सारे उथल पुथल पार करने के बाद,जो मेरे जीवन में अविश्वनीय रूप से, अंधविश्वास जैसी घटनाओ के रूप में आया। जिसे मैं किसी साधारण मित्र,वैज्ञानिक सोंच रखने वाले मित्र से शेयर नहीं कर सकता था। अगर करता हूँ तो वो तो यही समझेगा कि मेरे दिमाग का स्क्रू ढीला हो गया है,इसे साइकियाट्रिस्ट की सख्त जरुरत है।
या फिर सोंचा जायेगा कि ये घोर अंधविश्वासी है,या फिर दुष्टतावश कहानिया गढ़ रहा है।
खैर मैंने बहुत ही गहरे मित्रो से ही इन घटनाओ पर चर्चा किया। जिसमे एक दो वो मित्र भी है जो इन सब विषयों में रूचि रखते है,मुझसे भी ज्यादा गहरी समझ रखते है।
पर मेरे मन में नयी उथल पुथल मचती रही आखिर ये सब मेरे साथ ही क्यों हुआ। ईश्वर से मेरी क्या दुश्मनी थी जो मुझे ये दिन देखने पड़े।या मैंने ब्रम्हा की कौन सी भैंस खोल दी थी जो मेरे भाग्य में ये सब लिख दिया। अब ये सब जानने की प्रबल जिज्ञासा मेरे मन में कई वर्ष बनी रही। मैं किसी सिद्धि प्राप्त व्यक्ति की तलाश में रहा,कोईं मिल ही नहीं रहा था। आजकल तपस्वी/साधना करने वाले लोग बहुत कम लोग होते है। अगर कोई इच्छुक भी हो तो उसे भूखों मरने की नौबत अवश्य आती है। यदि कोई कष्ट पाते हुए भी किसी प्रकार की सिद्धि प्राप्त कर भी ले तो अपने आपको छुपा कर ही रखेगा,आम लोगो के रवैये को देखते हुए इसी में अपनी भलाई समझेगा।
कुछ वर्षो बाद मेरी धर्म पत्नी धुलिया महाराष्ट्र गयी तो वहां एक सिद्ध व्यक्ति(तांत्रिक) के पास पंहुचने का अवसर मिला। उसे सचमुच सिद्धि प्राप्त थी। बिना पूछे उसने मेरे घर परिवार और व्यवहार के बारे में बता दिया। मेरी पत्नी ने लौट कर सब बताया तो मैं आश्चर्य चकित हो गया। मेरी भी उसके पास जाने की इच्छा बलवती हो गयी।
आखिर मैं भी वहां पहुँच गया। मेरी बारी आई तो काली माई उसके शरीर में आ गयी। मैं भूल न जाऊ इसलिए पाकेट डायरी में लिख कर ले गया था। पर वहां तो पूछने की नौबत ही नहीं आई। मेरे कुछ पूछने के पहले ही देवी ने उसके मुख से कहा- तुम्हारे मन में ये प्रश्न है न जो कुछ घटनाये तुम्हारे साथ घटी,उसका कारण क्या है। मेरे हां कहने पर उन्होंने कहा-तुम्हारे कोई पूर्वज ब्याज का धंधा करते थे(गिरवी रख उधार देने का)। उसमे लोगो की मज़बूरी का फायदा उठाकर खूब लूटा खसोटा। मैंने ये कहा वो मेरे परदादा थे।उसने कहा वो जो कोई भी हो,मुझे कोई मतलब नहीं। उसी कर्म का भुगतान तुम कर रहे हो यानी उनके पाप को चुकता करने का।
और सारे प्रश्न जो मेरे मन में थे जवाब उसने दे दिया। और यह भी कहा पूर्वजो के कर्ज और पाप को संतानो या आने वाली पीढ़ी को चुकाना पड़ता है। ये सुन कर मेरा दिमाग ही घूम गया।
अब नया प्रश्न उठ गया। आखिर मैं ही क्यों चुकता करूँ। परिवार में और भी लोग तो थे।उनपर क्यों नहीं बीती ! सोंचते 2 यह भी याद आया कि बचपन से तिजोरी के ऊपर लिखा हुआ नाम " सेठ करणीदान रावलमल बाफना" नाम में से "करणीदान" नाम से मुझे आकर्षण महसूस होता था। कही उन्ही का तो पुनर्जन्म तो नहीं हूँ मैं ,पुराने कर्मो को चुकता करने! बाद के बर्षो में मैं अपने दादा जी के परिवार में ,जहां से वे मेरे परदादा के यहाँ से गोद में आये थे(क्योकि मेरे परदादा की कोई संतान नहीं थी,अपने भाई के पुत्र को गोद में ले लिए थे),जा पंहुचा। वहां वृद्ध महिला से थोड़ी सी जानकारी मिली तो पाया परदादा करणीदान की रुचियाँ मुझसे बहुत कुछ मिलती है। और ये भी कि वे देवीभक्त भी थे! अब यह स्पष्ट हो गया कि मैं ही अपने परदादा सेठ करणीदान का पुनर्जन्म हूँ। इसीलिए देवीकृपा शुरू से मेरे साथ रही जबकि मैं युवावस्था में घोर नास्तिक था।पर मुझे मेरा पिछलाजन्म मुझे ज़रा भी याद नहीं आता। राजस्थान में पुराना अपने परदादा का खंडहरनुमा घर भी देखा,फिर भी कुछ नहीं याद आया।
(समाप्त)
जिज्ञासा ने मुझे विभिन्न जांच और प्रयोगो के लिए ऊर्जा दी , उसके परिणाम मैं जिज्ञासु हिंदीभाषी पाठको के लिए प्रस्तुत करता हूँ , ताकि जो मैंने पाया वह औरो तक पहुंचे . In Search of Truth, My experiments went on, Here I present in Hindi - for the Curious Indian People-रेणिक बाफना ,रायपुर (छ.ग.)भारत [My another Blog->renikbafna@blogspot.com(MERE VICHAR)] Whatsapp-94063-00401, Please do not Call, only whatsapp
19 नवंबर 2015
ऐसा भी होता है- (13)(धारावाहिक सत्य घटना)
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आपके अनुभव कमाल के।
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