दान देने के बाद वापस लेने का फल :
रवेली वाले महाराज जी की सिद्धिया मैंने की बार परीक्षा कर ली थी , उन्हे प्राप्त थी सचमुच। ग्राम चारामा में कई बार मुलाक़ात होती थी। एक माहेश्वरी गोत्र का व्यक्ति उनक पास आता था। उसका भी एक रिश्तेदार या पहचान का एक अन्य व्यक्ति (माहेश्वरी ही ) किसी समस्या को लेकर उनके पास चक्कर लगा रहा था। पर महाराज जी कुछ देखने के बाद उसे कुछ नहीं बताते थे चुप ही रहते थे। धीरे धीरे मेरे कानो में यह बात पहुंची। मैंने उत्सुकतापूर्वक पूछा महाराज जी से -तो बाद में मुझे उन्होंने बताया - यह व्यक्ति जब बालक था तो इसके पिता जी ने एक मंदिर को अपनी कुछ जमींन दान में दे दी थी , परन्तु रजिस्ट्री नहीं करवा पाये। परन्तु यह बालक को पिता जी का यों दान देना पसंद नहीं आया। बड़ा होने के बाद जब इसके हाथ में सब कुछ आया तो इसने दान दी हुई जमींन वापस ले ली। उस जमींन की कमाई से ही मंदिर में दिया जल पाता था, पूजा वगैरह हो पाती थी। और पुजारी के परिवार का भी पेट पलता था। पर ये सब बंद हो गया और पुजारी सपरिवार भूखो मरने लगा। पुजारी के परिवार सहित मन ही मन उस माहेश्वरी को श्राप देते रहे। ऐसा करते करते पुजारी की मृत्यु हो गयी . उधर माहेश्वरी निसंतान ही रहा और फिर एक दिन उसके यहाँ एक बच्चे का जन्म हुआ परन्तु वह जन्म से गूंगाबहरा था। वह बालक, दरअसल उस मंदिर का पुजारी है जो पुनः जन्म लेकर आया है अपना कर्जा वसूलने। माहेश्वरी ने बच्चे के इलाज में लाखो रुपये खर्च कर दिए पर कोई लाभ नहीं हुआ। महाराज जी बोले- अब ऐसे में उसे मैं क्या बताऊ ?
मैने उत्सुकता से पूछा अब आगे क्या हो सकता है ? तो उन्होंने बताया कि कुछ ही दिनों में उस बच्चे रूपी पुजारी का कर्ज वसूल हो जाएगा तो उसकी (बच्चे की )मृत्यु हो जायेगी। इससे दुःख झेलना पडेगा। पर ये तो मूल धन हुआ। ब्याज के रूप में सजा अभी बाकी है। अब धीरे धीरे वह माहेश्वरी बहरा होने लगेगा, फिर पूरी तरह गूंगा और बहरा हो जाएगा, और ऐसा सहते सहते मृत्यु पर्यन्त ऐसा ही रहेगा। यही उसका उसका दंड है जो उसे भुगतना है।
पाठको , यद्धपि मैं उस माहेश्वरी परिवार से न मिला , न ही उसे देख पाया , पर चारामा के जिस माहेश्वरी की पहचान से वह आया , उसे मै जानता हूँ और कई बार मिल चुका। उससे कुछ पूछा तो उसने भी गूंगे बहरे लडके की बात स्वीकारी .
रवेली वाले महाराज जी की सिद्धिया मैंने की बार परीक्षा कर ली थी , उन्हे प्राप्त थी सचमुच। ग्राम चारामा में कई बार मुलाक़ात होती थी। एक माहेश्वरी गोत्र का व्यक्ति उनक पास आता था। उसका भी एक रिश्तेदार या पहचान का एक अन्य व्यक्ति (माहेश्वरी ही ) किसी समस्या को लेकर उनके पास चक्कर लगा रहा था। पर महाराज जी कुछ देखने के बाद उसे कुछ नहीं बताते थे चुप ही रहते थे। धीरे धीरे मेरे कानो में यह बात पहुंची। मैंने उत्सुकतापूर्वक पूछा महाराज जी से -तो बाद में मुझे उन्होंने बताया - यह व्यक्ति जब बालक था तो इसके पिता जी ने एक मंदिर को अपनी कुछ जमींन दान में दे दी थी , परन्तु रजिस्ट्री नहीं करवा पाये। परन्तु यह बालक को पिता जी का यों दान देना पसंद नहीं आया। बड़ा होने के बाद जब इसके हाथ में सब कुछ आया तो इसने दान दी हुई जमींन वापस ले ली। उस जमींन की कमाई से ही मंदिर में दिया जल पाता था, पूजा वगैरह हो पाती थी। और पुजारी के परिवार का भी पेट पलता था। पर ये सब बंद हो गया और पुजारी सपरिवार भूखो मरने लगा। पुजारी के परिवार सहित मन ही मन उस माहेश्वरी को श्राप देते रहे। ऐसा करते करते पुजारी की मृत्यु हो गयी . उधर माहेश्वरी निसंतान ही रहा और फिर एक दिन उसके यहाँ एक बच्चे का जन्म हुआ परन्तु वह जन्म से गूंगाबहरा था। वह बालक, दरअसल उस मंदिर का पुजारी है जो पुनः जन्म लेकर आया है अपना कर्जा वसूलने। माहेश्वरी ने बच्चे के इलाज में लाखो रुपये खर्च कर दिए पर कोई लाभ नहीं हुआ। महाराज जी बोले- अब ऐसे में उसे मैं क्या बताऊ ?
मैने उत्सुकता से पूछा अब आगे क्या हो सकता है ? तो उन्होंने बताया कि कुछ ही दिनों में उस बच्चे रूपी पुजारी का कर्ज वसूल हो जाएगा तो उसकी (बच्चे की )मृत्यु हो जायेगी। इससे दुःख झेलना पडेगा। पर ये तो मूल धन हुआ। ब्याज के रूप में सजा अभी बाकी है। अब धीरे धीरे वह माहेश्वरी बहरा होने लगेगा, फिर पूरी तरह गूंगा और बहरा हो जाएगा, और ऐसा सहते सहते मृत्यु पर्यन्त ऐसा ही रहेगा। यही उसका उसका दंड है जो उसे भुगतना है।
पाठको , यद्धपि मैं उस माहेश्वरी परिवार से न मिला , न ही उसे देख पाया , पर चारामा के जिस माहेश्वरी की पहचान से वह आया , उसे मै जानता हूँ और कई बार मिल चुका। उससे कुछ पूछा तो उसने भी गूंगे बहरे लडके की बात स्वीकारी .
ऐसे मामले में अगर उस परिवार से मिलने की कोशिश करता तो भी दुष्ट व्यक्ति से मुलाक़ात करना और उसके परिवार के बारे में पूछताछ करना अच्छा नहीं होता। इसलिए घटना के बारे में गहराई से छानबीन मैं नहीं कर सका।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें