(ये सत्यकथा बिलासपुर से प्रकाशित प्रज्ञा तंत्र सन 2004 में प्रकाशित हो चुकी है, मेरे परिवार में ही घटी थी)
पिछली माँ पर सवार भूतनियों के निवारण के बाद सब ठीक हो गया,सुखशांति छा गयी, घर में माँ को एक पुत्री का जन्म हुआ(मेरी सबसे बड़ी बहन), पर कालान्तर में उसकी भी मृत्यु हो गयी। इसके बाद 10 वर्षो तक कोई संतान नहीं हुई।
इधर मेरे मामाजी बस्तर के जंगलों में लकड़ी का ठेका लिया था, इस सिलसिले में हमारे कांकेर स्थित घर आये।रात्रि में विश्राम किया तो घर में भारीपन और पारलौकिक कर्मो का आभास हुआ। सबेरे उठकर मेरी दादी से पूछा-सगी जी घर में सब ठीक ठाक तो है न?रात्रि में कुछ भारीपन लगा और अजीब2 चीजे दिखाई दी। तब दादी ने जवाब दिया-पता तो नहीं लगता, पर कुछ गड़बड़ जरूर लगती है कभी कभार। आपको कुछ समझ में आया तो देखो न।
मामाजी तो सब ताड़ चुके थे।उन्होंने दादी से कहा-मेरे आने की बात गुप्त रखना,किसी से न कहना, दुबारा आने की बात भी गुप्त रखना, किसी से चर्चा भी न करना, अन्यथा गड़बड़ हो सकती है।मेरी जान भी खतरे में पड़ सकती है।मैं दुबारा आऊंगा तो सब ठीक कर दूंगा।
मामाजी के आगमन की बात गुप्त रखी गयी,जैसा कि पूर्व निर्धारित था। मामाजी अपने साथ एक झोला लाये थे जिसमें बन्दर की खोपड़ी, उल्लू की हड्डी पंख, आदि नाना प्रकार की सामग्रियां थी। उस रात उन्होंने दादी को कहा आज नौकरानी को घर मत जाने दो यहीँ रहे,रात को जरुरत पड़ेगी। फिर 2 बड़े बोरे और मिटटी खोदने के लिए फावड़ा,गैती आदि का इंतजाम करवाया। बोरो को पहनने के लिए सिर व् हाथ डालने के लिए छेद/कट भी करवाया। लगभग आधी रात को नौकरानी को सारे कपडे उतार कर सिर्फ बोरा पहनने को कहा, नौकरानी ने वैसा ही किया, खुद मामाजी ने भी सिर्फ बोरा ही पहना। इसके बाद लघु पूजा करके गाय बांधने वाले कोठे में गए और एक स्थान खोदने को कहा। उस स्थान पर खोदने से एक पोटली मिली,जिसमे चूड़ियां,काला कपड़ा, हड्डियां,सिंदूर आदि सामग्री मिली। ये सभी सामान निकालकर घर के पीछे दूध नदी में गड्ढा कर दफना दिया। इसके बाद पूजा कर, घर में सभी को पूजा का अभिमंत्रित जल पीने को दिया। फिर विभिन्न सामग्री घर के चारो कोनो में गढ्ढाकर गाड़ दिया। इससे हमारा घर बंधन हो गया। ये सारे काम आधी रात के बाद ही हुए।पूजा का जल नौकरानी ने भी पीया। फिर सब आराम से सो गए।
सबेरे जल्दी उठकर मामाजी घर के सामने कुर्सी डालकर तमाशा देखने बैठ गए। अब तक मेरी दादी को ठीक से कुछ भी समझ में नहीं आया था कि, हुआ क्या था,किसने क्या किया था,या क्या हुआ था। पूछने पर मामाजी टाल देते थे,और बोलते थे खुद ही देख लेना।
सबेरे ही थोड़ी देर बाद जैन मंदिर के पीछे से एक महिला चिल्लाते हुए निकली,कौन है वो दुष्ट जिसने मेरा सारा तंत्र मंत्र फेल किया, मैं उसको छोडूंगी नहीं। मैं उसे देख लुंगी। सुनकर मेरी दादी हतप्रभ रह गयी, उधर मामाजी मंद2 मुस्कुरा रहे थे। फिर मेरी दादी के गुस्से का ठिकाना न रहा,उस महिला को धक्के देकर निकाल दिया, मेरे घर में भोजनपानी भी बंद किया और चेतावनी दी कि शहर में भी रही तो उसकी खैर नहीं। इस टोनही दुष्ट महिला में माँ की कोख बाँध दी थी जिससे 10 वर्षो से बच्चे नहीं हुए थे, इसके बाद ही हम सब का जन्म हुआ।और तो और नौकरानी के यहाँ भी बच्चे हुए,वो भी निसन्तान थी पहले।
वो टोनही कौन थी?
हमारा परिवार नगर सेठ था,राजाओं के जमाने में दो गाँव की मालगुजारी भी मिली हुई थी,धन संपत्ति भी अथाह थी,दादी बहुत तेज स्वभाव की थी मोहल्ले में सभी उससे डरते थे।धार्मिक कट्टरता मेरे परिवार में कभी नहीं रही।
हमारे दूर के रिश्ते की एक विधवा महिला जो दुर्ग के पास किसी गाँव में रहती थी,उसे गाँव वालों ने टोनही करार देकर निकाल दिया था। चूँकि हमारा परिवार पढ़ा लिखा था और धार्मिक कट्टरता से परे था, इसलिए धार्मिक ढकोसला चोंचला नहीं मानता था। मेरी दादी ने उस विधवा महिला को आश्रय दे दिया,घर में दो रोटियां ही तो खायेगी और जीवन बिता लेगी, हमारा क्या घाट जाएगा। सुविधा के तौर पर बाद में सामने जैन मंदिर के पीछे एक कमरा उसे दिला दिया गया रहने को, सिर्फ भोजन करने दोनों समय वो आती थी।
दुष्ट केवल दुष्ट होता है,दुष्टता व कपट करना उसका स्वभाव होता है,चाहे वो रिश्तेदार ही क्यों न हो।यहाँ तक कि सगा भाई भी अगर दुष्ट और कपटी स्वभाव का हो तो अवसर मिलने पर खून का रिश्ता भुलाकर दुष्टता से बाज नहीं आयेगा, ज्योतिष की भाषा में उसे शत्रु ही माना जाएगा। इसी शरणागत विधवा महिला के कर्म आप पढ़ चुके, जिस थाली में खाया उसी में छेद किया।