कर्नल ,चमत्कारी साधू और तालाब -
ऐसा नहीं है की विचित्र घटनाये कसी एक के ही जीवन में होती है, अनेको के साथ होती है। परन्तु शर्म, झिझक, लोग क्या कहेंगे या सोचेंगे जैसी बातो के कारण दूसरो को बताना पसंद नहीं करते या किसे बताये , कैसे बताये ,या फिर लिखे तो अखबारों और पत्रिकाओ के मूर्धन्य या "मूर्खधन्य " संपादक इसे छापना ही पसंद नहीं करेंगे, अंधविश्वास या बकवास मानकर।
रायपुर (छ.ग. ) में एक रिटायर्ड कर्नल साहब से मेरी जान पहचान हुई । उन्होंने अपने ड्यूटी के दौरान एक विचित्र घटना बताई। बार्डर पर उनकी ड्यूटी लगी थी .एक बार गश्त के लिए जा रहे थे गाडी के रेडियेटर में पानी खत्म जाने के कारण इंजन गर्म हो गया, तब अपने अटेंडेंट को गाडी में ही बैठ रखवाली करने को कह खुद केन लेकर पानी की तलाश में निकल पड़े। कई किलोमीटर चलने के बाद भी कही पानी का श्रोत नहीं मिला। पूरा बंजर इलाका था। इतने में सामने से एक साधू आता दिखाई दिया उन्होंने साधू से पूछा -बाबाजी इधर कही पानी मिल सकता है क्या ? साधू ने जवाब दिया -क्यों नहीं बेटा , थोड़ा आगे जाने पर बांयी ओर एक तालाब मिलेगा ,पानी ही पानी ,जितना चाहे ले लेना। वाकई कुछ दूर चलने पर एक साफ़ सुथरा तालाब मिल गया। कर्नल साहब ने पहले तो अपनी प्यास बुझाई , पैदल चलने के कारण और गर्मी के कारण जोर से प्यास के कारण खुद का बुरा हाल था। पानी काफी मीठा और साफ था। फिर वाटर केन भरकर वापस पीछे लौट चले। गाडी में रेडियेटर में पानी डालने के बाद और साथी की प्यास बुझाने की बाद भी केन में काफी पानी बचा था। जीप/गाड़ी स्टार्ट कर आगे चल पड़े। परन्तु कई किलोमीटर जाने के बाद भी वह तालाब नहीं दिखा जो पहले सड़क क किनारे ही दिखा था , और वह साधू भी नहीं दिखा।दृष्टि भ्रम की गुंजाइश भी नहीं थी क्योकि केन में बचा पानी साबूत के तौर पर मौजूद था।
[ तो क्या उस महात्मा ने कर्नल साहब की जोरो की प्यास बुझाने और गाडी के लिए पानी देने के लिए ही अपनी शक्ति से एक तालाब की रचना , उस पथरीली बंजर और सुनसान जगह में थोड़े समय के लिए कर दी थी ,जो बाद में अदृश्य हो गयी ?] (समाप्त )
ऐसा नहीं है की विचित्र घटनाये कसी एक के ही जीवन में होती है, अनेको के साथ होती है। परन्तु शर्म, झिझक, लोग क्या कहेंगे या सोचेंगे जैसी बातो के कारण दूसरो को बताना पसंद नहीं करते या किसे बताये , कैसे बताये ,या फिर लिखे तो अखबारों और पत्रिकाओ के मूर्धन्य या "मूर्खधन्य " संपादक इसे छापना ही पसंद नहीं करेंगे, अंधविश्वास या बकवास मानकर।
रायपुर (छ.ग. ) में एक रिटायर्ड कर्नल साहब से मेरी जान पहचान हुई । उन्होंने अपने ड्यूटी के दौरान एक विचित्र घटना बताई। बार्डर पर उनकी ड्यूटी लगी थी .एक बार गश्त के लिए जा रहे थे गाडी के रेडियेटर में पानी खत्म जाने के कारण इंजन गर्म हो गया, तब अपने अटेंडेंट को गाडी में ही बैठ रखवाली करने को कह खुद केन लेकर पानी की तलाश में निकल पड़े। कई किलोमीटर चलने के बाद भी कही पानी का श्रोत नहीं मिला। पूरा बंजर इलाका था। इतने में सामने से एक साधू आता दिखाई दिया उन्होंने साधू से पूछा -बाबाजी इधर कही पानी मिल सकता है क्या ? साधू ने जवाब दिया -क्यों नहीं बेटा , थोड़ा आगे जाने पर बांयी ओर एक तालाब मिलेगा ,पानी ही पानी ,जितना चाहे ले लेना। वाकई कुछ दूर चलने पर एक साफ़ सुथरा तालाब मिल गया। कर्नल साहब ने पहले तो अपनी प्यास बुझाई , पैदल चलने के कारण और गर्मी के कारण जोर से प्यास के कारण खुद का बुरा हाल था। पानी काफी मीठा और साफ था। फिर वाटर केन भरकर वापस पीछे लौट चले। गाडी में रेडियेटर में पानी डालने के बाद और साथी की प्यास बुझाने की बाद भी केन में काफी पानी बचा था। जीप/गाड़ी स्टार्ट कर आगे चल पड़े। परन्तु कई किलोमीटर जाने के बाद भी वह तालाब नहीं दिखा जो पहले सड़क क किनारे ही दिखा था , और वह साधू भी नहीं दिखा।दृष्टि भ्रम की गुंजाइश भी नहीं थी क्योकि केन में बचा पानी साबूत के तौर पर मौजूद था।
[ तो क्या उस महात्मा ने कर्नल साहब की जोरो की प्यास बुझाने और गाडी के लिए पानी देने के लिए ही अपनी शक्ति से एक तालाब की रचना , उस पथरीली बंजर और सुनसान जगह में थोड़े समय के लिए कर दी थी ,जो बाद में अदृश्य हो गयी ?] (समाप्त )
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