साधना करते2 कई बार हमें देव वाणी "सुनाई जैसा" देता है पर हम भ्रम विभ्रम समझ कर उपेक्षा कर देते है। ऎसे कई बार मुझे भी अनुभव हुए।
मेरा एक परम मित्र था सुब्रत दत्त राय,भारी संकट के दिनों में मेरे बहुत काम आया था। इसलिए वो हमेशा के लिए अविस्मरणीय बन गया,भले वो आज इस दुनिया में नहीं है।
वो कांकेर में ही था पर मैं रायपुर आ गया था रोजी रोटी के कारण। एक दिन मुझे कही से खबर मिली कि उसकी तबियत बहुत खराब है आजकल। उसके हार्ट में छेद था। मैंने उसी दिन सोंचा, मैंने उसके लिए आजतक कुछ भी नही किया,आज उसकी बिमारी दूर करने "प्रयोग" कर देखूंगा,बदले में मुझे कोई कष्ट हुआ भी तो झेलूंगा। रात्रि करीब 9 बजे मैंने देवी की संक्षिप्त पूजा की और एक भैरव प्रयोग शुरू किया,तभी मुझे लगा कोई कह रहा है- मत कर,अब कोई फायदा नहीं,रुक जा,बहुत देर हो चुका,अब कोई फायदा नहीं !
यह महसूस करने के बाद मैं रुक ही गया और आसन से उठ गया।
दूसरे दिन मेरे मित्र डॉ रामानी का फोन आया दिन को कि सुब्रत दत्त राय की मृत्यु हो गयी। मैंने पूछा- कब? उन्होंने बताया कल रात्रि करीब 11 बजे।
यानी कल जब मैं पूजा कर रहा था तो उसकी जिंदगी के आखरी 2 घंटे ही बचे थे!
उससे भी बड़ी बात, मेरे इष्ट देवी देवता ने मुझे रोका ! पर मैं भोला भाला इस वाणी को उस समय समझ भी न पाया !
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