ऐसा भी होता है-(११)-(धारावाहिक सत्य घटना)-
खुदा कसम पैसा खुदा तो नहीं पर खुदा से काम भी नही"
अभनपुर आने के बाद उस दुष्टा को आराम हुआ कि उसका शत्रु (यानी मै) उसके आस पास नहीं, उसका बंटाधार करने। कपटी भाई को भी चैन मिला , अब सम्पूर्ण धन संपत्ति पर उसका एकाधिकार होगा। जमा जमाया व्यवसाय "वेटिंग पीरियड" काटने के बाद उसे मिल गया। "बिल्लियों की लड़ाई में बन्दर का भाग्य खुला" वाला किस्सा हो रहा था. उसने तो रंच मात्र भी कष्ट नहीं उठाया इस तांत्रिक संघर्ष में बल्कि कभी दर्शक की भाँति देखा, कभी विरोधी बना। पैसा ही खुदा है, पैसा ही माँ है, बाप है,भाई है, बहन है। ये सब मुझे अब समझ में आ रहा था,सगे भाई बहन का व्यवहार देखकर . धन के सामने सारे रिश्तेनाते नत-मस्तक होते है।
मेरे कांकेर से हटने के बाद वहाँ शान्ति छा गयी। परन्तु ये तो तूफ़ान के आने के पहले की शान्ति थी। मुझे परिवार सहित इसलिए माता जी ने हटाया ताकि जब ये लोग चक्की पीसे तो उसका बुरा असर मुझ पर ना पड़े।
अभनपुर में रहते हुए मैंने पूजा पाठ इत्यादि करना प्रारम्भ किया। मन्त्र आदि का अध्ययन किया। मित्रो गुरुओ से मार्गदर्शन प्राप्त किया। कई विद्वानो के संपर्क में भी आया। आत्मरक्षा विषयक विद्याओ का ज्ञान हुआ। इधर दुष्टा भाभी की दाल नहीं गल रही थी . परन्तु मेरे मन में भी असंतोष हमेशा बना रहा। क्योकि माता परा-शक्ति ने उसके किये का दंड अभी तक नहीं दिया। इसी बीच महाराज जी से मुलाक़ात की कई बार हुई महाराज जी ने आश्वस्त किया-काम चल रहा है ,देवी ऐसा कहती है. इसी अवधि में जी ने शिवरात्रि में मेरी जप माला शोधन किया, जप माला अब मन्त्र साधना उपयुक्त हो गयी। इसी बीच महाराज जी ने एक बार कहा-देवी कह रही है की इसी माह तुम्हे पता चलेगा कि उसे क्या दंड मिल रहा है। सचमुच उसी महीने पता चला की दुष्ट भाभी को गर्भाशय का कैंसर हो गया। वह इलाज के लिए नागपुर व बम्बई दौड़ लगाना शुरू भी कर दी। चूँकि कैंसर प्रारम्भिक अवस्था में था इसलिए इसके ठीक होने की संभावना थे। मैंने इधर महाराज जी से संपर्क किया तो कहा - देवी ने आशवस्त किया है की यही सजा है, कितना भी इलाज करा ले,वह ठीक हो ही नहीं सकती .
समय बीतता गया ,उस दुष्टा ने जितना मुझे परेशान किया था, दौड़ाया था , देवी ब्याज सहित उसे दंड दे रही थी , दौड़ा रही थी ज़ितना मै तडफा , वह उसे तड़फ़ा रही थी। जितना दरिद्रता व धन नाश मेरा की थी,देवी उसका ब्याज सहित नुकसान कर रही थी। कभी गोंदिया, कभी नागपुर , कभी बम्बई दौड़ भाग करती , धन की बरबादी अलग। कभी जाने के लिए कोई साथ मिल जाता, कभी नौकरानी को लेकर अकेले यात्रा। सारी खबरे
मिलती रहती। कैंसर आखरी स्टेज में पहुंच गया। परन्तु बड़ी जीवट दुष्टा थी वह ,इलाज रेडियम थेरेपी के फेल होने के बाद पूरा गर्भाशय कैंसर चपेट में आने के बाद और डाक्टरों द्वारा सर्जरी की सीमा के बाहर घोषित करने के बाद भी , मुझे "उड़ाने " के लिए विभिन्न तांत्रिको के पास घूमती रहती। कुछ धनलोभी टुच्चे तांत्रिक प्रयोग करते भी थे परन्तु असफल हो जाते, तो कुछ "विचार" कर देखते और लाखो रूपए देने पर भी प्रयोग करने से इंकार। मुझे पता चला कपटी दुष्टात्मा सगा भाई भी ऐसे हरामी तांत्रिको की खोज में उसकी सहायता करता ,ताकि उसका धन हड़पने का स्वार्थ पूरा हो सके. .
मैंने डायन के मृत्यु के पूर्व सच उगलवाने हेतु देवी कंकालीन माता से प्रार्थना भी की थी ताकि सब सच वह बोल जाए। एक प्रयोग भी करवाया अभनपुर से परन्तु किसी 'तेलगू तांत्रिक' के बीच में आ जाने से असफल हुआ. जब यह अभनपुर के तांत्रिक बैगा ने बताई तो विश्वास नहीं हुआ। उधर वह मुझ पर "तांत्रिक वार" करने की कोशिस करती रहती पर सफल नहीं होती। अब क्रोध आकर मैंने स्वयं अपनी जप माला उठाई और नौसिखिया प्रयोग कर बैठा। तीन दिन के मन्त्र प्रयोग के बाद दिन दुष्ट कपटी भाई दौड़ता दौड़ता आया, कि संपत्ति का हिस्सा बांटा करना है, भाभी मरणासन्न है ,डाक्टरों ने कहा है कुछ घंटो में प्राण निकल सकते है , अधिकतम 24 घंटे जीवित रह पायेगी।
(बाद में मुझे पता चला की मेरी विद्या सफल होने पर उसी तेलगू तांत्रिक पास इस प्रयोग को असफल कराने गए थे, परन्तु उसने साफ़ मना कर दिया और कहा की यह प्रयोग उसने खुद किया है, देवी देवता उसी के साथ है,मै बीच में आऊंगा तो मै भी मारा जाऊंगा , दोषी तो तुम्ही लोग हो इत्यादि। महाराज जी ने जब यह बात बताई तो अभनपुर वाले बैगा की बात की सच्चाई पता चली )
अब एक अन्य महाराज (भीखम महाराज ) पास जांच के लिए पहुंचा तो पता चला दुष्ट डायन का प्राणांत अभी नहीं होगा। मैंने कहा -असंभव, ड़ाक्टर ने हद से हद 24 घंटे दिया है। कैसे बच सकती है? परन्तु सचमुच मेकाहारा अस्पताल रायपुर से एक सप्ताह खून चढ़ाने बाद पुन: डायन घर आ गयी। और लगभग छह माह जीवित रही।
दरअसल देवी उसे कुछ माह और जीवित रखना चाहती थी। मैंने जो मांग की थी वह अभी बाकी था । अगले छह माह डायन भाभी खाट(बिस्तर ) पर से उठ नहीं पायी .उसका इधर उधर तांत्रिको के पास ,बैगाओं के पास भागना दौड़ना बंद हो गया। परन्तु दर्द से तड़फ़ना जारी रहा। अस्पताल जाना भी बंद हो गया।
सारी रात, सारा दिन दर्द से तड़फती रहती। उसकी दुर्दशा पर बहुत से लोगो को दया आती , पेट भर सहानुभूति प्रकट करते समाज के लोग, जाति के लोग. नाते रिश्तेदार वगैरह आते , शायद मुझे कोसते भी थे, गालिया भी देते रहे होंगे। उसकी दुर्दशा जो देवी ने की सारे वे लोग देख रहे थे, पर समझ नहीं रहे थे थे, सिवा मेरे। (क्योकि इन छह महीनों में मै कांकेर नहीं गया और क्योकि खेल मुझे और उस डायन को पता था ). परन्तु उसके कर्म किसी को दिखाई नहीं दिए (समाज अंधा भी होता है ). अब मेरे श्राप (या मांग ) का बाकी हिस्सा पूरे होने को थे। उसका कैंसर सारे शरीर में फ़ैल गया , पूरा शरीर ही सड़ने लगा , यहां तक कि बदबू देने लगा, सड़े मांस जैसा । 24 घंटे, हप्तों ,महीनो सो न पाना हमेशा तड़फते हुए कराहना ,करवटें बदलते रहना यही हो रहा था। जो भी उससे मिलने आता या देखने आता , मारे दुर्गन्ध के नाक में रुमाल रख लेते। ज्यादा देर उसके पास में न रहते। मैंने माँगा था - तड़फ तड़फ कर मरे, घुल घुल कर मरे ,सड़ सड कर मरे। माँ दुर्गा उसे शब्दश: पूरा कर रही थी। पापी जब अपने पाप भुगतने लगता है तो अच्छे अच्छों की हिम्मत जवाब दे जाती है। इस तड़फन से वह अपने सारे कर्म मेरे कुटुंब के सामने बकने लगी। सारे कर्म पर्दाफ़ाश होने के बाद भी मेरे कुटुंब के कपटी सदस्यों की आँखे नहीं खुली , न हि पश्चाताप का भाव आया। न कलयुगी माँ का दिमाग आया, न कलयुगी स्वार्थी कपटी भाई का दिमाग सही हुआ। उसकी पत्नी भी ओछे दिमाग की थी, उसका दिमाग सही नहीं हुआ। सारी वास्तविकता उलटे गोपनीय रखने लगे। समाज के लोग भी पूर्व में काफी पीड़ा पहुंचा चुके थे,मुझे सारी बाते विभिन्न श्रोतो से मालूम थी। पूरा 'हॉरर टीवी शो' मेरे जीवन में घटित था।
मैंने अभनपुर छोड़ दिया क्योकि मेरी कंपनी छपारिया के मंदी के चलते बंद हो गयी और नौकरी के लिए विशाखापटनम कुछ माह रहा। फिर होशंगाबाद जिले के टिमरनी ग्राम में रहा. जबकि मेरी पत्नी और बच्चे विशाखापटनम से दक्षिण भारत घूमने चले गए -चेन्नई।
(बाद में समझ आया की देवी ने सुरक्षा के लिए विस्थापित किया था ताकि तांत्रिक प्रयोग से मै परिवार सहित बचा रह सकू , मरते वक्त उसने शरीर अर्पित कर परिवार का नाश करने का प्रयोग किया था , ये बात देवी ने खुद ही आकर बताया बहुत बाद में। आश्चर्य तो यह भी हुआ की देवी ने समुद्र, शिप इत्यादि का आभास भी कराया था मुझे व मेरी पत्नी को भी , यानी पूर्वाभास था विशाखापटनम जाने का ,जो हम अज्ञानी होने के कारण समझ नहीं पाये )
टिमरनी में में रहते हुए ही नवरात्रि का समय आया। इसी नवरात्रि में देवी के पास मैंने पुन : याचना की-हे माता, दुष्ट प्रभा डायन के प्राणो अंत कर दे, जब तक वह जीवित रहेगी मेरा कार्य पूरा नहीं हो पायेगा , नवरात्रि पवित्र है, उसमे मत मारना , नवरात्रि के बाद 15 दिन में उठा लेना। माँ ने स्वीकार कर लिया. शायद और नवरात्रि के 21 वें दिन उसे यमलोग भेज दी। मुझे टिमरनी (होशंगाबाद) में रहते ही यह सूचना मिली य़ह दिन 28 अप्रैल 1997 य़ानी कांकेर में मेरे घर पर किये गए नवरात्री के 2 वर्ष उपरांत।
परन्तु मेरे इस महाभारत में मजे लेने वाले अभी तक खीर खा रहे है। उन्हें उनके कपट की सजा इस इंटरनेटी लेख के लिखते तक नहीं मिली है। जन्म दात्री माँ कुछ ही महीनों पूर्व मृत्य को प्राप्त हुई , और मेरे, उसके सामने ही उसके व्यवहार से क्रोधित होकर, किये गए प्रण के अनुसार मैंने न कोई शोक मनाया , न ही कांकेर गया उसके दाह संस्कार में, और न कंधा दिया शव यात्रा में , न किसी कर्मकांड मे भाग लिया। मुझे तो मेरी जगत जननी माँ मिल चुकी थी फिर साँसारिक माँ न भी मिले तो क्या परवाह। दरअसल विधि के विधान का-"बोया सो काटेगा" की परीक्षा भी मै करना चाहता था , अत : मैंने देवी से प्रार्थना थी की मुझे दिखाए ताकि ईश्वरीय न्याय पर मुझे विश्वास हो सके , ये सिर्फ कहावत है डराने के लिए, या फिर सच्चाई ! और मैंने देख लिया कर्म फल घटित होते हुए . दुष्टा घर पर बोल कर गयी थी कि उसकी मृत्यु के बाद कोई कर्मकांड न किया जाए , ऐसा सुनने में आया।
दुष्टा की आत्मा को मुक्ति नहीं मिली, प्रेतनी के रूप में भटक रही है , दो बार अटैक भी चुकी , परन्तु मेरे रक्षा -प्रयोग, माताजी और माजी सा तथा आदरणीय सासु माँ (मेरी दिवगंत सास की आत्मा) की कृपा से रक्षा हुई।
मेरी आत्मा कथा पाठको की आँख खोलने के लिए तथा सत्य से परिचय कराने प्रकाशित किया. इस पूरे घटनाक्रम में मै नास्तिक से आस्तिक बना, एक अनजान अविश्वनीय क्षेत्र का ज्ञानी बना। विधि के विधान एवं ज्ञान बढ़ा। परन्तु घोर संताप , संघर्ष व हर तरह की तकलीफ मुझे झेलना पड़ा। कभी किसी व्यक्ति को ऐसे बुरे दिन देखने में आये तो उसकी सहायता भले ही न कर पाये परन्तु उपहास न करे ,कपटी अभय की तरह और समाज के और तरह। बगैर असलियत जाने उसे बुरा भला न कहे , पाठको से यही प्रार्थना है
(आपको ऐसा करने का अधिकार भी नहीं) होसकता है इससे उसकी मानसिक पीड़ा बढ़ जाए और फिर आपकी बोई फसल आपको भी कभी काटना पड़े इस तरह -रेणिक बाफना
(और है - आखिर ये घटना मेंरे जीवन में ही क्यों घटी !)