25 अक्टूबर 2013

धर्म या पूजा एक पाखण्ड बन गया : DHARM, PUJA HAVE BECOME SUPERSTITIONS(Hindi) !

धर्म  या पूजा एक पाखण्ड बन गया :-
   भारत के समाज में बहुतायत से यह माना जाता है कि लक्ष्मी नामक एक देवी है , जिसकी पूजा करने से धन आता है।  यह पाखण्ड बचपन से  एवं बारम्बार पंडो ने भारतीय मानस में भर दिया है इसका कोई तार्किक आधार नजर नहीं आता। आप देखेंगे कि भारत के सर्वाधिक धनी जो तीन पीढ़ी से सर्वोच्च क्रम में रहे - 
टाटा घराना तो पारसी है और वे लक्ष्मी पूजा कभी करेंगे नहीं।  फिर उनकी स्थिति ध्यान देने लायक है . 
बिलगेट्स तो दुनिया के सबसे धनी  व्यक्ति है , ईसाई धर्मावलम्बी होने के कारण लक्ष्मी का नाम भी नहीं सुना होगा , पूजा करना तो दूर। 
अरब देशो में इस्लाम धर्मावलम्बी है , लक्ष्मी तो क्या खुदा के अलावा अन्य किसी की उपासना करना उनके धर्म के खिलाफ है , फिर भी वे कितने धनी  है ये बात किसी से छिपी नहीं। 
वैसे दुनिया के सबसे धनी देश अमेरिका तो ईसाई धर्म को मानते है , बिना लक्ष्मी पूजा किये ही दशको से धनी  है .
                      इससे एक बात भारतीयो को स्पष्ट हो जानी चाहिए, कोई गरीब मजदूर हो या किसान , लक्ष्मी पूजा से धनवान हो या न हो , पण्डे पुजारियो को इनको ठग-ठग कर पेट भरने का जरिया मिल गया इसलिए इन्होने कूट कूट कर उल जलूल बाते हिन्दुओ के मन में भर दिया।
                             आजकल श्री यंत्र , कनकधारा यंत्र आदि अनेक प्रकार के यंत्र और कथित तांत्रिक वस्तुओ का करोडो का व्यापार पूरे हिंदुस्तान में चल रहा है , इनके जाल में अशिक्षित , अर्धशिक्षित और तो और शिक्षित लोग बुरी तरह से फंसे दिखाई देते है।  कोई लाफिंग बुद्धा अपने आफिस में रखता दिखाई देता है तो कोई आइना या घंटी दरवाजे पर लटकाये दीखता है। हकीकत तो यह है कि लाफिंग बुद्धा (हँसता हुआ बुद्ध / बुड्ढा ) रखे या हँसता हुआ गधा, फर्क कुछ भी नहीं पडता , चाहे तो आजमा कर देख लें । 
इन बेकार की वस्तुओ को बेच बेचकर बेचने वाले जरूर करोड़पति बन गए। पर उपयोग कर वाले जस के तस है। जिन्होंने उन्नति की उसकी वजह दूसरी है। एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता कि इन वस्तुओ का उपयोग करने वाला , या हर वर्ष विधि विधान से लक्ष्मी पूजा करने वाला गरीब किसान या मजदूर करोड़पति बन गया ! ऐसा होता तो हजारो किसान इस देश में आत्महत्या नहीं करते। 
लक्ष्मी पूजने वाला यह देश,  एक गरीब  देश नहीं कहलाता ! और अमेरिका जैसे देशो के कर्ज के बोझ से दबा नहीं होता !
हां कुछेक भारतीय नेताओ व अफसरो के पास काफ़ी धन संपत्ति जरूर है पर लक्ष्मी पूजा के कारण नहीं , बल्कि गलत तरीके से कमाया गया , दूसरो को लूटकर कमाया गया है। 
इतने धर्म गुरुओ /कथावाचकों की धार्मिक जुगाली के बाद भी देश का चरित्र व दशा नहीं बदली।  चालाक लोग इन प्रवचनो पर ध्यान भी नहीं देते क्योकि इनकी असलियत उन्हें भी मालूम है।
                              ऐसा नहीं है कि कुछ धर्म गुरुओ ने पाखण्ड हटाने की कोशिस  नहीं की ,सच्चे धर्म गुरुओ ने कोशिस बहुत की, पर पंडावाद से निपटना काफ़ी कठिन पाकर उन्होंने अपना अलग पंथ स्थापित किया जो आगे चलाकर नए धर्म में बदल गया , पर आगे चलकर इन नए धर्म के ठेकेदार भी वही धंधा करने लग गए जिनका विरोध  मूलत: उन सच्चे धर्म गुरुओ ने किया।  पाखंडवाद के चलते ही हिन्दू धर्म की अनेक शाखाये जैसे - जैन धर्म , सिक्ख धर्म , बौद्ध धर्म  आदि अस्तित्व में आये।  आगे अभी कबीर पंथ , घासीदास पंथ, संत रैदास पंथ साईबाबा पंथ आदि अस्तित्व में धीरे धीरे आ रहे है (शायद महात्मा गांधी पंथ भी आयेगा ), जो आगे चलकर धर्म में बदल दिए जायेंगे ठेकेदारो द्वारा ।  लोगो की बुद्धि इतनी कमजोर है कि जहा धर्म का मामला आया , दिमाग के सारे दरवाजे बंद हो जाते है , तर्क वितरक की क्षमता ख़त्म हो जाती है , उन्हें बचपन से ही सिखाया जाता है कि धर्म विरुद्ध बोलना या सोंचना घोर पाप है , धर्म सोंचने का नहीं - केवल (अंध ) श्रद्धा का विषय है, (अंध )विश्वास  का विषय है ! चालाक पाखंडी , धर्म के धंधे बाज इसी का फ़ायदा उठाकर जी भरकर लोगो को लूटते है। कभी कभी इज्जत भी लुट जाती है। ताज्जुब तो इस बात का है फिर भी इन  लोगो  की आँखे नहीं खुलती और वे बहु प्रचारित बाबाओ के चक्कर में पड़े रहते है।
                                   अनेक मसीहाओ के यहाँ करोडो का सोना चांदी, हीरे जवाहरात , जमीं जायजाद आदि पकड़ा जाता है , लोग मंदिरो में की किलो सोना चढ़ा जाते है , जिनका भरपूर उपयोग ट्रस्टीगण , पण्डे , पुजारी आदि करते है , अनेक मंदिरो के चढ़ावे पर सत्ताधारी  नेताओ की गिद्ध दृष्टि रहती है , वे येन केन प्रकारेण मंदिर के ट्रस्टी बन धन हड़पने का कार्य करते है। 
हिदुस्तानी लोगो को यह समझ में नहीं आता कि जो तपस्वी या संत कुछ भी संग्रह नहीं किया करते हे , जैसे शिरडी के साईं बाबा , जिन्होंने फलफूल , वस्त्र अनाज आदि का भी जीते-जी संग्रह नहीं किया , वे शरीर त्याग के बाद इन सबका क्या करेंगे ? उनके नाम से इकट्ठा करने वाले लोग मजा कर रहे है।  आजकल अनेक पंथगुरु  भी इसी धंधे में लिप्त है , सच्चे गुरुओ की शिक्षा की जुगाली करते खुद को गद्दीदार बताते ये लोग काफ़ी धनवान बन गए है , जबकि ये पंथ के गद्दीदार उन गुरुओं के पैर के धूल बनने लायक भी नहीं। इनको राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त है क्योकि सम्भावित वोट बैंक जो ठहरे , इसलिए राजनीतिज्ञ  इन्हे भरपूर उकसाते रहते है .

                                                                                                                                                                                                                                                                     

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