25 अक्टूबर 2013

परम्पराए जो धर्म बन गयी :TRADITIONS HAVE BECOME RELIGIONS (Hindi)



                                                                                                 
परम्पराए जो धर्म बन गयी-

                                                                                               


लेखक--रेणिक बाफना,रायपुर , हस्तरेखा विशेषज्ञ (94063--00401,98279&43154)
                                                                                     

सभी धर्मो में अधिकाँश धार्मिक नियम तत्कालीन परिस्थितियों की सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार बने है, इनका धर्म से कोई लेना देना न होते हुए भी इन्हे लागू करने  धर्म ध्यान, पाप पुण्य की चाशनी में डुबाया गया ताकि इनका पालन सख्ती से हो। सिर्फ प्रबुद्ध वर्ग के पाठको के लिए कुछ उदाहरण प्रस्तुत है -
दाह संस्कार --
आदि मानव मृत शरीरो को यत्र तत्र फेंक देता था , इससे लाशो के सड़ने से दुर्गन्ध व बीमारिया फैला करती थी।  दूसरे जिस शरीर से रिश्ता रहा, लगाव रहा उसकी दुर्दशा देखने में बुरा लगता था।  आखिर शरीर ही तो रिश्ते की पहचान थी।  तब मानव ने दाह संस्कार पद्धतियाँ विकसित की।जिन स्थानो पानी की कमी, सूखी बंजर जमीनें थी  वहाँ दफनाने की परम्परा विकसित हुई , जहां लकड़िया उपलब्ध थी ऐसे जंगली स्थानो में जलाने (दाह संस्कार ) की परम्परा विकसित हुई। बाकी कर्मकाण्ड धार्मिक धंधेबाजो के वर्ग ने अपना पेट भरने और धन संपत्ति ठगने के लिए जोड़ा। 
रात्रि भोजन :-
प्राचीन काल  में बिजली नहीं थी , लोग अन्धेरा होते ही दीपक /लालटेन / चिमनी  जलाते थे,इसी रोशनी में भोजन इत्यादि करते थे।  परन्तु चिमनी /दीपक के आसपास सभी प्रकार के कीड़े मंडराया करते थे , वे ही भोजन सामग्री पर गिरते थे  और भोजन के साथ मानव पेट में चले जाते थे। दूसरी बात रात्रि में भोजन के बाद लोग जल्दी सो जाया करते थे , अक्सर ८-९ बजे तक।  इससे पाचन सम्बन्धी रोग भी हो जाते थे , अत: तकालीन वैद्यों की सलाह से रात्रि भोजन के त्याग की परम्परा चली।  पहले धर्म गुरु भी चिकित्सक का दायित्व सम्भालते थे।  आज परिस्थितिया बदल चुकी है , बिजली के जमाने में लैम्प / बल्ब दूर दूर रहता है , मच्छररोधी जालिया घरो में लगी रहती है , टेलीविजन ने लोगो का सोना १२-१ बजे तक टाल दिया है। अत: रात्रि भोजन त्याग के नियम उतने आवश्यक नहीं लगते।
छान कर पानी पीना :-
राजस्थान में पानी की बेहद कमी थी , वर्षा का जल कुओ में एकत्रित किया जाता था , फिर उसका उपयोग पिने व् अन्य कार्यो में लिया जाता था।  चूकि एकत्रित पानी में कीड़े भी पनपते थे , अत: बचाव के लिए कपडे से छान कर उपयोग करने की परम्परा चली। इससे कीड़ो का मृत शरीर हट जाता था।  बाद में पानी उबालने की भी परम्परा चली।  आधुनिक विज्ञान ने खोजा कि कीटाणु इतने सूक्ष्म होते है कि छानने से भी अलग नहीं होते अत: जीवित या मृत रूप में पेट में पंहुच जाते है।  अत: आज के जमाने में एक से एक वाटर फ़िल्टर बाजार में उपलब्ध है , मेरे विचार से इनका उपयोग बेहतर होगा न कि अंधाधुंध धार्मिक नियम का।


मुँह पत्ती का प्रयोग :-
जैन धर्म की कुछ शाखाओ में मुंह पत्ती का प्रयोग किया जाता है इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि इससे जीव हिंसा कम  होती है , ये बात मेरे गले नहीं उतरती।  हालांकि आपरेशन के समय डाक्टरो द्वारा भी मुंह पत्ती (पट्टी ) का प्रयोग किया जाता है , इंफेक्शन रोकने। परन्तु ये अंहिसा नियम के अनुसार होता तो चौबीस तीर्थंकरो में से कम से कम एक के द्वारा स्वयं भी पालन किया जाता और अपने श्रावको को ऐसा करने को कहते। परन्तु जैन धर्म में सर्वोच्च पद प्राप्त किसी भी तीर्थंकर ने अपने मुंह में पट्टी  नहीं बाँधी ! इसका दूसरा पक्ष यह है कि जीव जगत तो चारो ओर है , आप इससे बच नहीं सकते , आपका शरीर तो सूक्ष्म जीवो से भरा हुआ है ,भोजन पचाने का काम कीड़े ही करते है, दही भी कीड़े ही जमाते है, आप सोफे पर बैठे  या जमीं पर चले , कीड़े तो मरेंगे ही ,सूक्ष्म जीव तो सांस के साथ अंदर बाहर होते रहते है , किसी भी तीर्थंकर ने सांस लेना बंद नहीं किया या जमीं पर चलना बंद नहीं किया , क्या मुंहपत्ती (पट्टी ) बांधकर जैन साधूगण तीर्थंकरो से भी आगे निकलेंगे ?

     आजकल जैनसाधु दर्शन हेतु जाते वक्त घडी व् मोबाइल बाहर रखने के नियम बनाने लगे है , तर्क देते है कि घडी और मोबाइल में बैटरी रहती है , उसमे विद्युत् रहता है इससे अहिंसा का नियम खंडित होता है -जीव हिंसा होती है।  यह काफ़ी हास्याप्रद लगता है क्योकि मनुष्य शरीर तो  स्वयं विद्युत संकेतो से हिलता डुलता है ,चलता है , उस  विद्युत का क्या करोगे ?

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