27 दिसंबर 2013

जैन गोत्रों की कुलदेवी कुलदेवता -पुस्तक

जैन गोत्रों की कुलदेवी कुलदेवता 

मेरे जीवन के एक बड़ी घटना और कड़वे अनुभव के बाद मैंने जैन समाज के लिए एक किताब की रचना की ताकि दूसरे भुगतने से बच जाए . हालांकि इसमे राजस्थानी मूल के निवासियो के लिए भी पढने लायक सामग्री है।  कई  लोगो को अपनी कुल देवी के बारे में इसी से जानकारी मिली जो वर्षो से खोज रहे थे. दरअसल ८ वीं  से १२ वीं  शताब्दी के बीच राजस्थानी मूल के हिन्दुओ को ही  जैन धर्म में दीक्षित किया गया था। अतः अन्य सभी ज्ञान सहित ये खासकर जैन धर्मावलम्बियों के लिए उपयोगी है। मूल्य १००/-सौ रुपये 
उपलब्ध - श्री लक्ष्मी जनरल स्टोर्स , लिली चौक , पुरानी बस्ती , रायपुर (छ.ग.)- श्री लक्ष्मी कान्त ताम्रकार 
मेरा संपर्क-आर के बाफना(लेखक),94063-00401



पुस्तक इस पते पर उपलब्ध है
श्री लक्ष्मीकांत ताम्रकार , लक्ष्मी जनरल स्टोर्स ,लिली चौक ,पुरानी बस्ती रायपुर (छ.ग.)  

1 दिसंबर 2013

कुत्ते की छठी इन्द्रिय होती है !

कुत्ते की छठी इन्द्रिय होती है !
आप माने या न माने कुत्ते को छठी इन्द्रिय प्राप्त होती है।  मैं यहाँ उन कुत्तो की बात नहीं कर रहा हम जो दो टांगों  वाले होते है और देश के राजनीतिक क्षितिज के परिपक्ष्य में इंटरनेट में छाये हुए है ! अब की बार मेरा आब्जर्वेशन चार टांगों वाले प्रकृति रचना वाले कुत्तो पर पेश है। 
                बचपन में एक भूरे रंग का कुता मेरे बड़े भाई ने शौक से पाला था , नाम रखा-शेरा। काफ़ी समय तक घर पर रखे , काफ़ी समय तक खेले ।  फिर उसे दादाजी के पास गाँव में भेज दिए ताकि खेतों में टहलता रहे। कुछ साल वह वहां रहा , बीच बीच में हम लोग वहीं जाकर खेलते रहे उसके साथ।  पर एक दिन दादाजी को गुस्सा आया कि इसके लिए रोज रोज खाना बनाना पडता है मुझे (क्योकि दादाजी अकेले रहते थे ), उन्होंने कांकेर में ही एक किराना दूकानदार को दे दिया। जो मेरे घर से २ किलोमीटर दूर अन्नपूर्णापारा में रहता था। उसके यहाँ शेरा हमेशा रहता था एक आज्ञाकारी पालतू पशु की तरह। पर हर साल ठीक दीपावली के रोज राजापारा स्थित हमारे घर के सामने सुबह सीबह आकर बैठ जाया करता था।  हम लोग एक दो बार तो ध्यान नहीं दिए बस उसे देखते और त्यौहार के हिसाब से जो कुछ रोटी वगैरह बनाता था उसे दे देते थे। पर हर साल यही सिलसिला चलता रहा और हम लोग आश्चर्यचकित होने लगे आखिर शेरा को कैसे मालूम पड़  जाता है कि आज दीपावली है ! वह कैलेण्डर तो देख नहीं सकता , फिर तिथी , तारीख आदि का ज्ञान उसे कैसे हो जाता है !
                            एक बार तो गजब हो गया , बीच में ही एक दिन वह सबेरे सबेरे घर के सामने आकर बैठ गया।  हम लोग सोंचने लगे आज तो दिवाली नहीं है फिर ये शेरा आज सबेरे सबेरे कैसे और क्यों आ गया है। उसी दिन कुछ घंटे बाद ही करीब नौ बजे मेरी दादी जी कि लीवर फटने से मृत्यु  हो गयी , शाम तक शेरा वहीँ बैठा रहा घर के सामने। फिर चला गया।  कुछ सालो बाद वह कभी नहीं आया , शायद उसने भी नश्वर शरीर का त्याग कर दिया।

                 यहाँ शेरा की  दो बाते आश्चर्यचकित कराती है , एक तो यह कि उसे समय ज्ञान होता था जैसे आज ही दीपावली है - बिना कैलेण्डर देखे या ब्राम्हणो से पंचांग दिखाए।  दूसरी यह कि मेरे पुराने मालिक के यहाँ किसी कि मृत्यु होने वाली है इसलिए शोक में शामिल होने सबेरे से आकर बैठ गया ! यानि घटना का पूर्वाभास। 
                                       काफी साल हो गए इसके बाद फिर एक कुतिया काले रंग की हमें मिल गयी भटकती हुई आ गयी।  हमने भी पहले तो उसके मालिक का पता किया , पर पता नहीं चलने पर उसे पाल लिया। बाद में कुछ दिनों बाद पता चल गया तो भी पुराने मालिक ने उसे न रखने कि इच्छा जाहिर किया और हमें ही रखने कह दिया। मैंने कई बार ध्यान दिया कि भले ही वह( जैकी नाम रखा हमने ) बोल नहीं सकती पर मनुष्यो कि भाषा शायद समझती थी।  जैसे मैंने उसे बिना इशारा किये  मेरे बेटे के पास  बैठने कहा या फिर उसे मेरे वापस आते तक किसी स्थान पर बैठने कहता तो जैकी  वैसा ही करती।  यानि मेरे आते तक वहीं  बैठे रहती, मेरे नन्हे बेटे  की  देख रेख करते !
                       अब काफ़ी साल बाद मेरे न कहने के बाद भी मेरी बिटिया, जो कुत्तो की बेहद शौकीन है, को संयोग से जर्मन शेफर्ड प्रजाति की एक कुतिया( लगभग) घायल अवस्था में भूखी प्यासी मिल गयी, दया कर उसका इलाज करवाते हुए घर पर ले आयी। मैंने भी स्वीकृति दे दी नाम रखा- जूबी ।  छोटे बच्चो की तरह मचलती उसकी हरकते देखता रहता हूँ। जूबी घर पर सबसे ज्यादा मुझे ही चाहती है , और उसके बाद ही मेरी बिटिया से जूबी को लगाव है। उसकी समझदारी भरी हरकते देखकर मैं स्वयं आश्चर्य चकित हूँ। घर पर मैं कहता हम कि ये बोल नहीं सकती -भगवान ने इसे जुबान नहीं दी पर समझती सब कुछ है ऐसा लगता है . जैसे भूख लगी किचन के पास जाकर सामने दरवाजे पर चुपचाप बैठकर टुकुर टुकुर "मम्मी " को देखते रहना , यदि ध्यान न दिया जाए तो थोड़ी देर बार ऊं , ओं आदि आवाजें निकालना , पर किचन में नहीं घुसती -डाँट  पड़ेगी जानती है। पूजा के कमरे में कभी नही घुसना , यह भी समझती है बिना सिखाये ! कभी कोई गलती हो जाए तो  डांट के डर से  सोफे के नीचे घुसकर मुंह छुपा लेना। यदि डांट पद रही हो तो सिर झुका कर जमीन कई ओर देखना, ऐसी ही अनेक हरकते  करती है वो।

21 नवंबर 2013

दान देने के बाद वापस लेने का फल :

दान देने के बाद वापस लेने का फल :
  रवेली वाले महाराज जी की सिद्धिया मैंने की बार परीक्षा कर ली थी , उन्हे प्राप्त थी  सचमुच।  ग्राम चारामा में कई  बार मुलाक़ात होती थी।  एक माहेश्वरी गोत्र का व्यक्ति उनक पास आता था।  उसका भी एक रिश्तेदार या पहचान का एक अन्य व्यक्ति (माहेश्वरी ही ) किसी समस्या को लेकर उनके पास चक्कर लगा रहा था।  पर महाराज जी कुछ देखने के बाद उसे कुछ नहीं बताते थे  चुप ही रहते थे। धीरे धीरे मेरे कानो में यह बात पहुंची।  मैंने उत्सुकतापूर्वक पूछा महाराज जी से -तो बाद में मुझे उन्होंने बताया - यह व्यक्ति जब बालक था तो इसके पिता  जी ने एक मंदिर को अपनी कुछ जमींन  दान में दे दी थी , परन्तु रजिस्ट्री नहीं करवा पाये।  परन्तु यह बालक को पिता जी का यों  दान देना पसंद नहीं आया। बड़ा होने के बाद जब इसके हाथ में सब कुछ आया तो इसने दान दी हुई जमींन वापस ले ली। उस जमींन की कमाई से ही मंदिर में दिया जल पाता  था, पूजा वगैरह हो पाती थी।   और पुजारी के परिवार का भी पेट पलता था।  पर ये सब बंद हो गया और पुजारी सपरिवार भूखो मरने लगा।  पुजारी के परिवार सहित मन ही मन उस माहेश्वरी को श्राप देते रहे।  ऐसा करते करते पुजारी की  मृत्यु हो गयी . उधर माहेश्वरी निसंतान ही रहा और फिर  एक दिन उसके यहाँ एक बच्चे का जन्म हुआ परन्तु वह जन्म से गूंगाबहरा था। वह बालक, दरअसल उस मंदिर का पुजारी है जो पुनः जन्म लेकर आया है अपना कर्जा वसूलने।  माहेश्वरी ने बच्चे के इलाज में लाखो रुपये खर्च कर दिए पर कोई लाभ नहीं हुआ। महाराज जी बोले- अब ऐसे में उसे मैं क्या बताऊ ?
                                       मैने उत्सुकता से पूछा अब आगे क्या हो सकता है ? तो उन्होंने बताया कि  कुछ ही दिनों में उस बच्चे रूपी पुजारी का कर्ज वसूल हो जाएगा तो उसकी (बच्चे की )मृत्यु हो जायेगी। इससे दुःख झेलना पडेगा।  पर ये तो मूल धन हुआ।  ब्याज के रूप में सजा अभी बाकी है।  अब धीरे धीरे वह माहेश्वरी बहरा होने लगेगा, फिर पूरी तरह गूंगा और बहरा हो जाएगा, और ऐसा सहते सहते मृत्यु पर्यन्त ऐसा ही रहेगा। यही उसका उसका दंड है जो उसे भुगतना है।
             पाठको , यद्धपि मैं उस माहेश्वरी परिवार से न मिला , न ही उसे देख पाया , पर चारामा के जिस माहेश्वरी की पहचान से वह आया , उसे मै जानता हूँ और कई बार मिल चुका।  उससे कुछ पूछा तो उसने भी गूंगे बहरे लडके की बात स्वीकारी . 
ऐसे मामले में अगर उस परिवार से मिलने की कोशिश करता तो भी दुष्ट व्यक्ति से मुलाक़ात करना और उसके परिवार के बारे में पूछताछ करना अच्छा नहीं होता। इसलिए घटना के बारे में गहराई से छानबीन मैं नहीं कर सका।

20 नवंबर 2013

भूतनी मोटर साइकिल में पीछे बैठ गयी थी ! !

भूतनी मोटर साइकिल में पीछे बैठ गयी थी ! !
                        ये घटना तो मेरे घर की ही है, मेरे बड़े भाई साहब जो ठेकेदारी करते थे , और गाँव का खेती  वगैरह भी देख रेख किया करते थे . हैम लोग स्कुल में पढते थे।  ग्राम माटवाड़ा आने जाने के रास्ते में पंडरीपानी नामक गाँव पडता था जो कांकेर से २- कि मी लगभग दूर था।  अब तो बस्ती काफ़ी बस गयी।, पहले काफ़ी सुनसान रहता था।  रास्ते में शमशान भी पडता था और मुस्लिम कब्रिस्तान भी।  एक बार काफ़ी रात को अपनी मोटर साइकिल से ,माटवाड़ा से आ रहे थे कि पण्डरीपानी पार करने के बाद सड़क पर एक सफ़ेद वस्त्र पहने एक महिलाए मिली , और रुकने का इशारा किया , लिफ्ट देने को कहा।  परन्तु इतनी रात गए किसी महिला को लिफ्ट कैसे दे देते ? सो सरपट मोटर साइकिल भगाते गए। परन्तु शीध्र ही उन्हे पता चल गया कि वह महिला उनके मोटर साइकिल पर पीछे बैठ गयी है और उनके कंधो पर भी हाथ रखा दी है। दर कर वे मोटर साइकिल चलाते रहे और जैसे की कांकेर की सीमा में पहुंचे वह महिला जाने कहां गायब हो गयी तब घर पहुँचते पहुंचते समझ में आ गया कि कोई भटकती आत्मा/भूतनी थी।  घर आकर पूरी घटना बताया।
                          मेरे  बड़े साहब का स्वर्गवास ३ मार्च सन 1992 को हो गया। इसके पीछे भी एक भयानक कहानी से मुझे आमना सामना हुआ , और एक भयानक घटना से मुझे स्वयं को जूझना पड़ा।  शायद फिर कभी बताओ। "ऐसा भी होता है" शीर्षक से 

विश्वास तो नहीं होता पर यह सत्य है ! !



विश्वास तो नहीं होता पर यह सत्य है 
मेरा एक परम मित्र श्री सुब्रत दत्त राय जो पेशे से शिक्षक थे और युवा भी।  सरकारी नौकरी में उनकी ड्यूटी गाँवों में होती थी। एक बार अपने तीन मित्रो के साथ एक गाँव की और जा रहे थे , सामने गाव में साप्ताहिक बाजार भरा हुआ था , शाम का समय था , और वे लोग पैदल ही जा रहे थे।  अन्धेरा होने में काफी समय था , करीब १-२ घंटे। ग्रामीण सड़क पर चले जा रहे थे , कि सामने से करीब सौ मीटर दूर कुछ ग्रामीण महिलाये सर पर टोकनी आदि लिए हुए आ रही थी , बाजार करके , सामान खरीदी आदि करके।  बाकी सड़क सुनसान थी। इन लोगो के देखते देखते वे ग्रामीण महिलाये सड़क के किनारे एक आम के वृक्ष में घुसने लगी और गायब होने लगी ! ये विचित्र दृष्य देखकर को किसी को कुछ समझ नहीं आया , एक दूसरे का मुंह देखने लगे , फिर  चारो डरने लगे।  पर सुब्रत दत्त राय ,बंगाली होने के नाते इन मामलो में कुछ समझदार भी था। उसने सबको इशारा कर चुप रहने को कहा , और चुपचाप शांत होकर चलते रहने को कहा।  कुछ मिनटों के बाद ये सभी गाँव में पहुँच गए , जब जान में जान आयी और उन्होंने सुब्रत से पूछ -ये क्या हुआ था , कैसे हुआ था।  तब सुब्रत ने अपने मित्रो को बताया कि  "भटकती आत्माए " जो ग्रामीण क्षेत्रो की रहती है , वे किसी पेड़ /वृक्ष पर निवास करती है , और समय काटने के लिए जीवित आदतानुसार बाजार भी करने जाती है , इसके बाद लौट कर अपने निवास पर वापस आ जाती है ऐसा कहते है , इन्हे कोई पहचान नहीं पाता . संयोग से हमें दिखाई दे गयी। अगर इन्हे धोखे  से पुकार लिया गया तो फिर उनके पीछे पड़ जाने का खतरा होता है, ऐसा कहा जाता है , इसलिए मैंने (सुब्रत ने )चुप रहने का इशारा किया था।
                     सुब्रत दत्त राय ,मेरा गहरा मित्र था और कभी झूठ नहीं बोलता था , मै अच्छे से उसकी आदत जानता था। चूँकि चार लोग थे , सभी एक जैसा दिखाई दिया , इसलिए भ्रम विभ्रम की गुंजाइश नहीं , मैंने उसके एक दोस्त से पुष्टि भी की थी। सन 2001 के आसपास उसका( सुब्रत दत्त का ) स्वर्गवास हो गया। ऐसी घटनाये कइयो के साथ आकस्मिक रूप से घटती रहती है , अतः सावधानी रखने में क्या बुराई है ?

18 नवंबर 2013

जब मैंने बाण /मूठ की मार खायी

 जब मैंने बाण /मूठ की मार खायी :
सन १९९८-९९ के आसपास की बात थी , मै आफिस में बैठे बैठे  अपने कार्य में मशगूल था। कि अचानक मुझे घबराहट होने लगी बेहद पसीना आने लगा , तंग आकर मैं पंखे के ठीक नीचे जाकर बैठ गया अपना  छोडकर। आस पास के कर्मचारी मुझे देखने लगे।  पर मैं तो चुपचाप बैठा रहा। मुझे ऐसा लगने लगा मैं मर जाउगा , मेरी मृत्यु होने वाली है , इस प्रकार "मृत्यु भय" अकारण आने लगा , जिस पर मैं खुद भी आश्चर्यचकित था , ऐसा विचार आखिर क्यों आ रहा है मेरे दिमाग में ? फिर मैंने अपने इष्ट को याद करने लगा। शंकावश कुछ रक्षा मन्त्र जप भी करने लगा।  थोड़ी देर  में ठीक ठाक हो गया।  शाम को मैं रवेली वाले महाराज जी(तीसरे गुरु) जो रायपुर आये हुए थे , उनके पास चला गया , और अपना आज का अजीब अनुभव बताया।  उन्होंने एक नींबू मुझसे मंगवाया और कुछ पढ़कर देखने लगे फिर हंसने लगे -  तुम्हे धूलबाण मारा गया था , तुमने रक्षा मंत्र का जप किया तो रुक गया।  वापस चला गया। तुम्हारे छोटे भाई  ने किसी ग्रामीण तांत्रिक को पैसे देकर चलवाया था ! (भाई सचमुच घोर शत्रु है , मैं जानता हूँ ) . उन्होंने कहा कल फिर  उसी समय (दिन को 11 बजे) आयेगा एक बार और।  दुष्ट तांत्रिक फिर कोशिश करेगा कि संयोग से बाण लौट गया है ।  महाराज जी ने नींबू  फूंक कर दिया जेब में रखने को, रक्षा के लिए ।  दूसरे दिन- मैं फिर इंतज़ार कर रहा था आफिस में बैठे बैठे, अपना काम करते हुए , ठीक ग्यारह बजे सचमुच फिर वैसे ही लगा , आश्चर्यजनक रूप से।  अबकी बार मै तैयार भी था , सब कुछ जानकर।  मैंने थोड़ी देर  महसूस करके पुनः रक्षामंत्र जपने लगा , थोड़ी देर में सब कुछ शांत हो गया।  शाम को फिर महाराज जी से फिर मिला , तो उन्होंने बताया फिर धूलबाण लौट गया , अब सामने वाले दुष्ट तांत्रिक को पता चल गया कि, तुम्हे मालुम पड़ गया और तुमने लौटा दिया ,कल भी तुमने लौटा दिया तो उसने सोंचा कि अपने आप लौट गया होगा किसी कारण से। अब तीसरी बार कोशिश नहीं करेगा , नहीं तो उस तांत्रिक की मौत निश्चित है।  तीसरे दिन मैंने इंतज़ार किया कि फिर कुछ होता है क्या उत्सुकतावश।  पर सारे दिन वैसा महसूस नहीं हुआ। ये मेरा पहला अनुभव था बाण विद्या झेलने का। 
                   (ग्रामीण क्षेत्रो में मन्त्र-तंत्र विद्याएँ चलती है , दरअसल ये शाबर मन्त्र आधारित होते है , बाण विद्या जिसे मूठ विद्या भी कहते है - क्रूर कर्म के नाम से पुकारा जाता है , इसे बाण मारना , या  मूठ मारना भी कहते है , इससे किसी को काफ़ी पीड़ा पहुंचायी जाती है  बाद में फिर उसकी मृत्यु भी हो जाती है।  अतः ये मारण  विद्या ही है, सिर्फ थोड़े से पैसो के बदले ये मूर्ख ग्रामीण उसका दुरुपयोग कर बैठते है , या सनकवश ऐसा करते है , लौट गया तो खुद  ही मौत के शिकार हो जाते है।  हालांकि मैंने कभी इसका परीक्षण करके नहीं देखा , पापकर्म है जिसका परिणाम भुगतना ही पडता है , परन्तु मेरी जानकारी में है -इनका अस्तित्व सचमुच है पाठको के ज्ञानवर्धन के लिए सच्ची घटना लिखा ,कि कैसा लगता है, ताकि सावधान रहे, ये अंधविश्वास है ऐसा सोंचने की गलती नही करे ! )

13 नवंबर 2013

वह किडनी दान से बच गया

वह किडनी दान से बच गया :-
-आर.  के.  बाफना , रायपुर (छत्तीसगढ़ ) 
                                              मेरे पास एक दंपत्ति आये , जो मेरे पूर्व परिचित के रिश्तेदार थे।  उनकी आर्थिक स्थिति बहुत  खराब चल रही थी , इस कारण पति पत्नी के बीच बहुत तनाव रहता था। अक्सर झगड़ा होते रहता था।  (ऐसे मामलो में पत्नी अक्सर सिर पर सवार रहती है।)  दोनों भविष्य  सम्बन्धी मार्गदर्शन के लिए आये थे।  उनकी एक ट्रक भी थी , जो खराब खड़ी थी की महीनो से, और बनवाने के लिए पैसा नहीं था . हस्तरेखा में उम्र अनुसार कोई विशेष खराबी नहीं थी अत: मैंने बताया  ये केवल कुछ समय का उतार चढ़ाव है चिंता मत करो , संकट के समय धीरज रखना चाहिए न कि लड़ना झगड़ना चाहिए। महज तीन महीने में सब ठीक हो जाएगा।  फिर उन्होंने बताया कि संकट के कारण पति महोदय किडनी दान करने वाले है अपने एक साढ़ू  को, (साली साहिबा के पति को ). जिससे एडवांस भी ले लिया है।  आपरेशन की तारीख भी निर्धारित हो चुकी है और रेलवे रिजर्वेशन भी हो चुका है। आगामी ८-१० दिनों बाद वे रवाना होने वाले है ! इसकी चिंता भी उन्हें थी ! मैंने पुन: हाथ देखा और बताया इसमे ऐसा तो नहीं दीखता कि तुम्हे कोई आपरेशन या अंग भंग दिखाई देता हो  ! फिर भी आगे ईश्वर की इच्छा ! 
                                दिन बीते, रिजर्वेशन  के दिन  वे लोग ट्रेन में बैठकर रवाना हो गए।  इधर ये लोग ट्रेन में थे उधर  साढ़ू की अस्पताल में ही मृत्यु हो गयी। वे लोग जब स्टेशन पर उतर कर पहुंचे रिश्तेदार के यहाँ ,तो आगे मृत्यु की खबर का सामना हुआ  और किडनी दान से बच गए।  चैन की साँस लेकर वापस घर की ओर  आये . आगे समयानुसार उनकी स्थिति ठीक हुई, ट्रक बनवा लिया , और धंधा चलने से सारी तकलीफे दूर होने लगी अब वे सुखी है। (हस्तरेखा में रूचि रखने वालो के लिए - व्यक्ति के निम्न चन्द्र में कोई खराबी मुझे दिखाई नहीं दी , इसलिए मैंने अनुमान लगाया  कि किडनी निकाले जाने का कोई संकेत नहीं )

25 अक्टूबर 2013

कमी कहां है ?(Hindi) Where is Problem in Life ?

कमी कहां है ?
-रेणिक बाफना (हस्तरेखाविद,रायपुर) 
मो. 98279 -43154

कभी कभी किसी व्यक्ति को जीवन में संघर्ष ही संघर्ष झेलना पडता है. सारा जीवन संघर्ष में निकल जाता है समझ में नहीं आता कि जहाँ सारे दूसरे लोग  मेहनत से दिन ब दिन उन्नति करते जा रहे है वही आपकी स्वयं तमाम कोशिशो के बाद भी रास्ता नहीं सूझता।  ऐसे में व्यक्ति कभी साधुओ , कभी बाबाओं , कभी तांत्रिकों और कभी ज्योतिषियों के पीछे घूमता नजर आता है। आइये सारे खोज बीन के पश्चात कारण- सार प्रस्तुत है लोक कल्याण के लिए -
१-स्वयं का भाग्य - अगर मुसीबतो से छुटकारा नहीं मिल रहा है तो स्वयं का भाग्य दिखाए।  हो सकता है खुद का समय खराब चल रहा हो. जिससे सफलता मिलने का नाम ही नहीं लेती या रास्ता ही नहीं मिलता।  यह भी देखना चाहिए कि सारा जीवन /समय यूं ही रहेगा या कुछ समय ही ऐसा रहेगा , ताकि अनुकूल समय की प्रतीक्षा की जा सके , 
"इसमे यह भी देखना चाहिए कि किया गया कार्य अनुकूल भी है या नहीं !"
२- दूकान, संस्थान के स्थान का अभिशप्त होना -
घर की तरह दूकान संस्थान का स्थान भी अभिशप्त हो जाने से लक्ष्मी का आगमन नहीं होता,दरिद्रता दूर ही नहीं होती, अत: दूकान स्थान की शुद्धता , पवित्रता की भी जांच करवानी चाहिए। तांत्रिक जांच और बंधन भी करवा लेना चाहिए
३-काम धंधे का अनुकूल न होना -
कभी कभी काम धंधे का क्षेत्र ग्रहो के प्रतिकूल होता है , सीधा साधा सिद्धांत है जो व्यक्ति जिस मिट्टी का बना है या जिसे जिस काम के लिए ऊपर वाले ने गढ़ा है , वही  कार्य उसे सन्तुष्टि देंगे। यह कुछ हद तक कुंडली ज्योतिष तथा हस्तरेखा से भी जाना जा सकता है। पर इन क्षेत्रों में एक्सपर्ट लोग बहुत कम है। कभी कभी प्रतिकूल कार्य भी असफलता , संघर्ष को जन्म देता है . ऐसे में धंधे में परिवर्तन या धंधे के मालिक के नाम में परिवर्तन या कार्य स्थल का नाम परिवर्तन लाभदायक होता है।
4 -घर का अभिशप्त होना -
कभी कभी निवास स्थान के अभिशप्त होने से सारी मेहनत पर पानी फिर जाता है , गरीबी  लगातार बनी रहती है अत: घर की पवित्रता या शुद्धता की जांच भी करवा लेना चाहिए।  वास्तु या फिर तान्त्रिक जांच भी योग्य व्यक्तियो से करवाना चाहिए। ऐसे घरो  में लगातार गरीबी, बीमारियो , कलह आदि लक्षण पाये जाते है.
5- उच्च शक्तियों की अप्रसन्नता -
कभी कभी उच्च शक्तियां  जैसे पितर जी या कुलदेवी के रुष्ट होने सेभी गरीबी बिमारी या फिर संघर्ष ख़त्म नहीं होता , अत: ऐसी बातो के प्रति भी सावधानी से जांच सुयोग्य व्यक्तियो से करवाना चाहिए और उच्च शक्तियो की प्रसन्नता के लिए भी प्रयास किये जाने चाहिए। हालांकि विश्वास तो नहीं होता होगा पर यह सत्य है 
                      "याद रखिये कुलदेवी या कुलदेवता के नाराज होने से अन्य देवी देवता भी एक सीमा तक ही भला कर पाते है" ।
6 तंत्र सम्बन्धी बाधाये -
कभी कभी स्वयं या घर पर या कार्य स्थल पर टोना टोटका जैसे बाधाओं को भी कारण के रूप में देखा गया है। जिसके कारण गंभीर संकट भी उपस्थित हो जाते है। व्यक्ति मेहनत करता रहता है या फिर वास्तु प्रयोगो को आजमाता रहता है पर कोई फर्क नहीं पड़ ता इससे छुटकारा पाने हेतु किसी सही तांत्रिक द्वारा निवारण प्रयोग ही परेशानी दूर कर पाता है। 
 इन बातों  को लोग अंधविश्वास भी कह डालते है पर ऐसे "वैज्ञानिक सोंच" वाले भी स्वयं आस्तिक होते है और ईश्वर के अस्तित्व पर विशवास रखते हुए धार्मिक रीती रिवाजो का पालन करते देखे जाते है। दिन को जनता के सामने "नास्तिक/आधुनिक सोंच वाले" और  शाम को नारियल अगरबत्ती लेकर मंदिर की और या अँधेरे में किसी बाबा के पास ऐसे लोग देखे जा सकते है। 

वास्तु शास्त्र का सच----VASTU SHASTRA (Hindi)



वास्तु शास्त्र का सच---------
रेणीक बाफना हस्तरेखाविशेषज्ञ रायपुर (मोबा.98279-43154)

भारत में भेड़चाल की परम्परा बहुत पुरानी है , और भारतीय हजारो वर्ष से इसका आदी रहा है , किसी ने कहा दिया यदि फलां  चीज रखने से घर में धन  वर्षा होती है तो बस अधिकांश लोग देखा देखी  रखना शुरू कर देंगे , चाहे कीमत कुछ भी हो , चाहे धन आये या न आये।  करीब बीस वर्ष पूर्व वास्तु शास्त्र का चलन नहीं था , पर अचानक कुछ लोगो ने पुराने ग्रंथो में कुछ उदाहरण खोजे और  अनेक मूर्धन्य विद्वान पैदा हो गए। अनेक किताबे लिखी गयी , अनेक झूठे सच्चे प्रमाण दिए गए , एक "ऊर्जा " का प्रवाह (नेगेटिव और पॉजिटिव )का सिद्धांत समझाया गया ,जो किसी ने न देखा, न नाप जोख किया जा सका। अनेको ने इसे साइंटिफिक बताया , विज्ञानछाप प्रमाण भी दिए गए।  रहस्य  विध्याओ में मेरी स्वाभाविक रूचि के कारण मेरा भी ध्यान जाना स्वाभाविक था , परन्तु परम्परा के विरुद्ध मेरी रूचि - "पहले सच्चाई परखो फिर मानो " में ज्यादा थी।  मैंने निरिक्षण करना शुरू किया तो दैनिक राशिफल, साप्ताहिक राशिफल जैसी बकवास से ज्यादा नजर नहीं आया। पाठको के समक्ष कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूं।
1 . एक उदाहरण में एक घर में ईशान दिशा में खुली लेट्रिन , पूर्व में पीपल का वृक्ष , जिसकी शाखाएं घर तक आती थी , घर का मुख दक्षिण की और जैसा घोर दोष था , परन्तु उस घर का निवासी नगर सेठ भी बना तथा अथाह धन संपत्ति का स्वामी भी !
2 - एक अन्य उदाहरण में फैक्ट्री का मालिक जिस घर में  रहता था उसमे कुछ वास्तु दोष था , फैक्ट्री की जमीन भी तिकोनी थी , फैक्ट्री चलाने में आर्थिक कष्ट भी चल रहा था।  वास्तु सलाह के अनुसार पहले घर का वास्तु दोष कुछ तोड़ फोड़ कर सुधारा गया , बाद में फैक्ट्री का वास्तु दोष दूर करने एक मंदिर की स्थापना किया गया।  बस परिणाम आ गया।  फैक्ट्री रो धो कर डेढ़ साल चल पायी और बंद करना पड़ गया।
3 - जिस घर में श्वेत आक का पौधा हो वह घर शुभ माना जाता है  और धन संपत्ति से परिपूर्ण होता है , पर निरिक्षण में मैंने पाया कि ऐसा घर प्राय: खँडहर ही रहता है।
4 -नया घर बनवाये तो वास्तु शास्त्र का पालन करने में कोई गुनाह नहीं होता , परन्तु यह जरुरी नहीं सब कुछ अच्छा हो ही होगा।  मैंने प्रयोग के तौर पर एक वास्तु सम्मत घर नया बना कर देखा , परन्तु कोई ख़ास बात या  ख़ास उन्नति  जैसा चमत्कार नहीं देखा जितना बढ़ा चढ़ा कर बताया जाता है।
       दर असल कोई भी विद्वान किताबी ज्ञान वाला होता है कोई  वैज्ञानिक प्रयोग कर्ता या  खोजी नहीं होता।  अत  विद्वानो की भीड़ में खोजी विद्वान  कठिन होता है यदि कोई भाग्य से मिल भी जाए तो उसका संरक्षण चाहिए क्योकि हीरे कम कांच ज्यादा होते है अंधाधुंध किसी सिद्धांत को मानना भी गलत है। अत अनुभवी के अनुभव को महत्व देने के साथ खुद भी आँख कान खुला रखे तो बेहतर होता है मैंने पारद शिवलिंग रुद्राक्ष राशि रत्न पिरामिड आदि अनेक प्रयोग  निरिक्षण कर देखा और भरोसेमंद नहीं पाया।  इसी तरह लाफिंग बुड्ढा यानी हंसते हुए वृद्ध व्यक्ति की मूर्ति आदि चाइनीज वस्तुओ को भी भरोसेमंद नहीं पाया। अनेक नियम जैसे घडी, आइना सम्बन्धी नए नियम भी वास्तु शास्त्र में जुड़े मिलते है  जबकि वास्तु शास्त्र प्राचीन बताया जाता है जबकि इन चीजो का अस्तित्व भी नहीं था।

अजीबो गरीब परेशानियो के लिए सम्मोहन चिकित्सा : HYPNOTHERAPY (Hindi)

अजीबो गरीब परेशानियो के लिए हिप्नोथैरेपी (सम्मोहन चिकित्सा ) :-
-आर.  के. बाफना ,(94063-00401)(वाट्सएप)
चंगोराभाठा , रायपुर (छ.ग. )
दुनिया में मनुष्य बड़ा जटिल प्राणी  है , जितना जटिल उताना ही अजीबो गरीब परेशानिया , रोग इत्यादि।  अनेक ऐसी समस्याए या रोग देखने में आती है जो दवाइयो से ठीक नहीं होते , आखिर भाग्य या ईश्वर की इच्छा मानकर लोग चुप बैठ जाते है , वर्षो भुगतते रहते है , भाग्य या पिछले जन्म का कर्म मानकर।  कुछ उदाहरण समझने के लिए दे रहा हूं पाठको के मार्गदर्शन के लिए।

१- एक व्यक्ति को लगता था कि घर से १०० मीटर के दायरे के भीतर सुरक्षित है , उससे बाहर जायेगा तो मर जाएगा ,नतीजा जीवन भर उसी दायरे में रहने लगा।

२- एक लड़का हर 10 -15  दिन में घर से भाग जाया करता था उसके घर वाले उसे समझा बुझा कर , मार पीट कर , कमरे में बंद कर , डाक्टरो को दिखाकर ,यहाँ तक झाड़फूंक करा कर देख चुके थे , सब बेकार साबित हुआ।
(इस लड़के की सम्मोहन चिकित्सा मैंने खुद सफलतापूर्वक किया)

३- एक दुकानदार रोजाना रात्रि तीन बजे उठता , दूकान जाता , ताले शटर इत्यादि की जांच करता , फिर वापिस आकर सो जाता।  कड़कड़ाती ठण्ड हो या मूसलाधार बारिश , ये क्रम कभी नहीं टूटता।


४-एक युवा को रात्रि स्वप्न में सांप बिच्छू दिखाई देते , नींद में चीखता चिल्लाता , घर वाले वर्षो से इस ला-इलाज बिमारी से परेशान रहे।(इस मरीज को भी सम्मोहन चिकित्सा से मैंने ही ठीक किया था)

५-एक व्यक्ति दिन भर तो नियमित कार्य करता परन्तु रोज रात्रि नौ बजे से बारह बजे शो में सिनेमा देखने जाता।  पिक्चर कोई भी हो , इससे उसे कोई मतलब नहीं , एक ही पिक्चर सैकड़ो बार देख डालता।  घर वाले परेशान थे ही।  शादी के बाद भी ये क्रम नहीं टूटा तो पत्नी ने इसी आदत से परेशान हो उसे छोड़ दिया।

६- कई  व्यक्ति अनेक प्रकार के भय से पीड़ित रहते है , जैसे - ऊंचाई से भय , अँधेरे से भय , बिजली कड़कने से भय , बंद कमरे से भय ,गन्दगी से भय।  इन्हे मनोविज्ञान की भाषा में " फोबिया " कहा जाता है।  इसी तरह आत्महत्या करने की ईच्छा  होना भी खतरनाक लक्षण है। परिवारके सदस्यो को भी ऐसे मामले में गम्भीरता से ध्यान देना चाहिये।

7- एक लड़की रात्रि में सोने के बाद नींद में सांपो का झुण्ड देखा करती थी और नींद में ही चीखना चिल्लाना किया करती थी,नींद खुल जाने के बाद सब सामान्य हो जाता था। 
(इस मामले का भी सम्मोहन चिकित्सा द्वारा इलाज मैंने सफलता पूर्वक किया था)
                 ये परेशानिया दरअसल मनोवैज्ञानिक समस्याए है , जिनका मनोरोग विशेषज्ञ , मनोविश्लेषण द्वारा करते है।  इसके साथ ही सम्मोहन चिकित्सा (हिप्नोथैरेपी ) सहज और प्रभावकारी चिकित्सा साबित होती है, होमियोपैथी से  भी इसका इलाज सम्भव है । हिप्नोथैरेपी से बुरी आदते भी छुड़ाई जा सकती है,पढ़ाई में एकाग्रता बधाई जा सकती है , दर्द रहित प्रसव भी सम्भव होता है , सद्गुण विकास ,आत्मविश्वास में वृद्धि , नींद न आने की बिमारी , हकलाना निवारण आदि सम्भव है।

मेरा परिचय-आऱ के. बाफना : R.K.BAFNA- Introduction (Hindi)

मेरा परिचय - 
आऱ के. बाफना ,हस्तरेखा विशेषज्ञ , (शौकिया ) (94063-00401)
                                                                                                                                                           
                 मै , आर के बाफना, कालेज लाइफ से भी पहले हस्तरेखा विद्या को एक मजाक का विषय मानकर मजा लेता था और मजाक के तौर  पर मित्रो रिश्तेदारो को सामान्य बाते बताता रहा था विद्वान् होने का ढोग करके -
१- जैसे तुम बहुत अच्छे हो , सबका भला चाहते हो पर तुम्हारे साथ लोग बुरा ही करते है (हर व्यक्ति अपनी नजर में अच्छा ही होता है ! ) ,
२- तुम्हारे पास पैसा आयेगा पर टिकेगा  नहीं ( भला पैसा टिकने की चीज है? )
३-  आप बहुत समझदार है पर आपकी कोई कद्र नहीं करता   
४- युवा हो तो - आप किसी को बहुत चाहते हो ....... आदि आदि
 एक बार अपनी मामी जी को हाथ देखकर बताने का ढोग किया तो वो रो भी पड़ी , जबकि उस समय देखना आता ही नहीं था !
लगभग 1989 से इसकी सत्यता का प्रमाण मिलने बाद गम्भीर रूप से और जिज्ञासावश अध्ययन और प्रयोग करने लगा  , यह जानने के लिए क्या यह वाकई सच है ! या महज अंधविश्वास !
सच जाने के बाद इसका उपयोग मित्रो , जानपहचान के लोगो तथा रिश्तेदारो को मार्गदर्शन देने में उपयोग करने लगा  , बाद में उन्ही की सुझावो पर नौकरी से बचे समय पर आम लोगो को मार्गदर्शन देने लगा  जिससे हजारो लोगो को लाभ मिला . हस्तरेखा के गहन अध्ययन के लिए पश्चिमी लेखको के अंग्रेजी में लिखित हजारो रुपयो की किताबे खरीदी ( हमारे देश के लेखक धूर्त है केवल अनुवाद करके खुद की कृति बताते है ) और अध्ध्यन किया एवं प्रयोग करता  रहा ।  परम्परागत ज्योतिषियों को सामान्यतया अंग्रेजी भाषा का ज्ञान न होने से तथा खोजी प्रवृत्ति (रिसर्चर ) न होने के कारण लोगो को उचित मार्गदर्शन नहीं मिलपाता और ठगी के शिकार भी हो जाते है , एक समय बाद इन चीजो से विशवास भी उठ जाता है। 
                                  हस्तरेखा ज्योतिष वास्तव में भारतीय ऋषि मुनियो ने मनुष्य कल्याण के लिए ही रचना की।  जैन संत शांतिविजय जी ने हस्त-सामुद्रिक शास्त्र की रचना की , परन्तु भारतीयो के विशेष वर्ग ने स्वार्थवश छुपाने व कपटवश विकृत किये जाने से नष्ट भ्रष्ट हो गयी।  परन्तु भला हो विदेशी विद्वानो का जिन्होंने सारा जीवन इस खोज में खपा दिया और मिश्र, डचो , अरबियों एवं भारतीयो से इकट्ठा कर , परीक्षण कर  दुनिया के सामने प्रस्तुत कर दिया , ये विद्वान् अंगरेज , अमेरिकन, फ्रांसीसी आदि देशो के थे।  आज भी अनेक भारतीय विद्याएँ कपटी ,धूर्त , भारतीय लोगो के हाथो नष्ट भ्रष्ट हो रही है। 
                                        (मैंने दो ब्राम्हणो को देखा जिनके पास ख़ास विद्याएँ थी , मैंने परीक्षा की थी ,परन्तु एक ब्राम्हण  किसी को देना नहीं चाहता था सिर्फ़ इसलिए कि मै  उसके परिवार का नहीं जबकि उसका कोई पुत्र भी नहीं था, 
                   दूसरा इसलिए नहीं दिया क्योकि उसे धन का लालच था , जबकि उसके तीन पुत्रो में एक भी विद्याग्रहण के लायक नहीं था , तिस पर उसने वह विद्या एक गोंड जाति  के व्यक्ति से सीखा था ! दोनों ब्राम्हणो की मृत्यु के साथ विद्या भी चली गयी आगे किसी के पास नहीं जा सकी , नहीं तो मेरे जैसा सुपात्र सामने होने से मुझे मिल जाता और सैकड़ों का भला होता।)
                                 आर के बाफना यानी मै हस्तरेखा के साथ परामनोविज्ञान आदि में रूचि के चलते अन्य बाते भी सीखा और सैकड़ो लोगो का उद्धार भी किया।  एकाउंट मैनेजर के रूप में अनेक इंडस्ट्रीज में कार्य करते हुए , अपने शौक से सीखी हुई विद्याओ  का उपयोग , पिछले कुछ वर्षो से , नौकरी से बचा समय निकालकर करना शुरू किया ताकि लोगो का कुछ तो भला हो साथ ही साथ सीखे ज्ञान का सदुपयोग भी हो सके। शुरूआती दिनों में कुछ परेशानियो जैसे नींद में चीखना चिल्लाना (बहन का ), एवं घर से भाग जाने की इच्छा /बिमारी (अपने खेत के नौकर के पुत्र की ) को हिप्नोटिज्म से ठीक किया (ये प्रयोग मैंने सन 1984 में किये थे )। इसीतरह हस्तरेखा से भविष्य दर्शन  तथा जीवन के कष्टो में कमी करने के रास्ते खोजकर मार्गदर्शन दिया।
मेरे अध्ययन   :- मैंने  हायर सेकेंडरी तक विज्ञान (गणित), ग्रेजुएशन में कामर्स , फिर सी ए ( इंटर) तक की पढ़ाई की।  शौक से मनो विज्ञान , असामान्य मनोविज्ञान , मन्त्र विद्या , परा मनो विज्ञान , शिव पुराण ,भागवत पुराण ,गीता ,रामायण आदि पढ़ा।  शौक से बाइबिल, कुरआन , गुरुग्रंथ के अंश भी पढ़े। होमिओपैथी और नास्त्रेदेमस की भविष्यवाणिया भी पढ़ी। 
                                  ब्लाग  जगत में मैं क्यों आया ? इसकेपीछे एक कारण है , मैं लेख लिखता रहता था , अनेक अखबारो में मेरे व्यंग आदि प्रकाशित हुए ,  और मजा भी आया , अनेक लोग मेरे  गृह नगर में मुझे पहचानने लगे। पर सन्तुष्टि नहीं मिली।  इसी बीच अनेक वर्ष बीत  गए . लेख लिखना बंद  था परन्तु जीवन में ईश्वर की इच्छा से बहुत कुछ देखना था , वो देखना पड़ा।  फिर मेरे मन में -  अपने अनुभवो को बांटा जाए , ताकि नयी पीढ़ी के काम आये , अनेको का भला हो , भटकाव कम हो। इसलिए मेरे संस्मरण मैंने , और मेरे पुराने लेख अब ब्लॉग के जरिये प्रस्तुत कर रहा हूँ। In Search of TRUTH परामनोविज्ञान विषयक है जिसमे अजीबो गरीब घटनाओ का विवरण है जबकि MERE VICHAR में व्यंग , लेख , व्यक्ति परिचय ,असाध्य रोग जैसे विषयो पर है।  पढ़े- renikbafna.blogspot.com पर।
renikjain@blogspot.com
अपना संपर्क सूत्र हालांकि दे रहा हूँ क्योकि मेरे ब्लॉग जहा हजारो लोग पढ़ेंगे, फिर संपर्क भी करना चाहेंगे। उनसे संपर्क रख पाना, समस्याएं सुनना, रास्ता बताना संभव नहीं। निवारण करना भी संभव नही। अपने कार्य में बाधा उत्पन्न होगी। आखिर गृहस्थ हूँ मैं।