21 नवंबर 2013

दान देने के बाद वापस लेने का फल :

दान देने के बाद वापस लेने का फल :
  रवेली वाले महाराज जी की सिद्धिया मैंने की बार परीक्षा कर ली थी , उन्हे प्राप्त थी  सचमुच।  ग्राम चारामा में कई  बार मुलाक़ात होती थी।  एक माहेश्वरी गोत्र का व्यक्ति उनक पास आता था।  उसका भी एक रिश्तेदार या पहचान का एक अन्य व्यक्ति (माहेश्वरी ही ) किसी समस्या को लेकर उनके पास चक्कर लगा रहा था।  पर महाराज जी कुछ देखने के बाद उसे कुछ नहीं बताते थे  चुप ही रहते थे। धीरे धीरे मेरे कानो में यह बात पहुंची।  मैंने उत्सुकतापूर्वक पूछा महाराज जी से -तो बाद में मुझे उन्होंने बताया - यह व्यक्ति जब बालक था तो इसके पिता  जी ने एक मंदिर को अपनी कुछ जमींन  दान में दे दी थी , परन्तु रजिस्ट्री नहीं करवा पाये।  परन्तु यह बालक को पिता जी का यों  दान देना पसंद नहीं आया। बड़ा होने के बाद जब इसके हाथ में सब कुछ आया तो इसने दान दी हुई जमींन वापस ले ली। उस जमींन की कमाई से ही मंदिर में दिया जल पाता  था, पूजा वगैरह हो पाती थी।   और पुजारी के परिवार का भी पेट पलता था।  पर ये सब बंद हो गया और पुजारी सपरिवार भूखो मरने लगा।  पुजारी के परिवार सहित मन ही मन उस माहेश्वरी को श्राप देते रहे।  ऐसा करते करते पुजारी की  मृत्यु हो गयी . उधर माहेश्वरी निसंतान ही रहा और फिर  एक दिन उसके यहाँ एक बच्चे का जन्म हुआ परन्तु वह जन्म से गूंगाबहरा था। वह बालक, दरअसल उस मंदिर का पुजारी है जो पुनः जन्म लेकर आया है अपना कर्जा वसूलने।  माहेश्वरी ने बच्चे के इलाज में लाखो रुपये खर्च कर दिए पर कोई लाभ नहीं हुआ। महाराज जी बोले- अब ऐसे में उसे मैं क्या बताऊ ?
                                       मैने उत्सुकता से पूछा अब आगे क्या हो सकता है ? तो उन्होंने बताया कि  कुछ ही दिनों में उस बच्चे रूपी पुजारी का कर्ज वसूल हो जाएगा तो उसकी (बच्चे की )मृत्यु हो जायेगी। इससे दुःख झेलना पडेगा।  पर ये तो मूल धन हुआ।  ब्याज के रूप में सजा अभी बाकी है।  अब धीरे धीरे वह माहेश्वरी बहरा होने लगेगा, फिर पूरी तरह गूंगा और बहरा हो जाएगा, और ऐसा सहते सहते मृत्यु पर्यन्त ऐसा ही रहेगा। यही उसका उसका दंड है जो उसे भुगतना है।
             पाठको , यद्धपि मैं उस माहेश्वरी परिवार से न मिला , न ही उसे देख पाया , पर चारामा के जिस माहेश्वरी की पहचान से वह आया , उसे मै जानता हूँ और कई बार मिल चुका।  उससे कुछ पूछा तो उसने भी गूंगे बहरे लडके की बात स्वीकारी . 
ऐसे मामले में अगर उस परिवार से मिलने की कोशिश करता तो भी दुष्ट व्यक्ति से मुलाक़ात करना और उसके परिवार के बारे में पूछताछ करना अच्छा नहीं होता। इसलिए घटना के बारे में गहराई से छानबीन मैं नहीं कर सका।

20 नवंबर 2013

भूतनी मोटर साइकिल में पीछे बैठ गयी थी ! !

भूतनी मोटर साइकिल में पीछे बैठ गयी थी ! !
                        ये घटना तो मेरे घर की ही है, मेरे बड़े भाई साहब जो ठेकेदारी करते थे , और गाँव का खेती  वगैरह भी देख रेख किया करते थे . हैम लोग स्कुल में पढते थे।  ग्राम माटवाड़ा आने जाने के रास्ते में पंडरीपानी नामक गाँव पडता था जो कांकेर से २- कि मी लगभग दूर था।  अब तो बस्ती काफ़ी बस गयी।, पहले काफ़ी सुनसान रहता था।  रास्ते में शमशान भी पडता था और मुस्लिम कब्रिस्तान भी।  एक बार काफ़ी रात को अपनी मोटर साइकिल से ,माटवाड़ा से आ रहे थे कि पण्डरीपानी पार करने के बाद सड़क पर एक सफ़ेद वस्त्र पहने एक महिलाए मिली , और रुकने का इशारा किया , लिफ्ट देने को कहा।  परन्तु इतनी रात गए किसी महिला को लिफ्ट कैसे दे देते ? सो सरपट मोटर साइकिल भगाते गए। परन्तु शीध्र ही उन्हे पता चल गया कि वह महिला उनके मोटर साइकिल पर पीछे बैठ गयी है और उनके कंधो पर भी हाथ रखा दी है। दर कर वे मोटर साइकिल चलाते रहे और जैसे की कांकेर की सीमा में पहुंचे वह महिला जाने कहां गायब हो गयी तब घर पहुँचते पहुंचते समझ में आ गया कि कोई भटकती आत्मा/भूतनी थी।  घर आकर पूरी घटना बताया।
                          मेरे  बड़े साहब का स्वर्गवास ३ मार्च सन 1992 को हो गया। इसके पीछे भी एक भयानक कहानी से मुझे आमना सामना हुआ , और एक भयानक घटना से मुझे स्वयं को जूझना पड़ा।  शायद फिर कभी बताओ। "ऐसा भी होता है" शीर्षक से 

विश्वास तो नहीं होता पर यह सत्य है ! !



विश्वास तो नहीं होता पर यह सत्य है 
मेरा एक परम मित्र श्री सुब्रत दत्त राय जो पेशे से शिक्षक थे और युवा भी।  सरकारी नौकरी में उनकी ड्यूटी गाँवों में होती थी। एक बार अपने तीन मित्रो के साथ एक गाँव की और जा रहे थे , सामने गाव में साप्ताहिक बाजार भरा हुआ था , शाम का समय था , और वे लोग पैदल ही जा रहे थे।  अन्धेरा होने में काफी समय था , करीब १-२ घंटे। ग्रामीण सड़क पर चले जा रहे थे , कि सामने से करीब सौ मीटर दूर कुछ ग्रामीण महिलाये सर पर टोकनी आदि लिए हुए आ रही थी , बाजार करके , सामान खरीदी आदि करके।  बाकी सड़क सुनसान थी। इन लोगो के देखते देखते वे ग्रामीण महिलाये सड़क के किनारे एक आम के वृक्ष में घुसने लगी और गायब होने लगी ! ये विचित्र दृष्य देखकर को किसी को कुछ समझ नहीं आया , एक दूसरे का मुंह देखने लगे , फिर  चारो डरने लगे।  पर सुब्रत दत्त राय ,बंगाली होने के नाते इन मामलो में कुछ समझदार भी था। उसने सबको इशारा कर चुप रहने को कहा , और चुपचाप शांत होकर चलते रहने को कहा।  कुछ मिनटों के बाद ये सभी गाँव में पहुँच गए , जब जान में जान आयी और उन्होंने सुब्रत से पूछ -ये क्या हुआ था , कैसे हुआ था।  तब सुब्रत ने अपने मित्रो को बताया कि  "भटकती आत्माए " जो ग्रामीण क्षेत्रो की रहती है , वे किसी पेड़ /वृक्ष पर निवास करती है , और समय काटने के लिए जीवित आदतानुसार बाजार भी करने जाती है , इसके बाद लौट कर अपने निवास पर वापस आ जाती है ऐसा कहते है , इन्हे कोई पहचान नहीं पाता . संयोग से हमें दिखाई दे गयी। अगर इन्हे धोखे  से पुकार लिया गया तो फिर उनके पीछे पड़ जाने का खतरा होता है, ऐसा कहा जाता है , इसलिए मैंने (सुब्रत ने )चुप रहने का इशारा किया था।
                     सुब्रत दत्त राय ,मेरा गहरा मित्र था और कभी झूठ नहीं बोलता था , मै अच्छे से उसकी आदत जानता था। चूँकि चार लोग थे , सभी एक जैसा दिखाई दिया , इसलिए भ्रम विभ्रम की गुंजाइश नहीं , मैंने उसके एक दोस्त से पुष्टि भी की थी। सन 2001 के आसपास उसका( सुब्रत दत्त का ) स्वर्गवास हो गया। ऐसी घटनाये कइयो के साथ आकस्मिक रूप से घटती रहती है , अतः सावधानी रखने में क्या बुराई है ?

18 नवंबर 2013

जब मैंने बाण /मूठ की मार खायी

 जब मैंने बाण /मूठ की मार खायी :
सन १९९८-९९ के आसपास की बात थी , मै आफिस में बैठे बैठे  अपने कार्य में मशगूल था। कि अचानक मुझे घबराहट होने लगी बेहद पसीना आने लगा , तंग आकर मैं पंखे के ठीक नीचे जाकर बैठ गया अपना  छोडकर। आस पास के कर्मचारी मुझे देखने लगे।  पर मैं तो चुपचाप बैठा रहा। मुझे ऐसा लगने लगा मैं मर जाउगा , मेरी मृत्यु होने वाली है , इस प्रकार "मृत्यु भय" अकारण आने लगा , जिस पर मैं खुद भी आश्चर्यचकित था , ऐसा विचार आखिर क्यों आ रहा है मेरे दिमाग में ? फिर मैंने अपने इष्ट को याद करने लगा। शंकावश कुछ रक्षा मन्त्र जप भी करने लगा।  थोड़ी देर  में ठीक ठाक हो गया।  शाम को मैं रवेली वाले महाराज जी(तीसरे गुरु) जो रायपुर आये हुए थे , उनके पास चला गया , और अपना आज का अजीब अनुभव बताया।  उन्होंने एक नींबू मुझसे मंगवाया और कुछ पढ़कर देखने लगे फिर हंसने लगे -  तुम्हे धूलबाण मारा गया था , तुमने रक्षा मंत्र का जप किया तो रुक गया।  वापस चला गया। तुम्हारे छोटे भाई  ने किसी ग्रामीण तांत्रिक को पैसे देकर चलवाया था ! (भाई सचमुच घोर शत्रु है , मैं जानता हूँ ) . उन्होंने कहा कल फिर  उसी समय (दिन को 11 बजे) आयेगा एक बार और।  दुष्ट तांत्रिक फिर कोशिश करेगा कि संयोग से बाण लौट गया है ।  महाराज जी ने नींबू  फूंक कर दिया जेब में रखने को, रक्षा के लिए ।  दूसरे दिन- मैं फिर इंतज़ार कर रहा था आफिस में बैठे बैठे, अपना काम करते हुए , ठीक ग्यारह बजे सचमुच फिर वैसे ही लगा , आश्चर्यजनक रूप से।  अबकी बार मै तैयार भी था , सब कुछ जानकर।  मैंने थोड़ी देर  महसूस करके पुनः रक्षामंत्र जपने लगा , थोड़ी देर में सब कुछ शांत हो गया।  शाम को फिर महाराज जी से फिर मिला , तो उन्होंने बताया फिर धूलबाण लौट गया , अब सामने वाले दुष्ट तांत्रिक को पता चल गया कि, तुम्हे मालुम पड़ गया और तुमने लौटा दिया ,कल भी तुमने लौटा दिया तो उसने सोंचा कि अपने आप लौट गया होगा किसी कारण से। अब तीसरी बार कोशिश नहीं करेगा , नहीं तो उस तांत्रिक की मौत निश्चित है।  तीसरे दिन मैंने इंतज़ार किया कि फिर कुछ होता है क्या उत्सुकतावश।  पर सारे दिन वैसा महसूस नहीं हुआ। ये मेरा पहला अनुभव था बाण विद्या झेलने का। 
                   (ग्रामीण क्षेत्रो में मन्त्र-तंत्र विद्याएँ चलती है , दरअसल ये शाबर मन्त्र आधारित होते है , बाण विद्या जिसे मूठ विद्या भी कहते है - क्रूर कर्म के नाम से पुकारा जाता है , इसे बाण मारना , या  मूठ मारना भी कहते है , इससे किसी को काफ़ी पीड़ा पहुंचायी जाती है  बाद में फिर उसकी मृत्यु भी हो जाती है।  अतः ये मारण  विद्या ही है, सिर्फ थोड़े से पैसो के बदले ये मूर्ख ग्रामीण उसका दुरुपयोग कर बैठते है , या सनकवश ऐसा करते है , लौट गया तो खुद  ही मौत के शिकार हो जाते है।  हालांकि मैंने कभी इसका परीक्षण करके नहीं देखा , पापकर्म है जिसका परिणाम भुगतना ही पडता है , परन्तु मेरी जानकारी में है -इनका अस्तित्व सचमुच है पाठको के ज्ञानवर्धन के लिए सच्ची घटना लिखा ,कि कैसा लगता है, ताकि सावधान रहे, ये अंधविश्वास है ऐसा सोंचने की गलती नही करे ! )

13 नवंबर 2013

वह किडनी दान से बच गया

वह किडनी दान से बच गया :-
-आर.  के.  बाफना , रायपुर (छत्तीसगढ़ ) 
                                              मेरे पास एक दंपत्ति आये , जो मेरे पूर्व परिचित के रिश्तेदार थे।  उनकी आर्थिक स्थिति बहुत  खराब चल रही थी , इस कारण पति पत्नी के बीच बहुत तनाव रहता था। अक्सर झगड़ा होते रहता था।  (ऐसे मामलो में पत्नी अक्सर सिर पर सवार रहती है।)  दोनों भविष्य  सम्बन्धी मार्गदर्शन के लिए आये थे।  उनकी एक ट्रक भी थी , जो खराब खड़ी थी की महीनो से, और बनवाने के लिए पैसा नहीं था . हस्तरेखा में उम्र अनुसार कोई विशेष खराबी नहीं थी अत: मैंने बताया  ये केवल कुछ समय का उतार चढ़ाव है चिंता मत करो , संकट के समय धीरज रखना चाहिए न कि लड़ना झगड़ना चाहिए। महज तीन महीने में सब ठीक हो जाएगा।  फिर उन्होंने बताया कि संकट के कारण पति महोदय किडनी दान करने वाले है अपने एक साढ़ू  को, (साली साहिबा के पति को ). जिससे एडवांस भी ले लिया है।  आपरेशन की तारीख भी निर्धारित हो चुकी है और रेलवे रिजर्वेशन भी हो चुका है। आगामी ८-१० दिनों बाद वे रवाना होने वाले है ! इसकी चिंता भी उन्हें थी ! मैंने पुन: हाथ देखा और बताया इसमे ऐसा तो नहीं दीखता कि तुम्हे कोई आपरेशन या अंग भंग दिखाई देता हो  ! फिर भी आगे ईश्वर की इच्छा ! 
                                दिन बीते, रिजर्वेशन  के दिन  वे लोग ट्रेन में बैठकर रवाना हो गए।  इधर ये लोग ट्रेन में थे उधर  साढ़ू की अस्पताल में ही मृत्यु हो गयी। वे लोग जब स्टेशन पर उतर कर पहुंचे रिश्तेदार के यहाँ ,तो आगे मृत्यु की खबर का सामना हुआ  और किडनी दान से बच गए।  चैन की साँस लेकर वापस घर की ओर  आये . आगे समयानुसार उनकी स्थिति ठीक हुई, ट्रक बनवा लिया , और धंधा चलने से सारी तकलीफे दूर होने लगी अब वे सुखी है। (हस्तरेखा में रूचि रखने वालो के लिए - व्यक्ति के निम्न चन्द्र में कोई खराबी मुझे दिखाई नहीं दी , इसलिए मैंने अनुमान लगाया  कि किडनी निकाले जाने का कोई संकेत नहीं )