जिज्ञासा ने मुझे विभिन्न जांच और प्रयोगो के लिए ऊर्जा दी , उसके परिणाम मैं जिज्ञासु हिंदीभाषी पाठको के लिए प्रस्तुत करता हूँ , ताकि जो मैंने पाया वह औरो तक पहुंचे . In Search of Truth, My experiments went on, Here I present in Hindi - for the Curious Indian People-रेणिक बाफना ,रायपुर (छ.ग.)भारत [My another Blog->renikbafna@blogspot.com(MERE VICHAR)] Whatsapp-94063-00401, Please do not Call, only whatsapp
15 अप्रैल 2022
चटिया मटिया(बाल प्रेत)होते ही है
27 अगस्त 2021
उसका अभिशप्त घर ठीक हो गया
28 मई 2021
कुछ पारलौकिक घटनाएं
26 जुलाई 2020
पूर्व जन्म की कुछ यादें
17 अप्रैल 2020
अघोरी की कुटिया में रात भर जागा
9 मई 2019
जब वाट्सएप में ज्ञान देना मंहगा पड़ा!!
ज्योतिष के एक ग्रुप मेरा एक नम्बर जोड़ा गया। और लकीर के फ़क़ीर ज्योतिषी ने ,जिसने वो ग्रुप बनाया था, पंचांग और मुहूर्त था दैनिक,साप्ताहिक राशिफल देते रहे। कुछ दिनों तक मैं चुपचाप पढ़ता रहा। बाद में मैंने कुछ तर्क सत्यता, असत्यता पर लिखने शुरू किए। ग्रुप में कुछ लोगो को मेरी खरी2 बाते पसंद आई।पर ज्योतिष (जगदम्बा ज्योतिष नाम रखा था अपने संस्थान का शायद) महाशय चिढ़ गए। फिर उन्होंने टिप्पणी की कि "आप शास्त्रों को नही मानते इसलिए मैं आपको नही मानता"।
मैने तर्क दिया शास्त्रों की रचना मनुष्य ने ही कि है, बेशक वे असाधारण विद्वान थे, पर कई सिद्धांत उस काल मे सही रहे होंगे और आज गलत हो सकते है। ये भी हो सकता है कोई सिद्धांत सार्वभौमिक सत्य नही होता।अतः लोगो को मार्गदर्शन सम्भलकर करना चाहिए ताकि misguide न हो। ज्योतिषी महोदय और चिढ़ गए।
चूंकि ग्रुप में मैंने अपने अनुभवों और प्रयोगों के बारे में ही लिखा, तो कई सज्जनों ने अपने हाथ की छाप डालने लगे और जिद करने लगे कि हमारे बारे में भी बताएं। कुछ समय मैं चुप ही रहा क्योकि ग्रुप को मैं विषय से भटकाना नही चाहता था, तो अनेक मुझसे इसलिए नाराज हो गए कि मैं कोई जवाब नही दे रहा हूँ। फिर मैंने आखिरकार लिखा कि ग्रुप में मेरा उद्देश्य सिर्फ अपने अनुभव व प्रयोगों को बताना है, न कि profession चलाना।(वैसे मैं एक एकाउंट्स मैनेजर हूं)। तिस पर भी लोग नाराज हुए कि किसी के कष्ट को आप नही सुनते, कोई मार्गदर्शन नही देते तो क्या फायदा!
मैंने यह भी कहा कि मैंने हस्तरेखा देखना बन्द कर दिया है, समय की कमी और शौक पूरा होने के कारण। तब भी नाराजगी जारी रही। और फिर ग्रुप से मुझे निकाल दिया गया।
यानी लोग जबरन सेवा करवाना चाहते है, भले ही ये किसी के लिए परेशानी का कारण भी बनता हो तो बने।
खैर एक दो सालों बाद एक महाशय ने मुझे वाट्सएप पर अपनी हस्तरेखा की छाप भेजी। मैंने टालने की कोशिस की तो उसने सीधे फोन।लगाकर कुछ परेशानी बताई तो मेरा ध्यान उसकी हथेली की छाप पर गया। फिर भी टालने के लिए मैने कहा कि फीस जमा करानी होगी।आवश्यक फीस उसने मेरे बैंक में जमा भी करा दी, अब मैंने भी निश्चय किया कि देख ही लिया जाए। मैंने उसे वाट्सएप पर ही लिखा कि समय दे,रविवार को खाली रहूंगा तो अध्ययन करके लिखूंगा। उसने मान लिया।
1-2 दिन बाद रविवार को मैंने खाली समय पाकर study किया और वाट्सएप पर ही हस्तरेखा अध्ययन फल लिख भेजा।
उसके बाद यह आइडिया भी आया कि जिन्हें वाकई जरूरत हो, उन्हें ये सेवा प्रदान की जाए भले ही सप्ताह में एक को ही देख पाऊं, इससे थोड़े टच में रहूंगा।
अतः मैं चाहूंगा कम से कम लोग ही सम्पर्क करें अपने हस्तरेखा अध्ययन के माध्यम से। जवाब देने में देर हो सकती है समयाभाव के कारण, पर दूंगा जरूर। और हां, फीस तो लूंगा ही, मुफ्त सेवा नही करूँगा। सीधे फोन पर बात न करे क्योकि ऑफिस के कार्य के कारण व्यस्त रहूंगा, ड्यूटी के बाद मेरे अपने कार्य भी कुछ रहते है।
अतः वाट्सएप पर ही लिखे,उसी के माध्यम से जवाब मिलेगा।वाट्सएप पर ही मेरी स्वीकृति के बाद दोनों हाथों की फोटो, नाम,जन्म तारीख,जन्मसमय,जन्मस्थान भेजा जाना चाहिए।
स्थानीय लोगो के हाथ तो बहुत देखे, अब सेवा का दायरा बढ़ाया जाए, क्योकि ब्लाग और वाट्सएप द्वारा सम्पर्क देशभर से हो गया।
मेरा वाट्सएप नम्बर है-94063-00401.
- आर के बाफना,रायपुर, छत्तीसगढ़
जितना हो सके उतना ही बताऊंगा समाधान।क्योकि मनुष्य की एक सीमा होती है।असाधारण उम्मीदे न पालना।
25 अक्टूबर 2018
उसका उतरा ,मुझ पर चढ़ गया
2001 से 2010 के बीच की बात है (ठीक2 वर्ष मुझे याद नहीं) मेरे एक मित्र की पत्नी बहुत कष्ट में दिन बिता रही थी। एक दिन मुझसे बोली मुझ पर टोने टोटके/तंत्र प्रयोग किये जा रहे है,पर राहत नहीं,बहुत मुश्किल महसूस कर रही हूँ ,इधर उधर देवस्थानों /झाड़फूंक करने वालो के पास भी घूम रही हूँ। ये सुनकर मुझे बहुत दया आ गयी,आप कुछ करे न मेरे लिए।
कहावत है न -"नया मुल्ला ज्यादा प्याज खाता है " !
मुझे भी ताव आ गया दयावश,मैंने कहा ठीक है मैं देखता हूँ ,परेशानी दूर करने की कोशिस करता हूँ।
मेरे ज्ञान और विद्या की परीक्षा करने का समय आ गया। घर आकर मैं पूजा में बैठ गया फिर बजरंगबली वाला एक प्रयोग उसके लिए कर बैठा।
उसका तो उतर गया पर 'नामुराद' मुझ पर चढ़ गया।
दो दिनों तक मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर मुझे हो क्या रहा है। जैसे शनि राहु केतु सब लट्ठ लेकर मुझ पर पिल पड़े है।
तीसरे दिन मेरा माथा ठनका, कुछ गड़बड़ है,जब से मैंने उसके लिए प्रयोग किया है तभी से उसका भार मुझ पर आ गया है। अब क्या करूँ.
फिर एक काली मंदिर के परिचित पुजारी के पास जा पंहुचा जो थोड़ा बहुत झाड़ फूंक भी करता था और उसे सब बताया। तो उसने एक खुद पर उतारा विधि बताई और उसका 'रेंज 'भी ,कि इससे क्या2 हो सकता है।
अगले दिन प्रयोग करने का अनुकूल दिन था,मैंने उतारा प्रयोग खुद पर किया। देखे क्या होता है। आश्चर्य दूसरे दिन अपने आप मैं ठीक ठाक हो गया था,हल्का फुल्का प्रसन्नचित्त।
मेरे जीवन का पहला अनुभव था जब किसी की भलाई करते खुद चपेट में आया और समझ में आने के बाद मुक्ति भी पाया !
लोग ऐसा सब मजाक समझते है और चाहते है/जोर देते है कि अपने ज्ञान और विद्या से कोई उनका संकट दूर कर दे। प्रयोगकर्ता खुद भी संकट में पड़ जाता इसलिए बहुत सोंच समझ कर ही कोई भी विद्याधर किसी के मामले में हाथ डालता है। मैं खुद भी डरता हूँ अनुभव के बाद,जो अंधाधुंध तंत्र प्रयोग करते है,उन्हें खुद भी नाना प्रकार की परेशानी झेलते देखा है
-आर के बाफना
एक बैगा/गुनिया की परीक्षा
सितम्बर 2018 का महीना था, 23 सितम्बर ,रविवार को आफिस की छुट्टी रहती है इसलिए घूमने का मन बनाया, एक मित्र के साथ घूमने का प्लान बनाया।
पर रविवार को वह बीमार पड़ गया तो मैंने अकेले ही घूमने का मन बनाया।
काफी पहले से मैने सुन रखा था चंपारण के आगे एक गांव है जहां एक ग्रामीण तांत्रिक रहता है जो सिक्के में देखकर विचार करता है और बताया करता है।मैंने उसी की परीक्षा लेने का विचार किया।
(छत्तीसगढ़ में ग्रामीण तांत्रिकों को बैगा, गुनिया कहा जाता है)
घूमते हुए मैं वहां पहुंच गया। उस दिन वो घर पर ही सबको देख रहा था।कई कार वाले,मोटर साइकिल वाले आदि लोग पहुंचे हुए थे। यह देख मैं प्रभावित हुआ, काफी प्रसिद्ध है ये, कुछ तो बात होगी।
अंदर बहुत से लोग बैठे हुए थे, सामने हनुमान जी की मूर्ति स्थापित थी। मैने नारियल अगरबत्ती अर्पित कर चुपचाप बैठ गया। धीरे2 खाली होती जगह द्वारा मैं निकट आते गया। मेरे सामने एक वृद्धा थी, वह कह रही थी शरीर मे दर्द रहता है, पिछली बार आयी थी उससे भी क्यो फर्क नही पड़ा? बैगा ने दो पुड़िया दी एक मे प्रसाद था, खाने के लिए, दूसरे में राख(भस्म) था उसे शरीर मे चुपड़ने(लगाने) कहा घर जाकर।
(मेरे विचार से वृद्धा वातरोग से पीड़ित थी और उसका आयुर्वेद या होमियोपैथी से सही चिकित्सा हो जाती)
वृद्धा उठी और बड़बड़ाते हुए वहां से निकली कि बार2 आने के बाद भी कोई फर्क नही पड़ा, सब बेकार है।
फिर मेरी बारी आई, मैने साधारण से कपड़े पहन रखा था जिससे बैगा ये अनुमान नही लगा पाया था कि मैं नौकरी पेशा वाला हूँ या व्यवसायी। मेरा नम्बर आते ही तुरंत पूछ बैठा- क्या काम करते हो?
मैने कहा एक कम्पनी में नौकरी करता हूं।
तुरंत उसने अंधेरे में तीर मारा- 3 साल से नौकरी में परेशानी जा रही है क्या? मैने कहा नही तो, कोई परेशानी नही। फिर उसने कहा काम का यश नही मिलता होगा? मैंने कहा ऐसा भी नही।
उसके बाद न तो उसने कुछ पूछा न ही बताया। मेरे दिए सिक्के को बिना देखे अंदर फेंक दिया। फिर चट से 2 पुड़िया बांधी, और कहा एक कहा लेना, दूसरे तो शरीर मे लगा लेना। बाहर आकर खोल कर देखा, एक मे प्रसाद तो दूसरे में राख था। प्रसाद तो खैर मैने खा लिया, राख तो रास्ते मे आने वाली नदी में डाल दिया।
मैंने उसकी परीक्षा में एकदम बकवास पाया। दरअसल अंधभक्तो ने जरूरत से ज्यादा अफवाह फैला रखी है, और भीड़ भी। इन सब चीजों में, धार्मिक मामलों में लोग अपने दिमाग का दरवाजा बंद कर लेते है, सोंचने समझने को तैयार नही होते। हम भारतीयों के मन मे बचपन से धर्म, तंत्र मंत्र जैसे मामलों में शंका, संदेह नही करने का संस्कार डाला गया होता है, फिर लोग ठगी का शिकार होते है और शिकायत करते है, खुद की बेवकूफी को दोष कभी नही देते