22 जुलाई 2014

ऐसा भी होता है -5 (धारावाहिक सत्य घटना )

ऐसा भी होता है -5 (धारावाहिक सत्य घटना ):-
"वन में ,युद्ध में ,शत्रु के सामने,जल में, अग्नि में,पर्वत शिखर पर,सोये हुए स्थिति में, तथा असावधान और विषम स्थिति में मनुष्य के पूर्व जन्म के पुण्य ही भाग्य के रूप में उसकी रक्षा करते है -भर्तृहरि नीति शतक (116 )
                   मेरे जीवन  सबसे बुरा समय प्रारम्भ हो चुका था, जिसमे कई कड़वे जहर के घूंट पीने थे, जगह जगह पीड़ा पहुंचनी थी, तकलीफो का ढेर मुझे परिवार सहित झेलना था। अकेले  संकट आये तो ठीक परन्तु पत्नी बच्चो पर कष्ट आये तो अपना असहायपन किसी भी  पुरुष को तोड़ कर रखा देता है।
                दूसरे दिन सर तो चले गए , लेकिन जाने के बाद घर हल्का फुल्का लगाने लगा,शरीर भी , सिर भी, जो हमेशा भारी और सुस्ती से भरा लगता था, वो हल्का फुल्का लगने लगा। पहले तो मैंने इसे मनोवैज्ञानिक प्रभाव माना, पर दूसरे दिन भी जब ऐसा ही लगा, तब क्रास चेकिंग के लिए पत्नी के अनुभव के बारे में उससे बातचीत की। उसे भी घर का हल्कापन व शरीर का हल्कापन लग रहा था। चिड़चिड़ापन व छोटी छोटी बातो पर झगड़ा भी दो दिनों से नहीं हो रहा था। कभी कभी अकारण आत्महत्या के विचार भी आते थे वे भी बंद थे दोनों के मन में। (पाठको को बता देना चाहिए कि तंत्र प्रयोग से भी अकारण आत्महत्या के विचार आते है , कभी2 लोग आत्महत्या भी कर लेते है,अकाल मौतो के कारण भी यही होते है कई  केसेस में ) तब समझ में आया की पहले हम दोनों प्रभावित थे। प्रभावित होने पर कैसा लगता है,छुटकारा मिलने पर क्या परिवर्तन महसूस होता है , ये हमारे जीवन का पहला अनुभव था। पहले किसी2 के मुंह से सुना था ,अब तो स्वयं महसूस कर देखा है।
                       अगले  दिन पता चला महाराज आये हुए है, तो उनके पास गया. उन्हें 'सर' के बारे में बताया. उन्होंने कहा ठीक है ,  पहले उन्हे देख लो , उनसे कार्य सिद्ध न हो तो फिर मै तो हूँ ही।
                  कई  दिनो तक सब  ठीक ठाक रहा , फिर वापस बेचैनी,भारीपन, अनमनापन लगाने लगा। पुराने अनुभव से सबक सीख हम लोग सर के यहाँ गए और देवी के थान (थान =पूजा स्थल ) में बैठे। बातचीत करते हुए बातो बातो में मैंने सर को पत्नी के घुटने के दर्द के बारे में बताया।  इतने में पत्नी को हिस्टीरिया जैसा दौरा पड़ा।  इधर इस दौरे से मै भौंचक्का हो गया उधर सर मुस्कुराने लगे। पत्नी ने पहले आँखे तरेरी फिर बोली- माता मैंने कुछ नहीं किया, मैंने तो रक्षा की,मै तो तेरी ही बेटी हूँ , कोई नुकसान थोड़ी पहुंचाती हूँ। इधर सर देवी के चित्र की तरफ मुस्कुराते हुए  देखते रहे। फिर मुझे आश्चर्यचकित देखकर बात  स्पष्ट किया जिससे मै और भी भौंचक्का रह गया।  आर ने कहा ये हिस्टीरिया नहीं, दरअसल इसके मायके की कुलदेवी (यानी माँजी सा) आयी थी।  फिर उन्होंने और रहस्य उजागर किया ,तुम्हारी दुष्ट भाभी ने इसके कमर के नीचे का सम्पूर्ण भाग लकवाग्रस्त करने हेतु "प्रयोग" (अभिचार कर्म या टोना जादू )किया था ,पर इसके मायके की कुलदेवी (माजी सा)ने इसकी रक्षा की और तंत्र प्रयोग का असर रोक कर घुटने तक सीमित कर दिया। अगली बार जब मै घर आऊंगा तब इसे ठीक कर दूंगा, अभी बंधन कर देता हूँ।  सर ने एक और रहस्योदघाटन  किया-इसकी एक और ख़ास सहेली(डायन-2 ) जो इन सब कर्मो में इसकी साथिन है , ने भी अपने देवर के लडके पर ऐसा प्रयोग किया है जिससे वह बालक लकवाग्रस्त हो गया है जिसके इलाज में लाखो बर्बाद होगये उसके पिता के (जो सब इंजिनियर थे ) । इस सफल प्रयोग को इस पर भी आजमाया गया है। (बाद में  पता करने पर मैंने ये सब सच पाया , सचमुच उस डायन नंबर 2 की देवर का लड़का पोलियोग्रस्त जैसा था, बाद में की सालो बाद पता चला उसकी मृत्यु भी हो गयी,इसी बीच   यह भी पता  चला कि  देवर को धमतरी में किसी ने उसकी भाभी (डायन नं -2 ) की करतूतो के बारे में बता दिया था। )
                                        दूसरे दिन घर लौटा तो घर पर मंझली बहन आयी हुई थी।  उससे बात करने लगा तो बातो में उसने बताया की कल भाभी(यानी डायन नं -1, मेरी भाभी ) के  पास बैठकर बातचीत कर रही थी तो अचानक भाभी ऐंठते हुए रोने लगी और कहने लगी थी -कौन मेरे करम बाँध रहा है , मुझे बहुत तकलीफ हो रही है। यह सुनकर मै तो चौंक गया और बहन से पूछा-कितने समय की बात है ?बहन ने बताया करीब दो बजे ! यह तो वही समय था जब हम लोग सर के पास थान में बैठे थे और सर मेरी पत्नी के  घुटने पर मन्त्र फूंककर बंधन कर रह थे। इसके बाद मैंने खोजबीन किया तो पाया वाकई दुष्ट भाभी की सहेली के देवर के लडके को लकवा हुआ है और उसके इलाज में बच्चे के पिता ने लाखो खर्च कर दिए है।  ऐसा सुनकर तो मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही। इधर एक और घटना हुई -मेरे मुंहबोले जीजाजी के होटल में, मै कभी कभार मिलने जाकर बैठता था , वहां एक बार दो अनजान व्यक्ति आये और नाश्ता करते हुए आप में खुसुर पुसुर करने लगे फिर जीजाजी से कहा -सुनो महाराज , आपके यहां बाफना जी के लडके जो आते है न ?जीजाजी अनजान बन कहने लगे- कौन भाई , मै किसी को नहीं जानता , कोई मेरे यहाँ नहीं आता।  उन अजनबी व्यक्तियों ने कहा-महाराज जो बाफना यहाँ के पुत्र आते है , उन्हें बोल देना, उनके यहां घर पर जो देवी घुसी हुई है वो घर की सुख समृद्धि के लिये  है, उसे निष्काषित  करने का प्रयास न अकरे, नहीं तो परिणाम भुगतेगा , वो उस घर के हित  के लिए है। जीजाजी ने मिलने पर  यह बात बताई तो हम दोनों ही आश्चर्य चिकित हुए। वे अनजान व्यक्ति पहले और बाद में कभी दिखाई नहीं दिए।
                                     (ग्रामीण क्षेत्रो में जो बहुत प्रेत पाला जाता है उसे भी ग्रामीणजन देव या देवी कहते है, ये छत्तीसगढ़ विशेषकर बस्तर की परम्परा है )
मेरी आत्म  स्वीकृति एवं प्रायश्चित :-
ईश्वर परम दयालु ,कृपालु , करुणा का  सागर , सहनशील है(इन सब का मतलब अब समझ में आया). मैंने करीब दो वर्ष तक शंकर भगवान को उलाहना दी , लेकिन भोलेनाथ ने रुष्ट होने की बजाय मेरी नादानी समझते थे, परत दर परत रहस्यों को खोलना शुरू किया। क्रशर में काम करते वक्त, वक्त की मार से पार्टनरशिप की बजाय "छोटे भाई  की नौकरी " जैसी स्थिति में आ गया था। उस वक्त रक्त सम्बन्धी एक गन्दी गाली लगने लगी, सब कुछ जानते समझते हुए भी अनजान रहना मजबूरी थी, "कुटुंब" के लिए . उस समय गाँव के कमरे में मैंने अपने प्रिय भगवान कृष्ण(विष्णु) की गीता ज्ञान देते हुए विराट स्वरुपवाली तस्वीर लगाकर रखा था , उस पर रोज अगरबत्ती।  दिमाग खराब होने पर भगवान को उलटा टांग देता और बोलता सीधा- सीधा सब कुछ कर लिया भगवान, परन्तु  सुनते ही नहीं।  कलयुग में सबकुछ उलटा होता है , तुम दुष्टो के साथ ही रहते हो ,अत : अब तुम्हारे साथ उल्टा ही करूंगा। भगवान विष्णु की तस्वीर उलटा लटकाकर बाए हाथ से अगरबत्ती जलाता और उलटी दिशा में (एंटी क्लॉक वाइज ) अगरबत्ती घुमाता। परन्तु "हरि और हर" शायद सुनते ही नहीं थे। सुनते भी थे तो कभी नाराज नहीं हुए।  अनजाने में किया गया दुर्व्यवहार ,क्षोभवश दी गयी गालियाँ भगवान भी प्रेमपूर्वक ग्रहण करता है और रास्ता दिखाता है। यही हो रहा था और परदे के पीछे छुपे रहस्य उघड़ते  जा रहे थे, जैसे ईश्वर कह रहा हो -देख सच में किसके द्वारा क्या किया जा रहा है , और तू  दे रहा था ! 
( आगे जारी है )

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