सितम्बर 2018 का महीना था, 23 सितम्बर ,रविवार को आफिस की छुट्टी रहती है इसलिए घूमने का मन बनाया, एक मित्र के साथ घूमने का प्लान बनाया।
पर रविवार को वह बीमार पड़ गया तो मैंने अकेले ही घूमने का मन बनाया।
काफी पहले से मैने सुन रखा था चंपारण के आगे एक गांव है जहां एक ग्रामीण तांत्रिक रहता है जो सिक्के में देखकर विचार करता है और बताया करता है।मैंने उसी की परीक्षा लेने का विचार किया।
(छत्तीसगढ़ में ग्रामीण तांत्रिकों को बैगा, गुनिया कहा जाता है)
घूमते हुए मैं वहां पहुंच गया। उस दिन वो घर पर ही सबको देख रहा था।कई कार वाले,मोटर साइकिल वाले आदि लोग पहुंचे हुए थे। यह देख मैं प्रभावित हुआ, काफी प्रसिद्ध है ये, कुछ तो बात होगी।
अंदर बहुत से लोग बैठे हुए थे, सामने हनुमान जी की मूर्ति स्थापित थी। मैने नारियल अगरबत्ती अर्पित कर चुपचाप बैठ गया। धीरे2 खाली होती जगह द्वारा मैं निकट आते गया। मेरे सामने एक वृद्धा थी, वह कह रही थी शरीर मे दर्द रहता है, पिछली बार आयी थी उससे भी क्यो फर्क नही पड़ा? बैगा ने दो पुड़िया दी एक मे प्रसाद था, खाने के लिए, दूसरे में राख(भस्म) था उसे शरीर मे चुपड़ने(लगाने) कहा घर जाकर।
(मेरे विचार से वृद्धा वातरोग से पीड़ित थी और उसका आयुर्वेद या होमियोपैथी से सही चिकित्सा हो जाती)
वृद्धा उठी और बड़बड़ाते हुए वहां से निकली कि बार2 आने के बाद भी कोई फर्क नही पड़ा, सब बेकार है।
फिर मेरी बारी आई, मैने साधारण से कपड़े पहन रखा था जिससे बैगा ये अनुमान नही लगा पाया था कि मैं नौकरी पेशा वाला हूँ या व्यवसायी। मेरा नम्बर आते ही तुरंत पूछ बैठा- क्या काम करते हो?
मैने कहा एक कम्पनी में नौकरी करता हूं।
तुरंत उसने अंधेरे में तीर मारा- 3 साल से नौकरी में परेशानी जा रही है क्या? मैने कहा नही तो, कोई परेशानी नही। फिर उसने कहा काम का यश नही मिलता होगा? मैंने कहा ऐसा भी नही।
उसके बाद न तो उसने कुछ पूछा न ही बताया। मेरे दिए सिक्के को बिना देखे अंदर फेंक दिया। फिर चट से 2 पुड़िया बांधी, और कहा एक कहा लेना, दूसरे तो शरीर मे लगा लेना। बाहर आकर खोल कर देखा, एक मे प्रसाद तो दूसरे में राख था। प्रसाद तो खैर मैने खा लिया, राख तो रास्ते मे आने वाली नदी में डाल दिया।
मैंने उसकी परीक्षा में एकदम बकवास पाया। दरअसल अंधभक्तो ने जरूरत से ज्यादा अफवाह फैला रखी है, और भीड़ भी। इन सब चीजों में, धार्मिक मामलों में लोग अपने दिमाग का दरवाजा बंद कर लेते है, सोंचने समझने को तैयार नही होते। हम भारतीयों के मन मे बचपन से धर्म, तंत्र मंत्र जैसे मामलों में शंका, संदेह नही करने का संस्कार डाला गया होता है, फिर लोग ठगी का शिकार होते है और शिकायत करते है, खुद की बेवकूफी को दोष कभी नही देते
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