22 जून 2016

उस औघड़ ने मुझे बेवकूफ बना दिया

एक बार मैं अपने छठवे गुरु अग्रवाल जी के पास गया और पूछा-गुरूजी कोई असाधारण सिद्ध व्यक्ति कोई जानकारी में हो तो बतावे,मैं दर्शन करना चाहता हूँ
उन्होंने महासमुंद रोड में सतबहानिया देवी के छोटे से मंदिर में रहने वाले औघड़ श्री तारागिरि बाबा का पता दिया।
मैं निकल पड़ा उनसे मिलने। मैं ये भी भलीभांति जानता था कि सन्यासी लोग सांसारिक लोगो को घास भी नहीं डालते। सो पहली बार मैं कुछ फलफ्रूट लेकर केवल दर्शन करने के नाम से गया। वो तो शराब के नशे में था ही पर बातचीत में पूरी तरह से होश में था।उसने भेंट स्वीकार की आशीर्वाद भी दिया,फिर एक फल मुझे दिया घर ले जाने को,पर कोई अचरज वाली बात तो बताई नहीं।
   अब मुझे लगा बेकार ही आया,ये तो कोई साधारण साधू है पियक्कड़,हमेशा शराब के नशे में चूर रहने वाला। ये क्या ख़ाक सिद्ध होगा ! कभी थोड़ी बहुत सिद्धि मिली भी होगी तो नष्ट भी हो गयी होगी।
                  दूसरी तीसरी बार भी मैं गया तो भेंट स्वीकार तो की,देवी को पहले चढाने कहा फिर प्रसाद स्वरूप खुद ग्रहण किया। फिर उसने ध्यान से मुझे देखा और कहने लगे तुम्हे जो कुछ चाहिए वो तुम्हारे गुरु के पास ही मिल जाएगा जिसके बताने पर तुम यहाँ आये हो। इस बात पर मैंने खास ध्यान नहीं दिया।
            कुछ महीने बीत गया, उस औघड़ ने देह त्याग दिया। उसकी खबर मैंने अखबार में पढ़ी। कई दिन बाद मैं गुरु के पास गया ,बातो2 में हमने उस औघड़ के बारे में बात किया,मैंने कहा वो ख़ास सिद्ध नहीं लगे मुझे,क्योकि सिद्ध होते तो मुझे देखते ही जान जाते, मेरे बारे में कुछ ख़ास बात बताते तभी मुझे विश्वास होता।तब गुरु ने मुझे बताया वास्तव ने गुरु अपने बचपन से ही उन्हें जानते थे। बहुत निकटता थी उनकी उस औघड़ से।
                एक बार औघड़ ने मेरे गुरु को  गिरनार की पहाड़ी की तरफ जाने की इच्छा जाहिर की तो गुरूजी उनके साथ चल पड़े। वहाँ पंहुचने के बाद एक गुप्त गुफा में प्रवेश कर गए। वहां आम व्यक्ति नहीं जा सकता पर सिद्ध योगी/औघड़ के साथ होने से वे भी बिना बाधा के अंदर जा सके। वहां गुरु जी ने देखा अनेक तपस्वी साधना में लीन थे,औघड़ ने बताया वे लोग सैकड़ो हजारो साल से  तपस्यारत है। फिर थोड़ा घूमने और समय बिताने के बाद औघड़ ने गुरूजी को कहा तुम जाओ मैं कुछ दिन बिताने के बाद वापस आऊंगा। गुरूजी गुफा से बाहर निकले और प्रवेश द्वार के बाहर एक वृक्ष में गमछा(गले में लपेटने वाला कपडे का टुकड़ा)बाँध दिया और वापस लाज में ठहर गए।दूसरे दिन फिर उत्सुकतावश फिर पहाड़ी जा पंहुचे ताकि आजादी से अकेले फिर घूम सके।पहाड़ी घूमते रहे पर कोई गुफा उन्हें दिखाई नहीं दी।वृक्ष भी मिला,उसमे बंधा गमछा भी दिखा पर उस गुफा का प्रवेश द्वार नहीं दिखाई दिया।काफी भटकने के बाद थककर उन्हें समझ में आ गया कि बिना अनुमति कोई सांसारिक व्यक्ति तपस्वियों की गुफा में प्रवेश कर ही नहीं सकता। दिखाई ही नहीं देगा ऐसे गुप्त स्थान।
     अब ये सुन कर मैं सन्न रह गया,इतने बड़े सिद्ध तपस्वी से मिला,पर उन्होंने मुझे एक अति सामान्य शराबखोर साधारण व्यक्ति की तरह व्यवहार कर मुझे बेवकूफ बना दिया,और मुझे लगा कि मेरा उनके पास जाना फ़ालतू हो गया। वो मुझे और मेरे मकसद को जानकर भी अनजान की तरह व्यवहार किया।
         ऐसे ही होते है सिद्ध पुरुष लोग जो सांसारिक लोगो को अपने से दूर रखने के लिए जानकर भी अनजान बनने का ढोंग करते है।

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