17 अप्रैल 2020

अघोरी की कुटिया में रात भर जागा

कुछ खोजने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है।समय पैसा भी खर्च होता है खतरा भी उठाना पड़ता है निडरता के साथ। दिवाली 2019 का दिन निकट आ रहा था । महानिशा यानी दीपावली की रात तांत्रिकों के लिए बेहद खास रात्रि होती है। छत्तीसगढ़ में उच्च कोटि के साधु नही मिलते अतः काशी जांने का निर्णय मैने लिया क्योकि कई दिनों की छुट्टी का अवसर था। अतः दिवाली के पहले काशी की ओर निकल गया बस से। पहले इलाहाबाद ताकि चंडी कार्यालय में मिलूं कोई संपर्क मिले तो काम आए पर कोई लिंक न मिला। फिर काशी चला गया। वहां स्थित आस्था प्रकाशन से भी।कोई संपर्क सूत्र न मिल सका। एक मणिकर्णिका घाट के पास स्थित लाज में ठहर गया। वहां पास में स्थित मंदिर में निवास करने वाले जो रायपुर के पास आरंग तरफ निवास करते थे उनके पास भी कोशिश किया पर सूत्र न मिला। आखिर स्वतंत्र रूप से हाथ पैर मारने का निर्णय लेते हुए दिन के समय मणिकर्णिका घाट की सीढ़ियों पर बैठ गया। एक साधु मुझे दिखाई दिया उससे चर्चा करने लगा कोई सिद्ध महात्मा के बारे में जानने। अपना उद्देश्य बताने के बाद उसने। कहा ऐसा सिद्ध महात्मा आजकल कोई नही है जानकारी में। फिर उधर से जाते हुए काले कपड़े वाले युवा साधु की ओर इशारा कर कहा, उसके पास जाओ वह बाबा कीनाराम सम्प्रदाय का है शायद वह काम का साबित हो सके। मैं उस काल कपड़े वाले युवासाधु के साथ हो लिया। उसे अपना उद्देश्य बताया तो वह अपनी कुटिया ले जाने को तैयार हो गया। फिर उसकी कुटिया जो वहां से 15-20 किमी दूर थी वहां के लिए निकल गया ताकि उसका स्थान देख सकूं और रास्ता भी नॉट करते गया। एक गांव में गंगा किनारे ही कुटिया बनी थी जिसमे यज्ञ कुंड भी था। मुझे उपयुक्त लगा। दूसरे दिन दिवाली थी। आज की रात मैं पुनः लाज जाकर सो गया। दूसरे दिन तैयार होकर अपनी कुछ सामग्री लेकर अघोरी साधु की कुटिया के लिए निकल पड़ा। फोन से आने की सूचना भी दे दी तय कार्यक्रम के अनुसार। वह गांव में ही मिल गया। ग्राम बाज़ार भरा था उसने मुर्गे का मांस और शराब खरीदी फिर दोनों पैदल चलते हुए अंदर के गांव स्थित गंगा किनारे उसकी कुटिया के जा पहुंचे। वहां उसके कुछ गांव वाले चेले भी थे। साधु ने मिठाई व हवन आदि पूजन सामग्री उनसे मंगवाई जिसका पैसा मैने दिया। दोपहर को मैंने नींद ले लिया था लाज के कमरे में ताकि रातभर जागरण कर सकूं। पूजन सामग्री आदि आने पर उसने कुंड की धूनी को और लकड़ी डाल कर जलाया और बर्तन में चावल  मुर्गा मांस आदि डालकर पकाने चढ़ा दिया। 
मैने उसे पहले ही बता रखा था कि मैं डात्विक हूँ अतः आप अपनी प्रक्रिया करे अपने तरीके से मैं सिर्फ देखूंगा। सामग्री के लिए पैसे जरूर दे दूंगा।
काफी देर बाद उसने कुंड में हवन सामग्री स्वाहा कहते कुएं आहुति दी। 11 आहुति हवन सांगरी से मुझसे व एक अन्य ग्रामीण व्यक्ति से भी डलवाई। मनुष्य की खोपड़ी के खप्पर पर थोड़ी शराब चढ़ाई। अपने बांह से इनकेक्षण द्वारा खूननिकालकर खप्पर पर टपकाया और जलते कुंड की अग्नि में भी खून व शराब डाला। फिर बर्तन से मांस का टुकड़ा व पका चांवल भी कुंड में डाला अग्नि में। मिठाई की भी आहुति दी।
फिर बोला हम अघोरियों की यही प्रक्रिया है बस यही पूजा है यही साधना है और कोई मंत्र तंत्र आदि नही होता। फिर पका भोजन मांस सहित उसने खुद ग्रहण किया फिर शराब भी पी लिया। अब काफी रात बीतने लगी तो ग्रामीण शिष्य उठकर गांव चला गया। बस हम दोनों ही रह गए। अभी तक कुछ नजर नही आया था मुझे। फिर उसने गंगा की रेत में जाकर अशरीरी आत्माओं को बुलाने जांने की बात कहते हुए चला गया। किंसरे थोड़ा सा घुटनो तक पानी था और आगे रेत का टापू। थोड़ी देर बाद वापस आया। फिर कहने लगा उधर कोई नही मिला। इधर दोनों तरफ शमशान है एक2 करके जाऊंगा। अब तक शराब का नशा भी उस ओर चढ़ गया था। वह बोला हम लोग की साधना में हम लोग यह मानते है हम भी उन्ही बहुत प्रेतों के बीच के ही है उनसे अलग नही मानते खुद को यही हमारी साधना है। उसने पूरे कपड़े उतार कर पूरी तरह नग्न हो गया और कुटिया के दाहिनी तरह कुकुछ दूर स्थित शमशाम की ओर चला गया। नशे के होने के कारण बहुत प्रेत जिन्न खब्बीस मसान आदि को गंदी2 गालियां देते हुए चला गया। फर तक उसकी आवाज मुझे सुनाई देती रही। थोड़ी देर बाद वह वापिस आया। साथ मे एक जलती चिता की लकड़ी क्लेकर आया था और उसे कुंड में डाल दिया।मेंफिर बोला इधर भी कोई नही आया अब दूसरे तरफ की शमशान जाता हूँ। ये बड़ा शमशान है। और अशरीरी आत्माओं को गंदी2 गालियां देते हुए फिर चला गया। इसी बीच समय पाकर मैने भी एक मंत्र का जप।साधना किया। थोड़ी देर बाद वह वापस आया और मुझे जप करते देख भी लिया। फिर मुझे पंडित कहकर संबोधित भी किया और कहा इस शमशान में भी कोई नही आया। पर एक बहुत मुझे बेवकूफ बनाकर मुझपर हमला कर दिया ऐसा वह कहने लगा। और तबियत खराब होने की बात कहने लगा। पर मेरे ख्याल से शराब का नशा ज्यादा हो चुका था और अपच य्या अजीर्ण का शिकार हो चुका था फिर उसने कुटिया के बाहर उल्टियां की और राहत पाया। फिर सोने लगा ठंड लगने पर उसने ओढाने कहा तो वहां बिछे बोर को मैंने ओढ़ा दिया। वह सो गया नींद में। दूर से कहीं बाबा चिल्लाने की आवाज आने लगी। रात को 3 बज चुके थे। उसी गांव का एक गुंडा शराब पीकर एक साथी के साथ आया और अघोरी को गाली देते हुए उठाया। पर वह न उठा तो लातो से मारने लगा और खप्पर /खोपड़ी का हिस्सा उठाकर पटक दिया गालियां देते हुए साले अपने आप को अघोरी कहता है दिखा अपनी औकात। इस तरह लात मार2 कर उसे उठाया। कुटिया के बाहर ले जाकर झापड़ ही झापड़ मारा। कहने लगा कि जब तेरे लिए 35 किलो चावल हर महीने की व्यवस्था कर दिया तो इस महीने क्यो नही उठाया? इसी बात पर नाराज होकर वह गुंडा उसकी पिटाई करने लगा था। आंखे लाल थी उस गुंडे की। मुझे लगा जैसे बेताल गुंडे पर सवार होकर गालियों का हिसाब बराबर करने आया हो (बेताल शराब भी पीना पसंद करते है)। बाजू एक अधूरा बना मंदिर भी था जिसमे एक और बाबा रहा करते थे जो खुद को अवधूत कहते थे वे भी आ गए। और गुंडे को समझाने लगे। एक और आदमी जो उसी गांव का था वह भी आ चुका था समझाने। फिर अधूरे मन्दिर की तरफ सब गए मैं भी गया। गुंडा धीरे2 शांत हुआ। अब तक पौ फटने लगी थी। रात ब्जित चुकी थी और मुझे कुछ भी दिखाई नही दिया था रातभर जिस जिज्ञासा से मैं वहां गया था। सबेरे उस अवधूत से भी मिला उसने भी कहा देखता हूँ। सामान्य पूजा हवन होम कर कटोरी में पानी लेकर उसमे लौंग डालने लगा काफी प्रयास के बाद एक ही लौंग डूबा तो वह कहने लगा तुम्हारी देवी बंधन में है उसने बंधन तोड़ कर बुलाया है। पर उससे मैं संतुष्ट नही हुआ कोई खास बात तो उसने बताया नही। जैसे बंधन में कैसे बंध गयी आदि बाते वह नही बताया। गोलमाल बाते ही लगी। अतः दक्षिणा देकर और उसके सुझाव को सुनकर मैं वापस लॉज में चला आया नाश्ता चाय लेकर नहा कर जमकर सोया। शाम को उठकर घाट तरफ घूमने चला गया। इस तरह दिवाली की रात असफलता हाथ लगी।

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