25 अक्टूबर 2013

कमी कहां है ?(Hindi) Where is Problem in Life ?

कमी कहां है ?
-रेणिक बाफना (हस्तरेखाविद,रायपुर) 
मो. 98279 -43154

कभी कभी किसी व्यक्ति को जीवन में संघर्ष ही संघर्ष झेलना पडता है. सारा जीवन संघर्ष में निकल जाता है समझ में नहीं आता कि जहाँ सारे दूसरे लोग  मेहनत से दिन ब दिन उन्नति करते जा रहे है वही आपकी स्वयं तमाम कोशिशो के बाद भी रास्ता नहीं सूझता।  ऐसे में व्यक्ति कभी साधुओ , कभी बाबाओं , कभी तांत्रिकों और कभी ज्योतिषियों के पीछे घूमता नजर आता है। आइये सारे खोज बीन के पश्चात कारण- सार प्रस्तुत है लोक कल्याण के लिए -
१-स्वयं का भाग्य - अगर मुसीबतो से छुटकारा नहीं मिल रहा है तो स्वयं का भाग्य दिखाए।  हो सकता है खुद का समय खराब चल रहा हो. जिससे सफलता मिलने का नाम ही नहीं लेती या रास्ता ही नहीं मिलता।  यह भी देखना चाहिए कि सारा जीवन /समय यूं ही रहेगा या कुछ समय ही ऐसा रहेगा , ताकि अनुकूल समय की प्रतीक्षा की जा सके , 
"इसमे यह भी देखना चाहिए कि किया गया कार्य अनुकूल भी है या नहीं !"
२- दूकान, संस्थान के स्थान का अभिशप्त होना -
घर की तरह दूकान संस्थान का स्थान भी अभिशप्त हो जाने से लक्ष्मी का आगमन नहीं होता,दरिद्रता दूर ही नहीं होती, अत: दूकान स्थान की शुद्धता , पवित्रता की भी जांच करवानी चाहिए। तांत्रिक जांच और बंधन भी करवा लेना चाहिए
३-काम धंधे का अनुकूल न होना -
कभी कभी काम धंधे का क्षेत्र ग्रहो के प्रतिकूल होता है , सीधा साधा सिद्धांत है जो व्यक्ति जिस मिट्टी का बना है या जिसे जिस काम के लिए ऊपर वाले ने गढ़ा है , वही  कार्य उसे सन्तुष्टि देंगे। यह कुछ हद तक कुंडली ज्योतिष तथा हस्तरेखा से भी जाना जा सकता है। पर इन क्षेत्रों में एक्सपर्ट लोग बहुत कम है। कभी कभी प्रतिकूल कार्य भी असफलता , संघर्ष को जन्म देता है . ऐसे में धंधे में परिवर्तन या धंधे के मालिक के नाम में परिवर्तन या कार्य स्थल का नाम परिवर्तन लाभदायक होता है।
4 -घर का अभिशप्त होना -
कभी कभी निवास स्थान के अभिशप्त होने से सारी मेहनत पर पानी फिर जाता है , गरीबी  लगातार बनी रहती है अत: घर की पवित्रता या शुद्धता की जांच भी करवा लेना चाहिए।  वास्तु या फिर तान्त्रिक जांच भी योग्य व्यक्तियो से करवाना चाहिए। ऐसे घरो  में लगातार गरीबी, बीमारियो , कलह आदि लक्षण पाये जाते है.
5- उच्च शक्तियों की अप्रसन्नता -
कभी कभी उच्च शक्तियां  जैसे पितर जी या कुलदेवी के रुष्ट होने सेभी गरीबी बिमारी या फिर संघर्ष ख़त्म नहीं होता , अत: ऐसी बातो के प्रति भी सावधानी से जांच सुयोग्य व्यक्तियो से करवाना चाहिए और उच्च शक्तियो की प्रसन्नता के लिए भी प्रयास किये जाने चाहिए। हालांकि विश्वास तो नहीं होता होगा पर यह सत्य है 
                      "याद रखिये कुलदेवी या कुलदेवता के नाराज होने से अन्य देवी देवता भी एक सीमा तक ही भला कर पाते है" ।
6 तंत्र सम्बन्धी बाधाये -
कभी कभी स्वयं या घर पर या कार्य स्थल पर टोना टोटका जैसे बाधाओं को भी कारण के रूप में देखा गया है। जिसके कारण गंभीर संकट भी उपस्थित हो जाते है। व्यक्ति मेहनत करता रहता है या फिर वास्तु प्रयोगो को आजमाता रहता है पर कोई फर्क नहीं पड़ ता इससे छुटकारा पाने हेतु किसी सही तांत्रिक द्वारा निवारण प्रयोग ही परेशानी दूर कर पाता है। 
 इन बातों  को लोग अंधविश्वास भी कह डालते है पर ऐसे "वैज्ञानिक सोंच" वाले भी स्वयं आस्तिक होते है और ईश्वर के अस्तित्व पर विशवास रखते हुए धार्मिक रीती रिवाजो का पालन करते देखे जाते है। दिन को जनता के सामने "नास्तिक/आधुनिक सोंच वाले" और  शाम को नारियल अगरबत्ती लेकर मंदिर की और या अँधेरे में किसी बाबा के पास ऐसे लोग देखे जा सकते है। 

वास्तु शास्त्र का सच----VASTU SHASTRA (Hindi)



वास्तु शास्त्र का सच---------
रेणीक बाफना हस्तरेखाविशेषज्ञ रायपुर (मोबा.98279-43154)

भारत में भेड़चाल की परम्परा बहुत पुरानी है , और भारतीय हजारो वर्ष से इसका आदी रहा है , किसी ने कहा दिया यदि फलां  चीज रखने से घर में धन  वर्षा होती है तो बस अधिकांश लोग देखा देखी  रखना शुरू कर देंगे , चाहे कीमत कुछ भी हो , चाहे धन आये या न आये।  करीब बीस वर्ष पूर्व वास्तु शास्त्र का चलन नहीं था , पर अचानक कुछ लोगो ने पुराने ग्रंथो में कुछ उदाहरण खोजे और  अनेक मूर्धन्य विद्वान पैदा हो गए। अनेक किताबे लिखी गयी , अनेक झूठे सच्चे प्रमाण दिए गए , एक "ऊर्जा " का प्रवाह (नेगेटिव और पॉजिटिव )का सिद्धांत समझाया गया ,जो किसी ने न देखा, न नाप जोख किया जा सका। अनेको ने इसे साइंटिफिक बताया , विज्ञानछाप प्रमाण भी दिए गए।  रहस्य  विध्याओ में मेरी स्वाभाविक रूचि के कारण मेरा भी ध्यान जाना स्वाभाविक था , परन्तु परम्परा के विरुद्ध मेरी रूचि - "पहले सच्चाई परखो फिर मानो " में ज्यादा थी।  मैंने निरिक्षण करना शुरू किया तो दैनिक राशिफल, साप्ताहिक राशिफल जैसी बकवास से ज्यादा नजर नहीं आया। पाठको के समक्ष कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूं।
1 . एक उदाहरण में एक घर में ईशान दिशा में खुली लेट्रिन , पूर्व में पीपल का वृक्ष , जिसकी शाखाएं घर तक आती थी , घर का मुख दक्षिण की और जैसा घोर दोष था , परन्तु उस घर का निवासी नगर सेठ भी बना तथा अथाह धन संपत्ति का स्वामी भी !
2 - एक अन्य उदाहरण में फैक्ट्री का मालिक जिस घर में  रहता था उसमे कुछ वास्तु दोष था , फैक्ट्री की जमीन भी तिकोनी थी , फैक्ट्री चलाने में आर्थिक कष्ट भी चल रहा था।  वास्तु सलाह के अनुसार पहले घर का वास्तु दोष कुछ तोड़ फोड़ कर सुधारा गया , बाद में फैक्ट्री का वास्तु दोष दूर करने एक मंदिर की स्थापना किया गया।  बस परिणाम आ गया।  फैक्ट्री रो धो कर डेढ़ साल चल पायी और बंद करना पड़ गया।
3 - जिस घर में श्वेत आक का पौधा हो वह घर शुभ माना जाता है  और धन संपत्ति से परिपूर्ण होता है , पर निरिक्षण में मैंने पाया कि ऐसा घर प्राय: खँडहर ही रहता है।
4 -नया घर बनवाये तो वास्तु शास्त्र का पालन करने में कोई गुनाह नहीं होता , परन्तु यह जरुरी नहीं सब कुछ अच्छा हो ही होगा।  मैंने प्रयोग के तौर पर एक वास्तु सम्मत घर नया बना कर देखा , परन्तु कोई ख़ास बात या  ख़ास उन्नति  जैसा चमत्कार नहीं देखा जितना बढ़ा चढ़ा कर बताया जाता है।
       दर असल कोई भी विद्वान किताबी ज्ञान वाला होता है कोई  वैज्ञानिक प्रयोग कर्ता या  खोजी नहीं होता।  अत  विद्वानो की भीड़ में खोजी विद्वान  कठिन होता है यदि कोई भाग्य से मिल भी जाए तो उसका संरक्षण चाहिए क्योकि हीरे कम कांच ज्यादा होते है अंधाधुंध किसी सिद्धांत को मानना भी गलत है। अत अनुभवी के अनुभव को महत्व देने के साथ खुद भी आँख कान खुला रखे तो बेहतर होता है मैंने पारद शिवलिंग रुद्राक्ष राशि रत्न पिरामिड आदि अनेक प्रयोग  निरिक्षण कर देखा और भरोसेमंद नहीं पाया।  इसी तरह लाफिंग बुड्ढा यानी हंसते हुए वृद्ध व्यक्ति की मूर्ति आदि चाइनीज वस्तुओ को भी भरोसेमंद नहीं पाया। अनेक नियम जैसे घडी, आइना सम्बन्धी नए नियम भी वास्तु शास्त्र में जुड़े मिलते है  जबकि वास्तु शास्त्र प्राचीन बताया जाता है जबकि इन चीजो का अस्तित्व भी नहीं था।

अजीबो गरीब परेशानियो के लिए सम्मोहन चिकित्सा : HYPNOTHERAPY (Hindi)

अजीबो गरीब परेशानियो के लिए हिप्नोथैरेपी (सम्मोहन चिकित्सा ) :-
-आर.  के. बाफना ,(94063-00401)(वाट्सएप)
चंगोराभाठा , रायपुर (छ.ग. )
दुनिया में मनुष्य बड़ा जटिल प्राणी  है , जितना जटिल उताना ही अजीबो गरीब परेशानिया , रोग इत्यादि।  अनेक ऐसी समस्याए या रोग देखने में आती है जो दवाइयो से ठीक नहीं होते , आखिर भाग्य या ईश्वर की इच्छा मानकर लोग चुप बैठ जाते है , वर्षो भुगतते रहते है , भाग्य या पिछले जन्म का कर्म मानकर।  कुछ उदाहरण समझने के लिए दे रहा हूं पाठको के मार्गदर्शन के लिए।

१- एक व्यक्ति को लगता था कि घर से १०० मीटर के दायरे के भीतर सुरक्षित है , उससे बाहर जायेगा तो मर जाएगा ,नतीजा जीवन भर उसी दायरे में रहने लगा।

२- एक लड़का हर 10 -15  दिन में घर से भाग जाया करता था उसके घर वाले उसे समझा बुझा कर , मार पीट कर , कमरे में बंद कर , डाक्टरो को दिखाकर ,यहाँ तक झाड़फूंक करा कर देख चुके थे , सब बेकार साबित हुआ।
(इस लड़के की सम्मोहन चिकित्सा मैंने खुद सफलतापूर्वक किया)

३- एक दुकानदार रोजाना रात्रि तीन बजे उठता , दूकान जाता , ताले शटर इत्यादि की जांच करता , फिर वापिस आकर सो जाता।  कड़कड़ाती ठण्ड हो या मूसलाधार बारिश , ये क्रम कभी नहीं टूटता।


४-एक युवा को रात्रि स्वप्न में सांप बिच्छू दिखाई देते , नींद में चीखता चिल्लाता , घर वाले वर्षो से इस ला-इलाज बिमारी से परेशान रहे।(इस मरीज को भी सम्मोहन चिकित्सा से मैंने ही ठीक किया था)

५-एक व्यक्ति दिन भर तो नियमित कार्य करता परन्तु रोज रात्रि नौ बजे से बारह बजे शो में सिनेमा देखने जाता।  पिक्चर कोई भी हो , इससे उसे कोई मतलब नहीं , एक ही पिक्चर सैकड़ो बार देख डालता।  घर वाले परेशान थे ही।  शादी के बाद भी ये क्रम नहीं टूटा तो पत्नी ने इसी आदत से परेशान हो उसे छोड़ दिया।

६- कई  व्यक्ति अनेक प्रकार के भय से पीड़ित रहते है , जैसे - ऊंचाई से भय , अँधेरे से भय , बिजली कड़कने से भय , बंद कमरे से भय ,गन्दगी से भय।  इन्हे मनोविज्ञान की भाषा में " फोबिया " कहा जाता है।  इसी तरह आत्महत्या करने की ईच्छा  होना भी खतरनाक लक्षण है। परिवारके सदस्यो को भी ऐसे मामले में गम्भीरता से ध्यान देना चाहिये।

7- एक लड़की रात्रि में सोने के बाद नींद में सांपो का झुण्ड देखा करती थी और नींद में ही चीखना चिल्लाना किया करती थी,नींद खुल जाने के बाद सब सामान्य हो जाता था। 
(इस मामले का भी सम्मोहन चिकित्सा द्वारा इलाज मैंने सफलता पूर्वक किया था)
                 ये परेशानिया दरअसल मनोवैज्ञानिक समस्याए है , जिनका मनोरोग विशेषज्ञ , मनोविश्लेषण द्वारा करते है।  इसके साथ ही सम्मोहन चिकित्सा (हिप्नोथैरेपी ) सहज और प्रभावकारी चिकित्सा साबित होती है, होमियोपैथी से  भी इसका इलाज सम्भव है । हिप्नोथैरेपी से बुरी आदते भी छुड़ाई जा सकती है,पढ़ाई में एकाग्रता बधाई जा सकती है , दर्द रहित प्रसव भी सम्भव होता है , सद्गुण विकास ,आत्मविश्वास में वृद्धि , नींद न आने की बिमारी , हकलाना निवारण आदि सम्भव है।

मेरा परिचय-आऱ के. बाफना : R.K.BAFNA- Introduction (Hindi)

मेरा परिचय - 
आऱ के. बाफना ,हस्तरेखा विशेषज्ञ , (शौकिया ) (94063-00401)
                                                                                                                                                           
                 मै , आर के बाफना, कालेज लाइफ से भी पहले हस्तरेखा विद्या को एक मजाक का विषय मानकर मजा लेता था और मजाक के तौर  पर मित्रो रिश्तेदारो को सामान्य बाते बताता रहा था विद्वान् होने का ढोग करके -
१- जैसे तुम बहुत अच्छे हो , सबका भला चाहते हो पर तुम्हारे साथ लोग बुरा ही करते है (हर व्यक्ति अपनी नजर में अच्छा ही होता है ! ) ,
२- तुम्हारे पास पैसा आयेगा पर टिकेगा  नहीं ( भला पैसा टिकने की चीज है? )
३-  आप बहुत समझदार है पर आपकी कोई कद्र नहीं करता   
४- युवा हो तो - आप किसी को बहुत चाहते हो ....... आदि आदि
 एक बार अपनी मामी जी को हाथ देखकर बताने का ढोग किया तो वो रो भी पड़ी , जबकि उस समय देखना आता ही नहीं था !
लगभग 1989 से इसकी सत्यता का प्रमाण मिलने बाद गम्भीर रूप से और जिज्ञासावश अध्ययन और प्रयोग करने लगा  , यह जानने के लिए क्या यह वाकई सच है ! या महज अंधविश्वास !
सच जाने के बाद इसका उपयोग मित्रो , जानपहचान के लोगो तथा रिश्तेदारो को मार्गदर्शन देने में उपयोग करने लगा  , बाद में उन्ही की सुझावो पर नौकरी से बचे समय पर आम लोगो को मार्गदर्शन देने लगा  जिससे हजारो लोगो को लाभ मिला . हस्तरेखा के गहन अध्ययन के लिए पश्चिमी लेखको के अंग्रेजी में लिखित हजारो रुपयो की किताबे खरीदी ( हमारे देश के लेखक धूर्त है केवल अनुवाद करके खुद की कृति बताते है ) और अध्ध्यन किया एवं प्रयोग करता  रहा ।  परम्परागत ज्योतिषियों को सामान्यतया अंग्रेजी भाषा का ज्ञान न होने से तथा खोजी प्रवृत्ति (रिसर्चर ) न होने के कारण लोगो को उचित मार्गदर्शन नहीं मिलपाता और ठगी के शिकार भी हो जाते है , एक समय बाद इन चीजो से विशवास भी उठ जाता है। 
                                  हस्तरेखा ज्योतिष वास्तव में भारतीय ऋषि मुनियो ने मनुष्य कल्याण के लिए ही रचना की।  जैन संत शांतिविजय जी ने हस्त-सामुद्रिक शास्त्र की रचना की , परन्तु भारतीयो के विशेष वर्ग ने स्वार्थवश छुपाने व कपटवश विकृत किये जाने से नष्ट भ्रष्ट हो गयी।  परन्तु भला हो विदेशी विद्वानो का जिन्होंने सारा जीवन इस खोज में खपा दिया और मिश्र, डचो , अरबियों एवं भारतीयो से इकट्ठा कर , परीक्षण कर  दुनिया के सामने प्रस्तुत कर दिया , ये विद्वान् अंगरेज , अमेरिकन, फ्रांसीसी आदि देशो के थे।  आज भी अनेक भारतीय विद्याएँ कपटी ,धूर्त , भारतीय लोगो के हाथो नष्ट भ्रष्ट हो रही है। 
                                        (मैंने दो ब्राम्हणो को देखा जिनके पास ख़ास विद्याएँ थी , मैंने परीक्षा की थी ,परन्तु एक ब्राम्हण  किसी को देना नहीं चाहता था सिर्फ़ इसलिए कि मै  उसके परिवार का नहीं जबकि उसका कोई पुत्र भी नहीं था, 
                   दूसरा इसलिए नहीं दिया क्योकि उसे धन का लालच था , जबकि उसके तीन पुत्रो में एक भी विद्याग्रहण के लायक नहीं था , तिस पर उसने वह विद्या एक गोंड जाति  के व्यक्ति से सीखा था ! दोनों ब्राम्हणो की मृत्यु के साथ विद्या भी चली गयी आगे किसी के पास नहीं जा सकी , नहीं तो मेरे जैसा सुपात्र सामने होने से मुझे मिल जाता और सैकड़ों का भला होता।)
                                 आर के बाफना यानी मै हस्तरेखा के साथ परामनोविज्ञान आदि में रूचि के चलते अन्य बाते भी सीखा और सैकड़ो लोगो का उद्धार भी किया।  एकाउंट मैनेजर के रूप में अनेक इंडस्ट्रीज में कार्य करते हुए , अपने शौक से सीखी हुई विद्याओ  का उपयोग , पिछले कुछ वर्षो से , नौकरी से बचा समय निकालकर करना शुरू किया ताकि लोगो का कुछ तो भला हो साथ ही साथ सीखे ज्ञान का सदुपयोग भी हो सके। शुरूआती दिनों में कुछ परेशानियो जैसे नींद में चीखना चिल्लाना (बहन का ), एवं घर से भाग जाने की इच्छा /बिमारी (अपने खेत के नौकर के पुत्र की ) को हिप्नोटिज्म से ठीक किया (ये प्रयोग मैंने सन 1984 में किये थे )। इसीतरह हस्तरेखा से भविष्य दर्शन  तथा जीवन के कष्टो में कमी करने के रास्ते खोजकर मार्गदर्शन दिया।
मेरे अध्ययन   :- मैंने  हायर सेकेंडरी तक विज्ञान (गणित), ग्रेजुएशन में कामर्स , फिर सी ए ( इंटर) तक की पढ़ाई की।  शौक से मनो विज्ञान , असामान्य मनोविज्ञान , मन्त्र विद्या , परा मनो विज्ञान , शिव पुराण ,भागवत पुराण ,गीता ,रामायण आदि पढ़ा।  शौक से बाइबिल, कुरआन , गुरुग्रंथ के अंश भी पढ़े। होमिओपैथी और नास्त्रेदेमस की भविष्यवाणिया भी पढ़ी। 
                                  ब्लाग  जगत में मैं क्यों आया ? इसकेपीछे एक कारण है , मैं लेख लिखता रहता था , अनेक अखबारो में मेरे व्यंग आदि प्रकाशित हुए ,  और मजा भी आया , अनेक लोग मेरे  गृह नगर में मुझे पहचानने लगे। पर सन्तुष्टि नहीं मिली।  इसी बीच अनेक वर्ष बीत  गए . लेख लिखना बंद  था परन्तु जीवन में ईश्वर की इच्छा से बहुत कुछ देखना था , वो देखना पड़ा।  फिर मेरे मन में -  अपने अनुभवो को बांटा जाए , ताकि नयी पीढ़ी के काम आये , अनेको का भला हो , भटकाव कम हो। इसलिए मेरे संस्मरण मैंने , और मेरे पुराने लेख अब ब्लॉग के जरिये प्रस्तुत कर रहा हूँ। In Search of TRUTH परामनोविज्ञान विषयक है जिसमे अजीबो गरीब घटनाओ का विवरण है जबकि MERE VICHAR में व्यंग , लेख , व्यक्ति परिचय ,असाध्य रोग जैसे विषयो पर है।  पढ़े- renikbafna.blogspot.com पर।
renikjain@blogspot.com
अपना संपर्क सूत्र हालांकि दे रहा हूँ क्योकि मेरे ब्लॉग जहा हजारो लोग पढ़ेंगे, फिर संपर्क भी करना चाहेंगे। उनसे संपर्क रख पाना, समस्याएं सुनना, रास्ता बताना संभव नहीं। निवारण करना भी संभव नही। अपने कार्य में बाधा उत्पन्न होगी। आखिर गृहस्थ हूँ मैं।

                                                                                                                                                                                               

विज्ञान मानता है पुनर्जन्म सच है ! : SCIENCE ACCEPTS REBIRTH ! (Hindi)

विज्ञान मानता है पुनर्जन्म सच है !
- रेणिक बाफना (98279 -43154 ) , रायपुर(छ ग.) भारत 
चौंक  गए न ? परन्तु यह सच है।  विज्ञान की एक शाखा है मनोविज्ञान , जिसे इतिहास प्रसिद्ध डॉ सिगमंड फ्रायड ने जन्म दिया और अनेक मनोवैज्ञानिको ने विकसित किया , जिसके आधार पर मनोविश्लेषण , मनोचिकित्सा आदि का विकास हुआ।  इसे तो आप विज्ञान की शाखा मानेंगे ? इसी की एक उप-शाखा परामनोविज्ञान विकसित हो रही है , ख़ास कर विदेशो में।  इसी शाखा के अंतर्गत सभी रहस्यमय क्षेत्रो पर वैज्ञानिक अनुसंधान  किये जा रहे है जैसे - उड़न तश्तरी , पुनर्जन्म , आत्मा , ईश्वर का अस्तित्व ,भूत प्रेत ,तंत्र मन्त्र , सूक्ष्म शरीर ,टैली पैथी  इत्यादि। अब वैज्ञानिक मानने लगे है कि पुनर्जन्म सच है।  यह बात अलग है कि विज्ञान का अधकचरा ज्ञान रखने वाले अब भी मूर्खो की तरह कहते है कि -"विज्ञान पुनर्जन्म को नहीं मानता , यह कोरा अंध विश्वास है ". पुनर्जन्म की मान्यताये हर धर्म में है , और हजारो वर्षो से है।  इस बात को ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने इसकी सच्चाई जानने प्रयोगो का सिलसिला शुरू किया।  आधुनिक भौतिक साधनो का उपयोग करके इसकी जांच पड़ताल की गयी। अनेक प्रयोगो के बाद वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे कि पुनर्जन्म कोरी कल्पना नहीं वरन एक सच्चाई है।  ब्रिटेन सोवियत संघ , अमेरिका आदि देशो में परामनोविज्ञानिको ने अनेक प्रयोग किये।  भारत इस  क्षेत्र में  कई दशको पीछे है। हालांकि बगैर जाने समझे विद्वता झाड़ने वाले लोगो की कमी नहीं इस देश में। भारत में इने गिने परामनोवैज्ञानिक अनुसंधान कर रहे है - जैसे ब्यावर (राजस्थान ) के कीर्ति स्वरुप रावत, बैंगलोर के डॉ न्यूटन।  अहमदाबाद के डॉ . एच जाना ने अपने "जरनल " में यह स्वीकार किया कि दो लोगो में पुनर्जन्म की मेमोरी पायी गयी ! (परन्तु पुरानी रिपोर्ट की डिटेल उन्होंने देने में असमर्थता जतायी ). इसके अलावा कुछेक अन्य परामनोवैज्ञानिक भारत में हो सकते है  जो अनुसंधान में लगे है ,परन्तु गुमनाम रहकर शायद वे फिजूल की आलोचनाओ से दूर रहना चाहते हो या फिर अपना हाल महान ऐतिहासिक वैज्ञानिक गैलीलियो की तरह नहीं करना चाहते।
कैसे होती है पुनर्जन्म की खोज :-
वैज्ञानिकगण पुनर्जन्म  की खोज किन विधियों से करते है यह सुधि पाठको को जानना जरुरी है।  कुछ लोगो के साथ अजीब घटनाये होती है जैसे मृत्यु हो जाने के बाद , डाक्टरों के द्वारा मृत घोषित किये जाने के बाद पुन:  जीवित हो उठते है।  ऐसे लोग मृत्यु के बाद होने वाली घटनाओ का वर्णन करते है।  हालाकि ऐसी घटनाएं हजारो में एक के साथ होती है किन्तु अनुसंधान के लिए बेहद महत्वपूर्ण ! ऐसी घटनाओ को वैज्ञानिक गहराई से व  तार्किक ढंग से विश्लेषण करते है।  कभी कभी व्यक्ति कुछ दिनों में या उठने के तुरंत बाद भूलने लगता है , ऐसी स्थिति में वैज्ञानिक हिप्नोटिज्म का प्रयोग कर सब याद दिलाते है।  यह पाया गया सभी लोग एक जैसा वर्णन करते है।  इसमे जाति ,क्षेत्र , भाषा ,आदि की भिन्नता होते हुए भी वर्णनों में पायी गयी एक- रूपता एक सच्चाई का संकेत तो देती ही है। डॉ रेमंड  मूडी इस पद्धति के विश्व प्रसिद्द वैज्ञानिक माने जाते है। उन्होंने अपने निष्कर्षो को लाइफ आफटर डेथ नामक पुस्तक में संकलित किया है।  परंतु आलोचक कहते है कि मरते वक्त दिमाग विकृत हो जाता है जिससे भ्रम विभ्रम की स्थिति आती है। 
(बचपन में राजापारा कांकेर में एक जैन महिलाए थी जिसके बारे में कहा जाता था कि वो मरकर पुन: जी उठी थी , जिससे लोग उससे डरने लगे थे , और जीवन भर कांकेर के जैन समाज ने दूरी बनाये रखा !)
                  दूसरी पद्धति में में वैज्ञानिकों ने व्यक्ति को सम्मोहन निंद्रा ( तन्द्रा या योग निंद्रा ) अवस्था में धीरे धीरे बचपन  और फिर जन्म के दौरान , फिर पिछले जन्म की याद दिलाते है।  इस तरह प्राप्त निष्कर्षो की छानबीन की जाती है।  वैज्ञानिकों ने पाया कि लगभग सभी ने जन्म के समय की बाते बताई , जन्म के तुरंत बाद अस्पताल डाक्टरो इत्यादि की बाते या वर्णन जो उसने किया वो सही पाया गया ! इसी तरह पिछले जन्मो के बारे में कही गयी बातो की छानबीन की गयी तो आश्चर्यजनक रूप से सही पायी गई।  डॉ  हेलेन वॉम्बेक इस तरह के प्रयोगो  में विश्वप्रसिद्ध हुई . उन्होंने करीब चार हजार लोगो को पिछले जन्म कि याद दिलाई  और अपने निष्कर्षो को "लाइफ बिफोर लाइफ "नामक किताब में संकलित किया। इस तरह के प्रयोग करने वाले अनेक वैज्ञानिक विदेशो में कार्यरत है।
                             भारत में एक परामनोवैज्ञानिक डॉ प्रीती  जैन ने इमेजिन टी.वी।  पर राज पिछले जन्म का नामक सीरियल के द्वारा प्रस्तुत करने का दुस्साहस किया , परिणामस्वरुप चवन्नी छाप पत्रकारो, अधकचरे विज्ञान- शिक्षितो  की आलोचना का सामना करना पड़ा। एक दुर्जन वकील ने तो न्यालय में अंधविश्वास फैलाने के विरुद्ध दावा ही ठोक दिया। सुधि पाठकगण स्वयं निर्णय करे कि भारतीय जनमानस जो खुद को कितना पढ़ालिखा समझता है  वह कितना पिछड़ा है , दशको पीछे या फिर शताब्दियों पीछे ?

आत्मा का वजा तौला गया -
मरते हुए किसी व्यक्ति को यदि तराजू पर रख दिया जाए और जैसे ही व्यक्ति की मृत्यु हो और शारीर के वजन में कमी हो तो यह वजन आत्मा जैसी किसी चीज का ही होगा। यही प्रयोग वैज्ञानिकों ने किया बार बार . एक ऐसे तराजू का उपयोग किया गया जो एक ग्राम का हजारवा हिसा ठीक ठीक तौल सके।  हर बार एक प्रयोगो में एक छटाक वजन कम होते पाया गया। ! यानी मनुष्य की आत्मा का वजन एक छटाक के लगभग होता पाया गया। (यह रिपोर्ट कई  वर्षो पहले रीडर्स डाइजेस्ट में  छपी थी ). आलोचक पूछते है क्या चींटी की आत्मा का वजन भी यही होगा ? और हाथी का ? जवाब बुद्धिमान पाठक भी स्वयं दे सकते है।  कि प्रयोग मरते हुए मनुष्य पर किया गया था न कि हाथी और चींटी पर !
सूक्ष्म शरीर को परखा गया -
वैज्ञानिकों ने एक ऐसे कमरे का उपयोग किया जिसमे प्रकाश की एक किरण भी न जा सके . अंदर अनेक भौतिक यंत्र लगाए गए जो प्रकाश का एक  भी कण (फोटोन ) की उपस्थिति भी बता सके।  अब उन्होंने कमरे के अंदर कुछ वस्तुए अलग अलग स्थानो पर चिपकाए दिए  जिसकी जानकारी बेहद गुप्त रखी गयी . फिर एक व्यक्ति को गहन तन्द्रा में ले जाकर सूक्ष्म शरीर की यात्रा कराई गयी (अंग्रेजी में इसे क्लेरवायेंस/clairvoyace कहते है ). आश्चयर्जनक रूप से गहन तन्द्रा में व्यक्ति ने उस घुप अँधेरे में रखे वस्तुओ का स्थान ठीक ठीक बता दिया ! जबकि शारीरिक रूप से व्यक्ति उस उस कमरे से दूर था ! उधर संवेदनशील उपकरणों ने थी उसी समय कमरे में फोटोंन  कण (प्रकाश कण ) की उपस्थिति दर्शायी , कमरे में इधर उधर घूमते हुए ! (यह रिपोर्ट भी की वर्षो पहले रीडर्स डाइजेस्ट में छपी थी )
एक नयी जानकारी पेश करता हूं -हिस्टरी चैनल में अनसील्ड  फ़ाइल नामक सीरियल चल रहा है , यह देखने
 लायक है , इसके अनुसार ब्रम्हांड  दूसरे ग्रहों से प्राणी हजारो वर्षो से पृथ्वी पर आते रहे है . इसका मतलब  "देवता" हो सकते है . मेरा भी काफी पहले से अनुमान था  धरती पर मनुष्य जाति किसी दूसरे ग्रह से आरोपित किया गया हो , क्योकि डायनासोर जैसे प्राणियों से कोई साम्यता दिखाई नहीं देती। 

"   मूर्ख   सत्य का एक ही अंग देखता है , विद्वान सत्य के सौ अंगो को देखता है  "   -थेर गाथा

परम्पराए जो धर्म बन गयी :TRADITIONS HAVE BECOME RELIGIONS (Hindi)



                                                                                                 
परम्पराए जो धर्म बन गयी-

                                                                                               


लेखक--रेणिक बाफना,रायपुर , हस्तरेखा विशेषज्ञ (94063--00401,98279&43154)
                                                                                     

सभी धर्मो में अधिकाँश धार्मिक नियम तत्कालीन परिस्थितियों की सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार बने है, इनका धर्म से कोई लेना देना न होते हुए भी इन्हे लागू करने  धर्म ध्यान, पाप पुण्य की चाशनी में डुबाया गया ताकि इनका पालन सख्ती से हो। सिर्फ प्रबुद्ध वर्ग के पाठको के लिए कुछ उदाहरण प्रस्तुत है -
दाह संस्कार --
आदि मानव मृत शरीरो को यत्र तत्र फेंक देता था , इससे लाशो के सड़ने से दुर्गन्ध व बीमारिया फैला करती थी।  दूसरे जिस शरीर से रिश्ता रहा, लगाव रहा उसकी दुर्दशा देखने में बुरा लगता था।  आखिर शरीर ही तो रिश्ते की पहचान थी।  तब मानव ने दाह संस्कार पद्धतियाँ विकसित की।जिन स्थानो पानी की कमी, सूखी बंजर जमीनें थी  वहाँ दफनाने की परम्परा विकसित हुई , जहां लकड़िया उपलब्ध थी ऐसे जंगली स्थानो में जलाने (दाह संस्कार ) की परम्परा विकसित हुई। बाकी कर्मकाण्ड धार्मिक धंधेबाजो के वर्ग ने अपना पेट भरने और धन संपत्ति ठगने के लिए जोड़ा। 
रात्रि भोजन :-
प्राचीन काल  में बिजली नहीं थी , लोग अन्धेरा होते ही दीपक /लालटेन / चिमनी  जलाते थे,इसी रोशनी में भोजन इत्यादि करते थे।  परन्तु चिमनी /दीपक के आसपास सभी प्रकार के कीड़े मंडराया करते थे , वे ही भोजन सामग्री पर गिरते थे  और भोजन के साथ मानव पेट में चले जाते थे। दूसरी बात रात्रि में भोजन के बाद लोग जल्दी सो जाया करते थे , अक्सर ८-९ बजे तक।  इससे पाचन सम्बन्धी रोग भी हो जाते थे , अत: तकालीन वैद्यों की सलाह से रात्रि भोजन के त्याग की परम्परा चली।  पहले धर्म गुरु भी चिकित्सक का दायित्व सम्भालते थे।  आज परिस्थितिया बदल चुकी है , बिजली के जमाने में लैम्प / बल्ब दूर दूर रहता है , मच्छररोधी जालिया घरो में लगी रहती है , टेलीविजन ने लोगो का सोना १२-१ बजे तक टाल दिया है। अत: रात्रि भोजन त्याग के नियम उतने आवश्यक नहीं लगते।
छान कर पानी पीना :-
राजस्थान में पानी की बेहद कमी थी , वर्षा का जल कुओ में एकत्रित किया जाता था , फिर उसका उपयोग पिने व् अन्य कार्यो में लिया जाता था।  चूकि एकत्रित पानी में कीड़े भी पनपते थे , अत: बचाव के लिए कपडे से छान कर उपयोग करने की परम्परा चली। इससे कीड़ो का मृत शरीर हट जाता था।  बाद में पानी उबालने की भी परम्परा चली।  आधुनिक विज्ञान ने खोजा कि कीटाणु इतने सूक्ष्म होते है कि छानने से भी अलग नहीं होते अत: जीवित या मृत रूप में पेट में पंहुच जाते है।  अत: आज के जमाने में एक से एक वाटर फ़िल्टर बाजार में उपलब्ध है , मेरे विचार से इनका उपयोग बेहतर होगा न कि अंधाधुंध धार्मिक नियम का।


मुँह पत्ती का प्रयोग :-
जैन धर्म की कुछ शाखाओ में मुंह पत्ती का प्रयोग किया जाता है इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि इससे जीव हिंसा कम  होती है , ये बात मेरे गले नहीं उतरती।  हालांकि आपरेशन के समय डाक्टरो द्वारा भी मुंह पत्ती (पट्टी ) का प्रयोग किया जाता है , इंफेक्शन रोकने। परन्तु ये अंहिसा नियम के अनुसार होता तो चौबीस तीर्थंकरो में से कम से कम एक के द्वारा स्वयं भी पालन किया जाता और अपने श्रावको को ऐसा करने को कहते। परन्तु जैन धर्म में सर्वोच्च पद प्राप्त किसी भी तीर्थंकर ने अपने मुंह में पट्टी  नहीं बाँधी ! इसका दूसरा पक्ष यह है कि जीव जगत तो चारो ओर है , आप इससे बच नहीं सकते , आपका शरीर तो सूक्ष्म जीवो से भरा हुआ है ,भोजन पचाने का काम कीड़े ही करते है, दही भी कीड़े ही जमाते है, आप सोफे पर बैठे  या जमीं पर चले , कीड़े तो मरेंगे ही ,सूक्ष्म जीव तो सांस के साथ अंदर बाहर होते रहते है , किसी भी तीर्थंकर ने सांस लेना बंद नहीं किया या जमीं पर चलना बंद नहीं किया , क्या मुंहपत्ती (पट्टी ) बांधकर जैन साधूगण तीर्थंकरो से भी आगे निकलेंगे ?

     आजकल जैनसाधु दर्शन हेतु जाते वक्त घडी व् मोबाइल बाहर रखने के नियम बनाने लगे है , तर्क देते है कि घडी और मोबाइल में बैटरी रहती है , उसमे विद्युत् रहता है इससे अहिंसा का नियम खंडित होता है -जीव हिंसा होती है।  यह काफ़ी हास्याप्रद लगता है क्योकि मनुष्य शरीर तो  स्वयं विद्युत संकेतो से हिलता डुलता है ,चलता है , उस  विद्युत का क्या करोगे ?