7 अक्टूबर 2016

टोनही की करतूत

(ये सत्यकथा बिलासपुर से प्रकाशित प्रज्ञा तंत्र सन 2004 में प्रकाशित हो चुकी है, मेरे परिवार में ही घटी थी)
पिछली माँ पर सवार भूतनियों के निवारण के बाद सब ठीक हो गया,सुखशांति छा गयी, घर में माँ को एक पुत्री का जन्म हुआ(मेरी सबसे बड़ी बहन), पर कालान्तर में उसकी भी मृत्यु हो गयी। इसके बाद 10 वर्षो तक कोई संतान नहीं हुई।
इधर मेरे मामाजी बस्तर के जंगलों में लकड़ी का ठेका लिया था, इस सिलसिले में हमारे कांकेर स्थित घर आये।रात्रि में विश्राम किया तो घर में भारीपन और पारलौकिक कर्मो का आभास हुआ। सबेरे उठकर मेरी दादी से पूछा-सगी जी घर में सब ठीक ठाक तो है न?रात्रि में कुछ भारीपन लगा और अजीब2 चीजे दिखाई दी। तब दादी ने जवाब दिया-पता तो नहीं लगता, पर कुछ गड़बड़ जरूर लगती है कभी कभार। आपको कुछ समझ में आया तो देखो न।
मामाजी तो सब ताड़ चुके थे।उन्होंने दादी से कहा-मेरे आने की बात गुप्त रखना,किसी से न कहना, दुबारा आने की बात भी गुप्त रखना, किसी से चर्चा भी न करना, अन्यथा गड़बड़ हो सकती है।मेरी जान भी खतरे में पड़ सकती है।मैं दुबारा आऊंगा तो सब ठीक कर दूंगा।

मामाजी के आगमन की बात गुप्त रखी गयी,जैसा कि पूर्व निर्धारित था। मामाजी अपने साथ एक झोला लाये थे जिसमें बन्दर की खोपड़ी, उल्लू की हड्डी पंख, आदि नाना प्रकार की सामग्रियां थी। उस रात उन्होंने दादी को कहा आज नौकरानी को घर मत जाने दो यहीँ रहे,रात को जरुरत पड़ेगी। फिर 2 बड़े बोरे और मिटटी खोदने के लिए फावड़ा,गैती आदि का इंतजाम करवाया। बोरो को पहनने के लिए सिर व् हाथ डालने के लिए छेद/कट भी करवाया। लगभग आधी रात को  नौकरानी को सारे कपडे उतार कर सिर्फ बोरा पहनने को कहा, नौकरानी ने वैसा ही किया, खुद मामाजी ने भी सिर्फ बोरा ही पहना। इसके बाद लघु पूजा करके गाय बांधने वाले कोठे में गए और एक स्थान खोदने को कहा। उस स्थान पर खोदने से एक पोटली मिली,जिसमे चूड़ियां,काला कपड़ा, हड्डियां,सिंदूर आदि सामग्री मिली। ये सभी सामान निकालकर घर के पीछे दूध नदी में गड्ढा कर दफना दिया। इसके बाद पूजा कर, घर में सभी को पूजा का अभिमंत्रित जल पीने को दिया। फिर विभिन्न सामग्री घर के चारो कोनो में गढ्ढाकर गाड़ दिया। इससे हमारा घर बंधन हो गया। ये सारे काम आधी रात के बाद ही हुए।पूजा का जल नौकरानी ने भी पीया। फिर सब आराम से सो गए।

सबेरे जल्दी उठकर मामाजी घर के सामने कुर्सी डालकर तमाशा देखने बैठ गए। अब तक मेरी दादी को ठीक से कुछ भी समझ में नहीं आया था कि, हुआ क्या था,किसने क्या किया था,या क्या हुआ था। पूछने पर मामाजी टाल देते थे,और बोलते थे खुद ही देख लेना।

सबेरे ही थोड़ी देर बाद जैन मंदिर के पीछे से एक महिला चिल्लाते हुए निकली,कौन है वो दुष्ट जिसने मेरा सारा तंत्र मंत्र फेल किया, मैं उसको छोडूंगी नहीं। मैं उसे देख लुंगी। सुनकर मेरी दादी हतप्रभ रह गयी, उधर मामाजी मंद2 मुस्कुरा रहे थे। फिर मेरी दादी के गुस्से का ठिकाना न रहा,उस महिला को धक्के देकर निकाल दिया, मेरे घर में भोजनपानी भी बंद किया और चेतावनी दी कि शहर में भी रही तो उसकी खैर नहीं। इस टोनही दुष्ट महिला में माँ की कोख बाँध दी थी जिससे 10 वर्षो से बच्चे नहीं हुए थे, इसके बाद ही हम सब का जन्म हुआ।और तो और नौकरानी के यहाँ भी बच्चे हुए,वो भी निसन्तान थी पहले।

वो टोनही कौन थी?

हमारा परिवार नगर सेठ था,राजाओं के जमाने में दो गाँव की मालगुजारी भी मिली हुई थी,धन संपत्ति भी अथाह थी,दादी बहुत तेज स्वभाव की थी मोहल्ले में सभी उससे डरते थे।धार्मिक कट्टरता मेरे परिवार में कभी नहीं रही।
हमारे दूर के रिश्ते की एक विधवा महिला जो दुर्ग के पास किसी गाँव में रहती थी,उसे गाँव वालों ने टोनही करार देकर निकाल दिया था। चूँकि हमारा परिवार पढ़ा लिखा था और धार्मिक कट्टरता से परे था, इसलिए धार्मिक ढकोसला चोंचला नहीं मानता था। मेरी दादी ने उस विधवा महिला को आश्रय दे दिया,घर में दो रोटियां ही तो खायेगी और जीवन बिता लेगी, हमारा क्या घाट जाएगा। सुविधा के तौर पर बाद में सामने जैन मंदिर के पीछे एक कमरा उसे दिला दिया गया रहने को, सिर्फ भोजन करने दोनों समय वो आती थी।
दुष्ट केवल दुष्ट होता है,दुष्टता व कपट करना उसका स्वभाव होता है,चाहे वो रिश्तेदार ही क्यों न हो।यहाँ तक कि सगा भाई भी अगर दुष्ट और कपटी स्वभाव का हो तो अवसर मिलने पर खून का रिश्ता भुलाकर दुष्टता से बाज नहीं आयेगा, ज्योतिष की भाषा में उसे शत्रु ही माना जाएगा। इसी शरणागत विधवा महिला के कर्म आप पढ़ चुके, जिस थाली में खाया उसी में छेद किया।

दर्जन भर भूतनियों का उत्पात

(यह लेख सन 2004 के बिलासपुर(छग) से प्रकाशित प्रज्ञा तंत्र नामक पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है)

ये सत्य घटना कई दशक पुरानी है हम भाई बहनों का जन्म भी नहीं हुआ था शायद सन1940 के भी पहले का।

मेरी माँ की शादी हुई थी उस समय की।

कहते है जिसका घन कमजोर हो उस पर भूत प्रेत आसानी से वार कर बैठते है। मेरी माँ कमजोर/कच्चे घन की थी। उधर मेरे बड़े मामाजी श्री मांगीलाल जी कांकरिया (राजनांदगांव निवासी), बहुत पंहुचे हुए गृहस्थ और औघड़ सिद्धियां प्राप्त थे। माँ के बताए अनुसार वे हर अमावस्या को शमशान घाट जाते थे और अनामिका उंगली से रक्त निकालकर चढ़ाते थे ।जैन जाति का होने से वे पशु पक्षियों की बलि नहीं चढा सकते थे।

शादी के बाद प्रथम बार माँ जब मायके आयी और कुछ रूककर वापस ससुराल जाने लगी तो प्रथानुसार मोतीचूर के लड्डू (बूंदी के लड्डू), मेंहदी इत्यादि पैक करके साथ में भेजा गया। ससुराल पंहुचने के बाद माँ की मानसिक स्थिति बिगड़ गयी। मानो हिस्टीरिया की शिकार बन गयी।कभी हंसती, कभी रोती, सर पर घूँघट न रखती, (जबकि इसकी सास/मेरी दादी बड़ी खुर्राट महिला थी)।कभी नाचती कभी गाती ,कभी भोजन करती तो बस करती ही चली जाती,मिठाई विशेष रूप से बहुत खाती।
दादी ने डाक्टरों को दिखाया,मारा पीटा, लेकिन सब बेकार,कोई असर ही न होता।थक हार कर माँ के मायके खबर किया गया। जब दादी मांगीलाल जी,राजनांदगांव को खबर करने की बात कह रही थी ,तब माँ बोली उसको क्यों बुलाते हो?उसको बुलाने की क्या जरुरत? इस समय तक हिस्टीरिया रोग ही मान रही थी दादी ,डाक्टरों के अनुसार।

समाचार सुन बड़े मामाजी(मांगीलाल जी कांकरिया)आये, सारी बाते सुनी और माजरा समझ गए। उन्होंने निम्बू मंगवाया, माँ को सामने बिठाया और बोले सच2 बता तू कौन है,कहाँ से आयी है?वरना अभी निम्बू काटता हूँ।तब शरीर में घुसी भूतनियों ने डरकर सच बोलना शुरू कर दिया।
उन्होंने बताया कि वे संख्या में 10-12 है,राजनांदगांव के एक चौराहे से जब माँ रिक्शे से गुजरी बस स्टैंड जाने, तो मेंहदी और मिठाई की सुगंध से आकर्षित होकर वे सब की सब साथ में आ गयी।भूतनियों ने ये भी बताया कि पहले वे लोग अलग2 लोगो को पीड़ित करती थी,तांत्रिको ने उतारा कर करके चौराहे पर छोड़ दिया, तब से सब के सब उसी चौराहे पर रहती थी। सब जानकर मामाजी ने तुरंत बंधन कर दिया। उस समय मामाजी उत्साही युवा थे, अतः सारी भूतनियों को कैद करके एक बरनी (कांच का बर्तन) में डाल कर बंद कर दिया,और एक दो दिन वैसे ही रहने दिया ताकि लोग देखे भूतप्रेत सचमुच होते भी है या नहीं।मोहल्ले के बहुतो ने देखा, बरनी में दर्जन भर सफ़ेद छायाएं महिलाओं की तरह, लहराते बाल,गड्ढो की तरह आँखे, मक्खी मच्छर की तरह भिनभिनाती आवाजो में बोलती -हमें बाहर निकाला, हमें छोड़ दो।
मामाजी ने बाद में जंगल में गड्ढा खुदवा कर बरनी को गड़वा दिया ताकि वे भूतनियां फिर किसी को परेशान न कर सके।

5 अक्टूबर 2016

विचार करने की विविध विधियां

'विचार करने" की विविध विधियां-
ज्योतिष से भी बड़ा और गूढ़ विद्या है-विचार करना। इसे तांत्रिक और सिद्धो द्वारा "विचार करना"  ही कहा जाता है अतः इसे इसी नाम से पुकारूंगा।
विचार करना दरअसल किसी व्यक्ति की दैवी/अज्ञात  समस्या का मूल कारण जैसे -
क्यों हुई
कब हुई
कैसे हुई
आदि कारणों को जानना होता है। ज्योतिष विद्या से बड़ी इसलिए मानूँगा क्योकि कुंडली ज्योतिष, हस्तरेखा से यह नहीं जाना जा सकता। इन दैवी शक्ति युक्त विद्या के ज्ञाता देशभर में बहुत ही कम है, 1000 सिद्धो के बीच शायद 10 या सिर्फ 1
इस विद्या की जरुरत वैसा ही है जैसा डाक्टर पहले डायग्नोसिस करता है यानी रोग का निर्धारण करता है, फिर उसका उपचार। यानी मलेरिया हो तो उसकी दवा, टायफाइड हो तो उसकी दवा।
मैंने अपने बुरे दिनों में भटकते हुए अनेक सिद्धि प्राप्त ज्ञानियों से भेंट किया और उनकी विधियों को बड़ी उत्सुकता से देखा भी। समस्या का मूल कारण जानने के बाद अंततः छुटकारा मिला भी। अब सामान्य ज्ञान के लिए दे रहा हूँ। पर पाठक सावधान रहे क्योकि धंधेबाज कुछ भी ऊलजलूल बताकर धन ऐंठ लेते है।

1-सरंगपाल का तांत्रिक-

रिसाल नाम का तांत्रिक हनुमान जी या किसी देवीदेवता के कांच में फ्रेम किये तस्वीर पर सिक्का(1 या 5 रु का) मन्त्र पढ़कर चिपकाया करता था, यदि हाँ होता तो सिक्का चिपक जाता, ना का जवाब होता तो सिक्का गिर जाता/नहीं चिपकता। सिक्का बिना किसी अन्य पदार्थ की सहायता के चिपकता था। हमलोगों ने खुद भी  उसी तांत्रिक के सामने कई बार कोशिस की पर    कभी नहीं चिपका। उससे प्राप्त जवाब सही भी साबित हुए। कई बार अलग2 दिनों में परीक्षा  भी लिया था।
कांच में धातु का सिक्का चिपकना आश्चर्यजनक था, सिक्के के ऊपर सिक्का चिपकना और भी ज्यादा जैसे चुम्बक से चिपका हो।कोई फ्रॉड नहीं होता था।

2-सिक्के में विचार-

कुछ लोग 1, 2या 5 का सिक्का लेकर मन्त्र पढकर सिक्के को घूरते है, उसमे जो छवि दिखाई देती है, उसके अनुसार वे प्रश्न का जवाब देते है। ये विद्या कइयो के पास दिखाई देती है, पर हर बार सही हो कोई जरुरी नहीं। दरअसल ये विद्या सही तो है, पर सही -गलत होने के पीछे साधक की तपस्या, साधना, अहंकार आदि पर निर्भर होती है।क्योंकि साधको को भी दिव्य व्यक्ति होने का अहंकार हावी हो ही जाता है, ठीक वैसे जैसे धनवान हो जाने पर हो जाता है।

3-पीपल के पत्ते से विचार-

कांकेर के पास एक गाँव में एक ग्रामीण तांत्रिक था/है। जो पीपल का एक पत्ता लेकर अभिमंत्रित कर उसमें देखता था और बताता था। इतना सटीक कि देखकर ही बता देगा कि आप घर से भिन्डी की सब्जी खाकर आ रहे है, या बीबी से लड़कर आ रहे है और किस प्रकार की बाते/गालियां/डायलाग आपने बीबी से और बीबी ने आपसे कहा।(इस दुर्लभ व्यक्ति से मैं न मिल सका, न परीक्षा कर सका)

4- थाली में पानी भरकर गेंहूँ दाना द्वारा-

कांकेर के पास ही एक गाँव में एक व्यक्ति मिला जो थाली में पानी भरकर फिर गेहूं का दाना डालता, उन्हें तैरते देखकर बाते बताता, गहरी परीक्षा या अनेक बार परीक्षा न कर पाया।

5- भड़गांव वाले बाबा-

भड़गांव में बाबा रहते थे/है जो थाली/परात में पानी भरकर उसमें जलता कपूर तैराते थे और उसे देखकर बताते थे।तीन बार परीक्षा कर चुका, बेहद सही पाया। बिना पूछे ही मेरे मन का प्रश्न बता दिया साथ में उत्तर भी एकदम सही2।

6-रवेली वाले महाराज-

रवेली वाले महाराज एक घर से लाया नींबू लेकर उसे अभिमंत्रित करते फिर कान से लगाकर सुनते, उसमे छवि/छाया देखते और बताते थे।सारी बाते सत्य होती थी ,अनेक बार परिक्षा कर चुका था। वैसे महाराज अनेक बार पूजा में चढ़ाये गए फूल आदि चीजो को भी अभिमंत्रित कर उसमें देखते थे।

7-डौंडी वाले महाराज-

ये महाराज जी पीड़ित व्यक्ति या घर के सदस्य से निम्बू लेकर दिए के लौ के ऊपर तपाते है, जब धुंवा जम जाए तो एक कागज़ पर उसकी छाप लेते है।ऐसा तीन बार करते है। फिर तीनो छाप को लेंस से देखकर बताते है। निम्बू काटकर उससे निकले बीजो की संख्या के आधार पर भी निष्कर्ष निकालते है।

8- चालीसगांव वाले बाबा-

ये बाबाजी देखने जानने के लिए किसी माध्यम का प्रयोग नहीं करते थे। किसी व्यक्ति को देखते और पूछते -क्या नाम है?कहाँ से आये हो?
इन दो प्रश्नों के बाद बिना कुछ पूछे  प्रश्न और उनके उत्तर बता देते। काफी प्रसिद्ध थे पूरे देशभर में। मैंने भी परीक्षा लिया और आश्चर्यजनक पाया।

9-भीखम महाराज-

कांकेर में एक भीखम महाराज(असली नाम बृजमोहन शर्मा) रहा करते थे, राजाओं के जमाने में राज पुजारी थे। कोई पूछने जाए तो एक सिक्का जमीन पर रखवाते, दो अगरबत्ती जलाते, फिर माथे पर हाथ रखकर बोलते-चले आओ बाबा, इसके बाद जमीन पर रखे सिक्के पर अगरबत्ती घुमाते,फिर खुद की हथेली पर घुमाते, और इसके बाद हथेली में देखते हुए बुदबुदाते हुए बात करते और पूछी गये प्रश्न का उत्तर बताते। अनेक बार परीक्षा का सौभाग्य मिला, जो बताया गया वो पत्थर की लकीर साबित होता था।

10- मेरे मामाजी की विधि-

मेरे सगे मामाजी (राजनांदगांव, नाम-स्व.मांगीलालजी कांकरिया)जो औघड़ तंत्र साधक थे, उनके पितामित्र जो महाप्रसाद  और गुरु भी थे, उनकी विधि थी वे एक दिया जलाते, मन्त्र पढ़कर दिए की लौ में देखते फिर प्रश्नों के उत्तर बताते। एकदम सही होते थे।
ये दिए की लौ वाली विधि अनेको को अपनाते देखा था बाद में। लेकिन कइयों की बतायी बाते गलत भी निकलती थी। पर मामाजी या उनके महाप्रसाद की बाते कभी गलत नहीं हुई।
(मैं फिर सावधान करना चाहूंगा कि अनेक लोग इस तरह का नाटक करके लोगो को बताया करते है, सिद्धि प्राप्त होने का नाटक, मुझे भी ऐसे नकली लोग मिले, अतः परीक्षा से ही सच्चे/गलत की पहचान होती है)