14 जून 2017

नज़र सचमुच लगती है भई ! ! ! !


नज़र सचमुच लगती है भई !!!!       




                                                                                                                                                                                                                                                  

 हम  पढ़े लिखे लोग अपने आप को किसी वैज्ञानिक से कम नहीं मानते ! भले ही विज्ञान का दो प्रतिशत ही ज्ञान हो , अपने को आधुनिक (पिछड़ा नहीं ) मानते हुए जिन बातो का ज्ञान नहीं, जिसे कभी देखा नहीं , जिसे लेबोरटरी में परखा नहीं जा सकता ,जो दिखता नहीं , उसे नकारते है।  इसमे आपका दोष नहीं , वातावरण का या प्रचारित बातो/शिक्षा का दोष है।  मैं भी ऐसा ही मानता था एक समय , पर समय और जीवन के अनुभव ने मेरी आँखे खोल कर रख दी इसीलिये अपने अनुभव इंटरनेट पर दे रहा हूँ ताकि लोग इन सबसे सावधान रहे।
         
   बचपन से देखता आया कि कुछ बड़े  बूढ़े , बच्चो के मामले में अक्सर जब वह दूध नहीं पीता , हमेशा रोते रहता है जैसे उसकी तबियत कुछ खराब लगाती हो तो , कहते है उसे नजर लग गयी। जब मै  बच्चो का बाप बना तो अपने पुत्र पर भी ऐसे ही देखा।  ऐसे में वृद्ध लोग मिर्ची का धुंआ  , फिटकरी घुमाकर जलाना , एक तेल में भीगी रुई की बत्ती जलाकर उतारना आदि प्रयोग करते थे।  मेरी  समय  और बेटे के समय मेरे मन में विचार आया कि नजर सचमुच होती है भी या नहीं इसकी जांच करनी चाहिए।  मैंने सोंचा कि मै तो विज्ञान का  छात्र रहा हूँ , मैंने रसायन शास्त्र पढ़ा है , फिटकरी तो कीटाणु नाशक है , मिर्ची भी सूक्ष्म जीवो को मारती है जैसे पेट के कीड़े।  अत: इनका प्रयोग  प्रमाणिक नहीं। मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी नहीं होना चाहिए।  अत: मैंने एक यंत्र प्रयोग का निश्चय किया जो यंत्र-मन्त्र की किताबो में दिया गया है।  अब मेरे बच्चो को नजर लगाने पर मैंने एक यंत्र काली स्याही से बनाकर सर पर से घुमाकर उतारा और जला दिया।  आश्चर्य बच्चे  ने कुछ देर बाद रोना बंद कर पहले की तरह दूध पीना और खेलना सभी शुरू कर दिया।  जबकि पहले डाक्टरो की दवाइया भी असफल हो जाती थी ! अब एक प्रयोग से तो प्रमाणित नहीं होता , अत: जब भी नजर जैसी बात होती हर बार मैंने यंत्र प्रयोग करके देखा , हर बार मैंने असर होते देखा ! अंतत : मैंने स्वीकार किया कि सचमुच नजर जैसी चीजे होती है।  इसका अस्तित्व है।  हर प्रयोग के बाद मैं खुद उसमे कमी ढूंढा करता, आलोचना किया करता , और हर अंधविश्वास की सम्भावना ढूंढा करता।
                         
   उन दिनों मेरी दूकान भी थी, रेडीमेड कपडे की . मैंने दूकान पर भी नजर लगने की बात सुनी थी।  उसके लिए व्यापारी लोग निम्बू मिर्ची लटकाते थे।  दुकान पर नजर लगने से ग्राहकी बंद सी हो जाती है।  ऐसा मैंने भी होते देखा तो मैंने भी नींबू  मिर्ची टांग कर देखा , सचमुच ग्राहको की भीड़ पुन: चालु हो जाती थी , ऐसा करने के पहले दूकान में खाली बैठना पडता था। इसका परीक्षण मैंने बार बार किया और सही पाया।
               
    इसके बाद मै  नौकरी के सिलसिले में बाहर निकल आया।  एक बार ओ गजब हो गया।  मेरे रिश्तेदारी की महिलाये मेरे घर मिलने आयी , उनमे से एक का स्वास्थय करीब एक हप्ते से खराब थी।  दवा वगैरह असर नहीं कर रही थी। देखने में कुछ भयानक शकल की लगती थी . अतः मैंने मजाक में कहा कि आपको नजर लगी होगी , बाकी लोग तो मुस्कुराने लगे उन्हें मेरा व्यंग समझ में आ गया था। परन्तु वह महिला ने गम्भीरता से लिया वाकई उसे नजर लगी होगी क्योकि नजर के लक्षण वैसे ही होते  है . इसी बीच मेरी पत्नी के मुंह से निकल गया कि हमारे घर में बच्चो को नजर लगती है तो ये ही उतार लेते है। अब वो महिला मेरे पीछे पड़ गयी - लो न फूफाजी , मेरी नजर उतार दो।  मैंने लाख कोशिश की टालने की वो तो बच्चो के लिए है , ये अंधविश्वास है  आदि . पर बात नहीं बनी। मैंने यंत्र प्रयोग किया , और थोड़ा आराम करने कह फैक्ट्री ड्यूटी पर चला गया।  १०-१५ मिनट में वह महिला स्वस्थ हो गयी। मुझे पता लगने पर मेरे भी आश्चर्य का ठिकाना न 
रहा ! उधर मायके जाकर उसने मेरी बड़ाई क्या की , तीसरे दिन उसकी भाभी भी पहुँच गयी "झाड़ा " लेने के लिए।  अब मेरी मुसीबत बढ़ गयी मैंने उसे टरकाने की हरसंभव कोशिश की , कि ये अंधविश्वास है, मुझे कुछ नहीं आता , मैंने तो "नाटक" किया था, आदि।  पर बात नहीं बनी , हारकर मैंने उसे भी यंत्र और मन्त्र का झाड़ा दे दिया।  वापस वो चली गयी , न जाने आगे क्या हुआ शायद उसकी परेशानी दूर हो गयी, तो दो दिनों बाद देवर (साढू  का पुत्र ) पहुँच गया।  मेरी मुसीबते बढती जा रही थी , जिस व्यक्ति के हजारो पहचान हो उसके साथ चमत्कार हो जाए तो आगे भीड़ लग जायेगी !! पूरे धमतरी जैन समाज के लोग लाइन लगा देंगे और मेरे आफिस/नौकरी आदि में बाधा हो जायेगी, इसलिए मैंने निश्चय किया कि चाहे कुछ भी हो जाए इसे झाड़ा नहीं दूंगा , वरना मेरी  आज़ादी खतरे में पड़  जायेगी। मैंने ऐसा ही किया , और उसे एक ग्रामीण झाड़ फूंक करने वाले के पास टिका दिया।  पर इन प्रयोगो से नजर लगाने वाली बात सत्य साबित हुई।  और मै इस पर अब विश्वास करता हूँ।
     आगे जाकर मुझे घमंड हो गया कि नजर तो कमजोर इच्छा शक्ति वालो को ही लगती है .अतः मुझे नहीं लग सकती और मै ठहरा एक साधक , मुझ पर सम्भव नहीं। मुझे भी नजर लगी दो एक बार ! मेरा मन मानने को नहीं तैयार था।  पर शंकाग्रस्त होकर दो तीन दिन बाद अपनी पत्नी की सहायता से खुद पर यंत्र प्रयोग करवाया , तो वाकई १०-१५ मिनट में ठीक हो गया।  अब मै हतप्रभ हो गया , मेरा घमंड चूर चूर हो गया। कमबख्त मुझे भी लग ही गया। ऐसा कई  बार घटित हुआ मेरे साथ ।                          
पाठकगणों इससे सावधान रहने में ही भलाई है , नजर सचमुच होती हैं अंधविश्वास नहीं !

8 मार्च 2017

सम्मोहन विद्या से परामनोवैज्ञानिक प्रयोग

सामान्यतः लोगो के मन में ये धारणा होती है कि सम्मोहन मेंड्रेक (कॉमिक पत्रिका) के जादू जैसा होता होगा। बस हाथ हिलाया,आँखों में देखा और सामने वाला गया काम से।

  ऐसा नहीं होता, ये एक मन की शून्य विचार करने की प्रक्रिया है,जिसका परिणाम *योगनिंद्रा* या *तंद्रा* की अवस्था आती है।चूँकि इस अवस्था में चेतन मन सो जाता है,अतः मन की अमोध शक्तियों के बारे में पता चलता है और उनका उपयोग भी होता है। यही अवस्था मन की चिकित्सा में भी काम आता है। चिकित्सा संबंधी प्रयोग और उदाहरण तो एक भिन्न पेज "अजीबो गरीब समस्याओं की सम्मोहन चिकित्सा" नामक लेख में दे चुका हूँ।
यहाँ मैं सिर्फ परामनोवैज्ञानिक प्रयोगों के बारे में ही बताऊंगा।
1-मेरे गुरु और पिताजी के मित्र कुमार साहब से ज्ञान अर्जित करते समय उनसे एक घटना पता चली-
वे राजकुमार कालेज में पढ़ा करते थे,तब मित्रो के साथ प्रयोग किया।एक मित्र को हिप्नोटाइज (सम्मोहित)कर एक अन्य मित्र के यहाँ मानसिक रूप से भेजा,फिर उस मित्र के घर के बारे में सम्मोहित व्यक्ति से पूछताछ की,तो उसने बताया भाभी जी भिन्डी की सब्जी काट रही है,उनका छोटा बच्चा सीढ़ी चढ़ने की कोशिश कर रहा है,भाभी जी मना कर रही है कि गिर जाएगा,पर बच्चा है कि मान ही नहीं रहा,आखिर वो गिर भी गया,उसे उठाने की जल्दी में भाभी जी की ऊँगली भी कट गयी।
         अब इन लोगो ने प्रयोग समाप्त कर उस मित्र के यहाँ जाकर देखा तो पाया-भिन्डी की सब्जी कटी हुई रखी है,भाभी जी की ऊँगली में पट्टी भी बंधी हुई है।पूछताछ करने पर सब कुछ वैसा ही बताया जैसा उस सम्मोहित व्यक्ति ने तंद्रावस्था में वर्णन किया था।

2-यह जानने के बाद मैंने खुद वैसा ही प्रयोग करके देखा।घर के एक सदस्य को सम्मोहित कर मानसिक रूप से ग्राउंड फ्लोर में पिताजी के कमरे में भेजा,और वर्णन करवाया तो सुना-पिताजी भोजन के बाद सरिता पत्रिका पढ़ रहे है,35 वां पेज है, तुरंत मैंने जाकर जांच किया तो पिताजी सरिता पत्रिका का 36 वे पेज का पहला पैराग्राफ पढ़ना शुरू किये थे। ये मेरा पहला प्रयोग था और आश्चर्यजनक भी।

3-ड्राइवर की नौकरी के लिए आये एक ग्रामीण युवक को सम्मोहित कर मानसिक रूप से पौन किलोमीटर दूर भेजा,पर निर्देश को ठीक से न समझ पाने के कारण वह निर्देशित घर की बजाय बगल वाले घर में घुस गया।वहां उसने जो वर्णन किया वो मेरी जानकारी से मेल नही खा रहा था, दूसरे दिन मैंने पाया कि बगल वाले घर के लोगो के बारे जो कुछ मेरे पात्र ने बताया वो सही था।
              
              दूसरे दिन मैंने फिर उसी पर प्रयोग दुहराया, सम्मोहित पात्र ने उस घर के बारे मे बताया-एक बुढ़िया आराम से बैठी है, बगल कमरे में एक लड़की गोरी सी सोई हुई है। मैंने सोई हुई लड़की से नाम पूछकर बताने कहा तो उसने सही नाम बता दिया,इससे मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। यानी एक सम्मोहित पात्र के दिमाग का सम्पर्क एक अन्य सोये हुए व्यक्ति के दिमाग से सफलता पूर्वक होने का प्रमाण है ये तो।

अंग्रेजी में इसे cliarvoyance कहते है, जबकि telepathy में दिमाग का सिर्फ संपर्क होता है।इसमें तो दिखाई भी देता है! यानी दिव्यदृष्टि ! इसका मतलब द्वापर युग में संजय ने इसी दृष्टि से देखकर धृतराष्ट्र को सब बताया था !