताछ करने पर ज्ञात हुआ कि रात्रि में उन्हें एक काली छाया अक्सर दिखती है जो  घर बेचकर कहीं और जाकर रहने को कहती है।
मैंने  कुछ और सामग्री किराना दुकान से मंगवाया।एक लोहे का पात्र/घमेला लेकर हवन की तैयारी की।फिर भाभी जी को लेकर उनकी कुलदेवी की पूजा की उनको भी पूजा सिखाया। फिर हवन में बैठ गया।मित्र और उसकी धर्म पत्नी दोनों को बैठाया और चंडी पत्रिका की एक हवन नामावली का उपयोग किया। बाद में राख आदि ठंडा करने का निर्देश देकर वापस आ गया।
मेरा मित्र भी बाहरी हवा(भूत बाधा )से पीड़ित था उस समय तक ,जो मै उस समय तक भांप नही पाया था जिसके वजह से वह अपनी मम्मी से अकारण लड़ता था और टेढ़े मुंह से बोलता था अस्पष्ट जो मैं समझ नही पाता था। मैंने कह दिया था आगे जो भी जरूरत पड़ेगी मुझे आने की जरूरत नही पड़ेगी वहीं रायपुर से बैठकर कर दूंगा। 3 महीने बाद मित्र के शरीर से ग्रहबाधा रोग दोष निवारण के लिए अपने स्थान से ही पूजा कर दिया।अगले 2-3 महीने में वह पूरी तरह ठीक जो गया।इसका घर सुधर गया उन्नति भी शुरू हो गयी।बीच2 मे फोन कर बताते भी रहे।परिणाम देखकर मैं भी प्रसन्न हुआ।डेढ़ साल बाद वह मुझसे मिलने सपरिवार कार लेकर आया तो स्वस्थ और मोटा भी हो गया था।बोलने में एक़दम स्पष्ट बोलता था चेहरा भी खिला हुआ था।घर मे आर्थिक उन्नति लगातार हो रही थी।सब कुछ अच्छा हो रहा था।उसके घर मे घुसा जिन्न भाग चुका था शरीर मे घुसा प्रेत भी भाग गया था। काली छाया दुबारा कभी दिखाई भी नही दी थी । सब ईश्वर की कृपा से हुआ था।मुझे कोंडागांव भी देवी ने ही तीव्र प्रेरणा देकर भेजा था मेरे हाथों ये कार्य सपन्न करवाना था ये मुझे देर सबेर समझ मे आ गया था

28 मई 2021

कुछ पारलौकिक घटनाएं

पारलौकिक घटनाएं अन्य लोगो के साथ भी घटती है कुछ घटनाएं जो दूसरों के साथ घटी वह प्रस्तुत करता हूँ।
उसकी माँ प्रेतनी थी !
शाम को टहलने जाता हूँ तो एक टेलर मास्टर से मुलाकात हुई।
एक बार उसके पास एक ग्राहक युवक आया।बातों2 में उंस युवक ने बताया कि उसकी मां प्रेतनी थी।यह सुनकर टेलर भौंचक्का रहा गया पूरी बात उंसने पूछी तो युवक ने बताया कि उसके पिताजी ने एक भूतनी/प्रेतनी को वश में कर पत्नी के रूप में रख लिया था। जीवित महिला की तरह वह रहती थी। यह बात गुप्त  रहती थी।यानी वह युवक उसी की संतान है।जब युवक की शादी हुई तो विवाह बाद वह प्रेतनी जिद करने लगी कि मेरी साड़ी मुझे दे दो। पर उसके पिता नही मान रहे थे।तब मेहमानों ने जो जो सच से अनजान थे उसके।पिता को समझाया कि खुशी का मौका है उसे एक साड़ी क्यो नही दे देते?
इस वर्कर दबाव में आने के बाद उसके पिता जी ने वह काली साड़ी जो बांस के खोखले में छुपा रखी थी निकाल कर दे दी। वह साड़ी पहनकर नाचने लगी खुशी से।नाचते2 थोड़ी दूर जाकर अदृश्य हो गयी फिर वापस कभी नही आई।
एक इसी तरह को घटना और किसी से सुना था
एक ग्रामीण तांत्रिक ने एक भूतनी को वश में कर पत्नी बनाकर रख लिया था।भूतनी/प्रेतनी की शक्ति उसकी साड़ी में रहती है अतः उसकी साड़ी एक माचिस की डिबिया में छुपाकर रख लिया था।सालो बाद जब उसने माचिस की डिबिया से साड़ी निकालकर उसे दिया तो वह उसे लेकर गायब हो गयी और पकड़ से मुक्त हो गयी
जब रेजा का कार्य प्रेतनी ने किया।
एक मिस्त्री तेलीबांधा  रायौर इलाके में कार्य कर रहा था।उसे रेजा की जरूरत महसूस हुई।उंसने अपने सहायक को कहा जा भाई एक रेजा(महिला कुली) लेजर आ ।सहायक गया और मावली माता मंदिर के पास जाकर देखा तो सिर्फ एक रेजा मंदिर के पास बैठी हुई थी बाकी सब काम मे जा चुकी थी।उंसने पूछा काम मे जाओगी क्या तो उसने कहा हाँ। और साइकिल में पीछे बैठकर चली गयी।उसे लैंटर्न की लकड़ी निकालने का काम सौंपा गया।वह तेजी से करने लगी।तो सहायक ने कहा इतनी जल्दी2 करने  की क्या जरूरत है? रोजी में आई हो शाम तक समय है धीरे करो टाइम पास करते हुए फिर बाद में लकड़ियां उठाकर एक जगह रख देना।तो रेजा ने जवाब दिया मै जहां भी काम करती हूं ऎसे ही फटाफट करती हूं।उंसने देखते ही देखते सारी लकड़ियां खोल दी और रख दी।उसका काम देख मिस्त्री भी प्रसन्न हुआ और कल भी आने को कह दिया उंसने स्वीकृति दी। फिर सहायक उसे वापस छोड़ने मावली माता के मंदिर की ओर गया।वहां पास के तालाब की ओर देखते रेजा ने कहा गर्मी बहुत लग रही है कि जरा नहा लेती हूं कहकर वह तालाब में कूद गई।बड़ी देर तक वह वापस नही निकली तो सहायक चिंता करते हुए कपडे उतारकर तालाब में उतरा और उस स्थान पर पहुंच जहां वह कूदी थी।पर कोई नही मिला काफी खोजने के बाद वह बाहर निकला। फिर घबरा गया कि वह रेजा मनुष्य नही थी भूतनी थी जो अदृश्य हो गयी। उसकी रोजी भी नही दे पाए थे।दूसरे दिन फिर काटी स्थल पर न उसके न आने पर सहायक फिर रेजा मिलने के स्थान मावली माता मंदिर के पास पहुंचा तो वहां भी नही थी।जबकि रोजी भगतां बाकी था और दुबारा काम और नही आयी।तब समझ मे आ ही गया कि वह भूतनी थी टाइम पास करने उस रूप में आई थी
मैंने शायद जिन्न को देखा था!
ये घटना कांकेर शहर में मेरे ही जीवन की थी तब मैं उदं समझ नही पाया था अब समझ मे आ गया। कालेज ग्रेजुएशन कर रहे थे तब परीक्षा तैयारी करते हुए हम।तीनों दोस्तो के मन मे फितूर/झक आया कि रात को पढ़ते है चलो भूत देखने निकलते है।सो रोज रात 12 बजे से 3 बजे के बीच अलग2 समय मे सड़को पर घूमने निकलते थे कि अस्पताल के पास पोस्टमार्टम केबिन के पास कोई भूत दिख जाए।पर रोज असफल साबित हुए थे।एक रात 3 बजे हम तीनों दोस्त निकले कुछ नही दिखा तो वापस आ गए।एक दोस्त तो रास्ते मे घर होने के कारण चला गया।दूसरे को छोड़ने मैं उसके घर तक गया। वहां उसके घर के पास बालाजी मन्दिर के सामने वाले हिस्से में कुछ देर दोंनो गपशप करते बैठे रहे।इसी बीच मेरे मित्र ने कोहनी मार कर मुझे इशारा किया।सड़क के उस पार एक मुस्लिम का मकान था जिसे प्रथम मंजिल की बालकनी में एक औरत लगातार हमे देखे जा रही थी।सफेद रंग सफेद ही कपड़ा ओढ़े पूरा शरीर ढके हुए।आंखे बिल्लौरी पत्थर की तरह या चमकीले कांच की तरह चमकते हुए।मैन दोस्त से कहा क्या खास बात है इसमें।कोई महिला बाथरूम जाने उठी होगी और इतनी रात गए कौन है ये लोग सोंचकर हमे देख रही होगी।मित्र ने कहा वो हमें लगातार देखी जा रही है।मैंने  मैने भी ध्यान दिया बिना पलक झपकाए वो देख रही थी।तो मैंने भी उसकी आंख से आंख मिलाकर उसे लगातार देखना शुरू कर दिया।इससे उस महिला ने कुछ ही क्षणों के बाद सिर घुमाकर अपने बांयी ओर सिर घुमाया पुनः मुझसे आंख मिलाकर देखने लगी।अब मैं हड़बड़ा गया और नजर घुमा ली।फिर उठकर मित्र को पास ही स्थित घर पहुंचाने चला गया। वापस डरते हनुमान जी का नमा बुदबुदाते आया तो वह औरत जा चुकी थी।फिर मैं घर पहुच गया।आज जब सोंचता हूँ आगे इस विषय का ज्ञान लेने के बाद तो बिल्लौरी चमक वाली आंखे पूरी तरह सफेद चेहरा हाथ आदि(,स्ट्रीटट्यूब लाइट की रोशनी में) तो लगता है मैंने जिनी यानी मादा जिन्न को देखा था उस रात साक्षात।

26 जुलाई 2020

पूर्व जन्म की कुछ यादें

वैसे तो अनेक व्यक्तियों को पूर्व जन्म की कुछ स्मृतियां रह जाती है क्योकि ये अचेतन मन मे रिकार्ड रहती है जो कि आत्मा का ही हिस्सा रहता है। योगी लोग चेतन मन को सुप्त कर अचेतन मन तक पहुंच बनाकर जन्म जन्मांतर को जान जाते है यही ज्ञान उन्हें ज्ञानी और सिद्ध बना देती है। पर आम व्यक्ति इन यादों का अर्थ समझ ही नही पाता इसलिए मतलब जान नही पाता।
मेरी कुछ स्मृतियां लिख रहा हूँ जो पहले समझ नही पाता था पर परामनोवैज्ञानिक अध्ययन प्रयोग आदि के द्वारा समझ मे आया ये सब क्या है।
पिछले जन्म के अंतिम समय मे उस जन्म के किये गए अच्छे बुरे कार्य याद आई लगे मानो कोई कह रहा हो इसे देखो और याद करो।कुछ बुरे कर्म याद आये छोटे मोटे अच्छे कर्म भी। उसने कहा कोई खास उपलब्धि नही है ज्यादा बुरे भी नही। उसके बाद होश खो बैठा शायद मृत्यु हो गयी। फिर हल्का सा शरीर वायु जैसा और इच्छानुसार उड़ता हुआ पाया साथ मे एक और आत्मा भी थी साथी के रूप में मार्गदर्शक के रूप में। तभी मैंने एक वृक्ष के पास गड़ा धन सोना चांदी देखा तो लालच में आ गया कि देखो धन, इसे कब्जे में ले लेते है। साथी आत्मा ने समझाया लोभ और मोह में मत पड़ो ये हमारे किस काम के। और मोह में फंसे तो मुक्ति नही मिलेगी जबकि हमे मुक्ति चाहिए। नही तो इसी तरह रह जाएंगे । मैने कहा ठीक कहते हो हमे मोह लालच  में नही पड़ना चाहिए नही तो ऐसे ही फंसे रह जाएंगे। 
फिर मैंने कहा लोग कहते है भूत प्रेतों की।दुनिया यानी मृत्यु के बाद आत्माओं की दुनिया नही होती जबकि हम लोग तोमौत के बाद भी है। चलो लोगो को बताए कि इस लोक का अस्तित्व भी है। मित्र/साथी आत्मा ने समझाया मत करो कोई फायदा नही। दरअसल मृत्युलोक वासी न तो हमे देख सकते न हमे सुन सकते। यदि किसी प्रकार हमारी बात उन तक पहुंच भी जाये तो कोई विश्वास नही करेगा इसलिए कोशिस करना फालतू है। मैने उसकी बात मान ली
कालांतर में मैंने खुद को एक भिन्न लोक में पाया जहां पहाड़ियां और वीरानी थी चंद्रमा मंगल जैसा। एक शत्रु आत्मा मेरे सामने आ गयी  उससे कोई बहस हुई फिर उसने कोई शक्ति फेंकी शायद मंत्र बम, मेरा दाहिना हाथ टूट गया
 मैने कहा ये लो इसने तो मेरा  दाहिना हाथ ही तोड़ डाला अब क्या करूँ। एक मित्र आत्मा बोली डरने की क्या बात कोई भौतिक शरीर थोड़ी है जो विकलांग हो गए।हाथ बढ़ाकर फिर निर्माण कर लो। मैने दाहिने ठूंठ को हिलाया वह बढ़कर फिर पूरा हाथ बन गया। योगी कथा अमृत के अनुसार वह शायद हिरण्य लोक था।
फिर  कालांतर बाद किसी ने कहा तुम्हे फिर से जन्म लेना चाहिए तुम्हारी कुछ कर्म यात्रा बाकी है। मैने जिद पकड़ ली नही लूंगा। उसने ईश्वर से बात करा दी। एक सूर्य था जो प्रकाश किरणों के माध्यम से बात करता था बिना कान के भी सुनाई देता था और समझ मे आता था। उस सूर्य जैसे ईश्वर ने प्यार से मुझे पुचकारा जन्म ले लो न, कर्म यात्रा पूरी हो जाएगी। मैं भोला भाला सीधा साधा आत्मा उस सूर्य रूपी ईश्वर रूपी चक्कर मे फंस गया ह और हां कह दिया। फिर किसी एकाउंटेंट छाप व्यक्ति के पास ले गए उसने कुछ लिखा और घर दिखाने का निर्देश दिया। दो घर दिखाए गए मुझे यह भी कहा गया कि दो जन्मों के बीच चुनाव कर लो। एक मे बहुत कष्ट झेलना पड़ेगा जिससे सारे कर्म कट जाए, दूसरे में कष्ट कम होगा बचे कर्म फल के लिए एक जन्म और लेना पड़ेगा। मैने दुस्साहस करते हुए कहा किंतना भी कष्ट हो मैं झेल।लूंगा पर एक बार मे ही सब खत्म हो जाये
अब दो घर दिखाए गए मैने पहला ही पसंद कर लिया बाद में जिसमे जन्म लिया उसे ऊपर ही उड़ते हुए देख लिया था । एक घर दोमंजिला था ऊपर की मंजिल में बीच के हिस्से से आर पार उड़ान भरा और पसंद कर लिया कि इसी में जन्म लूंगा। 
फिर वापस लिखा पढ़ी करने वाले के पास ले गए।उसने नोट किया फिर भेजने का निर्देश दिया। दिया। दो लोग पकड़ कर आसमान में ऊपर ही ऊपर ले गए फिर उपर से ही धक्का दे दिया। मैं गिरते2 भी जरा भी नही डरा पर होश खो बैठा। बाद में होश आया तो अपने को एक बन्द स्थान पर पाया जहां घनघोर अंधेरा था । इसके बाद या तो मैं सो गया या बेहोश हो गया। आगे याद नही कुछ भी

विचित्र बात-
आज से 45-50 वर्ष पूर्व मैने जीईसी रेडियों का एरियल थी करते समय 4 इंची ड्रोन देखा था 1जमीन से 0-15 फीट की ऊंचाई पर उड़ते हुए क्या था ये कैसे समझ मे आएगा। पर अब समझ मे आता हूं कि दूसरे ग्रह के लोग पृथ्वी पर नजर रखते रहते है। वह ड्रोन विचित्र था उसके बीच लाइट जल रही थी पीले रंग की टार्च जैसी। और सर्पाकार तरीके से उड़ रहा था। फिर छत से उतर कर पुलिस लाइन पर कुछ फुट ऊंचाई पर उड़ने लगा समय शाम का था। काफी देर तक भौचक्के होकर देखते रहे आखिर ये उड़ने वाली चीज क्या है खिलौने जैसी।ये घटना 50 साल पूर्व की रही होगी मेरी आयु 10 वर्ष या कम रही होगी

17 अप्रैल 2020

अघोरी की कुटिया में रात भर जागा

कुछ खोजने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है।समय पैसा भी खर्च होता है खतरा भी उठाना पड़ता है निडरता के साथ। दिवाली 2019 का दिन निकट आ रहा था । महानिशा यानी दीपावली की रात तांत्रिकों के लिए बेहद खास रात्रि होती है। छत्तीसगढ़ में उच्च कोटि के साधु नही मिलते अतः काशी जांने का निर्णय मैने लिया क्योकि कई दिनों की छुट्टी का अवसर था। अतः दिवाली के पहले काशी की ओर निकल गया बस से। पहले इलाहाबाद ताकि चंडी कार्यालय में मिलूं कोई संपर्क मिले तो काम आए पर कोई लिंक न मिला। फिर काशी चला गया। वहां स्थित आस्था प्रकाशन से भी।कोई संपर्क सूत्र न मिल सका। एक मणिकर्णिका घाट के पास स्थित लाज में ठहर गया। वहां पास में स्थित मंदिर में निवास करने वाले जो रायपुर के पास आरंग तरफ निवास करते थे उनके पास भी कोशिश किया पर सूत्र न मिला। आखिर स्वतंत्र रूप से हाथ पैर मारने का निर्णय लेते हुए दिन के समय मणिकर्णिका घाट की सीढ़ियों पर बैठ गया। एक साधु मुझे दिखाई दिया उससे चर्चा करने लगा कोई सिद्ध महात्मा के बारे में जानने। अपना उद्देश्य बताने के बाद उसने। कहा ऐसा सिद्ध महात्मा आजकल कोई नही है जानकारी में। फिर उधर से जाते हुए काले कपड़े वाले युवा साधु की ओर इशारा कर कहा, उसके पास जाओ वह बाबा कीनाराम सम्प्रदाय का है शायद वह काम का साबित हो सके। मैं उस काल कपड़े वाले युवासाधु के साथ हो लिया। उसे अपना उद्देश्य बताया तो वह अपनी कुटिया ले जाने को तैयार हो गया। फिर उसकी कुटिया जो वहां से 15-20 किमी दूर थी वहां के लिए निकल गया ताकि उसका स्थान देख सकूं और रास्ता भी नॉट करते गया। एक गांव में गंगा किनारे ही कुटिया बनी थी जिसमे यज्ञ कुंड भी था। मुझे उपयुक्त लगा। दूसरे दिन दिवाली थी। आज की रात मैं पुनः लाज जाकर सो गया। दूसरे दिन तैयार होकर अपनी कुछ सामग्री लेकर अघोरी साधु की कुटिया के लिए निकल पड़ा। फोन से आने की सूचना भी दे दी तय कार्यक्रम के अनुसार। वह गांव में ही मिल गया। ग्राम बाज़ार भरा था उसने मुर्गे का मांस और शराब खरीदी फिर दोनों पैदल चलते हुए अंदर के गांव स्थित गंगा किनारे उसकी कुटिया के जा पहुंचे। वहां उसके कुछ गांव वाले चेले भी थे। साधु ने मिठाई व हवन आदि पूजन सामग्री उनसे मंगवाई जिसका पैसा मैने दिया। दोपहर को मैंने नींद ले लिया था लाज के कमरे में ताकि रातभर जागरण कर सकूं। पूजन सामग्री आदि आने पर उसने कुंड की धूनी को और लकड़ी डाल कर जलाया और बर्तन में चावल  मुर्गा मांस आदि डालकर पकाने चढ़ा दिया। 
मैने उसे पहले ही बता रखा था कि मैं डात्विक हूँ अतः आप अपनी प्रक्रिया करे अपने तरीके से मैं सिर्फ देखूंगा। सामग्री के लिए पैसे जरूर दे दूंगा।
काफी देर बाद उसने कुंड में हवन सामग्री स्वाहा कहते कुएं आहुति दी। 11 आहुति हवन सांगरी से मुझसे व एक अन्य ग्रामीण व्यक्ति से भी डलवाई। मनुष्य की खोपड़ी के खप्पर पर थोड़ी शराब चढ़ाई। अपने बांह से इनकेक्षण द्वारा खूननिकालकर खप्पर पर टपकाया और जलते कुंड की अग्नि में भी खून व शराब डाला। फिर बर्तन से मांस का टुकड़ा व पका चांवल भी कुंड में डाला अग्नि में। मिठाई की भी आहुति दी।
फिर बोला हम अघोरियों की यही प्रक्रिया है बस यही पूजा है यही साधना है और कोई मंत्र तंत्र आदि नही होता। फिर पका भोजन मांस सहित उसने खुद ग्रहण किया फिर शराब भी पी लिया। अब काफी रात बीतने लगी तो ग्रामीण शिष्य उठकर गांव चला गया। बस हम दोनों ही रह गए। अभी तक कुछ नजर नही आया था मुझे। फिर उसने गंगा की रेत में जाकर अशरीरी आत्माओं को बुलाने जांने की बात कहते हुए चला गया। किंसरे थोड़ा सा घुटनो तक पानी था और आगे रेत का टापू। थोड़ी देर बाद वापस आया। फिर कहने लगा उधर कोई नही मिला। इधर दोनों तरफ शमशान है एक2 करके जाऊंगा। अब तक शराब का नशा भी उस ओर चढ़ गया था। वह बोला हम लोग की साधना में हम लोग यह मानते है हम भी उन्ही बहुत प्रेतों के बीच के ही है उनसे अलग नही मानते खुद को यही हमारी साधना है। उसने पूरे कपड़े उतार कर पूरी तरह नग्न हो गया और कुटिया के दाहिनी तरह कुकुछ दूर स्थित शमशाम की ओर चला गया। नशे के होने के कारण बहुत प्रेत जिन्न खब्बीस मसान आदि को गंदी2 गालियां देते हुए चला गया। फर तक उसकी आवाज मुझे सुनाई देती रही। थोड़ी देर बाद वह वापिस आया। साथ मे एक जलती चिता की लकड़ी क्लेकर आया था और उसे कुंड में डाल दिया।मेंफिर बोला इधर भी कोई नही आया अब दूसरे तरफ की शमशान जाता हूँ। ये बड़ा शमशान है। और अशरीरी आत्माओं को गंदी2 गालियां देते हुए फिर चला गया। इसी बीच समय पाकर मैने भी एक मंत्र का जप।साधना किया। थोड़ी देर बाद वह वापस आया और मुझे जप करते देख भी लिया। फिर मुझे पंडित कहकर संबोधित भी किया और कहा इस शमशान में भी कोई नही आया। पर एक बहुत मुझे बेवकूफ बनाकर मुझपर हमला कर दिया ऐसा वह कहने लगा। और तबियत खराब होने की बात कहने लगा। पर मेरे ख्याल से शराब का नशा ज्यादा हो चुका था और अपच य्या अजीर्ण का शिकार हो चुका था फिर उसने कुटिया के बाहर उल्टियां की और राहत पाया। फिर सोने लगा ठंड लगने पर उसने ओढाने कहा तो वहां बिछे बोर को मैंने ओढ़ा दिया। वह सो गया नींद में। दूर से कहीं बाबा चिल्लाने की आवाज आने लगी। रात को 3 बज चुके थे। उसी गांव का एक गुंडा शराब पीकर एक साथी के साथ आया और अघोरी को गाली देते हुए उठाया। पर वह न उठा तो लातो से मारने लगा और खप्पर /खोपड़ी का हिस्सा उठाकर पटक दिया गालियां देते हुए साले अपने आप को अघोरी कहता है दिखा अपनी औकात। इस तरह लात मार2 कर उसे उठाया। कुटिया के बाहर ले जाकर झापड़ ही झापड़ मारा। कहने लगा कि जब तेरे लिए 35 किलो चावल हर महीने की व्यवस्था कर दिया तो इस महीने क्यो नही उठाया? इसी बात पर नाराज होकर वह गुंडा उसकी पिटाई करने लगा था। आंखे लाल थी उस गुंडे की। मुझे लगा जैसे बेताल गुंडे पर सवार होकर गालियों का हिसाब बराबर करने आया हो (बेताल शराब भी पीना पसंद करते है)। बाजू एक अधूरा बना मंदिर भी था जिसमे एक और बाबा रहा करते थे जो खुद को अवधूत कहते थे वे भी आ गए। और गुंडे को समझाने लगे। एक और आदमी जो उसी गांव का था वह भी आ चुका था समझाने। फिर अधूरे मन्दिर की तरफ सब गए मैं भी गया। गुंडा धीरे2 शांत हुआ। अब तक पौ फटने लगी थी। रात ब्जित चुकी थी और मुझे कुछ भी दिखाई नही दिया था रातभर जिस जिज्ञासा से मैं वहां गया था। सबेरे उस अवधूत से भी मिला उसने भी कहा देखता हूँ। सामान्य पूजा हवन होम कर कटोरी में पानी लेकर उसमे लौंग डालने लगा काफी प्रयास के बाद एक ही लौंग डूबा तो वह कहने लगा तुम्हारी देवी बंधन में है उसने बंधन तोड़ कर बुलाया है। पर उससे मैं संतुष्ट नही हुआ कोई खास बात तो उसने बताया नही। जैसे बंधन में कैसे बंध गयी आदि बाते वह नही बताया। गोलमाल बाते ही लगी। अतः दक्षिणा देकर और उसके सुझाव को सुनकर मैं वापस लॉज में चला आया नाश्ता चाय लेकर नहा कर जमकर सोया। शाम को उठकर घाट तरफ घूमने चला गया। इस तरह दिवाली की रात असफलता हाथ लगी।

9 मई 2019

जब वाट्सएप में ज्ञान देना मंहगा पड़ा!!

ज्योतिष के एक ग्रुप मेरा एक नम्बर जोड़ा गया। और लकीर के फ़क़ीर ज्योतिषी ने ,जिसने वो ग्रुप बनाया था, पंचांग और मुहूर्त था दैनिक,साप्ताहिक राशिफल देते रहे। कुछ दिनों तक मैं चुपचाप पढ़ता रहा। बाद में मैंने कुछ तर्क सत्यता, असत्यता पर लिखने शुरू किए। ग्रुप में कुछ लोगो को मेरी खरी2 बाते पसंद आई।पर ज्योतिष (जगदम्बा ज्योतिष नाम रखा था अपने संस्थान का शायद) महाशय चिढ़ गए। फिर उन्होंने टिप्पणी की कि "आप शास्त्रों को नही मानते इसलिए मैं आपको नही मानता"।
मैने तर्क दिया शास्त्रों की रचना मनुष्य ने ही कि है, बेशक वे असाधारण विद्वान थे, पर कई सिद्धांत उस काल मे सही रहे होंगे और आज गलत हो सकते है। ये भी हो सकता है कोई सिद्धांत सार्वभौमिक सत्य नही होता।अतः लोगो को मार्गदर्शन सम्भलकर करना चाहिए ताकि misguide न हो। ज्योतिषी महोदय और चिढ़ गए।
चूंकि ग्रुप में मैंने अपने अनुभवों और प्रयोगों के बारे में ही लिखा, तो कई सज्जनों ने अपने हाथ की छाप डालने लगे और जिद करने लगे कि हमारे बारे में भी बताएं। कुछ समय मैं चुप ही रहा क्योकि ग्रुप को मैं विषय से भटकाना नही चाहता था, तो अनेक मुझसे इसलिए नाराज हो गए कि मैं कोई जवाब नही दे रहा हूँ। फिर मैंने आखिरकार लिखा कि ग्रुप में मेरा उद्देश्य सिर्फ अपने अनुभव व प्रयोगों को बताना है, न कि profession चलाना।(वैसे मैं एक एकाउंट्स मैनेजर हूं)। तिस पर भी लोग नाराज हुए कि किसी के कष्ट को आप नही सुनते, कोई मार्गदर्शन नही देते तो क्या फायदा!
मैंने यह भी कहा कि मैंने हस्तरेखा देखना बन्द कर दिया है, समय की कमी और शौक पूरा होने के कारण। तब भी नाराजगी जारी रही। और फिर ग्रुप से मुझे निकाल दिया गया।
यानी लोग जबरन सेवा करवाना चाहते है, भले ही ये किसी के लिए परेशानी का कारण भी बनता हो तो बने।
खैर एक दो सालों बाद एक महाशय ने मुझे वाट्सएप पर अपनी हस्तरेखा की छाप भेजी। मैंने टालने की कोशिस की तो उसने सीधे फोन।लगाकर कुछ परेशानी बताई तो मेरा ध्यान उसकी हथेली की छाप पर गया। फिर भी टालने के लिए मैने कहा कि फीस जमा करानी होगी।आवश्यक फीस उसने मेरे बैंक में जमा भी करा दी, अब मैंने भी निश्चय किया कि देख ही लिया जाए। मैंने उसे वाट्सएप पर ही लिखा कि समय दे,रविवार को खाली रहूंगा तो अध्ययन करके लिखूंगा। उसने मान लिया।

1-2 दिन बाद रविवार को मैंने खाली समय पाकर study किया और वाट्सएप पर ही हस्तरेखा अध्ययन फल लिख भेजा।

उसके बाद यह आइडिया भी आया कि जिन्हें वाकई जरूरत हो, उन्हें ये सेवा प्रदान की जाए भले ही सप्ताह में एक को ही देख पाऊं, इससे थोड़े टच में रहूंगा।

अतः मैं चाहूंगा कम से कम लोग ही सम्पर्क करें अपने हस्तरेखा अध्ययन के माध्यम से। जवाब देने में देर हो सकती है समयाभाव के कारण, पर दूंगा जरूर। और हां, फीस तो लूंगा ही, मुफ्त सेवा नही करूँगा। सीधे फोन पर बात न करे क्योकि ऑफिस के कार्य के कारण व्यस्त रहूंगा, ड्यूटी के बाद मेरे अपने कार्य भी कुछ रहते है।

अतः वाट्सएप पर ही लिखे,उसी के माध्यम से जवाब मिलेगा।वाट्सएप पर ही मेरी स्वीकृति के बाद दोनों हाथों की फोटो, नाम,जन्म तारीख,जन्मसमय,जन्मस्थान भेजा जाना चाहिए।
स्थानीय लोगो के हाथ तो बहुत देखे, अब सेवा का दायरा बढ़ाया जाए, क्योकि ब्लाग और वाट्सएप द्वारा सम्पर्क देशभर से हो गया।
मेरा वाट्सएप नम्बर है-94063-00401.
- आर के बाफना,रायपुर, छत्तीसगढ़

जितना हो सके उतना ही बताऊंगा समाधान।क्योकि मनुष्य की एक सीमा होती है।असाधारण उम्मीदे न पालना।

25 अक्टूबर 2018

उसका उतरा ,मुझ पर चढ़ गया

2001 से 2010 के बीच की बात है (ठीक2 वर्ष मुझे याद नहीं) मेरे एक मित्र की पत्नी बहुत कष्ट में दिन बिता रही थी। एक दिन मुझसे बोली मुझ पर टोने टोटके/तंत्र प्रयोग किये जा रहे है,पर राहत नहीं,बहुत मुश्किल महसूस कर रही हूँ ,इधर उधर देवस्थानों /झाड़फूंक करने वालो के पास भी घूम रही हूँ। ये सुनकर मुझे बहुत दया आ गयी,आप कुछ करे न मेरे लिए।

कहावत है न -"नया मुल्ला ज्यादा प्याज खाता है " !

मुझे भी ताव आ गया दयावश,मैंने कहा ठीक है मैं देखता हूँ ,परेशानी दूर करने की कोशिस करता हूँ।
मेरे ज्ञान और विद्या की परीक्षा करने का समय आ गया। घर आकर मैं पूजा में बैठ गया फिर बजरंगबली वाला एक प्रयोग उसके लिए कर बैठा।
उसका तो उतर गया पर 'नामुराद' मुझ पर चढ़ गया।
दो दिनों तक मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर मुझे हो क्या रहा है। जैसे शनि राहु केतु सब लट्ठ लेकर मुझ पर पिल पड़े है।
तीसरे दिन मेरा माथा ठनका, कुछ गड़बड़ है,जब से मैंने उसके लिए प्रयोग किया है तभी से उसका भार मुझ पर आ गया है। अब क्या करूँ.
फिर एक काली मंदिर के परिचित पुजारी के पास जा पंहुचा जो थोड़ा बहुत झाड़ फूंक भी करता था और उसे सब बताया। तो उसने एक खुद पर उतारा विधि बताई और उसका 'रेंज 'भी ,कि इससे क्या2 हो सकता है।
अगले दिन प्रयोग करने का अनुकूल दिन था,मैंने उतारा प्रयोग खुद पर किया। देखे क्या होता है। आश्चर्य दूसरे दिन अपने आप मैं ठीक ठाक हो गया था,हल्का फुल्का प्रसन्नचित्त।
मेरे जीवन का पहला अनुभव था जब किसी की भलाई करते खुद चपेट में आया और समझ में आने के बाद मुक्ति भी पाया !
लोग ऐसा सब मजाक समझते है और चाहते है/जोर देते है कि अपने ज्ञान और विद्या से कोई  उनका संकट दूर कर दे। प्रयोगकर्ता खुद भी संकट में पड़ जाता इसलिए बहुत सोंच समझ कर ही कोई भी विद्याधर किसी के मामले में हाथ डालता है। मैं खुद भी डरता हूँ अनुभव के बाद,जो अंधाधुंध तंत्र प्रयोग करते है,उन्हें खुद भी नाना प्रकार की परेशानी झेलते देखा है
-आर के बाफना

एक बैगा/गुनिया की परीक्षा

सितम्बर 2018 का महीना था, 23 सितम्बर ,रविवार को आफिस की छुट्टी रहती है इसलिए घूमने का मन बनाया, एक मित्र के साथ घूमने का प्लान बनाया।
पर रविवार को वह बीमार पड़ गया तो मैंने अकेले ही घूमने का मन बनाया।
काफी पहले से मैने सुन रखा था चंपारण के आगे एक गांव है जहां एक ग्रामीण तांत्रिक रहता है जो सिक्के में देखकर विचार करता है और बताया करता है।मैंने उसी की परीक्षा लेने का विचार किया।
(छत्तीसगढ़ में ग्रामीण तांत्रिकों को बैगा, गुनिया कहा जाता है)
घूमते हुए मैं वहां पहुंच गया। उस दिन वो घर पर ही सबको देख रहा था।कई कार वाले,मोटर साइकिल वाले आदि लोग पहुंचे हुए थे। यह देख मैं प्रभावित हुआ, काफी प्रसिद्ध है ये, कुछ तो बात होगी।
अंदर बहुत से लोग बैठे हुए थे, सामने हनुमान जी की मूर्ति स्थापित थी। मैने नारियल अगरबत्ती अर्पित कर चुपचाप बैठ गया। धीरे2 खाली होती जगह द्वारा मैं निकट आते गया। मेरे सामने एक वृद्धा थी, वह कह रही थी शरीर मे दर्द रहता है, पिछली बार आयी थी उससे भी क्यो फर्क नही पड़ा? बैगा ने दो पुड़िया दी एक मे प्रसाद था, खाने के लिए, दूसरे में राख(भस्म) था उसे शरीर मे चुपड़ने(लगाने) कहा घर जाकर।
(मेरे विचार से वृद्धा वातरोग से पीड़ित थी और उसका आयुर्वेद या होमियोपैथी से सही चिकित्सा हो जाती)
वृद्धा उठी और बड़बड़ाते हुए वहां से निकली कि बार2 आने के बाद भी कोई फर्क नही पड़ा, सब बेकार है।

फिर मेरी बारी आई, मैने साधारण से कपड़े पहन रखा था जिससे बैगा ये अनुमान नही लगा पाया था कि मैं नौकरी पेशा वाला हूँ या व्यवसायी। मेरा नम्बर आते ही तुरंत पूछ बैठा- क्या काम करते हो?
मैने कहा एक कम्पनी में नौकरी करता हूं।
तुरंत उसने अंधेरे में तीर मारा- 3 साल से नौकरी में परेशानी जा रही है क्या? मैने कहा नही तो, कोई परेशानी नही। फिर उसने कहा काम का यश नही मिलता होगा? मैंने कहा ऐसा भी नही।
उसके बाद न तो उसने कुछ पूछा न ही बताया। मेरे दिए सिक्के को बिना देखे अंदर फेंक दिया। फिर चट से 2 पुड़िया बांधी, और कहा एक कहा लेना, दूसरे तो शरीर मे लगा लेना। बाहर आकर खोल कर देखा, एक मे प्रसाद तो दूसरे में राख था। प्रसाद तो खैर मैने खा लिया, राख तो रास्ते मे आने वाली नदी में डाल दिया।

मैंने उसकी परीक्षा में एकदम बकवास पाया। दरअसल अंधभक्तो ने जरूरत से ज्यादा अफवाह फैला रखी है, और भीड़ भी। इन सब चीजों में, धार्मिक मामलों में लोग अपने दिमाग का दरवाजा बंद कर लेते है, सोंचने समझने को तैयार नही होते। हम भारतीयों के मन मे बचपन से धर्म, तंत्र मंत्र जैसे मामलों में शंका, संदेह नही करने का संस्कार डाला गया होता है, फिर लोग ठगी का शिकार होते है और शिकायत करते है, खुद की बेवकूफी को दोष कभी नही देते