भगवान् शंकर की ही कृपा रही होगी शायद जो मुझे विश्वास दिलाने और प्रकृति के रहस्य समझाने मुझे समय से पहले काल के आगमन का रहस्य समझाते आये। मेरे रिसर्च यात्रा में अनेक बार मैंने पहले से जाना और फिर घटते हुए भी देखा।आश्चर्य तो तब और हुआ जब टलते हुए भी देखा। यानी 2+2=4 तो देखा ही पर 2+2= 5 या 3 होते भी देखा अपवाद स्वरूप ।
इसीलिए मैं विज्ञापनों में लिखा करता था जब हस्तरेखा देखा करता था-"मैंने विधि के विधान को देखा है,उसे घटते हुए भी देखा उसे बदलते हुए भी देखा
एक और घटना-
तब मैं एक जैन परिवार में नौकरी करने लगा था। एक बार अपने मालिक के बाजू में खड़ा हो बात कर रहा था,उसकी हथेली खुली हुई थी,आदतवश मेरी नजर उस पर पड़ गयी। कुछ ही सालो बाद उसकी मृत्यु थी।
कुछ महीनो बाद मैंने उसके यहाँ नौकरी छोड़ दी,बड़ी मुश्किल से वेतन निकाल पाया।
3-4 वर्षो बाद अखबार में न्यूज आई,नागपुर से लौटते वक्त उसकी कार का एक्सिडेंट हो गया और स्पॉट में ही उसकी मृत्यु हो गयी!
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