ऐसा भी होता है-4 (धारावाहिक सत्य घटना )-
दुःख क्याहै? सब कुछ तुम्हारे हाथ में है- शेक्सपियर
आपद काल परखिये चारि ,धीरज धरम मित्र अरु नारी -तुलसीदास
उम्मीद थी की दुष्ट डायन भाभी की पराजय के बाद सब ठीक हो जाएगा। मेरी पत्नी पूर्ण रूप से मेरा साथ दे रही थी, परन्तु पता नहीं इतनी छोटी-छोटी बातो पर आपस में खटपट शुरू हो जाती थी (आगे जाकर पता चला की तंत्र में विद्वेषण प्रयोग होता है, वह डायन इसमे सिद्ध हस्त थी )
इसी बीच ग्रामीण क्षेत्रो में कुछ बैगा गुनिया लोगो के बीच घूमा, विचार करने की अनेक पद्धतियाँ देखी । 'कुछ तीर कुछ तुक्का' छाप परिणाम देखे। नई जानकारियां भी मिली . मेरे दादी के कर्मो के कुफल के बारे में जानकारी मिली। दादा-दादी ने किसी "सिद्धो" नामक ग्रामीण देवता या देवी जो दरअसल खतरनाक किस्म का प्रेत होता है उसे पाला था। घरबंधन खुलने के बाद वह भी घर पर आने लगा था। खेती में हमेशा घाटा होता था ,ये उसी सिद्धो की करामात थी ऐसा पता लगा। इस सिद्धो के आने की पुष्टि (क्रास चेक के रूप में ) रवेली वाले महाराज ने भी की थी।
एक तरफ दुष्ट भाभी भयंकर तांत्रिक थी। दूसरी तरफ मै इन बातो से पूर्णत: अपरिचित एवं अविश्वासी ,तीसरी मुसीबत आर्थिक तंगी, दाने दाने को मोहताज और चौथी तरफ पत्नी को छोडकर घर सभी सदस्यों का (माँ बाप सहित ) विरोध। परछाई भी साथ छोड़ चुकी थी। और 'मुसीबत अकेले नहीं आती , चारो तरफ से एक साथ आती है' ,जैसे जुमले सच होते दिखाई दे रहे थे। ऐसे में एक मेरा मित्र सुब्रत दत्त राय जो उम्र में मेरे से छोटा था , ने साथ दिया (सच्चा मित्र लाखो करोडो के धन से भी कीमती होता है, पर बाद में भगवान ने उसे भी मुझसे छीन लिया, उसकी मृत्यु हो गयी कुछ सालो बाद ) सुब्रत मुझे अनेक स्थानो पर , गाँवों में अपनी मोटर सायकिल पर बिठाकर खुद के खर्चे पर ले जाता था। जब रक्त सम्बन्धी मुंह मोड़ ले , परछाई भी साथ छोड़ दे तब सच्चा मित्र , पत्नी रिश्तेदार आदि की परीक्षा होती है। सुब्रत शत-प्रतिशत खरा उतरा। मुझे ढाढस बंधाता , उस 'रहस्यमय क्षेत्र/विद्या ' की जानकारी देता , ताकि मैं सुरक्षित रह सकूँ। इधर-उधर ले जाता , जब में बुद्धि काम नहीं करती तो उसके सुझाव,उसकी बाते काफी लाभदायक रहती। मेरे जीवन के सर्वाधिक बुरे दौर में सुब्रत जो अब "स्वर्गीय" हो चुका है एक अमिट छाप और यादें छोड़ गया। मेरे घर के समस्त रक्त सम्बन्धियों जो वास्तव में मेरे शत्रु रूप में थे उनकी नजर में सुब्रत भी एक शत्रु बन गया ये बात हम दोनों भली भांति समझते थे।
नवरात्रि आयी , रवेली वाले महाराज जी नहीं आये(रवेली वाले महाराज परम आलसी और लापरवाह थे ), आखिर नवरात्रि के दूसरे तीसरे दिन परेशान होकर ए. डी आई साहब यानी डौंडी वाले सर के पास गया। दिनभर घटनाओ/इंतज़ार के बाद शाम 4 बजे वहां से निकले। रात्रि बारह बजे सर ने मेरे घर में प्रवेश किया। घर के आँगन में घूमने के बाद मेरे कमरे में बैठे. फिर मुझसे एक नींबू मांगकर उस पर सिंदूर लगाकर मुझे थमाया ,दो अगरबत्ती जलाकर मुझे देकर पुन : आँगन की और गए। वापस आकर कमरे में बैठे , मेरे हाथ से नींबू लेकर चाकू से मेरे सामने काटा तो उसमे से एक मनुष्य का दाढ़ का दांत प्लेट पर आकर गिरा। उन्होंने कहा कि प्रेत की कोई चीज आनी चाहिए , आ गयी प्रमाण के तौर पर। मैंने देखा दांत नीम्बू के रस से गीला था ,पान का दाग भी लगा था। डौंडी वाले सर पढ़े लिखे कारण मेरी जिज्ञासा भली भांति समझते थे ,साथ में मेरे मुंह बोले जीजाजी भी थे. सर ने कहा -अगली बार आऊंगा तो ठीक कर दूंगा। इससे पहले डौंडी वाले सर के घर बैठा था तो विचार समय मेरे द्वारा लाये गए नींबू से हड्डी जैसा कोई छोटी सी वस्तु या तिनका निकला था . नींबू काटते वक्त मेरा ध्यान था ,कोई हाथ की सफाई भी नहीं। यह नींबू से दांत निकलने की दूसरी घटना मेरे सामने घटी। सर इसके बाद मुंहबोले जीजाजी के यहां सोने चले गए .उन्होंने रात्रि में मेरी अनुपस्थिति में जीजाजी को बताया -इसको (यानी मुझे) कैसे बताऊ ,इसकी भाभी जो बगल के कमरे में रहती है , वह बेहद दुष्ट है ,उसने खतरनाक तंत्र मन्त्र सीखकर शमशान की गन्दी चीज (शायद प्रेत,पिशाच वगैरह ) घर पर बसा लिया है ,घर बुरी तरह अभिशप्त है। वह चीज काफी पुराना हो गया है और रच- बस गया है। जो भी उसे निकालने जायेगा ,उसके ही प्राण जाने की संभावना भी है . उसने(प्रेत ने ) बंधन का समय समाप्त होने के बाद "भक लेना"(भक्ष्य लेना या प्राण लेना ) शुरू कर दिया है। इसके बड़े भाई की मृत्यु भी इसी कारण हुई है . तीसरा वर्ष चल रहा है , इसके बड़े भाई के स्वर्गवास के बाद इस वर्ष इसका नंबर (यानी मेरा ) है. इसके बाद पूरे कुटुंब का नाश हो जाएगा। इस पर मुंह बोले जीजाजी ने जवाब दिया-सर इसे बहुत कुछ मालूम है, परन्तु विश्वास नहीं हो रहा है, इसलिए छानबीन कर रहा है। रायपुर में भृगु ज्योतिष (पंडित आर इन शर्मा ,जिला पाली राजस्थान )ने साफ़ बता दिया था ।
दूसरे दिन सबेरे जीजाजी ने सर की बताई 'सारी बाते' मुझे बताई ,जब मैंने जाना की सब बाते तो वही है जो औरो ने बताई ,परन्तु इस वर्ष मेरा नंबर है यह जानकर मै सकते में आ गया। मुझे याद आया की महाराज जी ने कहा था-"सबसे ज्यादा तुम्ही प्रभावित हो " . इसी तरह भृगु ज्योतिष ने तीन बार कहा था जोर देकर, इस तंत्र विद्या की काट जल्द से जल्द करवाओ . कुटुम्ब नाश की बात भी दो-तीन जगह से सांकेतिक व स्पष्ट रूप से ज्ञात हो गयी थी । मुझे सन 1971 -72 वाली बात भी याद आई जब बड़े भैया को राजस्थानी प्रसिद्द ज्योतिषी ने कहा था - तुम्हारी शादी एक चेचक दागवाली लडकी से होगी जो तुम्हारा घर तहस नहस कर देगी। मैंने नियति को साफ़2 जान लिया ,पहचान लिया। मैंने सीधे सीधे हार मानने की बजाय लड़ने की ठान ली। आमने सामने लड़ना ठीक नहीं ,कानूनी और अविश्वास, अंधविश्वास जैसे की पचड़े सामने थे। मैंने विधि के इस विधान से टकराने का फैसला कर लिया। आखिरकार स्वयं की रक्षा करना मेरा कर्त्तव्य था और अधिकार भी। (कदाचित मेरे जीवन का सबसे गलत निर्णय था जो मैंने पूरे कुटुम्ब की रक्षा की भी ठान ली। विधि के विधान से लड़ने कीबात भी ठान ली, जिसका दुष्प्रभाव यह हुआ की आगे चलकर कपट ,दुष्टता,घोर अपमान, सब तरह से पीड़ा ,उपेक्षा, बदनामी , दरिद्रता, और न जाने क्या क्या न झेलना पड़ा,अपने छोटे परिवार सहित! मैंने उन सिद्ध लोगो के सलाह की उपेक्षा भी की थी जिन्होंने कहा था-अपने और अपने परिवार अर्थात पत्नी और बच्चो की रक्षा भर करो, बाकी को यानी छोटे भाई व उसका परिवार , माँ इत्यादि को भी ध्यान मत दो , ये सब तुम्हारे काम नहीं आएंगे , बल्कि तुम्हारे साथ दुष्टता ही करेंगे , सब स्वार्थी है। पर मुझ पर तो कर्तव्य पालन,बड़प्पन , मोह माया आदि का बहुत सवार था। यही आदर्श मेरे जीवन का जहर साबित हुआ। एक ने तो स्पष्ट रूप से कहा था कि तुम कीचड़ में कमल पुष्प की भाँति हो. )
दुःख क्याहै? सब कुछ तुम्हारे हाथ में है- शेक्सपियर
आपद काल परखिये चारि ,धीरज धरम मित्र अरु नारी -तुलसीदास
उम्मीद थी की दुष्ट डायन भाभी की पराजय के बाद सब ठीक हो जाएगा। मेरी पत्नी पूर्ण रूप से मेरा साथ दे रही थी, परन्तु पता नहीं इतनी छोटी-छोटी बातो पर आपस में खटपट शुरू हो जाती थी (आगे जाकर पता चला की तंत्र में विद्वेषण प्रयोग होता है, वह डायन इसमे सिद्ध हस्त थी )
इसी बीच ग्रामीण क्षेत्रो में कुछ बैगा गुनिया लोगो के बीच घूमा, विचार करने की अनेक पद्धतियाँ देखी । 'कुछ तीर कुछ तुक्का' छाप परिणाम देखे। नई जानकारियां भी मिली . मेरे दादी के कर्मो के कुफल के बारे में जानकारी मिली। दादा-दादी ने किसी "सिद्धो" नामक ग्रामीण देवता या देवी जो दरअसल खतरनाक किस्म का प्रेत होता है उसे पाला था। घरबंधन खुलने के बाद वह भी घर पर आने लगा था। खेती में हमेशा घाटा होता था ,ये उसी सिद्धो की करामात थी ऐसा पता लगा। इस सिद्धो के आने की पुष्टि (क्रास चेक के रूप में ) रवेली वाले महाराज ने भी की थी।
एक तरफ दुष्ट भाभी भयंकर तांत्रिक थी। दूसरी तरफ मै इन बातो से पूर्णत: अपरिचित एवं अविश्वासी ,तीसरी मुसीबत आर्थिक तंगी, दाने दाने को मोहताज और चौथी तरफ पत्नी को छोडकर घर सभी सदस्यों का (माँ बाप सहित ) विरोध। परछाई भी साथ छोड़ चुकी थी। और 'मुसीबत अकेले नहीं आती , चारो तरफ से एक साथ आती है' ,जैसे जुमले सच होते दिखाई दे रहे थे। ऐसे में एक मेरा मित्र सुब्रत दत्त राय जो उम्र में मेरे से छोटा था , ने साथ दिया (सच्चा मित्र लाखो करोडो के धन से भी कीमती होता है, पर बाद में भगवान ने उसे भी मुझसे छीन लिया, उसकी मृत्यु हो गयी कुछ सालो बाद ) सुब्रत मुझे अनेक स्थानो पर , गाँवों में अपनी मोटर सायकिल पर बिठाकर खुद के खर्चे पर ले जाता था। जब रक्त सम्बन्धी मुंह मोड़ ले , परछाई भी साथ छोड़ दे तब सच्चा मित्र , पत्नी रिश्तेदार आदि की परीक्षा होती है। सुब्रत शत-प्रतिशत खरा उतरा। मुझे ढाढस बंधाता , उस 'रहस्यमय क्षेत्र/विद्या ' की जानकारी देता , ताकि मैं सुरक्षित रह सकूँ। इधर-उधर ले जाता , जब में बुद्धि काम नहीं करती तो उसके सुझाव,उसकी बाते काफी लाभदायक रहती। मेरे जीवन के सर्वाधिक बुरे दौर में सुब्रत जो अब "स्वर्गीय" हो चुका है एक अमिट छाप और यादें छोड़ गया। मेरे घर के समस्त रक्त सम्बन्धियों जो वास्तव में मेरे शत्रु रूप में थे उनकी नजर में सुब्रत भी एक शत्रु बन गया ये बात हम दोनों भली भांति समझते थे।
नवरात्रि आयी , रवेली वाले महाराज जी नहीं आये(रवेली वाले महाराज परम आलसी और लापरवाह थे ), आखिर नवरात्रि के दूसरे तीसरे दिन परेशान होकर ए. डी आई साहब यानी डौंडी वाले सर के पास गया। दिनभर घटनाओ/इंतज़ार के बाद शाम 4 बजे वहां से निकले। रात्रि बारह बजे सर ने मेरे घर में प्रवेश किया। घर के आँगन में घूमने के बाद मेरे कमरे में बैठे. फिर मुझसे एक नींबू मांगकर उस पर सिंदूर लगाकर मुझे थमाया ,दो अगरबत्ती जलाकर मुझे देकर पुन : आँगन की और गए। वापस आकर कमरे में बैठे , मेरे हाथ से नींबू लेकर चाकू से मेरे सामने काटा तो उसमे से एक मनुष्य का दाढ़ का दांत प्लेट पर आकर गिरा। उन्होंने कहा कि प्रेत की कोई चीज आनी चाहिए , आ गयी प्रमाण के तौर पर। मैंने देखा दांत नीम्बू के रस से गीला था ,पान का दाग भी लगा था। डौंडी वाले सर पढ़े लिखे कारण मेरी जिज्ञासा भली भांति समझते थे ,साथ में मेरे मुंह बोले जीजाजी भी थे. सर ने कहा -अगली बार आऊंगा तो ठीक कर दूंगा। इससे पहले डौंडी वाले सर के घर बैठा था तो विचार समय मेरे द्वारा लाये गए नींबू से हड्डी जैसा कोई छोटी सी वस्तु या तिनका निकला था . नींबू काटते वक्त मेरा ध्यान था ,कोई हाथ की सफाई भी नहीं। यह नींबू से दांत निकलने की दूसरी घटना मेरे सामने घटी। सर इसके बाद मुंहबोले जीजाजी के यहां सोने चले गए .उन्होंने रात्रि में मेरी अनुपस्थिति में जीजाजी को बताया -इसको (यानी मुझे) कैसे बताऊ ,इसकी भाभी जो बगल के कमरे में रहती है , वह बेहद दुष्ट है ,उसने खतरनाक तंत्र मन्त्र सीखकर शमशान की गन्दी चीज (शायद प्रेत,पिशाच वगैरह ) घर पर बसा लिया है ,घर बुरी तरह अभिशप्त है। वह चीज काफी पुराना हो गया है और रच- बस गया है। जो भी उसे निकालने जायेगा ,उसके ही प्राण जाने की संभावना भी है . उसने(प्रेत ने ) बंधन का समय समाप्त होने के बाद "भक लेना"(भक्ष्य लेना या प्राण लेना ) शुरू कर दिया है। इसके बड़े भाई की मृत्यु भी इसी कारण हुई है . तीसरा वर्ष चल रहा है , इसके बड़े भाई के स्वर्गवास के बाद इस वर्ष इसका नंबर (यानी मेरा ) है. इसके बाद पूरे कुटुंब का नाश हो जाएगा। इस पर मुंह बोले जीजाजी ने जवाब दिया-सर इसे बहुत कुछ मालूम है, परन्तु विश्वास नहीं हो रहा है, इसलिए छानबीन कर रहा है। रायपुर में भृगु ज्योतिष (पंडित आर इन शर्मा ,जिला पाली राजस्थान )ने साफ़ बता दिया था ।
दूसरे दिन सबेरे जीजाजी ने सर की बताई 'सारी बाते' मुझे बताई ,जब मैंने जाना की सब बाते तो वही है जो औरो ने बताई ,परन्तु इस वर्ष मेरा नंबर है यह जानकर मै सकते में आ गया। मुझे याद आया की महाराज जी ने कहा था-"सबसे ज्यादा तुम्ही प्रभावित हो " . इसी तरह भृगु ज्योतिष ने तीन बार कहा था जोर देकर, इस तंत्र विद्या की काट जल्द से जल्द करवाओ . कुटुम्ब नाश की बात भी दो-तीन जगह से सांकेतिक व स्पष्ट रूप से ज्ञात हो गयी थी । मुझे सन 1971 -72 वाली बात भी याद आई जब बड़े भैया को राजस्थानी प्रसिद्द ज्योतिषी ने कहा था - तुम्हारी शादी एक चेचक दागवाली लडकी से होगी जो तुम्हारा घर तहस नहस कर देगी। मैंने नियति को साफ़2 जान लिया ,पहचान लिया। मैंने सीधे सीधे हार मानने की बजाय लड़ने की ठान ली। आमने सामने लड़ना ठीक नहीं ,कानूनी और अविश्वास, अंधविश्वास जैसे की पचड़े सामने थे। मैंने विधि के इस विधान से टकराने का फैसला कर लिया। आखिरकार स्वयं की रक्षा करना मेरा कर्त्तव्य था और अधिकार भी। (कदाचित मेरे जीवन का सबसे गलत निर्णय था जो मैंने पूरे कुटुम्ब की रक्षा की भी ठान ली। विधि के विधान से लड़ने कीबात भी ठान ली, जिसका दुष्प्रभाव यह हुआ की आगे चलकर कपट ,दुष्टता,घोर अपमान, सब तरह से पीड़ा ,उपेक्षा, बदनामी , दरिद्रता, और न जाने क्या क्या न झेलना पड़ा,अपने छोटे परिवार सहित! मैंने उन सिद्ध लोगो के सलाह की उपेक्षा भी की थी जिन्होंने कहा था-अपने और अपने परिवार अर्थात पत्नी और बच्चो की रक्षा भर करो, बाकी को यानी छोटे भाई व उसका परिवार , माँ इत्यादि को भी ध्यान मत दो , ये सब तुम्हारे काम नहीं आएंगे , बल्कि तुम्हारे साथ दुष्टता ही करेंगे , सब स्वार्थी है। पर मुझ पर तो कर्तव्य पालन,बड़प्पन , मोह माया आदि का बहुत सवार था। यही आदर्श मेरे जीवन का जहर साबित हुआ। एक ने तो स्पष्ट रूप से कहा था कि तुम कीचड़ में कमल पुष्प की भाँति हो. )
(क्रमशः )
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