एक बार एक कंपनी की नौकरी छोड़ा हुआ था और दूसरी ज्वाइन करने के लिए एक सप्ताह का गैप मैंने लिया ताकि मानसिक तौर पर फ्रेश हो जाऊ।
इसी एक सप्ताह के गैप में नगर में ज्योतिष सम्मेलन हुआ,पेपर न्यूज पढकर मैं भी श्रोता बन पंहुच गया। वहां मेरे गृह नगर के कई ज्योतिषी मित्र भी आये हुए थे,हम लोग भी लाइन से बैठे हुए सबका भाषण सुन रहे थे। मेरे तीन साथियो के बाद चोथे चेयर पर एक सरदार जी आकर बैठ गए और मेरे मित्रो से पूछताछ करने लगे कि स्टेज में बैठे लोगो में कोई पंहुचा हुआ तांत्रिक है क्या,मुझे उसकी सहायता लेनी है। मेरे मित्रो ने जो साफ़ दिल के थे सरदारजी को सलाह दी -इनके चक्कर में मत पड़ो ये सब झांसेबाज है और दुकानदार है,लंबे से उतार देंगे। बल्कि अपने पहचान के लोगो से संपर्क करने की सलाह देने लगे। इसी बीच कुछ बाते मेरे कानो में पड़ी तो मैंने सरदार जी को बुलाया और पूछा क्या बात है सरदारजी,क्या प्राब्लम है।
तो उसने बताया कि उसकी किशोर उम्र की बेटी पिछले 8-9 साल से बीमार है सारे वैद्य हाकिम डाक्टर आदि को दिखा चुका हूँ कोई फायदा नहीं हुआ,बिस्तर पर ही पड़ी रहती है। उसकी मायूसी और बीमार बिटिया की बात सुनकर दया आ गयी
(क्योकि मैं खुद भी एक बिटिया का बाप हूँ और बिटिया बाप को बहुत प्यारी होती है)
मैंने उसे एक परिचित महाराज के पास ले जाने की सलाह दी।
तभी उसने बताया कि 2-3 बार प्राण निकलते2 बचे है।कल रात को भी उसने आँखे उलट दी थी तो हनुमान चालीसा बैठकर पढ़ा तो वापस आँखे सीधी हुई और होश में आई। बिस्तर में पड़ी रहती है,ले जाने लायक स्थिति भी नहीं,डर है कि कही प्राण ही न निकल जाए।
अब मुझे बहुत दया आ गयी। मैंने कहा ज्योतिष सम्मेलन की फिजूल की भाषणबाजी से बोर हो चुका हूँ और घर जाने ही वाला हूँ। आप मेरे साथ चाहिए, आपको कुछ देता हूँ। घर आकर एक सिद्ध की हुई जड़ी मैंने उसे दी कि घर जाकर तुरंत इसे घिसकर चटा देना,फिर रात्रि में फिर घिसकर चटा देना,सबेरे फिर घिसकर चटा देना। ऐसा 2-3दिन बार2 करना,जब स्थिति संभल जाए तो उसे महाराज जी के पास ले जाना।
(मेरे तीसरे गुरु ने मुझे एक जड़ी सिद्ध करने की विधि बताई थी जो केवल दिवाली के 3 दिनों की अवधि में किया जाता है।मैंने प्रयोग के तौर पर कर के रखा था शायद कभी जरुरत पड़े तो अजमा कर देखूंगा)
सरदार जी ने वैसा ही किया,उससे उसकी बेटी पूरी तरह ठीक ही हो गई और महाराज जी के पास गया ही नहीं।
पर भारतीय आदत से लाचार,फीड बैक देना भी जरुरी नहीं समझते कि हमें परीक्षा का परिणाम तो पता चले तो आगे और काम आये।काम पूरा होने के बाद तो चेहरा दिखाना, बात करना भी गवारा नहीं होता।
बल्कि 5-6 दिनों के बाद किसी दूसरे को मेरे पास भेज दिया कि आर के जैन के पास चले जाओ "मेरा नाम लेना", बोलना सरदार मंजीत सिंह भिलाई वाले ने भेजा है!
घर के सामने एक रिक्शा रुका और एक सुन्दर से बच्चे को लेकर महिला उतरी कि भिलाई वाले सरदार मंजीत सिंह ने भेजा है,वे हमें सिंधी गुरुद्वारा में मिले थे,बच्चे पर शायद बाहरी हवा का प्रकोप है,झाड़ा दिलवाना है।उसने यह भी बताया कि वो मुस्लिम है और ब्राम्हण से शादी की है।
मैंने कहा सरदार जी ने गलत बताया मैं सिर्फ हस्तरेखा ही देखता हूँ कोई झाड़फूंक आदि न करता न जानता। फिर भी बच्चा बहुत प्यारा लग रहा है कुछ माह का ही है अत: माता जी से प्रार्थना जरूर करूँगा। और माता जी का नाम लेकर शान्ति कर्म किया।
इसके बाद मैंने कई सालो से जड़ी सिद्ध करने की प्रक्रिया नहीं की क्योकि मुझे जरुरत नहीं भगवान् की दया से और लोगो की सेवा करने की भी जरुरत नही ,वे इस लायक लगते ही नहीं,भगवान् की इच्छा से।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें