ऐसा भी होता है -6 (धारावाहिक सत्य घटना ) :-
आपद परखिये चारि ,धीरज धरम मित्र और नारि -तुलसी दास
दुष्ट भाभी की स्वीकारोत्ति :-
डौंडी वाले सर कहते थे मेरा शिष्य जो इन विद्याओं को सीख चुका है , मेरे साथ रहेगा तभी तुम्हारा घर ठीक करने जा सकूंगा , अन्यथा मेरी ही जान को खतरा है ! ऐसा ही रवेली वाले महाराज जी कहते थे- जो ठीक करने जाएगा , उसी की जान को खतरा है,ऐसा ही एक तांत्रिक मांत्रिक साथ में चाहिए, रक्षा के लिए अन्यथा काम मुश्किल और खतरनाक है ! मुझे याद आया की मेरे मामाजी स्व. माँगीलाल जी कांकरिया ने भी कुछ ऐसा ही कहा था -मुझ मे अब इतनी शक्ति नहीं कि इसे ठीक कर सकूँ, बुढ़ापा आ गया । ऐसा आखिर क्या था मेरे घर में, जो दैवी शक्ति संपन्न को भी डरा रही थी ? खैर इस बात से मै बिलकुल अनजान था। सन 1994 , मई जून का महीना ,डौंडी वाले सर को लेकर मै कांकेर अपने घर आ गया, परन्तु बिना सहायक के। गोबर ,नींबू ,बोतल, थाली लोटा वगैरह पूजा सामग्री इकट्ठा किया। भोजनोपरांत मै सहयोगी के रूप में मुंहबोले जीजाजी को बुलाने गया, तब मेरी अनुपस्थिति में सर छत पर कुर्सी में ठंडी हवा में आराम कर रहे थे भोजनोपरांत।उस समय उन्हें अकेले देखकर डायन भाभी ने सर से कहा- मुझे बचा लो , किसी तरह का 'प्रयोग'मत करो, वरना मै तुम्हे भी देख लूंगी।( यह बात सर ने मुझसे छुपा लिया,परन्तु मुंहबोले जीजाजी को बताने के कारण दूसरे दिन मुझे पता चल गया)। रात्रि में सर ने पूजा किया , गोबर का घोल बनाया , थाली में भरा ,बीच में एक दिया जलाया , उसके ऊपर काफी देर तक एक उलटा लोटा हाथ में लेकर बुदबुदाते रहे, फिर दिए को उलटे लोटे से ढक दिया। अब यह लोटा गोबर पानी खींचेगा। सामान्य सी बात थी, एक विज्ञान का छात्र होने मै समझ सकता था -लोटे की हवा गर्म हुई बाहर निकली अंदर गर्म हवा का घनत्व कम हो गया , ढकने के बाद आक्सीजन की समाप्ति से दिया बुझेगा, हवा ठंडी होगी, अंदर का दबाव कम होगा,इससे गोबर का घोल लोटे के अंदर खिंचेगा। ( ये भौतिक शास्त्र पढ़ा हुआ कोई भी व्यक्ति आसानी से समझता है .उसे बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता)। इसी बीच मै सर से पहले की तरह जिज्ञासा पर जिज्ञासा रखता जा रहा था, जैसे क्या सचमुच तंत्र मन्त्र होता है ?क्या सचमुच भूत प्रेत होते है ? क्या वाकई इनका अस्तित्व होता है ? सर मेरी जिज्ञासा भलीभांति समझते थे , स्वयं शिक्षा विभाग के अधिकारी जो थे। दूसरा होता तो शायद मेरे प्रश्नो से बौखला जाता , शायद सोंचता कि मेरी जांच कर रहा है . पर सर ने एक सच्चे गुरु की भांति शांत , धीर गम्भीर होकर मेरी जिज्ञासा शांत की,एक एक प्रश्न का उत्तर दिया। आजकल पढ़े लिखे लोग इसे अंधविश्वास मानते है ,परन्तु तंत्र मन्त्र जादू टोना , भूत प्रेत इत्यादि वास्तव में होते है , इनका अस्तित्व है। विद्या बुरी चीज नहीं, परन्तु प्रयोग करने वाला अच्छा बुरा होता है। पहले मै भी (यानी स्वयं सर ) ये सब नहीं मानता था परन्तु घर में भुगतने के कारण और प्रमाण मिलाने के कारण मानना पड़ा। (सर स्वयं भी कटु घटनाओ से होकर गुजरेथे ! ) उस समय मै (यानी सर ) भी सच्चे जानकार व्यक्ति की तलाश में भटका।
रात्रि में ये सब क्रियाएँ करते करते काफी देर हो गयी, जीजाजी अपने घर चले गए, शेष कार्य सबेरे करेंगे ऐसा सर के कहने के बाद हम दोनों छत पर जाकर सो गए। गर्मी के दिन थे , सर मुझसे कुछ दूर किनारे पर सोये थे। सबेरे मेरी आँख जल्दी खुल गयी। आँख खोले मै लेटा था कि डायन भाभी चुपचाप सीढ़ी चढकर उपर आने लगी। इतने सबेरे उसे ऊपर आते देख कर मुझे आश्चर्य हुआ। मुझे जागते हुए उस दुष्टा ने
ने देखा तो तुरंत उलटे पाँव सीढ़ी से ही नीचे उत्तर गयी वापस। सर छत के किनारे सोये थे , शायद वह जल्दी में उन्हें देख नहीं पायी। कुछ समय बाद मै उठा ,और दंतमंजन लेने और मुंह धोने के लिए पानी लेने नीचे उतरा और आँगन के मध्य स्थित कुंए के पास गया। पानी लेने के बर्तन में मेरी नजर पड़ी , किनारे में थोड़ा गोबर लगा देखकर मै उसे धोने लगा। इधर मेरी पत्नी भी जल्दी उठ गयी और चाय बनाने हेतु किचन में गयी। घर पर मेरे नामुराद कुटुंब के लोग सोये हुए थे। भाभी ने मुझे अकेला देख मुझे सुनाते हुए कहने लगी -कल जो आदमी (यानी डौंडी वाले सर ) आया था न ,भाग गया लगता है , देख कर ही डर गया होगा . मैंने सुना अनसुना कर दिया, सिर भी नहीं उठाया। डायन ने सोंचा इसका ध्यान कही और है,सुन नहीं पाया या आवाज धीमी हो गयी होगी. उसने थोड़ी जोर से कहा - ठीक वही लाइन , वही शब्द। मैंने दुबारा अनसुना कर दिया। इस पर भाभी ने सोंचा इसका दिमाग अक्सर अनुपस्थित(Absent Mind) रहता है अत: और जोर से बोला जाए अत: तीसरी बार एकदम ऊँची आवाज में कहा - पम्मी (मेरी भतीजी का नाम, जो उस समय सोयी हुई थी ) कल जो आदमी आया था न, वो भाग गया लगता है ,देखकर ही डर गया होगा . अबकी बार मैंने सर उठाकर डायन को देखा , अपने कमरे के दरवाजे पर ही खड़ी थी मुझे देखकर हँसते हुए , उसे मैंने देखा तो जोर जोर से हा-हा-हा कर अट्टहासपूर्ण हंसने लगी। ये तो डायन भाभी की आत्मस्वीकृति थी,यानी अपनी दुष्टता व् करतूतो की स्वीकृति ! अब तक मिले प्रमाणों के आधार पर 90 प्रतिशत विश्वावास और 10 प्रतिशत बाकी था। परन्तु इस डायन की स्वीकारोक्ति के बाद रहा सहा अविश्वास भी समाप्त हो गया। मन क्रोध भी आ रहा था , यदि मै शेर चीता होता तो चीर-फाड़ कर खा जाता ! परन्तु इन विद्याओ का जवाब भी ऐसे ही देना चाहिए। अन्यथा कानून के ठेकेदारो और समाज के कथित ठेकेदारो का हस्तक्षेप झेलना पडता !
मै पानी और मंजन लेकर चुपचाप वहां से हट गया और पत्नी को यह बात तुरंत बता दी। वह भी चकित रह गयी , सावधान रहने की हिदायत देकर, नजर रखने को कह मै पुन : छत पर गया और सर को सारी बाते बताई . सर बोले अब ज्यादा देर तक यहां रहना ठीक नहीं। इन सामग्रियों की देख रेख मै करता हूँ तुम जीजाजी को बुला लाओ ,कार्य पूरा कर जल्दी से निकलना ठीक रहेगा।मंजन और चाय वगैरह बाद में करेंगे मेरे व जीजाजी के आने के बाद पत्नी भी ऊपर छत पर आ गयी (क्रमश:)
आपद परखिये चारि ,धीरज धरम मित्र और नारि -तुलसी दास
दुष्ट भाभी की स्वीकारोत्ति :-
डौंडी वाले सर कहते थे मेरा शिष्य जो इन विद्याओं को सीख चुका है , मेरे साथ रहेगा तभी तुम्हारा घर ठीक करने जा सकूंगा , अन्यथा मेरी ही जान को खतरा है ! ऐसा ही रवेली वाले महाराज जी कहते थे- जो ठीक करने जाएगा , उसी की जान को खतरा है,ऐसा ही एक तांत्रिक मांत्रिक साथ में चाहिए, रक्षा के लिए अन्यथा काम मुश्किल और खतरनाक है ! मुझे याद आया की मेरे मामाजी स्व. माँगीलाल जी कांकरिया ने भी कुछ ऐसा ही कहा था -मुझ मे अब इतनी शक्ति नहीं कि इसे ठीक कर सकूँ, बुढ़ापा आ गया । ऐसा आखिर क्या था मेरे घर में, जो दैवी शक्ति संपन्न को भी डरा रही थी ? खैर इस बात से मै बिलकुल अनजान था। सन 1994 , मई जून का महीना ,डौंडी वाले सर को लेकर मै कांकेर अपने घर आ गया, परन्तु बिना सहायक के। गोबर ,नींबू ,बोतल, थाली लोटा वगैरह पूजा सामग्री इकट्ठा किया। भोजनोपरांत मै सहयोगी के रूप में मुंहबोले जीजाजी को बुलाने गया, तब मेरी अनुपस्थिति में सर छत पर कुर्सी में ठंडी हवा में आराम कर रहे थे भोजनोपरांत।उस समय उन्हें अकेले देखकर डायन भाभी ने सर से कहा- मुझे बचा लो , किसी तरह का 'प्रयोग'मत करो, वरना मै तुम्हे भी देख लूंगी।( यह बात सर ने मुझसे छुपा लिया,परन्तु मुंहबोले जीजाजी को बताने के कारण दूसरे दिन मुझे पता चल गया)। रात्रि में सर ने पूजा किया , गोबर का घोल बनाया , थाली में भरा ,बीच में एक दिया जलाया , उसके ऊपर काफी देर तक एक उलटा लोटा हाथ में लेकर बुदबुदाते रहे, फिर दिए को उलटे लोटे से ढक दिया। अब यह लोटा गोबर पानी खींचेगा। सामान्य सी बात थी, एक विज्ञान का छात्र होने मै समझ सकता था -लोटे की हवा गर्म हुई बाहर निकली अंदर गर्म हवा का घनत्व कम हो गया , ढकने के बाद आक्सीजन की समाप्ति से दिया बुझेगा, हवा ठंडी होगी, अंदर का दबाव कम होगा,इससे गोबर का घोल लोटे के अंदर खिंचेगा। ( ये भौतिक शास्त्र पढ़ा हुआ कोई भी व्यक्ति आसानी से समझता है .उसे बेवकूफ नहीं बनाया जा सकता)। इसी बीच मै सर से पहले की तरह जिज्ञासा पर जिज्ञासा रखता जा रहा था, जैसे क्या सचमुच तंत्र मन्त्र होता है ?क्या सचमुच भूत प्रेत होते है ? क्या वाकई इनका अस्तित्व होता है ? सर मेरी जिज्ञासा भलीभांति समझते थे , स्वयं शिक्षा विभाग के अधिकारी जो थे। दूसरा होता तो शायद मेरे प्रश्नो से बौखला जाता , शायद सोंचता कि मेरी जांच कर रहा है . पर सर ने एक सच्चे गुरु की भांति शांत , धीर गम्भीर होकर मेरी जिज्ञासा शांत की,एक एक प्रश्न का उत्तर दिया। आजकल पढ़े लिखे लोग इसे अंधविश्वास मानते है ,परन्तु तंत्र मन्त्र जादू टोना , भूत प्रेत इत्यादि वास्तव में होते है , इनका अस्तित्व है। विद्या बुरी चीज नहीं, परन्तु प्रयोग करने वाला अच्छा बुरा होता है। पहले मै भी (यानी स्वयं सर ) ये सब नहीं मानता था परन्तु घर में भुगतने के कारण और प्रमाण मिलाने के कारण मानना पड़ा। (सर स्वयं भी कटु घटनाओ से होकर गुजरेथे ! ) उस समय मै (यानी सर ) भी सच्चे जानकार व्यक्ति की तलाश में भटका।
रात्रि में ये सब क्रियाएँ करते करते काफी देर हो गयी, जीजाजी अपने घर चले गए, शेष कार्य सबेरे करेंगे ऐसा सर के कहने के बाद हम दोनों छत पर जाकर सो गए। गर्मी के दिन थे , सर मुझसे कुछ दूर किनारे पर सोये थे। सबेरे मेरी आँख जल्दी खुल गयी। आँख खोले मै लेटा था कि डायन भाभी चुपचाप सीढ़ी चढकर उपर आने लगी। इतने सबेरे उसे ऊपर आते देख कर मुझे आश्चर्य हुआ। मुझे जागते हुए उस दुष्टा ने
ने देखा तो तुरंत उलटे पाँव सीढ़ी से ही नीचे उत्तर गयी वापस। सर छत के किनारे सोये थे , शायद वह जल्दी में उन्हें देख नहीं पायी। कुछ समय बाद मै उठा ,और दंतमंजन लेने और मुंह धोने के लिए पानी लेने नीचे उतरा और आँगन के मध्य स्थित कुंए के पास गया। पानी लेने के बर्तन में मेरी नजर पड़ी , किनारे में थोड़ा गोबर लगा देखकर मै उसे धोने लगा। इधर मेरी पत्नी भी जल्दी उठ गयी और चाय बनाने हेतु किचन में गयी। घर पर मेरे नामुराद कुटुंब के लोग सोये हुए थे। भाभी ने मुझे अकेला देख मुझे सुनाते हुए कहने लगी -कल जो आदमी (यानी डौंडी वाले सर ) आया था न ,भाग गया लगता है , देख कर ही डर गया होगा . मैंने सुना अनसुना कर दिया, सिर भी नहीं उठाया। डायन ने सोंचा इसका ध्यान कही और है,सुन नहीं पाया या आवाज धीमी हो गयी होगी. उसने थोड़ी जोर से कहा - ठीक वही लाइन , वही शब्द। मैंने दुबारा अनसुना कर दिया। इस पर भाभी ने सोंचा इसका दिमाग अक्सर अनुपस्थित(Absent Mind) रहता है अत: और जोर से बोला जाए अत: तीसरी बार एकदम ऊँची आवाज में कहा - पम्मी (मेरी भतीजी का नाम, जो उस समय सोयी हुई थी ) कल जो आदमी आया था न, वो भाग गया लगता है ,देखकर ही डर गया होगा . अबकी बार मैंने सर उठाकर डायन को देखा , अपने कमरे के दरवाजे पर ही खड़ी थी मुझे देखकर हँसते हुए , उसे मैंने देखा तो जोर जोर से हा-हा-हा कर अट्टहासपूर्ण हंसने लगी। ये तो डायन भाभी की आत्मस्वीकृति थी,यानी अपनी दुष्टता व् करतूतो की स्वीकृति ! अब तक मिले प्रमाणों के आधार पर 90 प्रतिशत विश्वावास और 10 प्रतिशत बाकी था। परन्तु इस डायन की स्वीकारोक्ति के बाद रहा सहा अविश्वास भी समाप्त हो गया। मन क्रोध भी आ रहा था , यदि मै शेर चीता होता तो चीर-फाड़ कर खा जाता ! परन्तु इन विद्याओ का जवाब भी ऐसे ही देना चाहिए। अन्यथा कानून के ठेकेदारो और समाज के कथित ठेकेदारो का हस्तक्षेप झेलना पडता !
मै पानी और मंजन लेकर चुपचाप वहां से हट गया और पत्नी को यह बात तुरंत बता दी। वह भी चकित रह गयी , सावधान रहने की हिदायत देकर, नजर रखने को कह मै पुन : छत पर गया और सर को सारी बाते बताई . सर बोले अब ज्यादा देर तक यहां रहना ठीक नहीं। इन सामग्रियों की देख रेख मै करता हूँ तुम जीजाजी को बुला लाओ ,कार्य पूरा कर जल्दी से निकलना ठीक रहेगा।मंजन और चाय वगैरह बाद में करेंगे मेरे व जीजाजी के आने के बाद पत्नी भी ऊपर छत पर आ गयी (क्रमश:)
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