25 अक्टूबर 2013

मेरे अलौकिक अनुभव MY SUPER-NATURAL EXPERINECES (Hindi)


मेरे अलौकिक अनुभव
कहते है निजी अनुभवो को सार्वजनिक नहीं करना चाहिए , परन्तु यह भी सच है ज्ञान का प्रसार करना ही चाहिए ताकि नयी पीढी को , विद्याखोजी लोगो को मार्गदर्शन मिले। सत्य की स्थापना हो सके , विश्वास  अंधविश्वास के बीच स्पष्टता कायम हो।  गोपनीयता की अति ने ही विकृति को जन्म दिया है , ब्राम्हण लोगो में यह आदत पायी जाती है कि वे अपनी विद्याएँ अपने पुत्र को इसलिए नहीं दे सके क्योकि वह ग्रहण करने योग्य नहीं था, दूसरी तरफ किसी अन्य को इसलिए नहीं क्योकि पारिवारिक या सामाजिक स्वार्थ आड़े आ गया। उनकी मृत्यु के साथ ही अनेक विद्याएँ लुप्त होती गयी। 
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संसार का प्रत्येक व्यक्ति अपने भाग्य के अनुसार ही प्राप्त करता है , करजीरी के वृक्ष में पत्ते न होने के का दोष वसंत का नहीं , उल्लू को दिन में दिखाई न देने का दोष सूर्य का नहीं , जल की बूंदे चातक पक्षी के मुह में नहीं जाती इसमे बादलो का क्या दोष ?
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तालाब में देव रहते है  -
वर्षो पहले उत्तर बस्तर के ग्राम झीपाटोला -लखनपुरी में मै रहने लगा था और घर के बाजू स्थित तालाब में स्नान करने जाया करता था।  एक बार स्नान करते समय मुझे पेशाब लगी , तो तालाब के भीतर ही मैंने पेशाब कर दिया।  बात सामान्य सी थी . कुछ समय के बाद मई भूल गया।  डेढ़ वर्ष के पश्चात मै  एक सिद्ध व्यक्ति के सामने बैठा था , कुछ चर्चा  चल रही थी , मैंने यूँ  ही कहा देखो तो महाराज जी , मुझ पर कौन सा ग्रह खराब चल रहा है ? उन्होंने मेरे कहने पर अगरबत्ती जलाकर कुछ विचार किया फिर कहने लगे - तुमसे सारे देवी देवता प्रसन्न है बस एक ही नाराज है , परन्तु वह भी तुम्हे कोई नुकसान नहीं पहुंचा रहा है ! मैंने आगे यूँ ही पूछा , कौन नाराज और क्यों नाराज ? तब उन्होंने बताया आज से डेढ़ वर्ष पूर्व एक गांव के तालाब में नहाते वक्त तालाब में ही तुमने पेशाब कर दिया था। इस पर एक देव नाराज हो गया , गन्दगी फैलाने के कारण।  मुझे याद तो नहीं आया पर मैंने कहा भला मै  और तालाब में  स्नान करूँ !! कोई गाँव  वाला नहीं जो तालाब में नहाऊ। पर दिमाग में जोर देने से याद आ गया  ! फिर उस  सिद्धि प्राप्त वृद्ध  ने समझाया -बेटा जलाशय में भी देव रहते है , उनमे गन्दगी नहीं फैलानी चाहिए , उस तालाब में भी एक देव रहता था। वही तुमसे नाराज हो गया , अब तुम उससे क्षमा मांग लो जाकर , मैंने उस तालाब के पास जाकर ऐसा ही किया।  है न विचित्र बात ? भला वह ८०-९० वर्षीय ब्राम्हण सिद्ध पुरुष कैसे जान गया वो बात जिसे मै भी भूल चुका था ! ! (यह सत्य घटना है )
                             इस घटना के बाद मै  हमेशा के लिए सावधान हो गया . इसके बाद मैंने हमेशा निरिक्षण में पाया जिनका घर तालाब के किनारे रहता है , वे आदतन गन्दगी फैलाते है , और दैवी आपदा , बिमारी , दरिद्रता आदि से पीड़ित रहते है। (ये मेरा निजी विचार है )महाभारत की कथा भी प्रमाणित होती है जिसमे एक तालाब में चार पांडव यक्ष के द्वारा मूर्छित कर दिए जाते है।  युधिष्ठिर द्वारा वापस यक्ष को प्रसन्न कर होश में लाया जाता है। 
दुर्घटना की पूर्व सूचना---
सन 1995 में मै अभयपुर की आयल फैक्ट्री  में कामर्शियल मैनेजर के पद पर कार्यरत था ,एक दिन आफिस कार्यवश रायपुर  आया था।  वापसी मुझे टैक्सी से जाना था क्योकि स्कूटर नहीं लाया था। पचमेढी नाका में रात्रि में एक टेक्सी पर सवार हुआ।  नाका पार करते ही मुझे तीव्र आभास हुआ मानो कोई कह रहा हो - उतर, नीचे उतर, इस गाडी से उतर जा,  इसका एक्सीडेंट होने वाला है ! इस पर मै कुछ घबरा गया। फिर अपने इष्ट को याद करते हुए बोला -जो भी होने वाला है उसे टालो , यह आखरी टैक्सी है , इसके बाद मिले न मिले या रात्रि ११ बजे मिली तो ! 
टैक्सी अभनपुर तक तो सही सलामत पहुँच गयी, पर जैसे ही उरला ग्राम के सामने पहुंची , अचानक न जाने उरला के रास्ते से एक ऑटो रिक्शा तेजी से मुख्य सड़क पर सामने आ गया (९० अंश के कोण पर ) (अभनपुर में ऑटो नहीं दिखाई देता था उन दिनों). इधर टेक्सी भी तेज गति से चल रही थी , हड़बड़ा कर टेक्सी ड्राईवर ने तेजी से स्टीयरिंग मोड़ी तो टेक्सी तिरछी हो किनारे के सिर्फ दो चक्को पर चलने लगी फिर कुछ मीटर  के बाद सीधी हो गयी , उलटते उलटते बची।  हम सभी यात्री बाल बाल बचे।  मैंने इष्ट का आभार प्रकट किया।
इस तरह देवकृपा से दुर्घटना का पूर्वाभास् भी हुआ और घटना किस जगह कैसे होने वाली है ये भी दिखाया, फिर घटना टाल कर 
भी दिखा दिया। न टलती तो किसकी मृत्यु होती, कौन विकलांग होता, कौन बुरी तरह घायल होता पता नहीं !
मूसलाधार वर्षा इच्छानुसार बार बार रुकी -
मनुष्य संकट में फंस जाए, जाये कोई रास्ता न सूझे, तब ईश्वर को याद करता है और जब दैवी सहायता प्राप्त होती है तो बेहद आनंद मिलता है।  कल्पना कीजिये कि आपके कहने से मूसलाधार वर्षा रुक जाए  तो इस   असम्भव कार्य के बाद आपको कैसा लगेगा ? इस भाव का आनद मैंने लिया।
            एक दिन स्कूटर से सपरिवार अभनपुर से रायपुर आया था , शाम को घनघोर बादल छा  गए , यह देख मैंने मिनी बस से पत्नी व बच्चो को रवाना कर दिया  और स्वयं स्कूटर से चल पड़ा।  परन्तु  पचमढ़ी नाका चौक पारकर मुश्किल से एम.एम.आई. अस्पताल तक ही पहुचा था कि घनघोर वर्षा प्रारम्भ हो गयी।  बौछारो के कारण स्कूटर चलाना मुश्किल हो गया तब एक छपरी के नीचे शरण ली।  वहा ५-७ लोग और भी खड़े थे, मेरी तरह फंसे हुए। पानी रुकने के आसार न देख मै चिन्ता में पड़  गया , अगर रात भर यूं  ही चलता रहा तो ? कोई चारा न देख बैठे बैठे मैंने ईश्वर  को याद किया और मैंने प्रार्थना की कि सिर्फ आधे घंटे के लिए वर्षा रुक जाए ताकि मै घर पहुच जाऊ फिर भले ही रात भर बरसता रहे।  और पांच मिनट में वर्षा एकदम थम गयी।  तुरंत सभी लोग अपने अपने वाहन से रवाना हो गए , मै भी आधे घंटे में घर पहुँच गया।  घर पहुँच कर स्कूटर अंदर रख कुर्सी पर बैठा ही था कि तेज बारिश पुन: प्रारम्भ हो गयी  जो लगभग रात भर होती रही .
                    कुछ दिनों बाद मुझे लगाने लगा  कि ये एक संयोग भी तो हो सकता है  और भ्रमवश या अंधविश्वासवश मै इसे चमत्कार मान रहा हूं। भला वर्षा भी किसी कहने मात्र से रुकती है ? कुछ वर्षो बाद एक बार पुन: मै  मूसलाधार वर्षा में फंस गया।  रायपुर शहर के लाखे नगर चौक से कुछ पहले पुरानी बस्ती में एक सायकल पंचर बनाने वाले के टपरे में शरण ली। धीरे  धीरे टपरा भी टपकने लगा , वहा ठहरे हुए  कुछ भीग भी गया , मैंने पुनः वही प्रयोग दुहराया।  पांच मिनट में वर्षा करीब-करीब थम गयी और मै  तुरंत घर की और रवाना हो गया। 
                आजकल की शिक्षा प्रणाली का भी दोष है कि व्यक्ति शंकालु हो जाता है और  इन सब बातो में विश्वास नहीं कर पाता ।  पूर्वाग्रह से पीड़ित कुछ दिनों बाद मै फिर सोंचने लगा -ये सब संयोग मात्र है ,कोई चमत्कार नहीं  और मै कही अंधविश्वास का शिकार तो नहीं होने जा रहा हूँ ! भला ईश्वर यदि है भी तो मेरी बात क्यों सुनने लगा ?और मूसलाधार वर्षा तो रोकना तो असम्भव ही है। एक बार ऐसी परीक्षा की घडी फिर आयी। जब रायपुर में अपना मकान बनवा रहा था। स्लैब ढलने का  दिन 10 मार्च 2006 निश्चित हुआ।  संयोग से उस दिन घनघोर बादल आसमान में छ गए।  मेरे इंजिनियर ने मुझे ढलाई टालने की सलाह दी।  इधर ठेकेदार ने ढालने की जिद की क्योकि लेबर आ रहे थे और ढलाई टालने से लेबर खर्च बढ़ जाए गा।  पालीथिन की शीट का इंतजाम करने का सोंचा गया  परन्तु इतने सबेरे कहा से हो पाता। आखिर ढलाई होने देने का निश्चय किया गया।  मैंने पुन: "माताजी" से प्रार्थना की  और इच्छा प्रकट की  कि आज किसी भी हालत में पानी न गिरे नहीं तो सब चौपट हो जाएगा। वर्षा होने ही न पायी।  दोपहर को कुछ बूंदा बांदी सी होने लगी तो बैठे बैठे मैंने पुन: "माताजी" से प्रार्थना की तो वह भी तुरंत रुक गयी।  फिर मैंने इच्छा की कि ढलाई पूरा होने के तीन घंटे बाद वर्षा शुरू हो वह भी फुहार के रूप में (क्योकि ३ घंटे में स्लैब "सेट " हो जाएगा  ऐसा ठेकेदार ने बताया था) . और ऐसा ही हुआ , शाम पांच बजे ढलाई पूरी हुई और रात्रि ८ बजे रिमझिम फुहार शुरू हुई।  दूसरे दिन अखबार पढ़ कर मै दंग  रह गया , पूरे शहर में विभिन्न स्थानो पर तेज वर्षा हुई थी , प्रदेश में भी यह हाल था ,मेरे बनवाए जा रहे घर से से कुछ कि. मी. दूर  तो ओलो की वर्षा हुई थी।  कुम्हारी में ओले जो गिरे उसका वजन पंद्रह से बीस किलो का बताया गया था, जो मेरे घर से कुछ किलोमीटर ही दूर था। [ एक अखबार(नवभारत ) में फोटो भी छपी थी]. कल्पना करे  बरसात की बजाय मेरी तरफ ओले गिरते तो ??? तो क्या होता !!! जबकि मेरे स्थान पर ओले तो क्या पानी भी नहीं गिरा , जबकि मेरे शहर के प्राय: सभी स्थानो पर बरसात हुयी थी। 
( टीप- पाठको को मै आगाह कर दूं  कि मै कोई चमत्कारी व्यक्ति नहीं , एक साधारण व्यक्ति हूं , बस मुसीबत आने पर उच्च शक्ति की शरणागत हो याचना की और मुझ पर "माँई " की कृपा बरस गयी , लोक कल्याण हेतु मैंने निजी अनुभव उजागर किया . )

काष्ठ पाषाण एवं मिटटी की मूर्तियो में देवता नहीं होते वे तो मानसिक भावो में रहते है और वही उनका कारण है।
मन्त्र, तीर्थ, ब्राम्हण, देवता , ज्योतिषी , औषधि , गुरु में जिस प्रकार भावना होती है तदनुसार उसे फल की प्राप्ति होती है। 


2 टिप्‍पणियां:

  1. pranam sir,

    maine ye poochna tha k aapke is lekh me likha hai k 15-20 kilo k ole gire..is it typing mistake or its true.

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  2. This is Truth, The Weight was 15 to 202 Kgs as published in Local New Paper- NAVBHARAT, with Photo, very surprising for me even , such a big size !

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