25 अगस्त 2016

देव वाणी मैंने सुना !!!

साधना करते2 कई बार हमें देव वाणी "सुनाई जैसा" देता है पर हम भ्रम विभ्रम समझ कर उपेक्षा कर देते है। ऎसे कई बार मुझे भी अनुभव हुए।

मेरा एक परम मित्र था सुब्रत दत्त राय,भारी संकट के दिनों में मेरे बहुत काम आया था। इसलिए वो हमेशा के लिए अविस्मरणीय बन गया,भले वो आज इस दुनिया में नहीं है।

वो कांकेर में ही था पर मैं रायपुर आ गया था रोजी रोटी के कारण। एक दिन मुझे कही से खबर मिली कि उसकी तबियत बहुत खराब है आजकल। उसके हार्ट में छेद था। मैंने उसी दिन सोंचा, मैंने उसके लिए आजतक कुछ भी नही किया,आज उसकी बिमारी दूर करने "प्रयोग" कर देखूंगा,बदले में मुझे कोई कष्ट हुआ भी तो झेलूंगा। रात्रि करीब 9 बजे मैंने देवी की संक्षिप्त पूजा की और एक भैरव प्रयोग शुरू किया,तभी मुझे लगा कोई कह रहा है- मत कर,अब कोई फायदा नहीं,रुक जा,बहुत देर हो चुका,अब कोई फायदा नहीं !
यह महसूस करने के बाद मैं रुक ही गया और आसन से उठ गया।
दूसरे दिन मेरे मित्र डॉ रामानी का फोन आया दिन को कि सुब्रत दत्त राय की मृत्यु हो गयी। मैंने पूछा- कब? उन्होंने बताया कल रात्रि करीब 11 बजे।
      यानी कल जब मैं पूजा कर रहा था तो उसकी जिंदगी के आखरी 2 घंटे ही बचे थे!
   उससे भी बड़ी बात, मेरे इष्ट देवी देवता ने मुझे रोका ! पर मैं भोला भाला इस वाणी को उस समय समझ भी न पाया !

24 अगस्त 2016

कल सुबह नंदी आएगा

एक सोमवार का दिन था, धर्म पत्नी ने सबेरे शंकर जी की पूजा की थी और एक केला अर्पित किया था।
रात्रि मैं माताजी और शंकर जी की पूजा में बैठा तो केला चढ़ा देखा और सोंचा शंकर जी का प्रसाद तो सीधे खाया नहीं जाता जब तक विष्णु भगवान् से स्पर्श न कराया जाए। अब इस केले का क्या करूँ।
तभी मुझे आभास हुआ- कल नंदी आएगा सबेरे2,उसे खिला देना। मैंने इस अनुभूति/अज्ञात कथन को ध्यान नहीं दिया। केला हटाकर एक तरफ रख दिया और पूजा किया।
दूसरे दिन सबेरे जब आँखे मलते2 उठा तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना न था,सचमुच एक गोल्लर/नंदी मेरे द्वार पर मेरे ही घर की ओर मुंह किये खड़ा था,जैसे हमारी प्रतीक्षा कर रहा हो। मैंने घर पर बताया-अरे ये नंदी तो सचमुच सामने आ चुका है यानी रात्रि को शंकर भगवान् ही मुझसे बोले थे,ऐसा कह पूरा किस्सा बताया। आम मेरे मोहल्ले में उन दिनों गाय बैल इत्यादि आया नहीं करते थे।
खैर मैंने सोंचा अभी तो मैं मंजन कर रहा हूँ, नहाधोकर ही पूजा स्थल में प्रवेश करू फिर केला इसे दे दूंगा। नंदी भी गया नहीं,ढीठ की तरह करीब 20 कदम दूर जाकर मेरे घर की ओर मुंह करके बैठ गया। नहा धोकर जब मैं शंकर जी वाला केलाप्रसाद लेकर उसे देने गया तो वह गुर्राया जैसे कह रहा हो इतनी देर क्यों किया !
केला खाकर भी वो गया नहीं बैठा रहा। अब मेरी पत्नी को प्रेरणा मिली उसे रोटी खिलाये। तो उसने एक मोटी रोटी बनाई उसे घी लगाकर शक्कर लगाकर नंदी को देने गयी तो शान्ति से बैठे2 ही खा लिया और खाने के तुरंत बाद चट से उठा और चल दिया। रोटी देते वक्त न तो गुर्राया न ही सींग हिलाकर पास आने पर डराया। बल्कि जैसे वह इसी का इन्तजार कर रहा था।

गढ़िया देव दर्शन

गढ़िया देव दर्शन-
ये सौभाग्य मुझे प्राप्त नहीं हुआ।
बस्तर जिले में पहाड़ियों का देवता होने की मान्यता है जिसे गढ़ियादेव कहते है। 1993 के लगभग वर्ष की बात थी उन दिनों मैं छोटे भाई के स्टोन क्रशर की देखभाल करता था। साईट में ही रहने की व्यवस्था छोटी सी झोपड़ी बना कर कर दी गयी थी। अक्सर रात्रि में मैं रुक जाया करता था। पलंग बिस्तर भी लगा रहता था। एक रात मैं वहां नहीं रुका था। दूसरे दिन सबेरे जब आया तो कर्मचारी डरे हुए थे। पूछने पर बताया कि रात्रि करीब 2 बजे के आसपास एक इंसानी चेहरे का कोई आया ,दिया कंडील जल ही रहा था उसकी रोशनी में साफ़ दिखाई दे रहा था, चौखट के सामने खड़ा हो गया और हम सबको ध्यान से देख रहा था। आगे पूछने पर बताया गया कि चेहरे पर भी काले2 बाल थे और पूरे शरीर पर भी बाल थे भालू जैसे पर वो भालू नहीं था। सभी 4-5 कर्मचारियो ने देखा था जो उस झोपड़ीनुमा घर में सोये हुए थे। उसने अज्ञात व्यक्ति ने न कुछ कहा, न कोई डराने वाली हरकत की। पर सभी लोग बुरी तरह  डर गए थे।
ग्रामीण लोग भालू को भली भाँती पहचानते है।
           मैं भी अचरज में पड़ गया कि वो भालू जैसा शरीरवाला और इंसानी चेहरे वाला जीव भला कौन हो सकता है। फिर उन ग्रामीणों ने जवाब दिया साहब ये गढ़िया देवता हो सकता है क्योकि आसपास पहाड़ है।
           उनका डर दूर करने के हिसाब से मैं बोला-फिर डरने की क्या बात है,वो तो देव था नुकसान थोड़ी पंहुचाता । तुम लोगो का सौभाग्य था कि तुम्हे देव का साक्षात् दर्शन हुआ। मैं कल रात रुका होता तो मुझे भी दर्शन का सौभाग्य होता। दर्शन करते ही उसे नमस्कार करता और पूजा भी।
        पर मुझे इस अद्वितीय मौके पर अनुपस्थित हो जाना बहुत अखरा।

23 अगस्त 2016

जंगल में रात्रि 3 बजे कौन था?

सन् 1973 लगभग वर्ष रहा होगा,9 वीं पढ़ते थे आयु करीब 15 वर्ष । एलिमेंटरी बायोलॉजी भी सब्जेक्ट था। टीचर नरेश तिवारी जी ने कैम्प लगाने का फैसला किया जंगली इलाके में ताकि हम लोग पेड़ पौधों के प्रकार आदि को देख सके और बायोलॉजी और अच्छी तरह समझ सके। 5-7 लडके ही क्लास में जाने को तैयार हुए।
कांकेर की दुधनदी का उद्गमस्थल मलांजकुड़ुम जो एक अविकसित पिकनिक स्पॉट भी था,वहां तम्बू लगाकर,खुले आसमान के नीचे चावल दाल सब्जी बनाकर खाना और झरने/नालेनुमा नदी में नहाना बड़ा आनंददायक था। जंगलो में भटकना ये सब आनंद शहरों में कहाँ।
रात्रि में खा-पीकर  तम्बू के भीतर ही हम सब सो गए। रात्रि करीब 3 बजे सर ने हम सबको जगाया और चुप रहने का इशारा किया,हम भी डरकर खामोश ही रहे कि आखिर बात क्या है!
तम्बू के आसपास उस जंगल में कोई व्यक्ति घूम रहा था जिसकी आवाज सर ने सुन लिया था,खतरा न हो इसलिए हम सबको जगा दिया था। गाँव तो काफी दूर था वहां से। तभी हम सभी ने किसी को तम्बू के बाहर किसी को पुकारते सुना- "कोई है क्या बाबू,कोई जाग रहे हो क्या?कोई बीड़ी वगैरह तो पिलाओ"। मैंने भी साफ़2 सुना, पर किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। क्योकि चुप्पी रखने का इशारा हुआ था। फिर वो व्यक्ति चला गया।
दूसरे दिन दोपहर को कोई ग्रामीण आया हुआ था उससे सर ने कोई बात की उसे बताया जो हम कोई नही सुन पाये। सिर्फ इतना ही सुना-वही था क्या? ग्रामीण ने जवाब दिया-हाँ वही होगा।
हमने सर से पूछा-कौन तरह होगा सर?पर उन्होंने नहीं बताया,बाद में बताऊंगा कहकर टाल दिया कि हम बच्चे न डर जाए कही और वापस घर जाने की जिद न कर बैठे।
आजतक मैं समझ न पाया "वो कौन था" जो इतनी रात 3 बजे घने जंगल में तम्बू के पास आकर हमें आवाज दे रहा था। कोई प्रेत/भटकती आत्मा या गढ़िया देव(पहाड़ी का देव) या कोई साधु जो जगलो में तपस्या करते रहते है। कोई ग्रामीण तो रहा नहीं होगा इतनी रात को ! वहां जंगली जानवर भी रहते थे जिन्हें रोकने अलाव जला रखा था रात भर।

21 अगस्त 2016

अंतरिक्ष-दूसरे ग्रहो के प्राणी यानी एलियन

रायपुर। जिस किसी ने भी ऋतिक रोशन की ‘कोई मिल गया’ फिल्म देखी होगी, वे अवश्य ही दूसरे ग्रह के प्राणी या एलियन को लेकर काफी रोमांचित हुए होंगे। एलियन का धरती पर आना और उसका रहन-सहन हमेशा ही पृथ्वीवासियों के लिए अजूबा रहा है। क्या ये वास्तव में सच है? ये प्रश्न हमेशा से सबके दिलो-दिमाग पर कौंधता है। पर छत्तीसगढ़ के सिरपुर के पुरातात्विक खुदाई में कुछ ऐसे ही प्रमाण मिले हैं, जिनसे यह पुख्ता होता है कि यहां भी हजारों साल पहले एलियन आ चुके हैं।

"एलियन के नाम से विख्यात मूर्तियों के ही समान हैं "

वहीं भारतवर्ष में भी हजारों सालों से यह मानना है कि दूसरे ग्रहों के भी प्राणी निवास करते हैं और बीच-बीच में वे पृथ्वी पर आते रहते हैं। इस बारे में विदेशों में भी लोगों द्वारा दूसरे ग्रहों से आई हुई उड़न तश्तरियां समय-समय पर देखे जाने के समाचार मिलते ही रहते हैं। उड़न तश्तरी के बारे में तो एक पाश्चात्य वैज्ञानिक ने तो पूरी की पूरी किताब ही लिख डाली है। वरिष्ठ पुरातत्वविद डॉ. अरुण शर्मा ने खास चर्चा में बताया कि इस तरह की बातों को काल्पनिक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि समय-समय पर उनके प्रमाण मिलते गए हैं।

डॉ. शर्मा के मुताबिक, भारतवर्ष में लोगों की यह धारणा है कि दूसरे ग्रहों से खासकर, मंगल और बुध से, हमारे संबंध थे। उन्होंने बताया कि सिरपुर उत्खनन में बाजार क्षेत्र से करीब 2600 वर्ष पुरानी पकाई हुई मिट्टी के पुतले मिले हैं, जिन्हें सामान्य खिलौना नहीं कहा जा सकता। इनमें कुछ ऐसे हैं, जो पाश्चात्य देशों में मिले एलियंस के नाम से विख्यात मूर्तियों के ही समान हैं। कुछ में तो एलियंस के चेहरों और मास्क में इतनी समानता है कि इन्हें आज से 2600 वर्ष पहले सिरपुर के कलाकारों ने बनाया, जबकि उनका विदेशों से कोई संबंध ही नहीं था।

डॉ. शर्मा बताते हैं कि जब कुछ पाश्चात्य वैज्ञानिक सिरपुर आए, तब उन्हें इन मूर्तियों को दिखाया गया तो वे भी उनकी कल्पना एवं सिरपुर के कारीगर की कल्पना में समानता से आश्चर्यचकित हो गए। उनका मानना है कि जब तक बनाने वाले इन एलियन को नहीं देखा होगा, तब तक ऐसी सौ प्रतिशत समानता नहीं आ सकती। इससे साफ जाहिर है कि सिरपुर जैसे संपन्न एवं विकसित वाणिज्यिक इलाके में दूसरे ग्रहों के ये प्राणी आए होंगे। गौरतलब है कि सिरपुर के पुरातात्विक उत्खनन का कार्य डॉ. अरुण शर्मा के नेतृत्व में ही 2008-09 के आसपास की गई थी, जिनमें प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के प्रमाण मिले हैं। सिरपुर के साथ-साथ छत्तीसगढ़ के प्रयागराज राजिम के उत्खनन का जिम्मा भी डॉ. अरुण शर्मा ने संभाला था।

डॉ. शर्मा ने दूसरे ग्रहों के प्राणी के संबंध में आगे बताया कि ये बड़े आश्चर्य की बात है कि राजिम के उत्खनन में भी हूबहू ऐसी मूर्तियां मिली हैं। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ में पुरा वैभव का भंडार है, आवश्यकता तो इस बात की है कि इस विषय पर और अधिक खोज की जाए और खासकर छत्तीसगढ़ के दो-तीन ऐतिहासिक पुरास्थलों में खुदाई की जाए, ताकि छत्तीसगढ़ का पुरावैभव प्रकाश में आ सके।

कैसे साहब मुझे क्यों गाली दिए थे?

🌐जैसा कि मैंने कहा था कि भारत में ज्योतिष से भी बड़ी विद्याऍ मौजूद है। कुंडली और हस्तरेखा आदि विद्याएं इनके सामने कुछ भी नहीं। इन्हें दैवी सिद्धि  कहा जाता है
💀🗿 1978 के पहले की घटना का उदाहरण देता हूँ।
मेरे अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर श्री ठाकुर साहब अपने तीन मित्रो के साथ कांकेर के पूर्णिमा होटल में बैठकर बड़ा खा रहे थे। बातो2 में मित्रो ने बताया कि कांकेर से कुछ किलोमीटर दूर गाँव में एक ग्रामीण रहता है उसे कुछ सिध्दियां प्राप्त है।पीपल के पत्ते में देखकर कुछ भी बता देता है। ये सुनकर प्रोफ़ेसर साहब आश्चर्य चकित हो गए और बोल पड़े -"चल तो साले को देखते है"।
चारो होटल से नाश्ता करने के बाद जाने को तैयार हो गए। नाश्ता करने के बाद दो मित्रो को कुछ जरुरी काम आ गया तो वे जाने से इनकार कर बैठे।
👽अब प्रोफ़ेसर साहब एक मित्र के साथ उस गाँव में जा पंहुचे अपनी मोटरसाइकिल से। उस ग्रामीण से मिलने के बाद मित्र ने परिचय दिया और कहा ये साहब कुछ पूछने (विचार करवाने)आये है।ग्रामीण ने कहा बैठिये आराम से फिर बाड़ी से बाहर आकर हाथ पैर धोकर अपने स्थान पर बैठा और एक पीपल का पत्ता लेकर देखने लगा।
फिर बोला-वाह रे ,होटल में बैठकर बड़ा खा रहे थे, पर चटनी तो मुँह से बह रही थी साफसफाई से तो खाना था। हूँ,चार दोस्त बैठे थे,चारो आने वाले थे पर जरुरी काम आने से दो दोस्त नहीं आ पाये।
फिर ठाकुर साहब से पूछा-क्यों साहब मुझे क्यों गाली दे रहे थे?
ठाकुर साहब ने जवाब दिया मैंने तो कोई गाली नहीं दी !
इस पर ग्रामीण ने कहा-आप ही ने तो कहा था- चल तो "साले " को देखते है। क्या "साले " शब्द गाली नहीं? और मैं कब से आपका "साला " हो गया?
अब प्रोफ़ेसर ठाकुर का चेहरा सूख गया ये सुनकर तो। उन्होंने क्षमा मांगी और वापस आ गए।

13 अगस्त 2016

दुष्टता करो और मुसीबत बुलाओ

अन्जाने में कपट दुष्टता गुरुर की वजह से आदमी मुसीबत मोल ले लेता है जिसकी क्षति पूर्ति संभव ही नहीं हो पाती।

वर्षो पहले ग्राम डौंडी (जिला दुर्ग) के पास किसी व्यक्ति के मुंह से सुनी घटना का विवरण बताता हूँ ताकि आप सभी सावधान रहे और ऐसी गलती न कर डाले।

डौंडी के पास किसी छोटे से शहर या ग्राम (नाम तो अब याद नहीं क्योकि 1994 में सूना था) एक मारवाड़ी सेठ की कपडे की दूकान थी। उसके यहाँ एक ग्रामीण आया और उधार कपड़ा लिया ,सेठ ने दे दिया और उधार रजिस्टर/खाते में लिख लिया।
कुछ दिनों बाद वो ग्रामीण उधार चुकाने आया परंतु सेठ की बजाय उसका लड़का बैठा हुआ था। ग्रामीण ने उधार चुकाया,सेठ पुत्र ने पैसा ले लिया। ग्रामीण ने अनुरोध किया कि उधारी लिखे को काट दे या उसमे नोट करदे। लडके ने आश्वासन दिया चिंता मत करो हिसाब में आ जायेगा।
कुछ दिन बाद वो ग्रामीण फिर कपड़ा खरीदने आया तो सेठ बोला पिछ्ला उधारी तो चुकाया नहीं और ऊपर से फिर उधारी मांगने आया है। ग्रामीण ने कहा मैं तो आया था और उधारी चुका दिया,उस दिन आप नहीं बैठे थे आपका लड़का बैठा था। इस पर सेठ नाराज हो गया और कहा यदि उधार चुकता ही गया होता तो खाते में लिखा होता। झूठ बोलता है। ग्रामीण ने कहा सेठ जी अपने लडके को बुला कर पूछ तो लो।
इस पर सेठ आपा खो बैठा और ग्रामीण को थप्पड़ ही थप्पड़ मारा और पिछला उधारी चुकाने को कहा। ग्रामीण ने कहा बिना कुसूर असलियत जाने मुझे मारते हो,सेठ अब तुम कल का सूरज भी नहीं देख पाओगे। सेठ भी गुस्सा कर अहंकारवश बोला-जा जा क्या कर लेगा।
ग्रामीण दरअसल तंत्र के मारण विद्या में निपुण था जिसे मूठ या बाण मारना कहा जाता है। वहां से जाने के बाद उसने मूठ या बाण चला दिया। रात्रि में ही सेठ की मृत्यु हो गयी। सबेरे शवयात्रा निकली तो वही ग्रामीण सड़क के किनारे खड़ा होकर देखते बड़बड़ाया-कहा था न कल का सूरज नहीं देख पाओगे! पास में खड़े लोग सुन लिए।
अब ज्योतिष पक्ष में भी ज़रा नज़र डाल ही ले- हस्तरेखा और कुंडली ज्योतिष में जो दीर्घजीवी व्यक्ति दिखाई देता हो वह भी अकाल मौत का शिकार हो सकता है। ऐसे में स्टाम्प पर लिखकर देने का दावा करने वाला ज्योतिषी सही कैसे हो सकता है? शास्त्र एक सिद्धांत है पर समयानुसार अज्ञात कारणों से गलत भी साबित हो सकता है। मैंने कुछ केसेस में "विधि का विधान" गलत होते देखा है। इसलिए कभी अपने विज्ञापनों में लिखता था-
"मैंने विधि के विधान को देखा है,उसे सही होते भी और बदलते भी"
-आर के बाफना,रायपुर छ ग

10 अगस्त 2016

R.T.O.Agent के घर का उद्धार

मैं तब एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में सीनियर एकाउंट आफिसर के पद पर कार्यरत था। एक RTO एजेंट अक्सर मेरे पास आया करता था जो कंपनी की गाड़ियो के आर टी ओ संबंधी कार्य देखा करता था।
सबेरे 9.30 से लेकर 5.30 तक ड्यूटी रहती थी। इसके बाद मैं फ्री हो जाता था। अत: समय काटने के लिए मैंने हस्तरेखा ज्योतिष प्रेक्टिस करने का निर्णय किया वो भी अनेक रिश्तेदारो के सलाह देने के बाद,झिझकते हुए।
     एक दिन RTO एजेंट ने यूँ ही पूछ लिया साहब शाम को इतनी जल्दी फ्री हो जाते हो उसके बाद आप क्या करते हो?टाइम पास कैसे करते हो? तब मैंने उसे बताया -लोग जो मेरे पास आ जाते है उनकी हस्तरेखा देखकर उनका मार्गदर्शन करता हूँ। ये जानकर उसे अचरज हुआ कि इतने समय से मैं आ रहा हूँ और मुझे पता ही नहीं। मैंने जवाब दिया न तुमने कभी पूछा तो बताऊंगा  भी क्यों? खैर उसने मुझसे उसी दिन शाम का एपाइन्टमेंट ले लिया और आया भी। मैंने देखा सब ठीक ठाक था। फिर भी उसकी बाते सुन मैंने एक तंत्र संबंधी साधना उसे दी कि वो उसे घर पर किया करे।
       आश्चर्य इस बात का हुआ कि वो जब भी प्रयोग करता,उसकी परेशानी बहुत बढ़ जाती। तब मैंने क्रमश: एक दिन की आड़ में,फिर कुछ दिनों के बाद सप्ताह में एक बार करने/पाठ करने को कहा। पर प्रयोग में ये पाया कि जिस दिन वो पाठ/प्रयोग करता उसी दिन उसके संकट बहुत बढ़ जाते थे। मुझे भी समझ में नहीं आता था आखिर भगवान् का नाम लेने से अशुभ क्यों साबित होता है!
    ऐसा वो हर एक दो दिन बाद या फिर सप्ताह में एक बार आकर रोना रोता। आखिर मैंने उसे बिठाकर पूछताछ किया तो पता चला उसका घर किराए का था और पुराना घर था। मकान मालिक कही दूसरे घर में रहता था और इस घर को किराए पर चढ़ा दिया। फ़ौरन मुझे समझ में आ गया कि इसका निवास अभिशप्त है और वहां कोई अशुभ शक्ति का निवास है,जब ये प्रयोग/पाठ करता है तो उस अशुभ शक्ति को जैसे जूते पड़ते होंगे वो क्रुद्ध होकर और परेशान करती है।
         ऐसा करते2 कई महीने बीत गए और वो हर हप्ते मेरे चक्कर लगाते रहा। महाशिवरात्रि का दिन आया,उस दिन मैं उपवास किया हुआ था और एक सुनसान शिवमंदिर जाकर हवन पूजन की योजना बना रखा था। इसकी तैयारी कर शांत बैठा ही था,कि वो आरटीओ एजेंट फिर आ धमका-बाफना जी मैं बहुत परेशान हूँ।क्या करू समझ में नहीं आ रहा।
     मुझे भी ताव आ ही गया। मैंने कहा मैं भगवान् की पूजा करने जा ही रहा हूँ,चलोगे?उसने स्वीकृति दे दी,फिर मैंने कुछ और तैयारी कर उसे लेकर उस शिव मंदिर जा पंहुचा। प्रारंभिक सारी पूजा करने के बाद मैंने उसके घर के "समस्त उत्पात" समाप्त करने प्रयोग कर दिया। उसका कार्य होने के बाद वो तो ऐसे गायब हुआ जैसे गधे के सिर से सींग।
6माह बाद वो कही सड़क चलते दिखाई दिया,पर मुझे देखकर अनदेखा कर दिया तो मैं ही खुद उसके पास जाकर पूछ लिया-क्या हाल है? सब ठीक ठाक?अब तो घर में कोई परेशानी नहीं होती उस दिन के बाद? उसने बताया हां अब सब ठीक ठाक है।
मैंने जान लिया मेरा प्रयोग सफल हुआ। पर भारतीयो की ये आदत बड़ी खराब होती है कि काम होने के बाद न तो रिपोर्ट देना, और कई तो इतने कृतघ्न  /अहसानफरामोश होते है कि हाय हेलो नमस्कार आदि भी भूल जाते है। यही हरकते साधको को उदासीन बना देती है और वे लोगो की भलाई न करने की कसम खा लेते है। ऐसा अनुभव मित्र साधको का भी रहा है। वे भी किसी को ध्यान इतनी आसानी से नहीं देते अब।

8 अगस्त 2016

करीब 9 साल से पीड़ित लड़की ठीक हुई

एक बार एक कंपनी की नौकरी छोड़ा हुआ था और दूसरी ज्वाइन करने के लिए एक सप्ताह का गैप मैंने लिया ताकि मानसिक तौर पर फ्रेश हो जाऊ।
इसी एक सप्ताह के गैप में नगर में ज्योतिष सम्मेलन हुआ,पेपर न्यूज पढकर मैं भी  श्रोता बन पंहुच गया। वहां मेरे गृह नगर के कई ज्योतिषी मित्र भी आये हुए थे,हम लोग भी लाइन से बैठे हुए सबका भाषण सुन रहे थे। मेरे तीन साथियो के बाद चोथे चेयर पर एक सरदार जी आकर बैठ गए और मेरे मित्रो से पूछताछ करने लगे कि स्टेज में बैठे लोगो में कोई पंहुचा हुआ तांत्रिक है क्या,मुझे उसकी सहायता लेनी है। मेरे मित्रो ने जो साफ़ दिल के थे सरदारजी को सलाह दी -इनके चक्कर में मत पड़ो ये सब झांसेबाज है और दुकानदार है,लंबे से उतार देंगे। बल्कि अपने पहचान के लोगो से संपर्क करने की सलाह देने लगे। इसी बीच कुछ बाते मेरे कानो में पड़ी तो मैंने सरदार जी को बुलाया और पूछा क्या बात है सरदारजी,क्या प्राब्लम है।
तो उसने बताया कि उसकी किशोर उम्र की बेटी पिछले 8-9 साल से बीमार है सारे वैद्य हाकिम डाक्टर आदि को दिखा चुका हूँ कोई फायदा नहीं हुआ,बिस्तर पर ही पड़ी रहती है। उसकी मायूसी और बीमार बिटिया की बात सुनकर दया आ गयी
(क्योकि मैं खुद भी एक बिटिया का बाप हूँ और बिटिया बाप को बहुत प्यारी होती है)
मैंने उसे एक परिचित महाराज के पास ले जाने की सलाह दी।
तभी उसने बताया कि 2-3 बार प्राण निकलते2 बचे है।कल रात को भी उसने आँखे उलट दी थी तो हनुमान चालीसा बैठकर पढ़ा तो वापस आँखे सीधी हुई और होश में आई। बिस्तर में पड़ी रहती है,ले जाने लायक स्थिति भी नहीं,डर है कि कही प्राण ही न निकल जाए।
अब मुझे बहुत दया आ गयी। मैंने कहा ज्योतिष सम्मेलन की फिजूल की भाषणबाजी से बोर हो चुका हूँ और घर जाने ही वाला हूँ। आप मेरे साथ चाहिए, आपको कुछ देता हूँ। घर आकर एक सिद्ध की हुई जड़ी मैंने उसे दी कि घर जाकर तुरंत इसे घिसकर चटा देना,फिर रात्रि में फिर घिसकर चटा देना,सबेरे फिर घिसकर चटा देना। ऐसा 2-3दिन बार2 करना,जब स्थिति संभल जाए तो उसे महाराज जी के पास ले जाना।
(मेरे तीसरे गुरु ने मुझे एक जड़ी सिद्ध करने की विधि बताई थी जो केवल दिवाली के 3 दिनों की अवधि में किया जाता है।मैंने प्रयोग के तौर पर कर के रखा था शायद कभी जरुरत पड़े तो अजमा कर देखूंगा)

सरदार जी ने वैसा ही किया,उससे उसकी बेटी पूरी तरह ठीक ही हो गई और महाराज जी के पास गया ही नहीं।

पर भारतीय आदत से लाचार,फीड बैक देना भी जरुरी नहीं समझते कि हमें परीक्षा का परिणाम तो पता चले तो आगे और काम आये।काम पूरा होने के बाद तो चेहरा दिखाना, बात करना भी गवारा नहीं होता।
बल्कि 5-6 दिनों के बाद किसी दूसरे को मेरे पास भेज दिया कि आर के जैन के पास चले जाओ "मेरा नाम लेना", बोलना सरदार मंजीत सिंह भिलाई वाले ने भेजा है!
घर के सामने एक रिक्शा रुका और एक सुन्दर से बच्चे को लेकर महिला उतरी कि  भिलाई वाले सरदार मंजीत सिंह ने भेजा है,वे हमें सिंधी गुरुद्वारा में मिले थे,बच्चे पर शायद बाहरी हवा का प्रकोप है,झाड़ा दिलवाना है।उसने यह भी बताया कि वो मुस्लिम है और ब्राम्हण से शादी की है।
मैंने कहा सरदार जी ने गलत बताया मैं सिर्फ हस्तरेखा ही देखता हूँ कोई झाड़फूंक आदि न करता न जानता। फिर भी बच्चा बहुत प्यारा लग रहा है कुछ माह का ही है अत: माता जी से प्रार्थना जरूर करूँगा। और माता जी का नाम लेकर शान्ति कर्म किया।
इसके बाद मैंने कई सालो से जड़ी सिद्ध करने की प्रक्रिया नहीं की क्योकि मुझे जरुरत नहीं भगवान् की दया से और लोगो की सेवा करने  की भी जरुरत नही ,वे इस लायक लगते ही नहीं,भगवान् की इच्छा से।