7 अक्टूबर 2016

दर्जन भर भूतनियों का उत्पात

(यह लेख सन 2004 के बिलासपुर(छग) से प्रकाशित प्रज्ञा तंत्र नामक पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है)

ये सत्य घटना कई दशक पुरानी है हम भाई बहनों का जन्म भी नहीं हुआ था शायद सन1940 के भी पहले का।

मेरी माँ की शादी हुई थी उस समय की।

कहते है जिसका घन कमजोर हो उस पर भूत प्रेत आसानी से वार कर बैठते है। मेरी माँ कमजोर/कच्चे घन की थी। उधर मेरे बड़े मामाजी श्री मांगीलाल जी कांकरिया (राजनांदगांव निवासी), बहुत पंहुचे हुए गृहस्थ और औघड़ सिद्धियां प्राप्त थे। माँ के बताए अनुसार वे हर अमावस्या को शमशान घाट जाते थे और अनामिका उंगली से रक्त निकालकर चढ़ाते थे ।जैन जाति का होने से वे पशु पक्षियों की बलि नहीं चढा सकते थे।

शादी के बाद प्रथम बार माँ जब मायके आयी और कुछ रूककर वापस ससुराल जाने लगी तो प्रथानुसार मोतीचूर के लड्डू (बूंदी के लड्डू), मेंहदी इत्यादि पैक करके साथ में भेजा गया। ससुराल पंहुचने के बाद माँ की मानसिक स्थिति बिगड़ गयी। मानो हिस्टीरिया की शिकार बन गयी।कभी हंसती, कभी रोती, सर पर घूँघट न रखती, (जबकि इसकी सास/मेरी दादी बड़ी खुर्राट महिला थी)।कभी नाचती कभी गाती ,कभी भोजन करती तो बस करती ही चली जाती,मिठाई विशेष रूप से बहुत खाती।
दादी ने डाक्टरों को दिखाया,मारा पीटा, लेकिन सब बेकार,कोई असर ही न होता।थक हार कर माँ के मायके खबर किया गया। जब दादी मांगीलाल जी,राजनांदगांव को खबर करने की बात कह रही थी ,तब माँ बोली उसको क्यों बुलाते हो?उसको बुलाने की क्या जरुरत? इस समय तक हिस्टीरिया रोग ही मान रही थी दादी ,डाक्टरों के अनुसार।

समाचार सुन बड़े मामाजी(मांगीलाल जी कांकरिया)आये, सारी बाते सुनी और माजरा समझ गए। उन्होंने निम्बू मंगवाया, माँ को सामने बिठाया और बोले सच2 बता तू कौन है,कहाँ से आयी है?वरना अभी निम्बू काटता हूँ।तब शरीर में घुसी भूतनियों ने डरकर सच बोलना शुरू कर दिया।
उन्होंने बताया कि वे संख्या में 10-12 है,राजनांदगांव के एक चौराहे से जब माँ रिक्शे से गुजरी बस स्टैंड जाने, तो मेंहदी और मिठाई की सुगंध से आकर्षित होकर वे सब की सब साथ में आ गयी।भूतनियों ने ये भी बताया कि पहले वे लोग अलग2 लोगो को पीड़ित करती थी,तांत्रिको ने उतारा कर करके चौराहे पर छोड़ दिया, तब से सब के सब उसी चौराहे पर रहती थी। सब जानकर मामाजी ने तुरंत बंधन कर दिया। उस समय मामाजी उत्साही युवा थे, अतः सारी भूतनियों को कैद करके एक बरनी (कांच का बर्तन) में डाल कर बंद कर दिया,और एक दो दिन वैसे ही रहने दिया ताकि लोग देखे भूतप्रेत सचमुच होते भी है या नहीं।मोहल्ले के बहुतो ने देखा, बरनी में दर्जन भर सफ़ेद छायाएं महिलाओं की तरह, लहराते बाल,गड्ढो की तरह आँखे, मक्खी मच्छर की तरह भिनभिनाती आवाजो में बोलती -हमें बाहर निकाला, हमें छोड़ दो।
मामाजी ने बाद में जंगल में गड्ढा खुदवा कर बरनी को गड़वा दिया ताकि वे भूतनियां फिर किसी को परेशान न कर सके।

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