कुत्ते की छठी इन्द्रिय होती है !
आप माने या न माने कुत्ते को छठी इन्द्रिय प्राप्त होती है। मैं यहाँ उन कुत्तो की बात नहीं कर रहा हम जो दो टांगों वाले होते है और देश के राजनीतिक क्षितिज के परिपक्ष्य में इंटरनेट में छाये हुए है ! अब की बार मेरा आब्जर्वेशन चार टांगों वाले प्रकृति रचना वाले कुत्तो पर पेश है।
बचपन में एक भूरे रंग का कुता मेरे बड़े भाई ने शौक से पाला था , नाम रखा-शेरा। काफ़ी समय तक घर पर रखे , काफ़ी समय तक खेले । फिर उसे दादाजी के पास गाँव में भेज दिए ताकि खेतों में टहलता रहे। कुछ साल वह वहां रहा , बीच बीच में हम लोग वहीं जाकर खेलते रहे उसके साथ। पर एक दिन दादाजी को गुस्सा आया कि इसके लिए रोज रोज खाना बनाना पडता है मुझे (क्योकि दादाजी अकेले रहते थे ), उन्होंने कांकेर में ही एक किराना दूकानदार को दे दिया। जो मेरे घर से २ किलोमीटर दूर अन्नपूर्णापारा में रहता था। उसके यहाँ शेरा हमेशा रहता था एक आज्ञाकारी पालतू पशु की तरह। पर हर साल ठीक दीपावली के रोज राजापारा स्थित हमारे घर के सामने सुबह सीबह आकर बैठ जाया करता था। हम लोग एक दो बार तो ध्यान नहीं दिए बस उसे देखते और त्यौहार के हिसाब से जो कुछ रोटी वगैरह बनाता था उसे दे देते थे। पर हर साल यही सिलसिला चलता रहा और हम लोग आश्चर्यचकित होने लगे आखिर शेरा को कैसे मालूम पड़ जाता है कि आज दीपावली है ! वह कैलेण्डर तो देख नहीं सकता , फिर तिथी , तारीख आदि का ज्ञान उसे कैसे हो जाता है !
एक बार तो गजब हो गया , बीच में ही एक दिन वह सबेरे सबेरे घर के सामने आकर बैठ गया। हम लोग सोंचने लगे आज तो दिवाली नहीं है फिर ये शेरा आज सबेरे सबेरे कैसे और क्यों आ गया है। उसी दिन कुछ घंटे बाद ही करीब नौ बजे मेरी दादी जी कि लीवर फटने से मृत्यु हो गयी , शाम तक शेरा वहीँ बैठा रहा घर के सामने। फिर चला गया। कुछ सालो बाद वह कभी नहीं आया , शायद उसने भी नश्वर शरीर का त्याग कर दिया।
यहाँ शेरा की दो बाते आश्चर्यचकित कराती है , एक तो यह कि उसे समय ज्ञान होता था जैसे आज ही दीपावली है - बिना कैलेण्डर देखे या ब्राम्हणो से पंचांग दिखाए। दूसरी यह कि मेरे पुराने मालिक के यहाँ किसी कि मृत्यु होने वाली है इसलिए शोक में शामिल होने सबेरे से आकर बैठ गया ! यानि घटना का पूर्वाभास।
काफी साल हो गए इसके बाद फिर एक कुतिया काले रंग की हमें मिल गयी भटकती हुई आ गयी। हमने भी पहले तो उसके मालिक का पता किया , पर पता नहीं चलने पर उसे पाल लिया। बाद में कुछ दिनों बाद पता चल गया तो भी पुराने मालिक ने उसे न रखने कि इच्छा जाहिर किया और हमें ही रखने कह दिया। मैंने कई बार ध्यान दिया कि भले ही वह( जैकी नाम रखा हमने ) बोल नहीं सकती पर मनुष्यो कि भाषा शायद समझती थी। जैसे मैंने उसे बिना इशारा किये मेरे बेटे के पास बैठने कहा या फिर उसे मेरे वापस आते तक किसी स्थान पर बैठने कहता तो जैकी वैसा ही करती। यानि मेरे आते तक वहीं बैठे रहती, मेरे नन्हे बेटे की देख रेख करते !
अब काफ़ी साल बाद मेरे न कहने के बाद भी मेरी बिटिया, जो कुत्तो की बेहद शौकीन है, को संयोग से जर्मन शेफर्ड प्रजाति की एक कुतिया( लगभग) घायल अवस्था में भूखी प्यासी मिल गयी, दया कर उसका इलाज करवाते हुए घर पर ले आयी। मैंने भी स्वीकृति दे दी नाम रखा- जूबी । छोटे बच्चो की तरह मचलती उसकी हरकते देखता रहता हूँ। जूबी घर पर सबसे ज्यादा मुझे ही चाहती है , और उसके बाद ही मेरी बिटिया से जूबी को लगाव है। उसकी समझदारी भरी हरकते देखकर मैं स्वयं आश्चर्य चकित हूँ। घर पर मैं कहता हम कि ये बोल नहीं सकती -भगवान ने इसे जुबान नहीं दी पर समझती सब कुछ है ऐसा लगता है . जैसे भूख लगी किचन के पास जाकर सामने दरवाजे पर चुपचाप बैठकर टुकुर टुकुर "मम्मी " को देखते रहना , यदि ध्यान न दिया जाए तो थोड़ी देर बार ऊं , ओं आदि आवाजें निकालना , पर किचन में नहीं घुसती -डाँट पड़ेगी जानती है। पूजा के कमरे में कभी नही घुसना , यह भी समझती है बिना सिखाये ! कभी कोई गलती हो जाए तो डांट के डर से सोफे के नीचे घुसकर मुंह छुपा लेना। यदि डांट पद रही हो तो सिर झुका कर जमीन कई ओर देखना, ऐसी ही अनेक हरकते करती है वो।
आप माने या न माने कुत्ते को छठी इन्द्रिय प्राप्त होती है। मैं यहाँ उन कुत्तो की बात नहीं कर रहा हम जो दो टांगों वाले होते है और देश के राजनीतिक क्षितिज के परिपक्ष्य में इंटरनेट में छाये हुए है ! अब की बार मेरा आब्जर्वेशन चार टांगों वाले प्रकृति रचना वाले कुत्तो पर पेश है।
बचपन में एक भूरे रंग का कुता मेरे बड़े भाई ने शौक से पाला था , नाम रखा-शेरा। काफ़ी समय तक घर पर रखे , काफ़ी समय तक खेले । फिर उसे दादाजी के पास गाँव में भेज दिए ताकि खेतों में टहलता रहे। कुछ साल वह वहां रहा , बीच बीच में हम लोग वहीं जाकर खेलते रहे उसके साथ। पर एक दिन दादाजी को गुस्सा आया कि इसके लिए रोज रोज खाना बनाना पडता है मुझे (क्योकि दादाजी अकेले रहते थे ), उन्होंने कांकेर में ही एक किराना दूकानदार को दे दिया। जो मेरे घर से २ किलोमीटर दूर अन्नपूर्णापारा में रहता था। उसके यहाँ शेरा हमेशा रहता था एक आज्ञाकारी पालतू पशु की तरह। पर हर साल ठीक दीपावली के रोज राजापारा स्थित हमारे घर के सामने सुबह सीबह आकर बैठ जाया करता था। हम लोग एक दो बार तो ध्यान नहीं दिए बस उसे देखते और त्यौहार के हिसाब से जो कुछ रोटी वगैरह बनाता था उसे दे देते थे। पर हर साल यही सिलसिला चलता रहा और हम लोग आश्चर्यचकित होने लगे आखिर शेरा को कैसे मालूम पड़ जाता है कि आज दीपावली है ! वह कैलेण्डर तो देख नहीं सकता , फिर तिथी , तारीख आदि का ज्ञान उसे कैसे हो जाता है !
एक बार तो गजब हो गया , बीच में ही एक दिन वह सबेरे सबेरे घर के सामने आकर बैठ गया। हम लोग सोंचने लगे आज तो दिवाली नहीं है फिर ये शेरा आज सबेरे सबेरे कैसे और क्यों आ गया है। उसी दिन कुछ घंटे बाद ही करीब नौ बजे मेरी दादी जी कि लीवर फटने से मृत्यु हो गयी , शाम तक शेरा वहीँ बैठा रहा घर के सामने। फिर चला गया। कुछ सालो बाद वह कभी नहीं आया , शायद उसने भी नश्वर शरीर का त्याग कर दिया।
यहाँ शेरा की दो बाते आश्चर्यचकित कराती है , एक तो यह कि उसे समय ज्ञान होता था जैसे आज ही दीपावली है - बिना कैलेण्डर देखे या ब्राम्हणो से पंचांग दिखाए। दूसरी यह कि मेरे पुराने मालिक के यहाँ किसी कि मृत्यु होने वाली है इसलिए शोक में शामिल होने सबेरे से आकर बैठ गया ! यानि घटना का पूर्वाभास।
काफी साल हो गए इसके बाद फिर एक कुतिया काले रंग की हमें मिल गयी भटकती हुई आ गयी। हमने भी पहले तो उसके मालिक का पता किया , पर पता नहीं चलने पर उसे पाल लिया। बाद में कुछ दिनों बाद पता चल गया तो भी पुराने मालिक ने उसे न रखने कि इच्छा जाहिर किया और हमें ही रखने कह दिया। मैंने कई बार ध्यान दिया कि भले ही वह( जैकी नाम रखा हमने ) बोल नहीं सकती पर मनुष्यो कि भाषा शायद समझती थी। जैसे मैंने उसे बिना इशारा किये मेरे बेटे के पास बैठने कहा या फिर उसे मेरे वापस आते तक किसी स्थान पर बैठने कहता तो जैकी वैसा ही करती। यानि मेरे आते तक वहीं बैठे रहती, मेरे नन्हे बेटे की देख रेख करते !
अब काफ़ी साल बाद मेरे न कहने के बाद भी मेरी बिटिया, जो कुत्तो की बेहद शौकीन है, को संयोग से जर्मन शेफर्ड प्रजाति की एक कुतिया( लगभग) घायल अवस्था में भूखी प्यासी मिल गयी, दया कर उसका इलाज करवाते हुए घर पर ले आयी। मैंने भी स्वीकृति दे दी नाम रखा- जूबी । छोटे बच्चो की तरह मचलती उसकी हरकते देखता रहता हूँ। जूबी घर पर सबसे ज्यादा मुझे ही चाहती है , और उसके बाद ही मेरी बिटिया से जूबी को लगाव है। उसकी समझदारी भरी हरकते देखकर मैं स्वयं आश्चर्य चकित हूँ। घर पर मैं कहता हम कि ये बोल नहीं सकती -भगवान ने इसे जुबान नहीं दी पर समझती सब कुछ है ऐसा लगता है . जैसे भूख लगी किचन के पास जाकर सामने दरवाजे पर चुपचाप बैठकर टुकुर टुकुर "मम्मी " को देखते रहना , यदि ध्यान न दिया जाए तो थोड़ी देर बार ऊं , ओं आदि आवाजें निकालना , पर किचन में नहीं घुसती -डाँट पड़ेगी जानती है। पूजा के कमरे में कभी नही घुसना , यह भी समझती है बिना सिखाये ! कभी कोई गलती हो जाए तो डांट के डर से सोफे के नीचे घुसकर मुंह छुपा लेना। यदि डांट पद रही हो तो सिर झुका कर जमीन कई ओर देखना, ऐसी ही अनेक हरकते करती है वो।
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