5 अक्टूबर 2016

विचार करने की विविध विधियां

'विचार करने" की विविध विधियां-
ज्योतिष से भी बड़ा और गूढ़ विद्या है-विचार करना। इसे तांत्रिक और सिद्धो द्वारा "विचार करना"  ही कहा जाता है अतः इसे इसी नाम से पुकारूंगा।
विचार करना दरअसल किसी व्यक्ति की दैवी/अज्ञात  समस्या का मूल कारण जैसे -
क्यों हुई
कब हुई
कैसे हुई
आदि कारणों को जानना होता है। ज्योतिष विद्या से बड़ी इसलिए मानूँगा क्योकि कुंडली ज्योतिष, हस्तरेखा से यह नहीं जाना जा सकता। इन दैवी शक्ति युक्त विद्या के ज्ञाता देशभर में बहुत ही कम है, 1000 सिद्धो के बीच शायद 10 या सिर्फ 1
इस विद्या की जरुरत वैसा ही है जैसा डाक्टर पहले डायग्नोसिस करता है यानी रोग का निर्धारण करता है, फिर उसका उपचार। यानी मलेरिया हो तो उसकी दवा, टायफाइड हो तो उसकी दवा।
मैंने अपने बुरे दिनों में भटकते हुए अनेक सिद्धि प्राप्त ज्ञानियों से भेंट किया और उनकी विधियों को बड़ी उत्सुकता से देखा भी। समस्या का मूल कारण जानने के बाद अंततः छुटकारा मिला भी। अब सामान्य ज्ञान के लिए दे रहा हूँ। पर पाठक सावधान रहे क्योकि धंधेबाज कुछ भी ऊलजलूल बताकर धन ऐंठ लेते है।

1-सरंगपाल का तांत्रिक-

रिसाल नाम का तांत्रिक हनुमान जी या किसी देवीदेवता के कांच में फ्रेम किये तस्वीर पर सिक्का(1 या 5 रु का) मन्त्र पढ़कर चिपकाया करता था, यदि हाँ होता तो सिक्का चिपक जाता, ना का जवाब होता तो सिक्का गिर जाता/नहीं चिपकता। सिक्का बिना किसी अन्य पदार्थ की सहायता के चिपकता था। हमलोगों ने खुद भी  उसी तांत्रिक के सामने कई बार कोशिस की पर    कभी नहीं चिपका। उससे प्राप्त जवाब सही भी साबित हुए। कई बार अलग2 दिनों में परीक्षा  भी लिया था।
कांच में धातु का सिक्का चिपकना आश्चर्यजनक था, सिक्के के ऊपर सिक्का चिपकना और भी ज्यादा जैसे चुम्बक से चिपका हो।कोई फ्रॉड नहीं होता था।

2-सिक्के में विचार-

कुछ लोग 1, 2या 5 का सिक्का लेकर मन्त्र पढकर सिक्के को घूरते है, उसमे जो छवि दिखाई देती है, उसके अनुसार वे प्रश्न का जवाब देते है। ये विद्या कइयो के पास दिखाई देती है, पर हर बार सही हो कोई जरुरी नहीं। दरअसल ये विद्या सही तो है, पर सही -गलत होने के पीछे साधक की तपस्या, साधना, अहंकार आदि पर निर्भर होती है।क्योंकि साधको को भी दिव्य व्यक्ति होने का अहंकार हावी हो ही जाता है, ठीक वैसे जैसे धनवान हो जाने पर हो जाता है।

3-पीपल के पत्ते से विचार-

कांकेर के पास एक गाँव में एक ग्रामीण तांत्रिक था/है। जो पीपल का एक पत्ता लेकर अभिमंत्रित कर उसमें देखता था और बताता था। इतना सटीक कि देखकर ही बता देगा कि आप घर से भिन्डी की सब्जी खाकर आ रहे है, या बीबी से लड़कर आ रहे है और किस प्रकार की बाते/गालियां/डायलाग आपने बीबी से और बीबी ने आपसे कहा।(इस दुर्लभ व्यक्ति से मैं न मिल सका, न परीक्षा कर सका)

4- थाली में पानी भरकर गेंहूँ दाना द्वारा-

कांकेर के पास ही एक गाँव में एक व्यक्ति मिला जो थाली में पानी भरकर फिर गेहूं का दाना डालता, उन्हें तैरते देखकर बाते बताता, गहरी परीक्षा या अनेक बार परीक्षा न कर पाया।

5- भड़गांव वाले बाबा-

भड़गांव में बाबा रहते थे/है जो थाली/परात में पानी भरकर उसमें जलता कपूर तैराते थे और उसे देखकर बताते थे।तीन बार परीक्षा कर चुका, बेहद सही पाया। बिना पूछे ही मेरे मन का प्रश्न बता दिया साथ में उत्तर भी एकदम सही2।

6-रवेली वाले महाराज-

रवेली वाले महाराज एक घर से लाया नींबू लेकर उसे अभिमंत्रित करते फिर कान से लगाकर सुनते, उसमे छवि/छाया देखते और बताते थे।सारी बाते सत्य होती थी ,अनेक बार परिक्षा कर चुका था। वैसे महाराज अनेक बार पूजा में चढ़ाये गए फूल आदि चीजो को भी अभिमंत्रित कर उसमें देखते थे।

7-डौंडी वाले महाराज-

ये महाराज जी पीड़ित व्यक्ति या घर के सदस्य से निम्बू लेकर दिए के लौ के ऊपर तपाते है, जब धुंवा जम जाए तो एक कागज़ पर उसकी छाप लेते है।ऐसा तीन बार करते है। फिर तीनो छाप को लेंस से देखकर बताते है। निम्बू काटकर उससे निकले बीजो की संख्या के आधार पर भी निष्कर्ष निकालते है।

8- चालीसगांव वाले बाबा-

ये बाबाजी देखने जानने के लिए किसी माध्यम का प्रयोग नहीं करते थे। किसी व्यक्ति को देखते और पूछते -क्या नाम है?कहाँ से आये हो?
इन दो प्रश्नों के बाद बिना कुछ पूछे  प्रश्न और उनके उत्तर बता देते। काफी प्रसिद्ध थे पूरे देशभर में। मैंने भी परीक्षा लिया और आश्चर्यजनक पाया।

9-भीखम महाराज-

कांकेर में एक भीखम महाराज(असली नाम बृजमोहन शर्मा) रहा करते थे, राजाओं के जमाने में राज पुजारी थे। कोई पूछने जाए तो एक सिक्का जमीन पर रखवाते, दो अगरबत्ती जलाते, फिर माथे पर हाथ रखकर बोलते-चले आओ बाबा, इसके बाद जमीन पर रखे सिक्के पर अगरबत्ती घुमाते,फिर खुद की हथेली पर घुमाते, और इसके बाद हथेली में देखते हुए बुदबुदाते हुए बात करते और पूछी गये प्रश्न का उत्तर बताते। अनेक बार परीक्षा का सौभाग्य मिला, जो बताया गया वो पत्थर की लकीर साबित होता था।

10- मेरे मामाजी की विधि-

मेरे सगे मामाजी (राजनांदगांव, नाम-स्व.मांगीलालजी कांकरिया)जो औघड़ तंत्र साधक थे, उनके पितामित्र जो महाप्रसाद  और गुरु भी थे, उनकी विधि थी वे एक दिया जलाते, मन्त्र पढ़कर दिए की लौ में देखते फिर प्रश्नों के उत्तर बताते। एकदम सही होते थे।
ये दिए की लौ वाली विधि अनेको को अपनाते देखा था बाद में। लेकिन कइयों की बतायी बाते गलत भी निकलती थी। पर मामाजी या उनके महाप्रसाद की बाते कभी गलत नहीं हुई।
(मैं फिर सावधान करना चाहूंगा कि अनेक लोग इस तरह का नाटक करके लोगो को बताया करते है, सिद्धि प्राप्त होने का नाटक, मुझे भी ऐसे नकली लोग मिले, अतः परीक्षा से ही सच्चे/गलत की पहचान होती है)

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