16 नवंबर 2015

ऐसा भी होता है-(12)-(धारावाहिक सत्य घटना)

कई महीने बीते,शायद साल भी बीता। छोटे भाई के मन में पूरी संपत्ति हड़पने की योजना चलने लगी। बंटवारे के लिए दौड़ भाग चलने लगी।
     इधर मृत डायन भाभी प्रेतनी के रूप में भटकने लगी थी।इसका मुझे ज़रा भी गुमान नहीं था। हालांकि वो आत्मा कांकेर स्थित निवास स्थान पर ही रहती थी।
बड़ी बहन इंदिरा जो वर्षो से पागल थी, ने घोर निराशा की वजह से चूहा मार दवा खाकर आत्महत्या कर ली। उसके दाह संस्कार आदि के लिए मैं कांकेर गया परिवार सहित। रात्रि में परछी में हम सोये। रात्रि में ही भाभी की आत्मा ने मेरी पत्नी के पैर खींचने का प्रयास किया। पत्नी को उसकी उपस्थिति का आभास भी हुआ। सबेरे उसने यह बात बताई तो मैंने गंभीरता से नहीं लिया ,सिर्फ वहम समझा। भला मरने के बाद भी कोई आ सकता है !
        वापसी पर वो दुष्ट आत्मा पत्नी के शरीर में प्रवेश कर साथ2 आ गयी। पर सब कुछ सामान्य होने से कोई आभास नहीं हुआ।
         इधर बाद में कई दिनों से पत्नी का चिड़चिड़ापन दिखने लगा था।जिसे मैंने तनाव और शायद कमजोरी के कारण समझा। कभी वह छोटी बिटिया को बहुत पीटती जबकि छोटी होने के कारण ज्यादा लाडली थी।
एक बार ठन्डे दिमाग से सोंचने पर मुझे कुछ शंका हुई।
रविवार के दिन अचानक मैंने उससे कहा चल घूमकर आते है।और स्कूटर में बिठाकर ले जाने लगा।उसने पूछा कहा ले जा रहे हो? मैंने कहा बस एक जगह से आते है। और सीधे एक (थान) देवस्थान ले गया।
       अनेक लोगो के बाद जब हमारा नं आया तो तुरंत पत्नी को क्रोध भरा आवेश आ गया। बाबाजी(थान के) से भी बहस करने लगी-तू मेरा क्या बिगाड़ लेगा? इसने मुझ(यानीे मैंने)बहुत तड़फा2 कर मारा है। मैं तो इसे((पत्नी को) लेकर ही जाउंगी, आदि। अब भेद खुल चुका था कि डायन की आत्मा का अटैक हो चुका है।
अब मुझे भी क्रोध आ गया-हरामजादी तेरे ज़िंदा रहते तो तेरे से डरा नहीं,तेरे मरने के बाद क्या डरूंगा ।
बाबा जी ने बंधन कर आवेश शांत किया। और मैं सावधान हो गया।वह डायन आत्मा भी सहम गयी कि उसका भेद खुल गया।
    इसी बीच मेरे ससुराल की कुलदेवी ने मेरी सास की दिवंगत आत्मा को निर्देशित किया कि जाओ अपनी बेटी(मेरी पत्नी ) के शरीर में रहकर उसकी रक्षा करो।
(ये रहस्य छोटे2 टुकड़ों में मेरे सामने खुले)।एक बार मेरी सास पत्नी के शरीर में आकर मेरी खिंचाई की तो पता चला। दरअसल मैंने भैरव बाबा से समस्त भूत प्रेत को बांधने की प्रार्थना की थी,चूँकि मेरी सास की आत्मा भी मेरे घर के लिए प्रेतनी ही थी,अत: वह भी बंधन में आ गयी और उन्हें तकलीफ होने लगी। ये बात स्वयं आत्मा ने ही मुझे कहा। मैंने तुरंत भैरव बाबा से प्रार्थना की ,कि पितरो और हमारी रक्षा करने आई आत्माओ को बंधन मुक्त करदे उन्हें तकलीफ मत हो। तुरंत 5 मिनट में सब शांत हो गया।
        कुछ दिनों बाद होली आ गयी। उस दिन पत्नी ने कहा आज मेरे जाने का दिन है। आखरी दिन है। रात्रि हुई घर की छत पर उल्लू भी आकर बैठ गया और आवाज करने लगा। मुझे भी शंका हो गयी अब।मैंने अपनी कुलदेवी के सामने जाकर गुस्सा हो बोला मैं तेरी पूजा करता रहता हूँ,यदि मेरी पत्नी को कुछ हुआ तो तेरी पूजा सदा के लिए बंद कर दूंगा,और तो और मेरी आने वाली पीढ़िया भी तेरी कभी पूजा नहीं करेगी।
रात्रि में सोने के बाद सपने में पत्नी को प्रेतनी भाभी दिखाई दी कि तुझे लेने आई हूँ। फिर एक थाली दिखाई दी जिसमे एक बिल्ली बैठी हुई थी।फिर एक चमकदार तलवार ऊपर से गिरती दिखाई दी उसके बाद बिल्ली उठकर चली गयी। रात्रि में ही पत्नी ने मुझे जगाने की कोशिस की पर मैं तो घनघोर नींद में था। सुबह होने पर रात्रि वाली बात बताई पर चमकदार तलवार जैसी चीज के बारे में समझ नहीं पा रही थी,तो मैंने माताजी की तस्वीर के पास ले जाकर दिखाया-ऐसी थी न? उसने तलवार का चित्र पहचान लिया। तब समझ में आया कि माताजी ने रक्षा की मेरी पुकार पर।
           इसी बीच कुछ समय बाद हमने किराए का घर बदल लिया। कुछ महीने बाद कभी डायन भाभी की प्रेतात्मा का आभास मेरी पत्नी और खुद मुझे भी हुआ। जब पत्नी से पूछने के बाद समझ में आ गया कि दुष्टा फिर से हमारे चक्कर लगा रही है तो मैंने भैरव प्रयोग किया। रात्रि में सपने में भैरव जी उस दुष्टात्मा को तालाब में डूबा2 कर मारते दिखाया। उसके बाद वो कभी नहीं आभास दी।
(आगे और है-ये सब क्यों हुआ)

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