विश्वास तो नहीं होता पर यह सत्य है
मेरा एक परम मित्र श्री सुब्रत दत्त राय जो पेशे से शिक्षक थे और युवा भी। सरकारी नौकरी में उनकी ड्यूटी गाँवों में होती थी। एक बार अपने तीन मित्रो के साथ एक गाँव की और जा रहे थे , सामने गाव में साप्ताहिक बाजार भरा हुआ था , शाम का समय था , और वे लोग पैदल ही जा रहे थे। अन्धेरा होने में काफी समय था , करीब १-२ घंटे। ग्रामीण सड़क पर चले जा रहे थे , कि सामने से करीब सौ मीटर दूर कुछ ग्रामीण महिलाये सर पर टोकनी आदि लिए हुए आ रही थी , बाजार करके , सामान खरीदी आदि करके। बाकी सड़क सुनसान थी। इन लोगो के देखते देखते वे ग्रामीण महिलाये सड़क के किनारे एक आम के वृक्ष में घुसने लगी और गायब होने लगी ! ये विचित्र दृष्य देखकर को किसी को कुछ समझ नहीं आया , एक दूसरे का मुंह देखने लगे , फिर चारो डरने लगे। पर सुब्रत दत्त राय ,बंगाली होने के नाते इन मामलो में कुछ समझदार भी था। उसने सबको इशारा कर चुप रहने को कहा , और चुपचाप शांत होकर चलते रहने को कहा। कुछ मिनटों के बाद ये सभी गाँव में पहुँच गए , जब जान में जान आयी और उन्होंने सुब्रत से पूछ -ये क्या हुआ था , कैसे हुआ था। तब सुब्रत ने अपने मित्रो को बताया कि "भटकती आत्माए " जो ग्रामीण क्षेत्रो की रहती है , वे किसी पेड़ /वृक्ष पर निवास करती है , और समय काटने के लिए जीवित आदतानुसार बाजार भी करने जाती है , इसके बाद लौट कर अपने निवास पर वापस आ जाती है ऐसा कहते है , इन्हे कोई पहचान नहीं पाता . संयोग से हमें दिखाई दे गयी। अगर इन्हे धोखे से पुकार लिया गया तो फिर उनके पीछे पड़ जाने का खतरा होता है, ऐसा कहा जाता है , इसलिए मैंने (सुब्रत ने )चुप रहने का इशारा किया था।
सुब्रत दत्त राय ,मेरा गहरा मित्र था और कभी झूठ नहीं बोलता था , मै अच्छे से उसकी आदत जानता था। चूँकि चार लोग थे , सभी एक जैसा दिखाई दिया , इसलिए भ्रम विभ्रम की गुंजाइश नहीं , मैंने उसके एक दोस्त से पुष्टि भी की थी। सन 2001 के आसपास उसका( सुब्रत दत्त का ) स्वर्गवास हो गया। ऐसी घटनाये कइयो के साथ आकस्मिक रूप से घटती रहती है , अतः सावधानी रखने में क्या बुराई है ?
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