23 अगस्त 2016

जंगल में रात्रि 3 बजे कौन था?

सन् 1973 लगभग वर्ष रहा होगा,9 वीं पढ़ते थे आयु करीब 15 वर्ष । एलिमेंटरी बायोलॉजी भी सब्जेक्ट था। टीचर नरेश तिवारी जी ने कैम्प लगाने का फैसला किया जंगली इलाके में ताकि हम लोग पेड़ पौधों के प्रकार आदि को देख सके और बायोलॉजी और अच्छी तरह समझ सके। 5-7 लडके ही क्लास में जाने को तैयार हुए।
कांकेर की दुधनदी का उद्गमस्थल मलांजकुड़ुम जो एक अविकसित पिकनिक स्पॉट भी था,वहां तम्बू लगाकर,खुले आसमान के नीचे चावल दाल सब्जी बनाकर खाना और झरने/नालेनुमा नदी में नहाना बड़ा आनंददायक था। जंगलो में भटकना ये सब आनंद शहरों में कहाँ।
रात्रि में खा-पीकर  तम्बू के भीतर ही हम सब सो गए। रात्रि करीब 3 बजे सर ने हम सबको जगाया और चुप रहने का इशारा किया,हम भी डरकर खामोश ही रहे कि आखिर बात क्या है!
तम्बू के आसपास उस जंगल में कोई व्यक्ति घूम रहा था जिसकी आवाज सर ने सुन लिया था,खतरा न हो इसलिए हम सबको जगा दिया था। गाँव तो काफी दूर था वहां से। तभी हम सभी ने किसी को तम्बू के बाहर किसी को पुकारते सुना- "कोई है क्या बाबू,कोई जाग रहे हो क्या?कोई बीड़ी वगैरह तो पिलाओ"। मैंने भी साफ़2 सुना, पर किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। क्योकि चुप्पी रखने का इशारा हुआ था। फिर वो व्यक्ति चला गया।
दूसरे दिन दोपहर को कोई ग्रामीण आया हुआ था उससे सर ने कोई बात की उसे बताया जो हम कोई नही सुन पाये। सिर्फ इतना ही सुना-वही था क्या? ग्रामीण ने जवाब दिया-हाँ वही होगा।
हमने सर से पूछा-कौन तरह होगा सर?पर उन्होंने नहीं बताया,बाद में बताऊंगा कहकर टाल दिया कि हम बच्चे न डर जाए कही और वापस घर जाने की जिद न कर बैठे।
आजतक मैं समझ न पाया "वो कौन था" जो इतनी रात 3 बजे घने जंगल में तम्बू के पास आकर हमें आवाज दे रहा था। कोई प्रेत/भटकती आत्मा या गढ़िया देव(पहाड़ी का देव) या कोई साधु जो जगलो में तपस्या करते रहते है। कोई ग्रामीण तो रहा नहीं होगा इतनी रात को ! वहां जंगली जानवर भी रहते थे जिन्हें रोकने अलाव जला रखा था रात भर।

2 टिप्‍पणियां: